जीवन का आधार है जल और धरती-इन्हें बचाइए

स्वनामधन्य बंकिमच चट्टोपध्याय ने अपने उपन्यास ‘‘ आनंदमठ में मातृभूमि की वंदना ने वंदेमातरम राष्ट्रीयगीत प्रथमत: जिन शब्दों का प्रयोग है, वह भारत की ऋषि और कृषि संस्कृति की महिमा का प्रतिपादन करती है। मातृभूमि की वंदना में कहे गये पहले तीन शब्द हैं सुजलां, सुफलां, मलयजसीतलम और फिर कवि कहता है, सस्य, श्यामला मातरम् अर्थात हमारी वंदनीया मातृभूमि भारत की नंदिया जल से भरपूर है, गंध वृक्ष, फलों से सदा लदे रहते हैं, ऐसे शीतल मंद सुगंध वायु से सुरभित परम पवित्र भारत माता का हम वंदन करते हैं-वंदेमातरम्। मां भारती की वंदना में रचे गये थे ये शब्द वास्तव में भारत की धरती, प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा को समर्पित हैं। आज जब प्रकृति नदियां नालों में परिवर्तित नदियां नालों में परिवर्तित हो रहे हैं तथा देश जल संकट के दरवाजे पर खड़ा है। वायु प्रदूषण के कारण समस्त वातावरण प्रदूषित हो रहा है, ऐसी स्थिति में आवश्यकता इस बात की है, कि हम विषय की गंभीरता को समझें और पर्यावरण, प्रकृति तथा धरती की रक्षा के लिए कटिबद्ध हों।

भारत के ऋषियों तथा मनीषियों ने प्रारंभ से ही प्रकृति को संपूज्य माना है। वेदों में विचार वर्णन है। अर्थवेद के बारहवें कांड का प्रारंभ पृथ्वी सूक्त से होता है। इस सू्क्त में 63 मंत्र हैं, जिसमें पृथ्वी का शब्दार्चन किया गया है। संपूर्ण पृथ्वी को माता के रूप में स्वीकार करके भारत का ऋषि उसकी स्तुति करता है। प्रारंभ के मंत्रो में ऋषियों ने धरती महिमा का वर्णन किया है।

असंबाधं मध्यतो मानवानां
यस्या उद्धत: प्रवत: समं बहु।
नाना वीर्या औषाधीर्या विभर्ति
पृथ्वी न: प्रधंता राध्यतां न:।

इसका विद्वानों ने सुंदर अनुवाद किया है।

उन्नत प्रदेश, उत्तुंग शिखर शिखर अति सुंदर,
नीची वसुंधरा नीचे बहते निर्झर,
वे हरे भरे मैदान मनोरम समतल,
मानव के समुंख सावकाश अगणित थल

वैदिक ऋषियों ने धरती को ईश्वर का ही रूप माना है और उसी प्रकार से अर्चन किया है।

यस्य भूमि: प्रभाऽन्तरिक्षामुतोदरम्
दिवं यशचक्रे मूर्धाने तस्मै ज्येष्ठाय ब्रम्हणे नम:॥

अर्थात भूमि किसकी पादस्थानीय और अंतरिक्ष उदर के समान है अर्थाथ धुलों के जिसका सिर है, ऐसे विराट ब्रम्ह को मेरा नमस्कार है। ृऋषि कहता है कि यह वह भूमि है जो हमें धारण करती है हमारा भरण पोषण करती है और साथ ही हमेें वैभव प्रदान करती है, ऐसी धरती मां हमारा सदैव रक्षण करे।

विश्वम्भरा वसुधानी प्रतिष्ठा।
हिरष्य वक्षा जगतो निवेशानी॥
वैश्वानर विभ्रती भूमिरग्नि
मिन्द्र ऋटष्मा द्रविणे जो दधांतु॥

जो विश्व भरण करती है,धरती धन को
आश्रय बनकर देती निवास जन-जन को
सोने की खान अहोजिसका वक्ष:स्थल
रखती वैश्वानर को निज अन्तस्तण
है इंद्र वृषभ, जिस धेनुमयी धरणी के
वह भदेवी वैभव दे हम को नीके॥

आषाढ़ मास, वर्षा के आगमन का मास है। बैशाख महीने—-सूर्य के ताप से दग्ध धरती पर वर्षा के जल की बूंदे अमृत समान होती है। अत: वेदों में वर्षा ऋृतु को जीवन दायिनी उत्सव के रूप में स्वीकार किया गया है। वर्षा का स्वागत करने के लिए सभी का आव्हान करते हुए वैदिक ऋषि कहता है-

ब्राम्णोसो अतिरात्रे न सोमे सरो न पूर्णमयितो वदन्त:।
सवंत्सरस्य तदह: परिष्ठ यन्मण्डूका: प्रावषीणं बभूव॥

अर्थात पहली वर्षा के दिन मेढक जलाशयों, कुण्डों तथा सरोवरों को पूरी तरह से भर जाने की इच्छा से खूब कोलाहल करते और इधर-उधर स्थिर हो जाते हैं। उसी प्रकार हे ब्राम्णों! तुम भी रात्रि बीत जाने के बाद ब्रम्हमुहूर्त में वेद के गान से वर्षा ऋतु का स्वागत करो और उत्सव मनाओ। प्रारंभ से ही हिंदू सभ्यता और संस्कृति में जल का विशेष महत्व है। एक बार किसी जिज्ञासू भाव वाले व्यक्ति ने एक महात्मा से पूछा कि हिंदू जाति का कोई एक ऐसा गुण बतलाइए, जो उसे अन्य जातियों से अलग करता हो। महात्मा का उत्तर था ‘‘हिंदुओं की जल के प्रति आस्था तथा उनकी जलप्रियता। यह बात बिल्कुल ठीक भी है, क्योंकि हिंदुओं के प्रत्येक पर्व, उत्सव, रीति-रिवाज, परम्परा सभी में सबसे पहले स्नादि करके पवित्र होने की प्रथा है। हिंदुओं के सभी तीर्थ और धार्मिक स्थल किसी न किसी नदी या सरोवर के किनारे बसे हुए हैं। साथ ही हिंदुओं के धार्मिक विधान और पूजा विधि में स्नान, मार्जन, आचमन आदि में जल का ही महत्व है। संकल्प, अर्पण, दर्पण में भी जल का प्रयोग होता है। वेदों में भी जल की पवित्रता, शुद्धता, निर्मलता और उसकी स्वच्छता पर बहुत अधिक जोर दिया गया है। अर्थ वेद में कहा गया है कि घर हमेशा ऐसे जलाशय के पास होना चाहिए, जिसका जल शुद्ध हो।

इमा आप: प्र भराभ्यक्ष्मा यक्ष्मानाशनी:।
गृहानुप प्र सीदाम्यमृतेन सहागिना॥

अर्थात शुद्ध, निर्मल तथा रोगनाशक जल का पना करके मैं मृत्यु से बचा रहूंगा। शुद्ध जल आदमी को चिरंजीवी बनाता है, इससे आयु बढ़ती है। आरोग्य मिलता है तथा व्यक्ति स्वस्थ्य रहता है। यह भाव वेद की निम्मन ऋचा में देखने को मिलते हैं।

शं नो देवीरभिष्टय आयो भवन्तु पीतसे
शं योरभि स्त्रवन्तु न:

अर्थात स्वच्छ तथा आरोयग्य युक्त जल हमारे मनोरथ को पूर्ण करने तथा सुख प्रदान करे के लिए निरंतर प्रवाहित होता रहे। जल हमेशा हमें सुख और समृद्धि प्रदान करे।

कृषि कर्म के लिए जल को उपयोगिता और आवश्यकता, साथ ही उसके संरक्षण सवर्धन के महत्व को भारत के ऋषि ने पहले ही समझ लिया था।

तस्मा अरं ग्गाम वो यस्य क्षयाय बिन्वथ
आयो जनय था च न:

हे जल! तुम अन्न की प्राप्ति के लिए उपयोगी हो। तुम पर जीवन तथा नाना प्रकार की औषधियां, वनस्पतियां एवं अन्न आदि पदार्थ निर्भर हैं। तुम औषधि के रूप हो। आज जब शहरीकरण और औद्योगीकरण से धरती का विनाश किया जा रहा है। प्रदूषण से पूरे वातावरण में जहर फैलता जा रहा है। महानगरों में प्रदूषण के कारण बीमारियां बढ़ रही हैं। भारत की सबसे पवित्र और सदानीरा नदियां गंगा और जमुना जिनके तट पर भारत की सनातन संस्कृति का विकास हुआ है, वे विनाश के कागार पर है। लाखों-करोड़ों रुपयों के गंगा यमुना बचाओ अभियान के बावजूद भी गंगा और यमुना के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है। एक तरफ तो ऋषिकेश, हरिद्वार और वाराणसी में प्रतिदिन सांयकाल गंगा की आरती हो रही है, दूसरी ओर गंगा में गंदे नालों और गटर के पानी रोकने के लिए कोई प्रयत्न नहीं हो रहे हैं। हरिद्वार में गंगा के किनारे-किनारे बालू, रेती के लिए खनन हो रहा है और उस खनन को रोकने के लिए अनशन कर रहे स्वामी श्री निगमानंद की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होती है किंतु फिर भी समाज मौन है। ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है, ऐसी परिस्थिति में आगे आने वाले दिनों में जल संरक्षण और जल संवर्धन के लिए सुनिश्चित प्रयत्न करने होंगे, ताकि हमारी नदियां सदानीरा बनी रहें और जीवन के लिए जल मिलता रहे। उधर हिमालय में ब्रम्हपुत्र के उद्गम स्थल पर, जो चीन के क्षेत्र में पड़ता है, वहां उसने बांध बनाकर ब्रम्हपुत्र के जल को रोक दिया है। असम के मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी है कि चीन द्वारा ब्रम्हपुत्र पर बांध का निर्माण पूरा होने पर ब्रम्हपुत्र का जल भारत में नहीं आएगा और भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र असम, मणिपुर, नागालैण्ड, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश में जल की कमी होगी और वे सूखे से प्रभावित होंगे। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि चीन ने वर्ष 2007 से ब्रम्हपुत्र के उद्गम स्थल पर बांध बना कर उसकी दिशा और धारा मोड़ने के लिए जलाशयों (रिसर्वायर) का निर्माण शुरु कर दिया था, किंतु भारत सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और चीन की सरकार से निर्माण का उसने कोई विरोध नहीं जताया। ज्ञातव्य हो कि ब्रम्हपुत्र तीन देशों से होकर गुजरती है वह है चीन, भारत तथा बंग्लादेश। ब्रम्हपुत्र के जल पर तीनों देशों का अधिकार है किंतु चीन ने इसकी अनदेखी करके और भारत सरकार की कमजोरी का फायदा उठाकर, बांध, जलाशयों का निर्माण किया है। चीन ब्रम्हपुत्र के जल से वहां पर बिजली का उत्पादन करेगा और सिंचाई के लिए उस जल का उपयोग करेगा। किंतु भारत के उत्तर पूर्व राज्यों के लोग सूखे से प्रभावित होगें। देखना यह है कि भारत की सरकार इस समस्या से कैसे निपटती है। विदेश मंत्री का बयान आया है कि वे स्थिति पर नजर रखे हुए हैं और सरकार उत्तर पूर्वी राज्यों के हितों की रक्षा करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि भारत को ब्रम्हपुत्र का जल प्राप्त होता रहे। तथापि, देश के जागरूक नागरिक होने के नाते हम सबका कर्तव्य है कि हम अपनी पवित्र नदियों को बचाएं, जल को स्वच्छ रखें और उसका संरक्षण करें, नहीं तो हमारा विनाश सुनिश्चित है।

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