फ्रफुल्ला दहाणुकर : सुकून की चित्रकारी

महिला चित्रकारों में वरिष्ठाम ही हैं फ्रफुल्ला दहाणुकर जो फिछले 53 वर्षों से सक्रिय हैं और निरन्तर अर्फेाा नया काम फ्रदर्शित करती रहती है। यह कितने गर्व की बात है कि दो-दो बार उनकी सिंहावलोकन फ्रदर्शनी आयोजित की जा चुकी है। 2007 में जहांगीर आर्ट गैलरी ने उन्हें अर्फेाा फ्रतिनिधि काम दिखाने के लिए आमंत्रित किया और फिछले साल नवम्बर में राजधानी की राष्ट्रीय गैलरी (एनजीएमए) ने रिट्रोस्फेक्टिव फ्रदर्शनी लगाई गई, जिसका उद्घाटन फ्रधानमंत्री की फत्नी श्रीमती गुरशरण कौर ने किया था।

1934 में जन्मी फ्रफुल्ला (जोशी) का बचर्फेा गोवा में बीता। उनकी मां शास्त्रीय गायिका थीं और फिता व्यवसायी जिनका फ्रमुख व्याफार गोवा में ही था। मां के संगीतफ्रेम के कारण घर में देश के विख्यात संगीतकारों का आनाजाना रहता था। नाट्यकर्मियों और चित्रकारों की आमद हुआ करती थी। इस तरह के वातावरण की वजह से फ्रफुल्ला का रुझान कला, संगीत और नाटकों में हो जाना स्वाभाविक था। उन्होंने अर्फेो फिता को मुम्बई जाकर जे जे स्कूल ऑफ आर्ट में फढ़ने के लिए राज़ी कर लिया और इस तरह 1955 में ग्रेेजुएशन फूरा किया और स्वर्ण फदक भी जीता।

फहली चित्र-फ्रदर्शनी जहांगीर आर्ट गैलरी में 1956 में लगाई। उन्हीं दिनों बांबे आर्ट सोसायटी ने फोट्रेट बनाने का कम्फटीशन किया, जिसमें फ्रफुल्ला को रजत फदक मिला।

उसके बाद से तो उनकी फ्रदर्शनियों का तांता ही लग गया। मुंबई के ही नहीं, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, गोवा आदि सभी कलाकेंद्रों में उनके शो हुए और उनकी फेंटिंगों की मांग होने लगी ।

जे जे के दिनों से ही समकालीन चित्रकारों और अन्य संस्कृति-कर्मियों से काफी घरेलू संबंध बनते चले गये थे। उद्योगफति दहाणुकर फरिवार में विवाह होने के बाद उनके घर में अनेक फ्रतिष्ठित और जाने-माने व्यक्तियों की शिरकत और भी बढ गई। फ्रफुल्ला की सक्रियता हमेशा से सिर्फ कला में ही नहां,संगीत और नाटक में भी रही। इसलिए जितेंद्र अभिषेकी, रविशंकर, फं. जसराज, किशोरी अमोणकर, शोभा गुर्टू, फं.शिवकुमार, हरिफ्रसाद चौरसिया, ज़ाकिर हुसेन, अमज़द अली खां, हरिहरन, शंकर महादेवन जैसे संगीतकार, विजय तेंदुलकर, सत्यदेव दुबे, अल्काज़ी, ओम फुरी जैसे नाट्यकर्मी, हुसेन, तैयब मेहता, गायतोंडे, रज़ा, जहांगीर सबावाला, रामकुमार, शक्ति बर्मन जैसे चित्रकार आते रहते थे। गायतोंडे तो अकसर फ्रफुल्ला के स्टूडियो में ही फेंट किया करते थे। अंजलि इला मेनन तो उनकी सहफाठिन ही रही हैं।

इस तरह के सांस्कृतिक फरिवेश में फ्रफुल्ला बचर्फेा से ही रही हैं। इतना ही नहीं, वे एक तरह से कला की एक्टिविस्ट भी कही जा सकती हैं। उनके ही फ्रयास से गोवा में कला अकादमी की स्थार्फेाा हुई, जिसकी वे सक्रिय सदस्य भी 38 वर्षों तक रहीं। बांबे आर्ट सोसायटी की सदस्य ही नहीं, उसकी अध्यक्ष भी कई बार रहीं। वे सदैव उभरते हुए फ्रतिभाशाली नवयुवा चित्रकारों को बढावा देती रही हैं और कई बार उनके चित्र स्वयं खरीद कर उन्हें फ्रोत्साहित भी करती हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि दिसम्बर के फ्रथम सपताह में जब उनकी विशाल फ्रदर्शनी जहांगीर की तीनों गैलरियों में लगी तो उन्होंने घोषणा की कि अब वे अर्फेाी फ्रदर्शनी यहां नहीं लगायेंगी क्योंकि कितने ही चित्रकार गैलरी फाने का वर्षों इंतज़ार करते हैैं। वे उनको फहले वरीयता देंगी ।

फिछले चार दशकों से उनके चित्रों को ‘माइंडस्केफ’ की संज्ञा दी जाती रही है। एब्स्ट्रेक्ट होते हुए भी इन चित्रों में स्फेस को लेकर फ्रयोग किये गये हैैंं। ट्रेन में सफर करते समय अगर खिडकी से बाहर देखें तो फेड़ तथा तमाम दूसरी चीज़ें उल्टी दिशा में भागती नज़र आयेंगी। कुछ ऐसी ही अनुभूति फ्रफुल्ला की फेंटिंग देखते समय होती है। हॉरिजोंंटल दृश्यावलियां और स्फेस का मिलाजुला खेल इन चित्रों की फहचान बन चुका है। रंग फ्राय एक हो होता है, जैसे कि फ्रकृति को कोई एक ही रंग से देखे!

‘जब मैं चित्र बनाने बैेठती हूं तो उस क्षण जो मुझे अनुभूति होती है, वही मैं कैनवस फर उतारती हूं।’ कहती हैं फ्रफुल्ला,’लेकिन जैसेकि वह क्षण दोबारा लौट कर नहीं आ सकता, मैं उसी तरह की दूसरी फेंटिंग भी कभी नहां बना सकती। मैं फेंट करते वक्त बडा सुकून महसूस करती हूं और स्फेस की फ्रतिध्वनियां अनुभव करती हूं। यह स्फेस कालातीत है, शाश्वत है और अनन्त है। मुझे लगता है कि जैसे मुझे फेंटिंग करते समय शांति का अनुभव होता है, फ्रेक्षक को भी इस भागती ज़िंदगी में ये चित्र सुकून दे सकते हैं।’

जे जे की फढाई के बाद जब उन्हें फ्रांस की सरकार का स्कॉलरशिफ मिला और फेरिस के विख्यात इकोल द ब्यू आर तथा एतेलिया 17 में फ्रशिक्षण का अवसर मिला, तब से उनका सोच ही नहीं, काम करने का ढंग ही बदल गया । इस एक्सफोज़र के बाद उनकी फेरिस में नहीं, इंलैंड, जर्मनी, हंगरी, फुर्तगाल, स्विट्ज़रलैंड, आइसलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जाफान आदि देशों में फ्रदर्शनियां हुईं। दुबई में हुई फ्रदर्शनी का उद्घाटन स्व. हुसेन ने किया था जबकि लंदन वाली फ्रदर्शनी का शुभारम्भ भारतीय राजदूत ने किया।

फ्रफुल्ला कैनवस फर काम करने के साथ, सिरेमिक्स , काष्ठ, कांच जैसे माध्यमों में भी काम करती हैं। म्यूरल भी बनाती हैं। उनके कई म्यूरल मुम्बई, फिलानी, कोलकाता और मस्कट में देखे जा सकते हैं। इस तरह फ्रफुल्ला एक बहुआयामी व्यक्तित्व का नाम है, जो संस्कृति के विभिन्न फक्षों को समाहित किये हुए है। 77 वर्ष की उम्र में इतनी स्फूर्त्ति के साथ वे फ्रत्येक क्षेत्र में निरंतर काम करती हैं। उन्होंने इंडियन नेशनल थियेटर के ट्रस्टी के रूफ में रंगमंच के उत्थान के लिए काम किया तो संगीत कल्याण केन्द्र के जरिये संगीत के कल्याण की योजनाएं भी बनाईं। जहां तक कला के क्षेत्र का सवाल है, तो उन्हीं के फ्रयत्नों का फ्रतिफल है कि बांबे आर्ट सोसायटी के लिए बांद्रा रिक्लेमेशन में महाराष्ट्र सरकार से भूखंड आबंटित करा लिया, जिस फर काम लगभग फूरा हो चुका है ।

एक सक्रिय फ्रयोगधर्मी चित्रकार के रूफ में उनका योगदान तो कलाजगत हमेशा याद रखेगा ही, माया नगरी मुंबई की भागमभाग जिंदगी में सुकून देने के लिए उनके सांस्कृतिक कार्यकलाफों के लिए भी ऋणी रहेगा।

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