घरेलू कामगारों कि पीडा समझने वाले रमणभाई शहा

पवित्र कुरान की छपाई करने वाला माझगांव का महंमदी प्रिटिंग प्रेस अधिकांश कामगार मुसलमान धार्मिकता का आवाहन और सतत शोषण से तंग हुए कामगार व्यवस्थापन के विरोध में खड़े रहने के लिए अनेक यूनियनों के पास पहुँचे, परंतु निराश होकर आखिर परेल में पोयबावड़ी के नाके पर भारतीय मजदूर संघ के कार्यालय में आ गए। उनकी मुलाकात एक लड़के जैसे अनुभवी कार्यकर्ता से हुई। कामगारों की बात उसने शांति से सुन ली। कामगारों की बात सुनने वाला, समझ लेने वाला, उनमें आत्मविश्वास जगाने वाला कोई मिल गया। दूसरे दिन सुबह गेट-मीटिंग हुई। भारतीय मजदूर संघ का झंडा फहरा गया.
मुंबई में भारतीय मजदूर संघ की यूनियन शुरू की गई और जिसके नेता थे रमण गिरिधर शहा। भारतीय मजदूर संघ की पहली-पहली यूनियन की यह हकीकत। रमणभाई का स्वयंसेवकत्व कामगारों को अखरा नहीं। व्यवस्थापन को संघ की एलर्जी नहीं हुई। महंमदी प्रिंटिंग प्रेस का अस्तित्व जब तक था, तब तक कामगार निष्ठापूर्वक भारतीय मजदूर संघ में रहे।

शहा परिवार

मावल में संघ को जानने वाले, संघ की अनुभूति वाले, उसे चरितार्थ करने वाले अनेक परिवार थे। तलेगांव का ‘शहा कुटुंब’ उनमें से एक प्रमुख नाम था। संघ के वरिष्ठ प्रचारक मा. गोपालराव देशपांडे के परिस स्पर्श का लाभ इस कुटुंब को हुआ था। घास-चारे के थोक व्यापार से लेकर सिनेमागृह तक अनेक व्यवसाय इस परिवार के चलते थे। सभी भाई एक दिल से, आत्मीयता के नाते से सबको सँभालकर रहने वाला एक आदर्श कुटुंब सर्व ज्ञात था। रमणभाई ज्येष्ठ नहीं थे, परंतु कुटुंब में इनका कहना माना जाता था। सबको सभांलते हुए, किसी की प्रतिष्ठा में आँच न आने देना, सम्मान तथा प्रेमपूर्वक एक साथ रखने, सब को आधार देने का काम रमणभाई का था। परिवार में परस्पर साहायता होनी ही चाहिए, अन्य को भी आश्रय और जरुरत वश मदद देनी चाहिए।

भारतीय मजदूर संघ में भी रमणभाई पर मददगार की जिम्मेदारी आ पड़ी। यह पालक का कार्य था। रमणभाई का स्नेहबंध सीमेंट का कार्य करता था, उत्प्रेरक था, मार्गदर्शक था। उन्होंने स्वाभिमान सिखाया। उन्होंने ही कार्यकर्ताओं को समर्पण की दीक्षा दी। कभी मन के विरुद्ध बात हुई, अप्रिय लगा, तो भी रमणभाई का शब्द उचित माना जाता। प्रचारक के जीवन से निवृत्त होकर वे मुंबई में नौकरी के लिए आए। वैसे आजन्म संघ प्रचारक की तरह रहे जीवन संघ शरण रहा। रमणभाई ने काला चौकी के दाभोलकर अड्डे की झोपडपट्टी में, चाल में संगठन का काम किया। नागरी सुविधाओं के लिए जोरदार आंदोलन किया।

मजदूर संघ में अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाले रमणभाई का भारतीय मजदूर संघ में प्रवेश हुआ, जिसका आदेश संघ से आया। महंमदी प्रिंटिंग प्रेस का किस्सा ऊपर वर्णित है। कामगार हित के साथ समझौता नहीं किया तो भी कामगार क्षेत्र दुर्गम व कठिन नहीं है, यह बात उन्होंने अपने कार्योंं से सिद्ध की। कामगार सच्चाई का साथ देते हैं, ईमानदारी की सहायता करते हैं, प्रेम के प्रति संवेदनशील रहते हैं, इसका उन्हें अनुभव मिला। यहाँ कानून के ज्ञान से श्रम का महत्त्व बढ़कर है। माधव पालांडे, गजानन गोखले, प्रभाकर केलुसकर, किशोर देशपांडे, गंगाधर नायक आदि के सहयोग से अनेक छोटे-बड़े कारखानों में भारतीय मजदूर संघ की यूनियन का गठन किया गया। कामगारों की दैनंदिन समस्याओं के साथ महंगाई भत्ते के निर्देशांक में सुधार के लिए आंदोलन करने तक के सारे उपक्रमोंं में वे सबसे आगे रहे।

घरेलू कामगार संगठन

उनका मन, घरेलू कामगारों की समस्याएँ हल करने में रमने लगा। अशिक्षित, संकोची, बिखरे हुए गरीब घरेलू कामगारों को, घरोंं में काम-काजी नौकरों-नौकरानियों को रमणभाई के रूप में नेता मिला। गणपत पारदले, शंकर वधवा का सहयोग पाकर उन्होंने बस्ती-बस्ती छान डाली। कुत्ते से भी बदतर जीवन, जिन पर थोपा गया है, उच्छिष्ट तथा बचे-खुचे बांसी अन्न पर पेट भरने की जिन पर बारी आती है, मालिक का पुराना कपड़ा, साड़ी यही जिनका वस्त्रावरण है, गाँव गया तो वापसी पर नौकरी का भरोसा नहींं, ऐसे असंगठित कामगारों को, वस्तुत: जिन्हें कोई कामगार संज्ञा नहीं देता था, ऐसे कामगारों को संगठित करना, उनमें आत्मविश्वास जागृत करना, मनुष्य जैसा स्वाभिमानी जीवन जीने की हिम्मत देना, इसके लिए रमणभाई ने अपार श्रम करके रात को भी दिन समझकर अपने उद्दिष्ट को मूर्त रूप दिया, कई आंदोलन किए। 35 हजार घरेलू कामगारों का मोर्चा निकाल कर मुंबई में खलबली मचा दी। शासन को घरेलू नौकरों के लिए संकेत जाहिर करने के लिए बाध्य किया।
असंगठित कामगार यह शब्दावली प्रचलित नहीं हुई थी, ऐसा वह जमाना। आंदोलन को तर्क संगति के सिरे तक उन्होंने पहुँचाया। अब कानून का समर्थन मिलने की स्थिति उत्पन्न हुई है। सैकड़ों गरीब कुनबी कार्यकर्ता भारतीय मजदूर संघ के साथ संघ (रा.स्व.संघ) को भी अपने साथ गाँव-गाँव लेकर गए। मुंबई में वस्त्रोउद्योग कामगारों ने कॉ. डांगे के नेतृत्व में, म्युनिसिपल कामगारों ने बाल दंडवते के सहकार से, गोदी मजदूरों ने एस.आर.कुलकर्णी के प्रभावी मार्गदर्शन में, घरेलू नौकरों ने स्व.रमणभाई शहा के कुशल नेतृत्व में मुंबई के कामगार-जीवन में महान योगदान दिया है। कामगार आंदोलन का इतिहास मेै इसका उल्लेख अवश्य होगा।

देश-भ्रमण

मुंबई से दिल्ली तक की रमणभाई की प्रगति उनकी कुशलता और अथक परिश्रम का फल है। अखिल भारतीय अध्यक्ष पद रमणभाई को सम्मान का कम, सेवा का ही अधिक लगा । सत्कारों को उन्होंने नकारा। पद, प्रतिष्ठा का उन्हें लोभ नहीं था। विविध शासकीय समितियों पर नामित किए जाने की उनकी इच्छा नहीं थी। एन.डी.ए. सरकार से फायदा उठाने का उन्होंने प्रयत्न नहीं किया। अहंकार ने उनको स्पर्श नहीं किया। देश-भ्रमण में सुदृढ़ संगठन ही उनका लक्ष्य रहा। कामगार क्षेत्र में प्रतिष्ठा, पैसा और संयोग वश व्यसन का प्रभाव शीघ्र होता है। स्वच्छ, कामगार हितैषी विचार का लक्ष्य रखकर अपने कृति का आदर्श उन्होंने कार्यकर्ताओं के सामने प्रस्तुत किया। कार्यकर्ताओं के अवगुणों को अनदेखा करके, उनके गुणों का उपयोग संगठन के उत्कर्ष के लिए करने में वे कुशल थे। निजी बैठकों में प्रसंगवश गुस्से में बात होती है। धीरे-धीरे इसका भी प्रेम का आधार होता था। अनुशासन रिसता परिणाम होता है, इस पर उनका विश्वास था। कार्य-व्यवस्था करते समय अनेक नेता दःुखी हो जाते थे, इस बात का उन्हें ज्ञान था। मजदूर संघ के परिवारों का वे एक आधार थे। धीरे-धीरे अब ‘सुनने’वाले कम हो रहे हैं। रमणभाई सौजन्य पूर्वक सुनने वाले थे। प्रासंगिक मतभेद हुए तो भी मतभेद बने नहीं रहेंगे, इसका वे अचूक ध्यान रखते थे।

आदर्श व्यवहार

श्रीगुरुजी उनका आदर्श, मा. दत्तोपंत ठेंगडी उनके मार्गदर्शक, संघ उनका खास। घरों तक संघ करने में वे प्रवीण थे। संघ नेतृत्व का शब्द उन्होंने हमेशा शिरोधार्य किया। संघ विचारों से समझौता नहीं किया।

‘संघशरण’ ही उनकी असली पहचान थी। मनुष्यों से संबंध जोड़ना उनका स्वभाव था। कामगार नेता और संघठनकर्ता ऐसी दोहरी जिम्मेदारी संभालने में, कुछ प्रसंगों में परहेज करने में शायद कुछ गड़बड़ी होना क्रम प्राप्त है, फिर भी वे कठोरता से पालन करते थे। भारतीय मजदूर संघ का केंद्रीय कामगार संगठनों में अव्वल स्थान रहने की उन्हें खुशी थी, परंतु कामगार आंदोलन पर, किंचित राजकीय अर्थनीति पर प्रभाव न होने का उन्हें दु:ख था। कामगार आंदोलन में समर्पित, ताकतवर कार्यकर्ता न आने का उन्हें दु:ख था, वे जानते थे कि कामगार हित दक्ष, जुझारू कार्यकर्ता तैयार नहां हो रहे हैं। संगठित, असंगठित कामगारों में से नेतृत्व निर्माण करने में हम कम पड़ रहे हैं, इसका उन्हें विषाद था, उनकी धारणा थी कि कामगार आंदोलन स्वार्थ का आंदोलन नहीं, फुरसत में काम करने का, अंशकालिक (पार्ट टाइम) काम करने का, निवृत्ति के बाद काम करने का स्थान नहीं। कामगार हित, निष्कलंक, नि:स्वार्थी चरित्र तथा अपार कष्ट से ही कार्य बढ़ेगा, यह उनका आग्रह था, उनका उज्ज्वल चरित्र, उनका सच्चा व्यवहार, यही उनके खुले जीवन ग्रंथ का रहस्य है।

राजनीति से दूर

कामगारों द्वारा कामगारों के लिए, कामगारों के हितों के लिए चलाया जा रहा आंदोलन यही थी, उनकी जीवन निष्ठा। हृदय की बाय-पास सर्जरी उनका भ्रमण रोक नहीं पाई। 80 वर्ष की आयु उनकी गति मंद नहीं कर सकी। राजनीति का बंधन उन्होंने कभी-भी स्वीकार नहीं की। भाजपा के अनेक नेता समझ चुके थे कि कामगार क्षेत्र के बिना अपना दल समाजव्यापी रूप धारण नहीं कर सकता। स्व. हशू अडवाणी, प्रा. फरांदे, धरमचंद चोराडिया, उल्लेखनीय कार्यकर्ता कामगारों की समस्याओं को राजनिति के स्तर पर ले जाने के आग्रही थे। मान. रमणभाई के साथ चर्चा किए बिना आगे नहीं बढ़ सकते इसका इन्हें ज्ञान था। संघ के वरिष्ठ प्रचारक मान. मुकुंदराव पणशीकर की मदद से, सलाह से मार्ग सूझा और भारतीय जनता पार्टी कामगार मोर्चा की स्थापना हो गई। भाजपा ने अंकित यूनियन की स्थापना न करते हुए पारिवारिक संबंधों से संघ की मदद लेकर काम करने का उपाय निकाला। मान. रमणभाई ने उन्हें स्वीकृति दी, परंतु वे यहीं नहीं रुके। भारतीय मजदूर संघ के कुछ प्रमुख कार्यकर्ता और भाजपा कामगार मोर्चा की ओर से मैं, इस तरह, पुणे में बैठक हुई। एक अच्छी चर्चा हुई। लिखित दस्तावेज तैयार हो गया। रमणभाई की उपस्थिति में और उनके हस्ताक्षर से। पहला मद यह की भाजपा कामगार आंदोलन में सकारात्मक दृष्टि से भाग लेगी। दूसरा मद की भाजपा सीधे यूनियन न चलाए उनका संगठन, आर्थिक व्यवहार स्वतंत्र रहे। अपरिहार्य कौन सा काम करें, इसका विवेचन हुआ। भाजपा प्रणीत सभी कामगार संगठन भा.म.संघ से संलग्न रहें। सविस्तार लिखने का कारण संघ परिवार ने सकारात्मक, परस्परपूरक दृष्टिकोण रखते हुए, एक दूसरे में संयुक्त न होकर, अंकित न होकर स्वतंत्र (पृथक), स्वावलंबी, कामगार हित को प्राधानता देने वाले भा.म.संघ को, कामगार आंदोलन को प्रोत्साहन, समर्थन दिया। रमण भाई का दृष्टिकोण इस प्रकार सरल, व्यावहारिक तत्व युक्त तथा यथार्थवादी था, अपने बाद काम सुचारू से चले, इसलिए दस्तावेज तैयार किये।

रमणभाई ने कई को कार्य प्रवृत्त किया, जो बाहर गए थे, उन्हें वापस बुलाया। जो दुखित हुए थे, उनसे कभी वैमनस्य नहीं किया। दीर्घ द्वेष भी नहीं किया, उनके योगदान को मान्यता दी। वे जानते थे कि सहकारियों को मान्यता देने वाले को ही सबकी मान्यता प्राप्त होती है। भारत पुनर्निर्माण का काम गतिशील हो, विचारों का प्रभाव तीव्रतर हो

ऐसा जिन्हें लगता हैं, वे सभी फिर एक बार इस काम पर जुट जाएँ। असली कामगार आंदोलन को आगे बढ़ाएँ, तात्कालिक फायदे का, आडंबर का घुन संगठन में न लगे, इसकी सतर्कता रखकर समर्थ कामगारों का आंदोलन के लिए कटिबद्ध होना, यही रमणभाई का वास्तविक स्मरण है।
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