दो सींगो वाला गेंडा

पाच हजार साल पुरानी मोहन-जोदड़ो की संस्कृति में गेंड़े के अस्तित्व के सबूत मिले हैं। मृगपक्षीशाधर्िं ठांथ में गंड़क व खड्ग नामक दो किस्म के गेंड़ों का जिक्र आया है। पंद्रहवीं सदी तक पेशावर तक गेंड़े मिलते थे। बाबर (1519) द्वारा गेंड़े की शिकार का उसकी आत्मकथा में उल्लेख आया है।

गेंड़ा दक्षिण भारत में भी होता था। उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में वह उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों व रोहिलखण्ड में वह दिखाई देता था।

पृथ्वी पर जो विशालकाय प्राणी हैं उनमें गेंड़े का समावेश किया जाता है। विश्व में गेंड़े की पांच किस्में हैं। इनमें से दो किस्में अफ्रीका में वह व शेष तीन किस्में एशिया में थीं। अफ्रीका की गेंड़े की दोनों किस्मों में दो सींग होते हैं। एशियाई गेंड़ों में सुमात्रा में मिलने वाली किस्में दो सींगों वाली होती हैं। इसी कारण उसे दो सींगी गेंड़ा कहते हैं।

पिछली सदी के अंत तक मणिपुर और नगालैण्ड के पर्वतीय इलाकों में ये गेंड़े दिखाई देते थे। अब उस इलाके से ये गेंड़े लुप्त हो गए हैं। जावा गेंड़ा आकार में छोटा होता है। पहले वह बंगाल, असम और म्यांमार में मिलता था। लेकिन अब वहां से लुप्त हो गया है। उसके सिर के कपाल पर एक सींग होता है। बड़े एक सींग वाले गेंड़े की अपेक्षा दो सींग वाले गेंड़े से आकार में छोटा होता है।

गेंड़े की पीठ का आवरण कठोर होता है। रंग काला होता है। कंटीली चमड़ी होती है। कंधे के पास मोटी चमड़ी के वलय होते हैं। इन गेंड़ों के दो कानों के बीच कम अंतर होता है। कान के अंदर का हिस्सा काले बालों से भरा होता है। पहले सींग के सामने नाक व मुंह चौड़ा होता है। उसे दो सींग होते हैं। उनका विकास तेजी से होता है। ये सींग कुछ पीछे की ओर झुके होते हैं। पूंछ लम्बी होती हैं। वह आगे की ओर पतली होती जाती है। अंत में बालों का गुच्छा होता है। उनके सींग कोई असली सींग नहीं होते। ये सींग कपाल की हड्डी से जुड़े नहीं होते। ये सींग चमड़ी के निचले मांस से जुड़े होते हैं। उसे धक्का लगाए तो वे बाएं-दाएं हिलते हैं। जोर से आघात करें तो वे टूट कर नीचे गिर जाते हैं। उससे हुई जख्म से खून बहने लगता है। एक साल के भीतर नए
सींग आने शुरू हो जाते हैं। नर और मादा दोनों को सींग होते हैं। इन सींगों के लिए उनकी चोरी-छीपे शिकार की जाती है। क्षेत्र: भारत में किसी समय ये गेंड़ें मणिपुर के एँको पहा़डियों और नगालैण्ड के टर्नसॅग जिले में दिखाई देते थे, लेकिन अब वे लुप्त हो गए हैं। भारत के बाहर इंडो-चायना, म्यांमार, थाईलैण्ड, मलेशिया में दिखाई देते हैं।

प्रजनन: दो सींगों वाले गेंड़ों के प्रजनन के बारे में बहुत जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन गेंड़े का बच्चा माता के साथ बहुत दिन तक रहता है।

भोजन: वे पेड़ों की पत्तियों व शाखाओं पर निकली कोमल नर्म पत्तियों के गुच्छों को पसंद करते हैं। उन्हें विशेष रूप से जंगली आम, नारिंगी कुल के फल और अंजीर अधिक प्रिय हैं। प्राकृतिक निवास: दो सींगों वाले गेंड़े पर्वतीय प्रदेशों के जंगलों में भटकते हुए काफी ऊंचाई तक चढ़ जाते हैं। भरपूर छांव, चारा व पानी उनके लिए जरूरी चीजें हैं। कोई जोड़ा स्थानीय क्षेत्र में निवास करता है। वहां पानी की कमी होने पर वे दूसरे क्षेत्र में स्थलांतर करते हैं। दिन में या रात में वे बरसाती नाले का आश्रय लेते हैं। कोई निश्चित जगह वे ’लोटन’ के रूप में इस्तेमाल करते हैं। वहां वे अक्सर लोटते रहते हैं।
गेंड़े का मांस, खून, चमड़ी, मूत्र आदि सभी उपयोगी है।

उनके सींगों की भारी मांग है। उनकी अवैध रूप से शिकार कर उनका सींग काट लिया जाता है। कुछ देशों में इसकी कीमत प्रति किलो 40 से 50 हजार रुपये तक है। बड़े सींग का मूल्य लाख से डेढ़ लाख रुपये तक होता है। इन सींगों में अनेक औषधि-गुण बताए जाते हैं। इन सींगों से बनाए गए प्याले के पेय में यदि जहर मिला दिया जाए तो उसके दो टकड़े हो जाते हैं। यही नहीं, प्याले में यदि विष डाला होगा तो फेन आना शुरू हो जाता है। राजघरानों में विष-प्रयोग की प्रथा होने से इस तरह के प्यालों का इस्तेमाल किया जाता होगा।

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