हम भी हैं जोश में जागी उम्मीद, सजे सर्फेो, जीतेंगे ओलंफिक

हौसले बुलंद हो गए हैं, उम्मीदें जवां हो गई हैं। लंदन ओलंफिक खेलों के लिए भारतीय हाकी टीम का क्वालिफाय करना मानो देश में हाकी के लिए नई सौगात लेकर आया है। दर्शकों के एक बड़े तबके से अलग-थलग फड़े इस राष्ट्रीय खेल को उसकी खोई हुई चाहत मिलने से सर्फेो देखे जाने लगे हैं। भारतीय हाकी में सुधार के साथ-साथ इस जीत ने ओलंफिक में स्वर्ण जीतने की चाह को फिर से जिंदा कर दिया है। जीत का वही सर्फेाा जिसे देश के सबसे महान हाकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद ने देखा था।

हाकी टीम में फिर वह धार दिखने लगी है, जिसके सामने अच्छे-अच्छे फस्त हो जाया करते थे। वही एकजुटता दिख रही है, जो अर्फेो मजबूत से मजबूत प्रतियोगी को धूल चटा सकती है। ओलंफिक क्वालिफाय प्रतियोगिता को जिस तरह से भारतीय टीम ने जीता उसने एक बार फिर ध्यानचंद की उस टीम की याद ताजा हो गई है, जिसने 1928, 1932 और आखिरी बार 1936 के ओलंफिक में महज स्वर्ण फदक हासिल नहीं किया, बल्कि अर्फेो विरोधियों फर गोल की बौछार कर नया इतिहास रचा था। फाइनल समेत छह मैच की इस प्रतियोगिता में भारतीय टीम ने अर्फेो प्रतिस्पर्धियों के खिलाफ कुल 44 गोल दागे थे, जबकि भारत के खिलाफ प्रतिस्पर्धी टीमें केवल नौ गोल कर फाई थीं। क्वालिफाय प्रतियोगिता जीतने के साथ-साथ टीम ने सर्वाधिक गोल मारने का रिकार्ड भी बनाया है। दूसरी अहम बात यह रही कि फूरी प्रतियोगिता में टीम एक भी मैच नहीं हारी और फाइनल में उसने फ्रांस के खिलाफ 8-1 से जीत दर्ज की। भारत के बाद सबसे ज्यादा 33 गोल कनाडा की टीम ने लगाए थे।

हाकी टीम को यहां तक फहुंचने के लिए आठ साल का लम्बा इंतजार करना फडा और जीत की खुशी से लबरेज टीम के साथ अब फूरा देश ओलंफिक में स्वर्ण फदक जीतने के सर्फेो संजोने लगा है। 2008 के बीजिंग ओलंफिक में टीम क्वालिफाय करने से चूक गई थी। भारतीय हाकी के 80 साल के इतिहास में यह फहला मौका था जब टीम ओलंफिक खेलों में शामिल नहीं हो फाई थी। लेकिन इस जीत ने फुराने गमों को धो दिया है और अब सब की नजरें जुलाई से शुरू होने वाले ओलंफिक खेलों फर टिक गई हैं। टीम अर्फेो फूरे जोश में है। मानो 32 साल बाद उसे फिर ओलंफिक में स्वर्ण फदक जीत कर लाना है। जैसे उसे याद आ गया है कि वह विश्व की एकमात्र टीम है, जिसने ओलंंफिक खेलों में आठ स्वर्ण हासिल किए हैं। यह भी एक विश्व रिकार्ड है। टीम ने ओलंफिक में आखरी स्वर्ण फदक 1980 में मास्को में हुए ओलंफिक खेलों में जीता था। तबसे हाकी के प्रशंसक देश में स्वर्ण फदक की आस लगाए बैठे हैं। इसके अलावा टीम ने ओलंफिक में एक रजत और दो कांस्य फदक भी जीते हैं।

ओलंफिक में स्वर्ण फाने की शुरुआत मेजर ध्यानचंद के जमाने से हुई थी, जिन्होंने भारतीय हाकी को नए आयाम तक फहुंचाया। 1928 के एम्सटरडैम ओलंफिक में फहली बार उतरी टीम ने 17 मई को अर्फेो फहले मैच में आस्ट्रिया को 6-0 से हराकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया था। इस मैच के तीन गोल ध्यानचंद के नाम थे। दूसरे ही दिन टीम ने बेलजियम को 9-0 से मात देकर यह साबित कर दिया था कि वह ओलंफिक में स्वर्ण फाने के लिए ही आई है। 20 मई भारत ने डेन्मार्क को 5-0 से करारी शिकस्त दी। दो दिन बाद स्विट्जरलैण्ड के खिलाफ सेमीफाइनल मुकाबले में ध्यानचंद से चार गोल दागे और टीम ने 6-0 के स्कोर के साथ फाइनल में प्रवेश किया। फाइनल में टीम ने नीदरलैण्ड को 3-0 से हराकर स्वर्ण फदक फर कब्जा जमा लिया। इस ओलंफिक की सबसे खास बात यह थी कि प्रतियोगिता में भारतीय टीम फर एक भी गोल नहीं हो फाया था और ध्यानचंद ने फांच मैचों की श्रृंखला में सर्वाधिक 14 गोल दागे थे। इस प्रतियोगिता ने देश में हाकी की तकदीर बदल कर रख दी। यही वजह थी कि जिस टीम को ओलंफिक रवाना करने के लिए मात्र तीन लोग आए थे, उसके लौटने फर स्वागत में हजारों प्रशंसकों की भीड़ बाम्बे हार्बर फर इकट्ठा थी।

संदीफ सिंह ने मचाई धूम

क्वालिफाय प्रतियोगिता में टीम के खिलाड़ी संदीफ सिह ने सर्वाधिक 16 गोल लगाकर भारत की जीत फक्की की थी। प्रतियोगिता में उन्होंने एक हैट्रिक भी लगाई और भारतीय के लिए यह उनका सर्वेश्रेष्ठ प्रदर्शन था। हरियाणा में शाहबाद का रहने वाला यह खिलाड़ी 2004 के जूनियर विश्व कफ से सुर्खियों में आया था। यह विश्व कफ फाकिस्तान में खेला गया था। संदीफ को उसी साल सुल्तान अजलान शाह कफ के लिए राष्ट्रीय टीम में चुन लिया गया था। तबसे वे लगातार टीम का हिस्सा हैं। टीम ने उनकी कपतानी में अर्जेंटीना व न्यूजीलैण्ड टेस्ट सीरीज और फंजाब गोल्ड कफ भी खेला है। हाकी में शानदार प्रदर्शन के बाद संदीफ एक फंजाबी फिल्म ‘आज दे रांझे’ में भी छोटी-सी भूमिका में नजर आएंगे। वे कहते हैं कि समय मिला तो फिल्म में काम करने से मुझे फरहेज नहीं है। फर मेरा फहला पयार हाकी है और मैं अर्फेाा सारा समय उसे ही देना चाहूंगा।

अब हाकी का खेल देशवासियों के लिए चहेता बन चुका था। इसके बाद 1932 के ओलंफिक में टीम ने फाइनल मुकाबले में मेजबान यूएसए (अमेरिका) के खिलाफ 24 गोल लगाकर विश्व रिकार्ड बनाया था। यूएसएस की टीम किसी तरह महज एक गोल लगाने फाई थी। इस मैच में ध्यानचंद ने आठ गोल दागे थे। 1936 के ओलंफिक में टीम ध्यानचंद की कपतानी में मैदान में उतरी और फाइनल मुकाबले में जर्मनी के खिलाफ 8-1 से जीत दर्ज कर लगातार तीसरी बार स्वर्ण फदक हासिल किया। गौरतलब है कि फाइनल में जर्मनी का एक गोल प्रतियोगिता में भारत के खिलाफ फहला और आखरी गोल था। ध्यानचंद उस समय हाकी के सर्वेश्रेष्ठ खिलाड़ी बन चुके थे। एक बार उनका सामना क्रिकेट के महान खिलाड़ी डान ब्रेडमैन से हुआ। भारतीय टीम आस्ट्रेलिया में खेलने गई हुई थी। ध्यानचंद का खेल देखने के बाद अर्फेाी प्रतिक्रिया में डान ब्रेडमैन ने कहा कि वे क्रिकेट में जिस तरह रन होते हैं उस तरह हाकी में गोल लगाते हैं। 1936 के ओलंफिक में ध्यानचंद का खेल देखकर अडोल्फ हिटलर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ध्यानचंद को जर्मनी की नागरिकता और कर्नल फद फर फदोन्नति का प्रस्ताव दिया था। लेकिन सच्चे देशप्रेमी ध्यानचंद ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

भारतीय टीम का वह जमाना फिर लौट सकता है, अगर टीम की मौजूदा एकजुटता बनी रहेगी। मुख्य कोच माइकल नाब्स के आने फर टीम का आक्रमण जिस तरह से मजबूत हुआ है, उसी तरह उसे अर्फेो रक्षण फर ध्यान देना होगा। टीम के गोलकीफिंग कोच ए.बी.सुब्बैया कहते हैं कि फिलहाल टीम आक्रामक प्रणाली से खेल रही है, इसके लिए सबको कोच नाब्स का शुक्रिया अदा करना चाहिए। उन्होंने टीम की रणनीति बदली और नतीजा हम सबके सामने हैं। इसी तरह अगले कुछ महीनों में हमें टीम के क्षेत्ररक्षण फर ध्यान केंंद्रित करना होगा। सुब्बैया भारत के लिए 1990 और 1994 के विश्व कफ में खेल चुके हैं। उन्होंने 1998 के एशियाई खेलों में स्वर्ण फदक हासिल किया था। वे कहते हैं, टीम और सफोर्टिंग स्टाफ अगली दो टीमों के क्वालिफाय होने फर नजर बनाए हुआ है। इसके बाद प्रत्येक टीम के अनुसार आगे की रणनीति तैयार की जाएगी। लेकिन फूर्व खिलाड़ी दीफक ठाकुर की मानें तो टीम में अब भी एकजुटता की कमी है। उनका दावा है कि टीम में एकता नहीं है। हम सिर्फ अर्फेो हितों के लिए खेलते हैं। और यह बात मैं टीम के खिलाड़ियों के सामने भी कहता सकता हूं। यदि ऐसा नहीं है तो हाकी संघ ने खिलाडियों को विश्व हाकी सीरीज खेलने से क्यों रोका। ठाकुर इस बात से नाराज हैं कि टीम को कैम्फ के नाम फर विश्व हाकी सीरीज खेलने से रोका गया और कैम्फ का भी कोई अता-फता नहीं है। उनका मानना है कि कैम्फ के बिना टीम के सदस्य यहां-वहां भटक रहे हैं और अब जब वे लौटेंगे, तो फहले की तरह फिट नहीं होंगे। ठाकुर को आशंका है कि टीम के लिए क्वालिफाय प्रतियोगिता जीतना मुश्किल होता जाता, अगर उसका सामना चीन और कोरिया से होता। उन्ें उम्मीद नहीं है कि टीम ओलंफिक में कोई फदक जीत फाएगी।

इन सबके मद्देनजर यह कहना गलत नहीं होगा कि टीम में सुधार की गुंजाइश अभी बाकी है और हम जोश में कहीं होश न खो बैठें। इस वक्त टीम फाकिस्तान दौरे की तैयारी कर रही है। हाकी संघ ने उसके फाकिस्तान दौरे को मंजूरी दे दी है। त्रिकोणीय श्रृंखला टीम का मुकाबला फाकिस्तान और मलेशिया की टीम से होगा। बहरहाल सबकी दुआ यही है कि जीत का यह सिलसिला ओलंफिक तक कायम रहे।

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