जावा गेंड़ा

छोटे एक सींग वाले गेंड़े अथवा जावा गेंड़े को अंग्रेजी में व्ैह (थेेी दहा प्दहा्) प्ग्हदेीदे- प्ग्हदमदे एदह्ग्म्ल्े कहते हैं। हिंदी में वह गेंड़ा, गैंड़ा, गोंड़ा, गंड़ा, गेनरा इत्यादि नामों से जाना जाता है।

भारतीय एक सींग वाले गेंड़े से यह भले ही छोटा हो, लेकिन मोटा‡त्ताजा होता है। वयस्क गेंड़े की कंधे तक ऊंचाई 180 से.मी. व सींग की लम्बाई 27.3 से.मी. होती है।

पहचान: इस गेंड़े की चमड़ी की सलवटें कंधे से पीठ तक फैली होती है। टाइल्स के टुकड़ों पर जिस तरह सुंदर नक्काशी होती है वैसी इस गेंड़े की चमड़ी पर दिखाई देती है। मादा को सींग नहीं होता। चमड़ी काली‡धूसर होती है।

क्षेत्र: भारत में वह पूरी तरह लुप्त हो चुका है, अथवा उसे खत्म किया जा चुका है। पहले वह पश्चिम बंगाल और भूटान में दिखाई देता था।
विदेश में: भारत के बाहर जावा के युजुंग कुलेन संरक्षित जंगल में वह दिखाई देता है।

प्रजनन: मादा एक बार में एक ही बच्चे को जन्म देती है। चार साल बाद पुन: उसका प्रसव काल आता है। बच्चा चार साल तक मां का दूध पीता है। मां अपने बच्चे को नजरों से ओझल होने नहीं देती। चरते समय वह मां के आगे‡आगे होता है। मौका पाने पर बाघ बच्चे की शिकार करता है, लेकिन वह वयस्क गेंड़े को कभी हाथ नहीं लगाता।

भोजन: जंगली झाड़ियों और वनस्पतियों पर निर्वाह करने के कारण इस गेंड़े ने अपना विहार क्षेत्र असम से बंगाल तक और म्यांमार से मलाया तक बढ़ाया है। इसके विपरीत भारतीय एक सींग वाला गेंड़ा घास पर ही निर्भर होने से वह बचा रह गया है।

प्राकृतिक निवास और आदतें: उसका प्राकृतिक निवास पहाड़ी प्रदेश है। वे 2135 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मिलते हैं। घास का प्रदेश उन्हें पसंद नहीं है। भारतीय गेंड़ों का इतिहास यानी भारतीय उपमहाद्वीप में जंगलों का होता विनाश और बदलती आबोहवा की कहानी है। वे बहुधा अकेले ही रहते हैं। पानी में नहीं घुसतें। केवल कीचड़ में लोटते रहते हैं। वे तेजी से भाग नहीं सकते। सूअर जैसे गुर्राते हैं। उनका सींग उनकी सुरक्षा में काम नहीं आता। उनके खांग (सूअर जैसे सामने के दांत) सूअर जैसे ही होते हैं। दुश्मन पर इन्हीं खांगों से वह हमला करता है। लेकिन उसकी दृष्टि कमजोर होती है।

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