शून्य से प्रारंभ भारतीय मजदूर संघ

हम सभी इस वास्तविकता से भली-भांति परिचित हैं कि उन्नीसवीं सदी के प्रथम व द्वितीय दशक तक अंग्रेजों ने भारत वर्ष को पूर्ण रूप से अपने कब्जे में ले लिया था। किन्तु, भारत की श्रेष्ठ जीवन धारा और जीवन पद्धति को अवरुद्ध कर अंग्रेजों को अपनी संस्कृति थोपने में उन्नीसवीं सदी के अन्त में ही सफलता मिलीं, यद्यपि हमारे भारतीय जीवन की गहरी जड़ें उखाड़ना किसी के लिए भी आसान नहीं, फिर भी अंग्रेजों का प्रभाव गहरा गया था।

इसी दौरान सन् 1919 में स्थापित अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) में भारतीय श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने के लिए केन्द्रीय श्रम संगठन की आवश्यकता महसूस की गई और इसी को ध्यान में रखकर सन् 1919 से पूर्व कई जगहों पर जिन लोगों ने संघर्ष किया था, यूनियनें चलाई थीं, ऐसे सभी लोगों कोे मिलकर देश के प्रसिद्ध नेता लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में 31 अक्टूबर 1920 को इकट्ठे होकर ऑल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) नामक भारत में पहला केन्द्रीय श्रम संगठन स्थापित किया। प्रारम्भ में ही 1, 40, 584 सदस्यों वाली 64 विस्तृत ट्रेड यूनियनें इसके साथ थीं और गठन काल से ही यह सुस्पष्ट हो गया था कि भिन्न-भिन्न विचारों के नेताओं और संगठनों का यह मात्र एकीकरण था। वर्ष 1947 में इसी एटक से कई संगठन और नेता जिन्हें एटक की कार्य पद्धति और उद्देश्य स्वीकार्य नहीं थे, वे सभी एटक से बाहर होकर विघटित संगठनों का एकत्रीकरण कर लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल, जिन्हें महात्मा गांधी जी का भी आशीर्वाद प्राप्त था, की अध्यक्षता में 3 मई, 1947 को ‘इण्डियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) का गठन किया। प्रारंभिक काल में ही 5,75,000 की सदस्यता से युक्त 200 युनियनों की सम्बद्धता इसे प्राप्त हुई। कुछ ही समय पश्चात् कांग्रेस से सन् 1948 में जो समाजवादी ग्रुप बाहर आया, उन्हीं के साथ समाजवादी विचारधारा के जो लोग इंटक में थे, वे भी अपने संगठनों को लेकर बाहर आ गए और उन्होंने हिन्द मजदूर किसान पंचायत (एच. एम. के. पी.) का गठन किया। दूसरे विश्वयुद्ध के समय भारतीय श्रमिकों का गठित इण्डियन फेडरेशन ऑफ लेबर और एच. एम. के. पी. को एकत्रित कर 31 अक्टूबर 1948 को प्रसिद्ध समाजवादी अशोक मेहता जी के नेतृत्व में हिन्द मजदूर सभा (एच. एम. एस.) का गठन किया गया, जिसके साथ प्रारंभिक स्तर पर ही 1,03,790 सदस्यों वाली 119 यूनियनें सम्बद्ध थीं। तत्पश्चात पुन: हिन्द मजदूर सभा और एटक से कई एक छोटे-मोटे गुट अपने-अपने संगठनों से विघटित होकर अलग एकत्रित हुए और अप्रैल 1949 में 254 यूनियनें अपनी 3,31,991 सदस्यों के साथ यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (यू.टी.यू.सी.) का गठन किया। इस प्रकार यह सुस्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्तर पर सभी केन्द्रीय श्रम संगठनों का गठन पूर्व से ही कार्यरत भिन्न-भिन्न यूनियनों और उनके सदस्यों के संगठन- विघटन-पुनर्सगठन से किया गया, जबकि भारतीय मजदूर संघ देश का पहला मजदूर संगठन है, जो शून्य से प्रारम्भ किया गया।

भारतीय मजदूर संघ की स्थापना के लिए 23 जुलाई, 1955 को भोपाल में मात्र 35 कार्यकर्ता जो मूल रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे और सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने की जिनकी रुचि थी, एकत्रित बैठे, इनमें से किसी की कोई पंजीकृत यूनियन नहीं थी और न ही कोई किसी पंजीकृत यूनियन से जुड़े थे। यही भारतीय मजदूर संघ की परम विशिष्टता है कि प्रारंभ ही शून्य से किया गया। इसकी स्थापना के पीछे एकमात्र दृढ़संकल्प ही था, जिसके आधार पर भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की गयी। शून्य से प्रारम्भ करने के कारण ही शायद अखिल भारतीय स्तर पर भारतीय मजदूर संघ की स्थापना अन्य कामगार संगठनों के नेताओं की दृष्टि में एक उपहास का विषय बना, परन्तु दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि तत्कालीन उन नेताओं मेें दूर-दृष्टि का अभाव था कि वे नहीं समझ पाए कि यही शून्य से प्रारम्भ होने वाला संगठन एक दिन देश के प्रथम क्रमांक का सबसे शक्तिशाली मजदूर संगठन बनने वाला है। उन्हें तो यह भी आभास नहीं था कि विगत कुछ समय से कई जगहों पर संघ के स्वयंसेवकों ने कम्युर्िंन्स्ट व कांग्रेस प्रणीत ट्रेड-यूनियनों को छोड़कर अपनी अलग राष्ट्रवादी ट्रेड यूनियनें खड़ी की थीं। यद्यपि भारतीय मजदूर संघ की स्थापना बैठक वर्ष 1955 में वे यूनियनें भा.म.संघ से सम्बद्ध नहीं थी, लेकिन बाद में क्रम से ये यूनियनें भी भामसंघ से जुड़ीं। 23 जुलाई 1955 की प्रथम प्रारंभिक बैठक में एकत्र होने वाले कार्यकर्ताओं में सर्वश्री अटल बिहारी वाजपेयी, जगदीश प्रसाद माथुर, वामनराव परब तथा कुशाभाऊ ठाकरे (म.प्र.) जो सभी तत्कालीन भारतीय जनसंघ के भी कार्यकर्ता थे, के साथ ही सर्वश्री रमण भाई शाह (मुम्बई) वाला साहेब कुलकर्णी, माधव राव पाळण्डे, भावराऊ वेलवलकर कान्हरे और सबनीश, पुणे से माधव राव बापट, बसंत राव परचुरे, नरसैया चिप्पा, दत्तात्रेय वैद्य, औंध से श्री पिंगले, उज्जैन से गोवर्धन लाल मेहता, बाबूलाल मेहरे और कैलाश प्रसाद भार्गव, कोलकाता से कन्हैया लाल बनर्जी, कानपुर से रामकृष्ण त्रिपाठी, भोपाल से नारायण प्रसाद गुप्ता और रामनाथ शर्मा, सिहोर (म.प्र.) से मानकचन्द्र चौबे और नरेन्द्र चौरासिया, दिल्ली से सरदार भगत सिंह, आगरा से राजमोहन अरोड़ा, हरियाणा से श्री राजनारायण शामिल थ, उनके साथ ही बिहार, भागलपुर, राजस्थान के ब्यावर तथा बीकानेर आदि कुछ स्थानों से अपेक्षित कार्यकर्ताओं के न पहुंच पाने का संदेश पत्र भी 10 बजे प्रारम्भ हुई प्रथम बैठक में पढ़ा गया।

उल्लेखनीय है कि सर्वप्रथम श्रद्धेय श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी द्वारा प्रास्ताविक भूमिका के तुरन्त पश्चात मा. श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय जनसंघ में पारित प्रस्ताव की जानकारी प्रतिनिधियों के सम्मुख रखते हुए स्पष्ट किया कि देश में एक राष्ट्रीय श्रमिक संगठन की आवश्यकता है और वह संगठन राजनीतिक पक्ष से अलग होना चाहिए। प्रस्तावित भाषण के बाद सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों से ऐसे छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं के सम्पर्क और संबंध में विस्तृत चर्चा की गयी जो किसी रूप में रा.स्व.संघ से जुड़े थे और विभिन्न प्रदेशों में कार्यरत ट्रेड-यूनियनों से भी संबंध था। विशेषकर वस्त्र उद्योग, सिल्क मिल्स, ऑयल मिल्स, इंजीनियरिंग वर्क्स, कोयला खदान, पंजाब नेशनल बैंक, आर.एम.एस., गुमास्ता मण्डल, आईस फैक्ट्री व रेहड़ी यूनियन से अच्छे सम्पर्क की जानकारी मिली,जहां राष्ट्रीय विचारधारा के अनेक कार्यकर्ता थे। भोजनोपरान्त द्वितीय सत्र में संगठन के नामकरण पर विस्तृत चर्चा की गयी। किसी कार्यकर्ता ने भारतीय श्रमिक संघ नाम रखने का सुझाव दिया, क्योंकि भोपाल की स्थापना बैठक के लिए जो कागजात तैयार करवाए गए थे, उनमें भी संगठन का नाम भारतीय श्रमिक संघ ही था। नागपुर से भोपाल श्री ठेंगड़ी जी के साथ यात्रा कर रहे कार्यकर्ताओं ने वे कागजात देखे और उन्हें स्पष्ट हो गया कि श्री ठेंगड़ी जी के मन में संगठन का जो नाम आया वह था ‘‘भारतीय श्रमिक संघ’’ और इसीलिए भारतीय श्रमिक संघ का नाम ही सुझाया गया। परन्तु उत्तर भारत के कार्यकर्ताओं ने उसका काफी विरोध किया और कहा कि इन क्षेत्रों में ‘श्रमिक’ शब्द का उच्चारण ठीक नहीं होगा। यद्यपि श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी को ‘भारतीय श्रमिक संघ’ का नाम अत्यंत पसंद था और चाहते थे कि इसी नाम पर सहमति बन जाए।

फिर भी श्री ठेंगड़ी जी ने कहा कि सम्मेलन में पश्चिम बंगाल के कार्यकर्ता भी बैठे हैं, जहां श्रमिक शब्द अत्यंत लोकप्रिय भी है और प. बंगाल के श्री कन्हैया लाल बनर्जी उपस्थित सभी कार्यकर्ताओं में सबसे वयोवृद्ध भी हैं, इसीलिए नामकरण के संबंध में हमें उनकी बात ही मान्य होगी। श्री बनर्जी ने कहा कि हमें एक महान कार्य करना है इसीलिए किसी को भी संगठन के नाम के बारे में दुराग्रह नहीं करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यद्यपि बंगाल में श्रमिक शब्द सभी को अच्छा लगता है तो भी पंजाब और उत्तर भारत के बंधुओं को ध्यान में रखते हुए ‘‘भारतीय मजदूर संघ’’ का नाम अच्छा रहेगा और इसीलिए संगठन का नाम हमें यही रखना चाहिए। श्री दत्तोपंत जी वचनबद्ध थे और इसीलिए संगठन का नाम सर्वसम्मति से ‘भारतीय मजदूर संघ’ ही रखा गया।

नामकरण के पश्चात संगठनात्मक स्वरूप पर चर्चा प्रारंभ हुई और निर्णय लिया गया कि श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी, इस संगठन के महामंत्री रहेंगे। अखिल भारतीय संगठन की प्रारंभिक व्यवस्था के लिए पांच सदस्यों की एक समिति रहेगी, जिसे आवश्यकतानुसार राष्ट्रीय महामंत्री को सदस्यों को बढ़ाने का अधिकार होगा। पांच सदस्यीय समिति में सर्वश्री दत्तोपंत ठेंगड़ी (दिल्ली) श्री कैलाश प्रसाद भार्गव (उज्जैन) श्री कन्हैया लाल बनर्जी (हावड़ा) श्री रामप्रकाश (लखनऊ) व श्री बसंत राव परचुरे (पुणे) का नाम तय किया गया। सत्र के दूसरे चरण में संगठन के कार्यालय व संगठन के ध्वज तय करने पर चर्चा हुई। प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श के बाद संगठन का कार्यालय छत्ता, मदन गोपाल, चांदनी चौक, दिल्ली तय किया गया। परन्तु ध्वज के संबंध मे कई सुझाव आने के बाद भी तत्काल कोई निर्णय नहीं किया जा सका। फिर भी यह तय किया गया कि आवश्यकता होने पर बिना किसी चिह् के 2’’×3’’ का ध्वज प्रयोग में लाया जा सकता है।

सम्मेलन के दूसरे दिन 24 जुलाई, 1955 को प्रथम सत्र में श्री दत्तोपंत जी ने नए संगठन की आवश्यकताओं के साथ-साथ सम्मेलन के बारे में विस्तृत विचार रखा। साथ ही उपस्थित प्रतिनिधियों का तत्कालीन अन्य चार मजदूर संगठनों यथा एटक, इंटक, हिन्द मजदूर सभा और यू.टी.यू.सी. के बारे में जानकारी दी और विस्तृत विश्लेषण के साथ उन्होंने स्पष्ट किया कि इन संगठनों के वैचारिक धरातल तथा व्यवहार को देखते हुए भारत के मजदूरों के विकास व राष्ट्र के पुनरुत्थान की दृष्टि से नए संगठन की अर्हताओं पर भी प्रकाश डाला। दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ एकत्रित उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं ने श्री ठेंगड़ी जी की बातों को समझते हुए मजदूर आन्दोलन में अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। उन्होंने यह भी निवेदित किया कि यह कार्य कैसे करना होगा, इसकी जानकारी दी जाए। श्री दत्तोपंत जी ने उनकी बातों को समझते हुए उन्हें विस्तार से मजदूर आन्दोलन एवं मजदूर नेता के विषय में जानकारी दी और सुस्पष्ट किया कि भामसंघ की स्थापना के छह वर्ष पहले से वह भिन्न-भिन्न संगठनों के साथ रहकर यह कार्य कर रहे थे। 24 जुलाई, 1955 के श्री ठेंगड़ी जी के उस अभिभाषण का सम्मेलन मे उपस्थित कार्यकर्ताओं पर बहुत गहरा असर हुआ और वे सूत्र वाक्य के रूप में अभिभाषण के अनुभव को अपनाकर जीवन पर्यन्त भा.म.संघ के लिए कार्यरत रहे।

सायंकाल एक आम सभा हुई। सभा का संचालन श्री गोपाल राव ठाकुर ने किया और सर्वप्रथम श्री शिव कुमार त्यागी का भाषण हुआ। उसके बाद श्री ठेंगड़ी जी ने सभा को सम्बोधित किया और कहा कि आज ‘‘भारतीय मजदूर संघ’’ नाम से एक अखिल भारतीय संगठन का निर्माण हुआ है। यह संगठन राष्ट्र भक्त मजदूरों द्वारा बलशाली बनेगा। भारत को वैभव सम्पन्न बनाने की राह पर भारतीयता पर आधारित राष्ट्र के पुनरूत्थान के इस साधन को हम शक्तिशाली करके रहेंगे। यह ईश्वरीय कार्य होने के कारण सफल होगा ही। इस पुनीत कार्य के लिए हमें देश की जनता एवं सहानुभूतिपूर्ण समाज के शुभकामनाओं की आवश्यकता है। इस सभा के बाद सम्मेलन का सत्रावासन हो गया।

इस प्रकार गठन के समय से यह सुस्पष्ट था कि भा.म.संघ विशुद्ध रूप से कामगारों का संगठन है। यह किसी राजकीय पक्ष से जुड़ा नहीं व राजकीय पक्ष के लिए नहीं। यह मालिकों से और सरकार से भी पूर्णत: अलग है। इस संगठन के अन्दर व्यक्ति प्रधानता भी नहीं है। यह किसी एक व्यक्ति के लिए या एक व्यक्ति का संगठन नहीं है। स्थापना के दिन ही यह सुस्पष्ट हो गया था कि यह राजनीति से जुड़ा संगठन नहीं रहेगा। यह मजदूरों का, मजदूरों द्वारा संचालित, मजदूरों के लिए चलता हुआ संगठन के रूप में निरन्तर कार्यरत है। उल्लेखनीय है कि भा.म.संघ मात्र ट्रेड यूनियन नहीं है, यह भारतीय विचार धाराओं पर आधारित राष्ट्र के पुनरूत्थान का साधन है।

भारतीय मजदूर संघ की शुरुआत प्राथमिक स्तर पर यूनियनें खड़ी करने, जिला समितियां बनाने, प्रदेश इकाईयां खड़ी करने जैसे कार्यक्रमों से हुई। संगठन कार्य को गति देने के साथ ही संगठन के ध्वज के रंगों पर पूर्ण विचार कर भारत की श्रेष्ठतम परम्परा से चला आया ‘भगवा’ रंग जो स्पष्ट रूप से त्याग, तपस्या व विश्वप्रेम का परिचायक है, को अपनाकर भगवे रंग का ध्वज अपनाया और पहली बार मजदूर क्षेत्र में भगवा ध्वज लहराया। इसी प्रकार भारतीय मजदूर संघ का प्रतीक चिह्न भी पूर्णतया भारतीय है:- प्रतीक चिह्न के रूप में जो ‘चक्र’ दर्शाया गया है, वह औद्योगीकरण व औद्योगिक मजदूरों का द्योतक है और गेहूँ की बाली एक ओर खेती और समृद्धि को दर्शाती है तो दूसरी तरफ खेतिहर मजदूरों का परिचायक है। बंधी हुई मुट्ठी संगठित शक्ति का परिचय देती है। साथ ही सबसे महत्वपूर्ण अंगूठा जिसके कारण मनुष्य अन्य समस्त प्राणियों से अधिक प्रगति कर सका है और जो स्पष्ट रूप से नेतृत्व शक्ति का भी बोध कराता है। इस प्रकार भारतीय मजदूर संघ के ध्वज का रंग व प्रतीक चिह्न भी पूर्ण रूपेण भारतीयता के साथ सबसे अनोखा है। भारतीय मजदूर संघ के उदय होने के पश्चात ही मजदूर क्षेत्र के क्षितिज पर भारतीय संस्कृति से जुड़े प्रतीक पहली बार दिखाई देने लगे। यद्यपि भा.म.संघ की स्थापना से पांच दशक पहले मजदूर आन्दोलन देश में खड़ा हो गया था फिर भी इसे दुःख की बात ही कहा जा सकता है कि तब तक देश में कोई श्रमिक दिवस तय नहीं हुआ था। राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के लिए कोई शोध या चर्चा भी आवश्यक नहां समझी गई थी। भारतीय मजदूर संघ ने ‘विश्वकर्मा जयन्ती’ को राष्ट्रीय श्रमिक दिवस तय किया, इसका मूल कारण था कि भारतवर्ष के सभी कारीगर प्राचीन काल से ही इस दिन को श्रमिक दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं और आज आधुनिक काल में भी भारत वर्ष में जगह-जगह पर कारखानों में विश्वकर्मा उत्सव अत्यन्त धूमधाम से मालिक, अधिकारी और मजदूर साथ मिलकर भी मनाते हैं। यद्यपि बामपंथी तथा अन्य संगठनों ने प्रारंभ में इस राष्ट्रीय श्रमिक दिवस का भी उपहास किया परन्तु केन्द्र सरकार ने मजदूर क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार तय किया जिसका नाम दिया गया ‘विश्वकर्मा पुरस्कार’। इसके साथ ही मजदूर क्षेत्र में भारतीय मजदूर संघ ने भारतीयता पर आधारित अनेक नए नारे व नए श्रमिक गीतों का निर्माण कर न मात्र वर्गीय दृष्टिकोण व राष्ट्रीय दृष्टिकोण के बीच जो दीवारें खड़ा की गई थीं, उसे मिटाया वरन् मजदूरों में नए उत्साह का निर्माण किया। वर्गभेद समाप्त करने की दिशा में प्रेरित कर राष्ट्रीयता के भाव के साथ दलित, दीन-हीन मजदूरों को साथ लेकर आगे बढ़े।

हमारे नारें :- 1) भारतीय मजदूर संघ ने पहली बार भारतीयता पर आधारित मजदूर क्षेत्र में ‘भारत माता की जय’ के नारों के साथ जयघोष गुंजित कर मजदूरों को उत्साहित किया। 2) जहां बाकी ट्रेड यूनियनों का नारा था- हमारी मांगें पूरी हो चाहे जो मजबूरी हो, वहीं भारतीय मजदूर संघ ने – ‘राष्ट्र के हित में करेंगे काम-काम का लेंगे पूरे दाम’ का अपना नारा देकर मजदूरों में राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को भी प्रदर्शित किया। 3) मार्क्सवादी ट्रेड यूनियनों का नारा-विश्व के मजदूरों एक हो के स्थान पर भा.म.संघ का नारा मजदूर भाईयों-दुनिया को एक करो का नारा लोकप्रिय हो गया।

इसी प्रकार भारतीय मजदूर संघ ने अपना त्रिसूत्रीय विचारधारा ‘‘राष्ट्र का औद्योगिकीकरण, उद्योगों का श्रमिकीकरण, श्रमिकों का राष्ट्रीयकरण रखकर यह सुस्पष्ट किया कि राष्ट्र के पुनर्निमाण के लिए राष्ट ्रहित, उद्योग हित और श्रमिक हित परस्पर विरोधी नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक है। राष्ट्र डूबेगा, उद्योग डूबेगा तो श्रमिक हित संभव नहीं हो सकता और इसी प्रकार इसके विपरीत यदि श्रमिक डूबेगा तो उद्योग डूबेगा तो राष्ट्र का हित संभव नहीं होगा। यह त्रिसूत्रीय विचारधारा आज मजदूर क्षेत्र में बहुत ही लोकप्रिय हो गई है।

भा.म.संघ ने अपने नवर्िंनर्मित नारों व भारतीय विचारधाराओं के साथ-साथ सैंकड़ों नवर्िंनर्मित श्रमिक गीतों के साथ 23 जुलाई 1955 को भोपाल की बैठक में शून्य से प्रारंभ कर अपने निष्ठावान कार्यकर्ता व भारतीयता पर आधारित गतिविधियों के साथ अन्य लोगों के सहयोग व सहानुभूति पाकर निरन्तर आगे बढ़ते हुए सर्वप्रथम सन् 1989 के आधार वर्ष को अपना कर भारत वर्ष के केन्द्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा किए गए सदस्यता जांच में प्रथम स्थान पाकर पुन: 2002 ई. के आधार वर्ष को स्वीकार कर केन्द्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा अपना प्रथम क्रमांक सुरक्षित रखते हुए सदस्यता वृद्धि के साथ निरन्तर अपनी विशेषताओं के साथ अग्रसर है।

आज वर्तमान में देश में कार्यरत केन्द्रीय श्रम संगठनों की स्थिति इसका स्पष्ट प्रमाण है, जो निम्नवत है-

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