खइके पान बनारस वाला…

कुछ दिन पहले मैं एक परिचित के घर गया था। बचपन में उनके घर मैं अक्सर जाया करता था। उस परिवार की एक महिला के प्रति मेरा ध्यान अक्सर जाता था। महाराष्ट्रीयन नौगजी साड़ी, माथे पर लाल कुंकुम की बड़ी सी बिंदिया, हाथ में चूड़ियों की भरमार, कमर में पान की चंची और पान से सुर्ख हुआ उसका मुख उसका नित्य का स्वरूप था।

आज तीस सालों के बाद मैं उनके घर गया। समय के साथ उम्र की सुर्खियां चेहरे पर आ गईं। बदन पर समय के चिह्न थे, बदलाव का आगाज था। केवल एक चीज नहीं बदली थी। वह उनकी पान की चंची! उसके खचों में अब भी पान‡सुपारी, कत्था, चूने की डिबिया‡ सब कुछ यथावत था। मुंह की सुर्खी भी वैसी ही थी। गपशप के समय जैसे ही अवसर मिलता उसका ध्यान पान की चंची की ओर चला जाता और वे बात‡बात में चंची से पान, सुपारी, कत्या और चूना निकालतीं और पान की गिलोरी बन कर कब मुंह में चली जाती पता ही नहीं चलता। मानो उसके जीवन में पान घुलमिल गया हो। वैसे भी पान हिंदुस्थानी लोगों के जीवन और संस्कृति का अंग है ही। भारत का अनोखापन जिन अनेक बातों में साबित होता है उसमें पान भी एक है। पान की बात छिड़ी कि सारी दुनिया का ध्यान भारत की ओर जाता है। पान की इस महत्ता के पीछे उसकी पौराणिक और ऐतिहासिक विरासत है।

वात्सायन के कामसूत्र में उल्लेख है कि सुबह उठने के बाद दांत साफ कर आइना देखते हुए तांबुल भक्षण कर दिन की शुरुआत करें। अर्थात वात्सायन जितनी प्राचीन परम्परा पान को है ही यह निर्विवाद है। तांबुल संस्कृत शब्द है जिसकी मूल धात ताम्र का अर्थ है सुर्ख या लाल। सुश्रुत कहते हैं, तांबुल सेवन से श्वांस में सुधार होता है, आवाज मधुर होता है, दांत, जीभ व मसूड़ों का रोगों से बचाव होता है और पाचन सुधार कर रक्ताभिसरण ठीक होता है।

भोजन के पाचन के लिए पाचक रस निर्माण करने वाले पान का भोज्य पदार्थों जैसा ही महत्व है। भोजन के पाचन के लिए पान की गिलोरी अवश्य दी जाती थी। आज भी पान पेश करने का रिवाज वैसा ही कायम है।

सोलह शृंगारों में भी पान की गिलोरी मान्यता पा चुकी है। इस गिलोरी को पहले राजाश्रय था। महिलाएं इसे विशेष रूप से पसंद करती थीं। पान से मुंह में सुर्ख रंग भरा कि पहले महिलाएं मानती थीं कि उसके पति का उस पर बहुत प्रेम है। इस लेकर महिलाओं के बीच हास्य‡विनोद भी हुआ करते थे। गिलोरी से मुंह लाल होने पर स्त्री भी लज्जा से चूर‡चूर हो जाती थी। गांव की किसी भी चौपाल पर वयस्क लोग गपशप करते समय पान‡ सुपारी खाते हुए दिखाई देती थी। इसके अलावा घर की ओसरी में आए अतिथि को चाय के बाद पान की तश्तरी अवश्य पेश की जाती थी। पान के नक्काशीदार पीतल के पात्र, उसमें रखे नक्काशीदार सरोतें आम बात हुआ करती थी।

सुसंस्कृत घरों की तरह अन्य स्थानों पर भी पान अपनी हाजिरी अवश्य लगाता था। उत्तर भारत में मुशायरे, संगीत की सभाएं या महाराष्ट्र में लावणी नृत्य की महफिलें पान के बिना अधूरी ही थीं। मराठी लोकगीत लावणी सुनने के लिए आने वाले रसिकों को गायिका शृंगारिक कटाक्ष के साथ जब पान की गिलोरी देती थी तो आने वाला बेहाल हो जाता था। यह सम्मान का प्रतीक हुआ करता था। इसी कारण देश के शृंगार गीतों में पान ने अपना रंगीला और महत्वपूर्ण स्थान बनाए रखा। कहा जाता है कि मस्तानी जब पान खाती थी तो उसकी कंचन की काया के कारण उसके गले में उतरने वाला लाल रस बाहर से दिखाई देता था। बिना शृंगार के गिलोरी में कभी रंग भरा ही नहीं!

वियतनाम में एक पुरानी कथा है। ‘टैन’ व ‘लैग’ नामक दो जुड़वा भाई थे। दोनों एक ही युवती के प्रेम में फंस गए। लेकिन बड़े का अधिकार पहला था। अत: टैन का उस युवती से विवाह हो गया। एक जैसे दिखने वाले भाइयों के कारण एक बार युवती चक्क्रर में फंस गई। गलती से उसने ‘लैग’ से प्रेमसंवाद किया। गलती ध्यान में आते ही लैग ने घर त्याग दिया और नदी के किनारे ‘चूना’ बन गया। टैन उसे खोजने के लिए निकला। ‘चूना’ बने भाई को देख कर दुखावेग से वह वहीं सुपारी का पेड़ बन गया। पति की खोज में युवती वहां पहुंची और पान की बेल बन कर उस पेड़ का आलिंगन किया। इस तरह प्रेम के त्रिकोण पूरा करने के लिए पान, सुपारी और चूना एकत्रित हो गए। तात्पर्य यह कि पान की परम्परा केवल भारत में ही नहीं तो अन्य देशों में भी है। पहले के ब्रह्मदेश और अब के म्यांमार में भी ‘कून ईट’ की प्रथा है। कुन ईट याने पान पात्र। अतिथियों के समक्ष आग्रहपूर्वक यह रखा जाता है।
पान‡सुपारी अर्थात पान की गिलोरी पर भारत में विभिन्न भाषाओं कई मुहावरें व कहावतें प्रचलित हैं। ‘बीड़ा उठाना’ इतिहास की पुस्तकों में बहुत प्रचलित मुहावरा है। शिवाजी महाराज को ‘जिंदा या मुर्दा’ पकड़ने का अफजल खान ने विजापुर के दरबार में बीड़ा उठाया था। किसी काम की ‘सुपारी’ देना यानी उस व्यक्ति को पूरे विश्वास के साथ काम सौंपना होता है। पहले ‘सुपारी’ आम व्यवहार में अटूट विश्वास का प्रतीक थी। गाने बजाने वालों, नौटंकी जैसे लोक कलाकारों, गायकों, नाट्य कलाकारों को कार्यक्रम के लिए बुलाते समय उन्हें औपचारिक रूप से सुपारी देने की प्रथा थी। अब तो गंभीर अपराध के लिए अपराधियों को ‘सुपारी’ दी जाने लगी है!

‘मेरे सिवा उसका पत्ता नहीं हिलता, लेकिन वह चूना लगा कर चला गया, फिर मैंने ही सुपारी देकर उसे पाठ सिखाया’ या ‘मैंने उसे पाठ सिखाने का बीड़ा उठाया’ जैसे वाक्प्रचार आज भी प्रचलन में हैं। अर्थात पान संस्कृति हमारे रोजमर्रे के जीवन से जुड़ गई है।
घर, बरामदे और चौपाल में बसा पान अब रास्तों की पान की दुकानों में पहुंच गया है। पान हमारे भारतीयों के जीवन में इतना रंग भरता है कि पान की दुकानें एक दूसरे के इतनी करीब होती हैं और यह भी याद नहीं रहता कि कल कहां पान खाया था और पान की पिचकारी कहां छोड़ी थी। विभिन्न धर्मों और वर्गों के लोग इन पान दुकानों से भले ही अपना जीवन‡यापन कर रहे हों, लेकिन पान के शौकीन अब भी उत्तर भारतीय की पान की दुकान पर ही जाना पसंद करते हैं। पान की दुकान पर बैठे लोगों की पान के प्रति इतनी ईमानदारी होती है कि ग्राहकों को पान देते‡देते पान की एक गिलोरी अपने मुंह में डालना भी नहीं भूलता। ग्राहकों से बात करते हुए थूंक ग्राहकों पर न पड़े इसके लिए मुंह ऊपर कर बात करने का उसका ढंग भी अनोखा होता है। मुंह का पान थूंक देना उसकी राय में पान का अपमान करना होता है। पान वाले से ग्राहकों की सुख‡दु:ख की बातें भी इसी तरह होती है। पान बनाते समय होने वाला संवाद उन दोनों के बीच रिश्तों में रंग भरते चलता है। कुछ साल पहले क्रिकेट की मैच के समय पानवाले रेडियो पर चलने वाली कमेंट्री बड़ी आवाज में लगा देते थे। इस तरह पान की दुकान एक छोटा सा स्टेडियम ही बन जाता था। कोई विकेट गिरने, किसी के छक्का या चौका ठोकने पर होने वालो शोरशराबा अनोखा हुआ करता था। अब यह दृश्य दिखाई नहीं देता। लेकिन अपने रिश्तेदारों को खोजते गांवों से आने वाले हजारों लोगों का गाइड़ आज भी पान वाला ही होता है।

भारत में आज सर्वत्र पान का शौक फरमाया जाता हैा लेकिन लखनऊ और बनारस के पान की रंगत कुछ अलग ही है। उत्तर में यात्रा के समय अनुभव होता है कि वहां मुंबई की तरह केवल पान का एक ही पत्ता नहीं लिया जाता अपितु दूसरे पत्ते का टुकड़ा भी अवश्य होता है। वहां एक पत्ते का पान अपमानास्पद माना जाता है। इसी कारण उत्तर के पान वाले अपने ग्राहकों के सम्मान का ख्याल रखते हुए डेढ़ पत्ते का पान पेश करते हैं।

अतिथियों के लिए पेश किए जाने वाले पान पात्र को ‘खासदान’ कहते हैं। पान की मुख्य किस्मों हैं कोलकाता, बनारसी, मगई और कपूरी या पूना पान। पान चबाते समय भरपूर लार आती है। इससे पिष्टमय पदार्थों का पाचन होता है। ‘ब’ जीवनसत्व मिलता है। पान जंतुनाशक होने से पेटदर्द में आराम मिलता है। श्वसनशुध्दि होती है। चूने से बिनपचे घटकों का पाचन करवाता है। दांत मजबूत होते हैं। सुपारी कफनाशक है। बध्दकोष्ठता नष्ट होती है।
कहते हैं कि भगवान कृष्ण पान खाया करते थे। अर्थात पान का इतिहास 5 हजार से भी अधिक वर्ष पुराना है। पूजा, विवाहादि संस्कारों, घर या समाज के किसी शुभ प्रसंग पर पान का अस्तित्व अनिवार्य है। यही नहीं शृंगार हो, महफिल हो, शर्त लगानी हो या कोई स्पर्धा हो पान के बिना पत्ता नहीं हिलता। बड़ों का सम्मान, जी‡हुजूरी, प्रियतमा का शृंगार या मर्दों का कर्तृत्व सुर्ख बनाना पान के बिना संभव नहीं है। इस तरह जीवन के इस तत्व को छोड़ कर हम ‘पान मसाला’ के पीछे दौड़ रहे हैं और पिकदानी छोड़ कर धरती को थूंकने लगे हैं। पान में तम्बाकू, भंग, अफू डाल कर नशा करने लगे हैं। रस उत्पत्ति कर पाचन सुधारने वाली और मुख सुगंधित करने वाली पान की गिलोरी में अब नशा की दुर्गंध आने लगी है। पुराने बंधन ठुकराने से जीवन में रंग, रस भरने वाली पान की गिलोरी अब जीवन नीरस बनाने लगी है।
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