दावा ठुकराना बीमा कंपनी को महंगा पड़ सकता है

बीमा कंपनियां ठााहकों को लुभाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाती हैं। हम सबको मालूम है कि वे स्वेच्छा से प्रीमियम स्वीकार कर लेती हैं। लेकिन जब बीमा राशि भुगतान करने की बारी आती है तो वे हर संभव बहाना करती हैं। प्राय: बीमा पालिसी में बहिष्करण उपबंध (एक्सक्लूजन क्लाज) का हवाला दिए बिना ही वे दावा ठुकरा देती हैं। ऐसे ही घटना जम्मू-कश्मीर के इसरदास मदनलाल के साथ हुई। लेकिन बीमा कंपनी के सामने झुकने या चुप होकर बैठ जाने के बजाए वे अदालत में गए और अंतत: उनकी जीत भी हुई।

इसरदास मदनलाल का आभूषणों का कारोबार था। उन्होंने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लि. द्वारा जारी ज्वेलर्स ब्लाक पॉलिसी ले रखी थी। उनकी दुकान से 63 हजार रुपये मूल्य का 140 ठााम आभूषण चोरी हो गया। उन्होंने पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई। लेकिन पुलिस चोर के बारे में पता नहीं लगा
सकी। इसरदास मदनलाल ने बीमा कंपनी के सामने अपना बीमा दावा पेश किया। बीमा कंपनी ने लंबे समय तक उनका बीमा दावा विचाराधीन रखा। इसरदास मदनलाल ने जम्मू और कश्मीर राज्य उपभोक्ता अदालत में दस्तक दी। राज्य उपभोक्ता अदालत के सामने यह मुद्दा विचाराधीन था
कि चोरी से हुई क्षति बीमा पॉलिसी के तहत कवर थी या नहीं।

राज्य उपभोक्ता अदालत में बीमा कंपनी की ओर से दलील दी गयी कि चोरी से हुई क्षति बीमा पालिसी में बहिष्करण उपबंध के कारण बीमा पॉलिसी की तहत कवर्ड नहीं थी। बीमा कंपनी के मुताबिक बहिष्करण उपबंध में स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि यदि ठााहक को आभूषण सुपुर्द किया जाता है और वह ठााहक बेईमानी या चोरी करता है तो उससे हुई क्षति बीमा पॉलिसी के तहत कवर नहीं होगी। उच्च न्यायालय ने ’सुपुर्द’ शब्द के मतलब पर गहराई से विचार किया। मामला था कि क्या एक ठााहक को आभूषण दिया जाना सुपुर्दगी माना जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि जब ठााहक दुकान में जाता है और गहनों को देखता-परखता है तथा उसे चुरा लेता है तो यह विशुद्ध चोरी का मामला है। ऐसे मामले में यह नहीं कहा जा सकता कि दुकानदार ने आभूषण ठााहक को सुपुर्द किया था। जम्मूकश्मीर उच्च न्यायालय ने दो टूक शब्दों में फैसला दिया कि इस मामले में इसरदास मदनलाल का बीमा दावा बहिष्करण उपबंध के दायरे में नहीं आता है। उच्च न्यायालय ने राज्य उपभोक्ता अदालत के फैसले को उलटते हुए कहा कि
बीमा कंपनी बीमा राशि का भुगतान करें।

जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के इस फैसले से असंतुष्ट बीमा कंपनी ने इस आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में दस्तक दी। सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मूकश्मीर उच्च न्यायालय के फैसले को उचित करार दिया। उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि चोरी बीमा पॉलिसी के दावे में कवर्ड है। सर्वोच्च न्यायालय ने फैसले में आगे कहा कि बीमा पॉलिसी जारी करते समय बीमा कंपनी यह निर्धारित करती है कि कितना जोखिम कवर्ड है और उसी के मुताबिक प्रीमियम वसूलती है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि बीमा पॉलिसी लेते समय बीमित व्यक्ति को भी मालूम होना चाहिए कि उसका कितना जोखिम कवर्ड है जिससे कि यदि जरूरी हो तो वह अतिरिक्त बीमा करवा ले। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब बीमा पॉलिसी में बहिष्करण उपबंध है तो यह बीमा कंपनी की जिम्मेदारी होगी कि वह यह साबित करे कि बीमा दावा बहिष्करण उपबंध के दायरे में आता है। यदि किसी तरह की अस्पष्टता है तो बीमित व्यक्ति के पक्ष में अनुमान लगाया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले को उचित करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह बीमा राशि का भुगतान इसरदास मदनलाल को करे। सुप्रीम कोर्ट ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह मुकदमे के खर्च के तौर पर 50 हजार रुपये की राशि भी उन्हें अदा करे।

ज्यादा अच्छा होगा कि बीमा कंपनियां निष्पक्ष दृष्टि से बीमा दावे का मूल्यांकन करें। मनमानी तरीके से बीमा दावा ठुकरा कर बीमा कंपनियां न केवल ठााहकों को परेशान करती हैं बल्कि, वो खुद को भी नुकसान पहुंचाती हैं क्योंकि उन्हें मुकदमेबाजी और मुआवजे का खर्च वहन करना होता है।

आपकी प्रतिक्रिया...