पर्यावरण और समाज का संबल

संत वचन है-
बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय।

जो हुआ सो बीत गया, जो बाकी है वह होना है। यह होना क्या है? यह होना है पर्यावरण का असंतुलन और अंत में मानव जाति का विनाश। यह विनाश विकास की अंधी दौड़ का नतीजा है। विकास से किसी का विरोध नहीं है, लेकिन यह विकास वसुंधरा के अन्य तत्वों के साथ सामंजस्य रख कर हो, यह लाजिमी अपेक्षा है। इसीलिए भारतीय मनीषियों ने पंच महाभूतों की कल्पना की‡ पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि। इन तत्वों से वसुंधरा का हर चक्र चलता है। सृष्टि का हर तत्व अंततोगत्वा ‘‘पंचत्वं गत:’’ हो जाता है। जिन तत्वों से बने उन तत्वों का विलीनीकरण ही मृत्यु कहलाई। इसीलिए भारतीय दर्शन सृजन और संहार दोनों को देवत्व प्रदान करता है। इस देवत्व को क्षति पहुंचाने का हमें कोई अधिकार नहीं है। यह देवत्व बचेगा तो मनुष्य बचेगा, यह अलिखित सत्य है। इस सत्य से खिलवाड़ कब तक करेंगे?

इन तत्वों के साथ छेड़छाड़ या उनका अतिदोहन ही प्रदूषण है। पंचतत्वों में से पृथ्वी की बात करें। हर जगह वनों की कटाई, वृक्षों की प्राकृतिक प्रजातियों के संतुलित मिश्रण का अभाव और केवल व्यापारिक दृष्टिकोण से चुनिंदा वृक्षों का रोपण व संवर्धन, पशुपक्षियों की विभिन्न प्रजातियों का लोप हो जाना या उनकी संख्या में उल्लेखनीय कमी, अति खनन कार्य से भूक्षरण और रसायनों के अति उपयोग से भू‡स्तर में गिरावट जैसी कई बातें गिनाई जा सकती हैं। इन सभी बातों का परिणाम जल स्तर पर हुआ है। नदियों पर विशाल बांध बनाकर उनके प्राकृतिक प्रवाह को मोड़ देने से एक ओर पानी ही पानी हो गया, जबकि दूसरी ओर भू‡जल का स्तर लगातार घटता जा रहा है। एक विषम स्थिति पैदा हो गई है। एक ओर खूब पानी की समस्या है तो दूसरी ओर पानी का अभाव है। पानी को लेकर आए दिन होने वाले झगड़े इस बात को उजागर करते हैं। औद्योगीकरण से वायु के साथ हो रहा प्रदूषण सारी दुनिया की समस्या है। कार्बन के अतिउत्सर्जन से ओजोन की परत में छेद हो गए हैं और आने वाले भविष्य में जीव को ओषजन की भी कमी झेलनी पड़ेगी। शहरों में तो मुंह पर कपड़ा बांधे बिना निकलना दूभर हो गया है। आकाश या अंतरिक्ष में तो उपग्रहों के जरिए कितना प्रदूषण हम फैला रहे हैं इसकी गिनती नहीं है। अग्नि या तेज को बंदी बनाकर बिजली या परमाणु बिजली जैसे ऊर्जा के स्रोत पाने में प्रकृति को कितना नष्ट कर रहे हैं यह अध्ययन का विषय है।

प्राकृतिक प्रदूषण के साथ जीवन के हर क्षेत्र में प्रदूषण हावी हो रहा है। चाहे राजनीतिक क्षेत्र हो, चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, चाहे सांस्कृतिक क्षेत्र हो हर जगह चरित्र की कठिन समस्या पैदा हो गई है। सिध्दांतों के साथ खिलवाड़ राजनीति का मंत्र बन गया है। राजनीति का माने जनकल्याण के कार्य न रह कर सत्ता पाने की तिकड़म बन गया है। शिक्षा के क्षेत्र में पश्चिम का अंधानुकरण हो रहा है। नतीजा यह है कि जीवनशिक्षा के नाम से कक्षाओं में दिए जाने वाले प्रोजेक्ट बच्चे कम और अभिभावक ही ज्यादा बनाते हैं। शिक्षा कम और बस्ते का बोझ ज्यादा हो गया है। बाल मंदिरों में भी प्रवेश के लिए अभिभावक रात‡रात भर स्कूलों के दरवाजे के सामने कतारें लगाए रहते हैं। भारतीय चिंतन पर आधारित व्यावहारिक नैतिक शिक्षा तो कब की बिदा कर दी गई है। आखिर हम नई पीढ़ी को क्या बनाना चाहते हैं? शिक्षा का कोई लक्ष्य हमारे सामने है या नहीं? सांस्कृतिक प्रदूषण तो गजब का है। हमारे तीज‡त्योहारों से लेकर रोजमर्रे की शैली तक बदल चुकी है। बदलने से किसी को परहेज नहीं है, परहेज अंधानुकरण से है। धर्म समूह‡आस्था की चीज नहीं रहा। वह व्यक्ति की आस्था तक सीमित कर दिया गया। नतीजा यह है कि धर्म का अर्थ पूजा पध्दतियों तक सीमित हो गया है। शुध्दाचरण ही धर्म है यह बात विस्मृत हो गई है। इसीलिए अण्णा हजारे या रामदेव बाबा जैसे लोगों को आंदोलन की बागडोर सम्हालनी पड़ रही है।

चित्र यह है कि हर जगह नैराश्य का अंधियारा है। लेकिन निराश होने से काम नहीं चलेगा। अब भी सुधार की भारी संभावना है। सुधार अनथक और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। पर्यावरण को बचाने की पहल देश भर में अलग‡अलग रूप में अवश्य हो रही है। कई स्वयंसेवी संस्थाएं न केवल प्राकृतिक पर्यावरण अपितु जीवन के हर क्षेत्र के पर्यावरण को बचाने की कोशिश में लगी हैं। इन प्रयासों को और तेज करने की आवश्यकता है। समाज का संबल ही उन्हें बल प्रदान करेगा। समाज का मतलब ‘दूसरे करें’ ऐसा नहीं है। शुरुआत अपने आप से होनी चाहिए। घरों के कचरे का उचित निपटान, जल की बचत, ए.सी. का कम उपयोग, प्लास्टिक की थैलियों का बहिष्कार, रसायनों का कम से कम उपयोग, सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग, वृक्षारोपण, बिजली की बचत, पशुओं की रक्षा इत्यादि के माध्यम से हम प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं। ऐसा करने से ही समूह‡शक्ति यानी समाज की शक्ति अवतीणर्र् होगी।
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