सिर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण

पूरे ब्रह्माण्ड की एक लय होती है। जहां लय है वहीं गति है, निरंतरता है, जीवन-प्रवाह है। यदि यह लय बिगड़ गयी तो प्रलय ही शेष बचता है। आज का भौतिकवादी मनुष्य अपनी उपभोगलिप्सा के कारण कितनी तेजी से प्रलय की ओर भाग रहा है, उसका उसे ज्ञान नहीं है।

धरती की प्रकृति जब तक सामान्य है तभी तक हम सुरक्षित हैं। सुरक्षा केवल मानव के लिए ही नहीं अपितु पशु-पक्षी, वनस्पति सब की सुरक्षा। कल्पना कीजिए यदि वसुधा का स्वभाव बहुत गरम हो जाए तो क्या जीवन सुरक्षित रह पायेगा? क्या पेड़-पौधे, वनस्पतियां बच पायेंगी? क्या ग्राम से नगर तक सभ्यता यथावत् टिक सकेंगी? कदापि नहीं। इसलिए इस समस्या पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।

हम जिस सुफला, सुजला, शस्य-श्यामला वसुन्धरा की बात करते हैं, उसकी धरती बंजर होती जा रही है। विगत 18 वर्षों से कहीं न कहीं अकाल रहा है। यह अकाल अवृष्टि एवं अल्पवृष्टि दोनो रूपों में रहा। वनों की अंधाधुंध कटाई, चरागाहों का अतिक्रमण, कृषि क्षेत्रों का नगरीकरण एवं रासायनिक का उपयोग, उद्योगों का विकेन्द्रीकरण, अनवरत् भू-खनन आदि अनेक कारण हैं, जो सीधे हमारे पर्यावरण पर प्रभाव डालते है। समाज का एक बड़ा वर्ग अशिक्षित है। वह वर्ग पर्यावरण की दृष्टि से अपने कर्तव्य-पालन की ओर से अनभिज्ञ है। विकासवादी, धनलोलुप वर्ग अपने स्वार्थ की सिद्धि कर लेता है। जंगलों की कटाई, कृषि योग्य खेती पर गृह निर्माण, खनिजों का उत्खनन जैसे कार्यों द्वारा सन्तुलन बिगड़ रहा है।

पर्यावरण विनाश की ओर ध्यान दें तो बीसवीं शताब्दी में सब से ज्यादा क्षति पहुंचायी गयी है। मनुष्य ने बड़ी मात्रा में वायुमण्डल में कार्बन डाइआक्साइड़ छोड़ा है। परिणामत: जलवायु परिवर्तन हुआ है। अनेकों प्रकार की वनस्पतियां नष्ट हो प्रकार के जीव-जन्तुओं का अस्तित्व समाप्त हो गया, कई प्रजातियां विलुप्त हो गयीं। यह स्थिति अधिक भयंकर होती जा रही है।

स्थिति को अधिक बिगड़ने से रोकने हेतु हमें वन संरक्षण का प्रयत्न करना होगा। वनों को विनाश से बचाकर सभ्यता को सुरक्षित रखा जा सकता है। आज जनजागरण हो रहा है। स्वयंसेवी संगठन एवं जनता के आपसी सहयोग से सुधार के कार्य किए जा रहे हैं। वनवासी समुदाय वनों की रक्षा के लिए आगे आ रहे हैं। गुजरात के धर्मपुरा क्षेत्र में वनवासी लोगों ने वृक्ष लगाने का अभियान शुरू किया। मिर्जापुर में स्थित ‘वनस्पति सेवा आश्रम’ द्वारा निजी एवं सामुदायिक जमीनों पर सामाजिक वानिकी कार्यक्रम शुरू किया गया है। इन्दौर की महू तहसील के गांवों में प्रत्येक परिवार अपनी ‘घर बगिया’ बना रहा है। उड़ीसा के ढेंकानल जिले में वनवासी संगठित होकर वनों का रोप़ण ही नहीं कर रहे हैं, अपितु उनकी रक्षा भी कर रहे हैं। गिरनार पर्वत की लकड़हारिनों को ‘सेवा संस्थान’ ने संगठित करके उसे हरा-भरा करने में सबको जुटा दिया है। मध्य प्रदेश के वनवासी बहुल क्षेत्र बस्तर, महाराष्ट्र के चन्द्रपुर, केरल में सौरन्ध्री और मन्नार, कर्नाटक में वेडची, उत्तरांचल में टिहरी, बिहार में कोयनकारों इत्यादि में वनों की रक्षा हेतु आन्दोलन चलाये जा रहे हैं। वनों के संरक्षण हेतु भारत सरकार ने कई कानून बनाए हैं और सर्वोच्च न्यायालय ने भी वनों की कटाई पर प्रतिबन्ध लगाया है। इससे भी बेरोक-टोक कटाई पर अंकुश लग रहा है।

वनों की रक्षा हेतु कई आन्दोलन हो चुके हैं। यदि हम इतिहास में झांके तो वृक्षों के रक्षार्थ प्राणों की बलि भी लोगों ने दी है। ऐसी ही एक घटना राजस्थान के जोधपुर की है। वहां पर्यावरण संरक्षण एवं मरुस्थल के ‘कल्पतरु’ खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने की विश्व इतिहास की अविस्मरणीय एवं अद्वितीय गौरवपूर्ण घटना भारत में विक्रम संवत् 1787, भाद्रपद, शुक्ल दशमी, दिन मंगलवार तदनुसार 28 अगस्त, 1730 को घटी। तत्कालीन मारवाड़ रियासत (वर्तमान जोधपुर संभाग) की राजधानी जोधपुर से लगभग 25 किमी दूरी पर खेजड़ली ग्राम स्थित है। वहां विश्नोई समाज के प्रवर्तक गुरु जन्मेश्वर के प्रयास से खेजड़ी के वृक्ष बहुतायत में उपलब्ध थे।

जोधपुर किले तथा महलों के निर्माण एवं रखरखाव हेतु चूना पकाने के लिए लकड़ी की आवश्यकता थी। तत्कालीन शासक राजा अजीत सिंह ने अपने कारिन्दों को आदेश दिया कि वे खेजड़ली गांव से खेजड़ी के वृक्ष काटकर लायें। शासक के कारिन्दे जब मजदूरों के साथ वृक्षों को कटवाने उस गांव में पहुंचे तो वहां के निवासियों ने मरुप्रदेश के जीवनदायी वृक्ष खेजड़ी की कटाई का विरोध किया। शासक के दीवान ने जोरजबरदस्ती से वृक्षों को काटना प्रारम्भ कर दिया। शासन की सख्ती का विरोध करने का साहस प्रजा नहीं जुटा पा रही थी। ऐसी विपरीत परिस्थिति में खेजड़ली ग्राम के श्री रामो विश्नोई का पत्नी वीरांगना श्रीमती अमृता देवी (इमरती देवी) की अगुवाई में 363 किसान और ग्रामीण महिला-पुरुष, बालक बालिका खेजड़ी वृक्षों के बचाव में आगे आये। उन्होंने अनूठे तरीक से शासन का विरोध किया। मजदूर वृक्षों को काट न सकें, इसके लिए वे वृक्ष को पकड़कर उससे चिपक गयीं। बहुत छुड़ाने पर भी जब उन्होंने वृक्ष को नहीं छोड़ा तो उन्हें भी काट दिया गया। श्रीमती अमृता देवी की दो मासूम पुत्रियों ने भी अपनी मां का अनुसरण करते हुए अपने प्राणों का बलिदान किया। देखते-ही-देखते सैकड़ों लोग वृक्षों से चिपक कर खड़े हो गये। इस प्रकार खेजड़ी के प्रत्येक वृक्ष के साथ विरोध स्वरूप एक-एक बलिदानी शासक के कारिन्दों से अपना सिर कटवाते रहे। वृक्षों की रक्षा हेतु उन्होंने अपना प्राण देना स्वीकार किया। ‘सिर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण’ की अवधारणा के साथ यह क्रम सात-आठ दिन तक चलता रहा। दीवान के सामने कटे मुण्डों का ढेर लग गया। इनमें 69 सिर स्त्रियों के थे।

सातवें दिन नव-विवाहित मुकलावा ने अपनी नवोढ़ा पत्नी के साथ जब बलि दी तो इस स्वेच्छिक बलिदान का समाचार सुनकर कठोर शासक का भी हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने स्वयं पहुंचकर क्षमा याचना के साथ उस पूरे क्षेत्र से खेजड़ी वृक्षों सहित सभी हरे वृक्षों की कटाई बन्द करवा दी। यही नहीं उन्होंने हरे वृक्षों को काटने पर कठोर दण्ड भी लगा दिया। वह नियम आज तक जैसा-का-तैसा लागू है।

उस बलिदान को 275 वर्ष हो गये किन्तु उसका सुफल आज भी मिल रहा है। थार की मरुभूमि के विशाल भाग पर खेजड़ी वृक्ष आच्छादित है। यदि उनकी कटाई न रोकी गयी होती तो आज वे लुप्त हो गये होते। श्रीमती अमृता देवी एवं उनके साथियों का वृक्षों की रक्षा के लिए किया गया बलिदान पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणापुंज बन गया है। आज भी उनकी स्मृति में प्रति वर्ष भाद्रपद, शुक्ल दशमी को जोधपुर के खेजड़ली ग्राम स्थित ‘अमृता देवी स्मारक’ पर वृक्ष मेला का आयोजन किया जाता है और वृक्षों के संरक्षण में संलग्न किसी व्यक्ति या संस्था को सम्मानित, पुरस्कृत किया जाता है। उनके बलिदान दिवस 28 अगस्त को ‘राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस’ के रूप में मनाया जाना जाहिए।

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