मर्डोक के साम्राज्य को धक्का

कोई समाचार पत्र 168 वर्षों तक प्रकाशित हो, उसकी खूब खपत हो, वह भरपूर लाभ कमा रहा हो, फिर भी अचानक बंद कर दिया जाय तो एक जबरदस्त आघात लगता है। ऐसा ही आघात इस समय लंदन के निवासियों को लगा है। ‘‘द न्यूज आफ दि वर्ल्ड’’ वहां का एक प्रसिद्ध समाचार पत्र है, जिसके अंतिम अंक के पहले पृष्ठ पर ‘‘थैंक्यू एंड गुड बाय’’ ये तीन शब्द छपे हैं। संचार माध्यमों के सम्राट रूपर्ट मर्डोक ने इस समाचार पत्र को वर्ष 1984 में खरीदा था। सामान्यत: यह प्रश्न उठता है कि लाखों की संख्या वाला, अच्छी तरह से चल रहा समाचार पत्र एकाएक क्यों बंद हो गया?
इसका एक वाक्य में उत्तर है कि समाचार पत्र के व्यवसाय में की गयी अनैतिकता। रूपर्ट मर्डोक के समाचार पत्र ‘दि न्यूज आफ वर्ल्ड’ ने कई गंभीर गड़बड़ियां कीं। गड़बड़ी से तात्पर्य है कि सनसनाखेज समाचार प्राप्त करने और बनाने के लिए इस समाचार पत्र में काम करने वाले पत्रकारों ने राजनेताओं, इंग्लैंड के राजघराने, अफगानिस्तान के युध्द में गये सैनिकों, आतंकवादी कार्रवाई में मारे गये नागरिकों के फोन हैक कर लिए। फोन टैपिंग करने का अर्थ है, फोन पर की जा रही वार्ता को चोरी से सुनना, जबकि फोन हैक करने का मतलब है, फोन छीन लेना या उस पर अधिकार कर लेना। हैक किए गये नंबर पर किसी से भी बात की जा सकती है, उस नंबर का हर तरह से उपयोग किया जा सकता है। यह प्रकरण पिछले दिनों खुल गया। इससे लंदन के निवासियों पर मानो बम गिर गया हो।

वस्तुत: हुआ यह कि वर्ष 2002 में मिली डेवलर नाम की 13 वर्ष की लड़की का अपहरण कर लिया गया था। उस लड़की का फोन ‘दि न्यूज आफ दि वर्ल्ड’ के पत्रकारों ने हैक कर लिया और फोन की आवाज का कुछ अंश उड़ा लिया। उस लड़की की हत्या कर दी गयी थी, किंतु इस समाचार पत्र ने लड़की के माता-पिता के मन में उसके जीवित होने की आशा जगाए रखी। इस राज के खुल जाने से इंग्लैंड की जनता में खलबली मच गयी। राजनीति और अन्य क्षेत्र के प्रसिद्ध लोगों की बातचीत का बनावटी खेल इस समाचार पत्र ने खोला था। ऐसे ही एक बार सिएन्ना मिलर नाम की अभिनेत्री के मामले में उसे बड़ा हरजाना चुकाना पड़ा था। किंतु डेवलर के मामले में लंदन की जनता ने हल्के में नहीं लिया। यह आग में घी डालने जैसा हुआ। पत्रकारों ने समाचार प्राप्त करने के लिए पुलिस अधिकारियों को रिश्वत दी थी, यह भी सामने आ गया। राजघराने की खबर निकालने के लिए वहां के सेवकों को रिश्वत दी थी। इन घटनाओं के कारण जनता में यह आक्रोश उभरने लगा कि इस समाचार पत्र का बहिष्कार करना चाहिए। विज्ञापन देने वाली बड़ी कंपनियों ने इसे विज्ञापन देना बंद कर दिया, क्योंकि बदनाम समाचार पत्र के साथ संबंध जोड़ने से उन्हें बदनामी का डर था।

इस समाचार पत्र की खपत 75 लाख प्रतियों की थी। 168 वर्षों की उसकी परम्परा थी। यह काल खंड 1843 से 2011 ई. तक है। जनता ने इस समाचार पत्र को मटियामेट कर दिया। ध्वस्त होने के पश्चात अंतिम सम्पादकीय में जो लिखा गया, वह उसके मालिक रूपर्ट मर्डोक की गर्वोक्ति का उदगार था। उनके शब्द थे, ‘‘ हम उच्च स्तर की प्रशंसा करते हैं, उच्च स्तर की इच्छा रखते हैं, किंतु इस समय हम अत्यंत कष्टदायक स्थिति में पहुंच गये हैं। 2006 ई. तक कुछ लोग हमारे लिए कार्य कर रहे थे। हमारे नाम से कार्य कर रहे थे। अर्थात ऊपर दिए गये मापदंड लज्जास्पद तरीके से नष्ट किए गये। हमने अपना मार्ग खो दिया। फोन हैक किए गये। इसलिए यह समाचार पत्र जिम्मेदारी पूर्वक दु:ख व्यक्त करता है’’

ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन ने रूपर्ट मर्डोक के मीडिया साम्राज्य पर आरोप लगाया है कि व्यक्तिगत जानकारी प्राप्त करने के लिए मर्डोक की कम्पनी ने कुख्यात अपराधियों की सहायता ली है। इंग्लैंड की ससंद में भी विपक्ष ने मर्डोक के समाचार पत्र के विरूद्ध जोरदार आवाज उठाई है।

गार्डन ब्राउन के प्रधानमंत्री रहते हुए उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। 2006 ई. में मर्डोक के स्वामित्व वाले ‘सन’ समाचार पत्र ने उनके पुत्र के बीमार पड़ने की खबर विस्तार से प्रकाशित की। ब्राउन के सामने प्रश्न उठा कि अपने नवजात पुत्र के बीमार होने की खबर, निहायत व्यक्तिगत होने पर भी सार्वजनिक कैसे हुई? इस समाचार के सार्वजनिक होने से ब्राउन की पत्नी दुखी हुई। वर्तमान प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने पूर्व प्रधानमंत्री के वक्तव्य पर सहानुभूति व्यक्त की है। यह व्यक्तिगत मामलों पर आक्रमण है।

इस समाचार पत्र के मालिक रूपर्ट मर्डोक हैं। उनका जन्म आस्ट्रेलिया में हुआ था। समाचार पत्र के क्षेत्र में वे सिरमौर हैं। अंग्रेजी समाचार पत्रों की भाषा में ‘मीडिया मुगल’ हैं। ‘न्यू कार्पोरेशन’ कंपनी के वे सी.ई.ओ. हैं। उन्होंने अपना कार्य एक समाचार पत्र से शुरू किया था और धीरे-धीरे दूरदर्शन के क्षेत्र में आये। उन्होंने अमेरिका में वर्ष 1986 ई. में ‘फाक्स ब्राडकास्टिंग’ कंपनी की स्थापना की। वर्ष 200 में सैटलाइट टेलीविजन क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों में वे अग्रणी बने। उन्होंने अमेरिका का प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘दि वाल स्ट्रीट जर्नल’ खरीद लिया। विश्व के अत्यंत महत्वपूर्ण ‘टाइम’ और ‘फोर्ब्स’ साप्ताहिकों ने उन्हें नामांकित किया। उनकी कुल सम्पत्ति 6.3 बिलियन अमेरिकी डालर है। विश्व के सबसे बड़े धनी व्यक्तियों में उनकी गणना की जाती है। उन्होंने सन् 1969 ई. दि ‘सन’ समाचार पत्र खरीद लिया। उसका स्वरूप बदलकर उसे टेब्लाइड आकार में ले आए। सन् 2006 में उसकी खपत तीस लाख प्रतियां थीं। सन् 1981 ई. में उन्होंने ‘दि टाइम्स’ और ‘दि सन्डे टाइम्स’ दोनों समाचार पत्रों को खरीद लिया।

उनका राजनीतिक प्रभाव भी खूब था। मार्गरेट थैचर और टोनी ब्लेयर के साथ उनके घनिष्ट संबंध थे। उन्होंने इंग्लैंड में दूरदर्शन के क्षेत्र में पदार्पण किया। सर्वप्रथम ‘स्काई टेलीविजन’ नामक कंपनी शुरू की और ब्रिटिश सैटलाइट ब्राडकास्टिंग कंपनी में अपनी कपनी का विलय कर दिया। आज ब्रिटिश स्काई ब्राडकास्टिंग कंपनी को 12 बिलियन डालर में खरीदने की तैयारी की थी। किंतु वर्तमान प्रकरण के चलते ब्रिटेन सरकार ने इस खरीददरी को किनारे कर दिया है। ‘दि न्यूज आफ दि वर्ल्ड’ के भूतपूर्व सम्पादक एण्डी कोल्सन, कम्पनी की सीईओ और पूर्व सम्पादक रेबेका बु्रक्स को गिरफ्तार कर लिया गया है। कोल्सन प्रधान मंत्री डेविड कैमरून के भी मीडिया प्रमुख थे। उनके साथ ही क्लाईव गुडमन को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। रूपर्ट मर्डोक के साम्राज्य और राजकीय लोगों की सुरक्षा के विषय में क्या परिणाम होंगे, इस पर भी चर्चा शुरू हो गयी है। कुल मिलाकर रूपर्ट मर्डोक के साम्राज्य को जबरदस्त धक्का लगा है।

इस समय समाचार पत्रों की नैतिकता और उनके बाजारीकरण की चर्चा भारत में भी होने लगी है। समाचार पत्र अपने उद्देश्य से भटक गये हैं, ऐसा माना जा रहा है। एम.बी. कामत ने आज की पत्रकारिता के लिए ‘वेश्या’ जैसे कटु शब्द का प्रयोग किया है। आज यह मंत्र बन गया है कि समाचार पत्र भी एक वस्तु के रूप में बाजार में बिकना चाहिए। पहले समाचार पत्रों में कुछ जगह विज्ञापनों के लिए छोड़ी जाती थी। आज समाचार का स्थान बेचा जाने लगा है। इसे ‘पेड न्यूज’ कहा जाता है। बड़े-बड़े समाचार पत्रों के पत्रकार बड़ी बड़ी कंपनियों के लिए काम कर रहे हैं। राडिया टेप कांड में बरखा दत्त और वीर सिंघवी का नाम आया था। इसकी भी खूब चर्चा हुई। महाराष्ट्र में ‘लोकसत्ता’ के सम्पादकीय में संघ और संघ से प्रेरणा लेकर कार्य कर रही संस्थाओं के विरुद्ध असत्य और भ्रम फैलाने वाले लेख बहुत दिनों तक प्रकाशित किये गये। इस समय सम्पादक बदल दिये जाने के कारण इस पर रोक लग गयी है। न चाहने पर भी ‘मुंबई मिरर’ को ‘टाइम्स आफ इंडिया’ के साथ लेना पड़ता है और कीमत चुकानी पड़ती है। यह सब खपत बढाने के लिए किया जाता है। ‘दि न्यूज आफ दि वर्ल्ड’ ने पाठकों और विज्ञापनदाताओं के साथ जो किया क्या वह अपने यहां भी न होगा? यह प्रश्न सामने है।

रूपर्ट मर्डोक के प्रकरण से संचार माध्यमों के संबंध में अतिशय गंभीर प्रश्न उठते हैं। ये प्रश्न सार्वकालिक और लोकतंत्र के संदर्भ में हैं। लोकतंत्र में संचार माध्यमों को चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसका तात्पर्य क्या है? राजसत्ता के तीन अंग हैं-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। इन तीनों अंगों को अपना कार्य ठीक ढंग से करना चाहिए। उन पर अंकुश का कार्य संचार माध्यम करते हैं। थामस जेफर्सन ने एक बार कहा था ‘समाचार पत्र के बिना सरकार चाहिए या समाचार पत्र सहित सरकार चाहिए, यह विकल्प होगा तब मैं समाचार पत्र सहित सरकार का विकल्प स्वीकार करूंगा।’’ समाचार माध्यम के बिना सरकार का कोई अर्थ नहीं है।

पुलिस पर गाज

फोन हैकिंग प्रकरण की जांच के लिए ब्रिटिश सरकार ने लार्ड जस्टिस ब्रेन लेवेशन की अध्यक्षता में समिति गठित कर दी है। लंदन पुलिस के उच्च महकमे में भी हडकम्प मच गया है। पुलिस उपायुक्त जॉन येट्स ने इस्तीफा दे दिया है। इसके पूर्व पुलिस आयुक्त जॉन स्टीफन्सन ने त्यागपत्र दिया था।

ब्रिटेन की जनता के भारी विरोध के कारण रुपर्ट मर्डोक ने बड़े नाटकीय ढंग से प्रसारण सेवा बीस्काईबी के अधिग्रहण का इरादा त्याग दिया है। वर्तमान में मर्डोक के पास बीस्काईबी की 39 प्रतिशत हिस्सेदारी है। वे कम्पनी पर एकाधिकार जमाने के लिए कम्पनी की शेष हिस्सेदारी भी लेना चाहते थे। इससे उनकी कम्पनी ब्रिटेन की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी हो जाती, यहां तक कि बी.बी.सी. से भी बड़ी।

समाचार पत्रों का यह स्थान बना रहना चाहिए। सत्ता का अपने हित में दुरुपयोग करने वाले और सत्ता के इशारे पर नाचने वाले समाचार माध्यमों का कोई महत्व नहीं है। जब से समाचार माध्यमों को उद्योग का दर्जा दिया गया, तबसे लाभ कमाना ही एक उद्देश्य रह गया। समाचार माध्यमों द्वारा मतदाता तैयार करना, उसके द्वारा साख का निर्माण करना, लोकतंत्र के हित में नहीं है। रूपर्ट मर्डोक से यही संदेश मिलता है।

मर्डोक के विषय में ‘गुड लाइफ टुडे’ की सम्पादकीय में एक हास्यापद टिप्पणी की गयी है, ‘‘हम श्रेष्ठ गुणवत्ता की प्रशंसा करते हैं, हम श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना करते हैं-हा हा हा! टैब्लाइड के राजा मर्डोक हैं। वे झूठे हैं। झूठ और बनावट के माध्यम से उन्होंने करोड़ों डालर कमाया है। अरे रे रे किंतु वह पकड़ लिया गया।’’ अमेरिका में उनके खिलाफ लोकमत तैयार हो रहा है। लोग प्रश्न पूछ रहे हैं कि 11 सितम्बर की घटना में मारे गये लोगों के फोन मर्डोक कैसे टेप कर सकते हैं। उन्होंने एफ.बी.आई. को खरीद लिया है क्या? उन्हें समाचार पत्र बेचने की कला मालूम है। उसका अपने समाज पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है?

मर्डोक के प्रकरण में अंत में यही लगता है कि वर्तमान वैश्वीकरण के युग में मर्डोक और उनके भ्रष्ट आचरण की शैली केवल अमेरिका और ब्रिटेन तक ही सीमित नहीं रहने वाली है। भारत में भी इसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा, क्योंकि स्टार टी.वी. के माध्यम से मर्डोक ने भारत में भी प्रवेश कर लिया है।

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