बड़े भाई रामनरेश सिंह


(मा. दत्तोपंत ठेंगडी ने मजदूर संघ के विषय में जो विचार दर्शन विकसित किया है, उसे व्यावहारिक रूप देने का काम बड़े भाई ने किया। कार्ल मार्क्स को जैसे लेनिन मिले थे, उसी प्रकार ठेंगड़ी जी को बड़े भाई प्राप्त हुए।)
यह उस समय का प्रसंग है जब संघ पर पहली बार प्रतिबन्ध लगाया गया था। संघ ने सभी प्रचारकों को अपने-अपने घर वापस जाने के लिए कह दिया था। यह सूचना जब बड़े भाई-राम नरेश सिंह को मिली तो उन्होंने घर वापस जाने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, ‘‘घर-परिवार त्याग करके मैं प्रचारक बना हूँ। अब वापस नहीं जाऊंगा। संघ का कार्य ही अब हमारे जीवन का कार्य है।’’ वे भूमिगत रहकर प्रतिबन्ध के काल खण्ड में संघ का कार्यकरते रहे। बड़े भाई ऐसे दृढ़ निश्चयी थे। एक बार जो निश्चय कर लिया, उसे जीवन को जोखिम में डालकर भी पूरा करने का साहस उनमें था।

बड़े भाई से मेरा बहुत पुराना परिचय था। वे मेरे बड़े करीबी सम्बन्ध के प्रचारक थे। माननीय ठेगड़ीजी ने मुझसे पूछा की भारतीय मजदूर संघ के लिए बड़े भाई कैसे रहेंगे? मैंने तुरन्त उत्तर दिया, अत्यन्त उपयोगी और उत्कृष्ट रहेंगे। मजदूर संघ के काम के लिए उनके जैसा योग्य दूसरा नाम शायद ही मिले। भारतीय मजदूर संघ का काम शुरू करने के उपरान्त बड़े भाई का काम आज सबके सामने है।

लौकिक दृष्टि से यद्यपि बड़े भाई की शिक्षा बहुत अधिक नही हुई। किसी भी विश्वविद्यालय से डिग्री न हासिल करने के बावजूद आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र की जटिलतम् समस्याओं को प्रत्यक्ष रूप से सामना करते हुए मजदूर संघ का कार्य जिस तरह से बढ़ाया, वह लोगों को आश्चर्य लगता है। ऊँची डिग्री न ग्रहण करने पर भी विभिन्न प्रकार के विषयों पर बड़े भाई ने सूक्ष्म चिन्तन किया था। उनकी कार्यक्षमता असामान्य थी। प्रात: काल की शाखा से लेकर देर रात तक वे निरन्तर काम में लगे रहते थे। थकना उनके शब्दकोश में ही नहीं था। अन्य लोग जब विश्राम कर रहे होते, तब भी कार्य करने में निमग्न रहते। पत्र लिखते रहते अथवा अलग-अलग विषय पर जानकारी एकत्र करते रहते। हस्तलिखित उनके पत्रों की संख्या बहुत बड़ी है। अपने हस्तलिखित पत्रों के माध्यम से वे लोगों से जीवंत सम्पर्क रखते थे। सब लोगों को एक साथ रखना और उन्हें साथ-साथ लेकर आगे बढ़ना उनके विलक्षण सामर्थ्य का सूचक है। इन विशेषताओं के चलते ‘संगठन के अद्वितीय शिल्पकार’ जैसा विशेषण उनके लिए सर्वथा योग्य है।

प्रत्येक समस्या के मूल में जाना उनका स्वभाव था। इसी कारण उनके सभी निर्णय उचित और परिपक्व होते थे। उनके निर्णय पर नाराज होने, टीना-टिप्पणी करने या आरोप लगाने वाला कोई भी व्यक्ति मुझे नहीं मिला। पूरी तरह से नि:स्वार्थ और नि:स्पृह भाव से वे संगठन के हित में चिन्तन करते थे। यही कारण है कि उनका हरेक कार्य सफल होता था।

आदर्शवाद के आग्रही-

उनके लिए त्याग की भावना सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। आदर्शवाद के मार्ग पर चलते हुए यूनियन के क्षेत्र में भ्रष्टाचार दूर करने का महत्वपूर्ण कार्य उन्होंने किया। भारतीय मजदूर संघ की स्थापना से पूर्व सभी मजदूर संगठन मालिकों के साथ गठजोड़ करके चलते थे। इतना ही अपने सदस्यों के हितों के विपरीत कार्य करते समय में आगे-पीछे नहीं देखते थे। इस तरह की खराब प्रवृत्ति को बड़े भाई ने निश्चित रूप से अवरुद्ध किया। मेरे परिचय के अनेक उद्योगपति बार-बार कहते, ‘‘आपका यह भारतीय मजदूर संघ हमारे किस काम का है। इस संगठन को पैसे से खरीदना असम्भव है।’’ बड़े भाई ने भारतीय मजदूर संघ को इतनी ऊँची प्रतिष्ठा दिलवाया। यह कार्य केवल आदर्शवाद के आग्रह से ही हो सका।

अपना कार्यालय किस प्रकार से होना चाहिए, कार्यकर्ताओं का व्यवहार कैसा होना चाहिए, घोषणा (नारा लगाना) किस प्रकार की जानी चाहिए इस प्रकार की छोटी-छोटी बातों पर उनकी सूक्ष्म दृष्टि रहती थी। कम्यूनिष्टों की यूनियने ‘‘भारत माता की जय’’ की घोषणा पर विरोध करती हैं। इस पर बड़े भाई ने एक बार कहा, ‘‘भले ही संयुक्त मोर्चे से हम बाहर हो जायें, किन्तु यह नारा लगाना बन्द नही करेंगे।’’ मामला प्रतिष्ठा का बन गया। मजदूरों में इस पर चर्चा जोरों से शुरू हो गयी कि भारत माता की जय बोलने से किसी को भला क्यों आपत्ति होने लगी? किन्तु कम्युनिस्ट नेताओं को यह नारा बन्द करने का आग्रह था। अपनी यूनियन छोटी होने के बावजूद बड़े भाई अपने आग्रह पर डटे रहे। वह आन्दोलन बड़ा महत्वपूर्ण था और अत्यन्त नाजुक स्थिति में पहुँच गया था। अन्त में निर्णय लिया गया कि संयुक्त आन्दोलन में ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते समय किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसका मजदूरों पर गहरा प्रभाव पड़ा। मजदूरों को यह स्पष्ट हो गया कि कम्यूनिस्ट नेता भारत माता के प्रति भी निष्ठावान नहीं है। परिणामत: बहुत बड़ी संख्या में मजदूर भारतीय मजदूर संघ में शामिल हो गये। इस विषय पर खुद कम्यूनिस्ट यूनियन ही दो भागों में बंट गयी।

राजनीति की समझ-

बड़े भाई को राजनीति का सूक्ष्म ज्ञान था। राजनेताओं को प्रभावित करने की कला में वे पारंगत थे। उनसे कौन सा कार्य कैसे कराया जा सकता है, इसका अच्छी तरह से ज्ञान उन्हें था। आपातकाल के उपरान्त चौधरी चरण सिंह जेल से छूटकर बाहर आये। देश भर में उस काल में क्या-क्या अत्याचार हुए, इसकी जानकारी उन्हें नहीं थी। बड़े भाई ने अत्याचारों के विषय से भरीव जानकारी वाली फाईल चरण सिंह को दिखाया। उस फाईल में सभी विषय सत्य थे और प्रत्यक्ष प्रमाणों पर आधारित थे। उस फाईल के आधार पर चरण सिंह ने लोकसभा में चर्चा की। समाचार पत्रों में इस पर खूब लिखा गया। यह सारी जानकारी बड़े भाई ने बड़े परिश्रम पूर्वक उन स्थानों पर जाकर इकट्ठा किया था। बड़े भाई की भाषण की शैली सीधी और सरल थी। छोटे-छोटे उदाहरण देते हुए अपनी बात रखते थे। उनके उदाहरण भी हल्के फुल्के और मनोरंजक होते थे।

अनुशासित विश्वबन्धु-

बड़े भाई स्वयं बड़े अनुशासित रहते ही थे, अपने अन्य सहयोगियों को भी हमेशा अनुशासित रहने के लिए प्रेरित करते रहते थे। परन्तु शिष्ट रहने के लिए आग्रह करने की उनकी शैली स्नेहमय और अपनत्व से भरी होती थी। मिर्जापुर छोड़कर जाने के कई वर्षों बाद जब वे पुन: वहाँ गये, तो यात्रा के दौरान वे जहाँ भी जाते थे, वहाँ बहुत से लोग उनसे भेंट करने आते थे। लोगों के सुख-दु:ख का ध्यान बड़े भाई हमेशा रखते थे। यह बात लोगों को हमेशा स्मरण रहता था। उनसे मिलने हेतु आने वाले लोगो में बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, औद्योगिक मजदूर, खेतिहर मजदूर इत्यादि सभी शामिल होते थे। कभी-कभी लोगों से यदि कोई अनुचित कार्य हो जाता, तो उसे भी बड़े भाई ध्यान देते। उनके गलत कार्यों के लिए उन्हें समझाते। उनका उद्देश्य व्यक्ति को सुधारना होता है। अनुचित कार्य करने वाले लोग भी बड़े भाई के पास संकोच त्यागकर आते थे। यद्यपि गलत कार्य सहन करना बड़े भाई के स्वभाव में नहीं था, किन्तु सभी तरह के लोगों को साथ लेकर चलने उनकी गजब की क्षमता थी। इसलिए गलत काम करने वालों पर यदि वे क्रोधित होते, तो वे लोग बुरा न मानते हुए अपने भीतर सुधार लाने की कोशिश करते थे।

मजदूर संघ का विचार दर्शन-

मा. दत्तोपंत ठेंगड़ी ने भारतीय मजदूर संघ के विषय में जो विचार दर्शन विकसित किया, उसे व्यावहारिक रूप देने का कार्य बड़े भाई राम नरेश सिंह ने किया। जिस तरह से कार्ल मार्क्स को लेनिन मिले थे, उसी प्रकार से ठेंगडी जी को बड़े भाई मिले। मजदूर कोई बिकाऊ चीज नहीं हैं। बड़े भाई ने उन्हें स्वाभिमानी बनाया। उनकी अस्मिता को जगाया। उन्हें राष्ट्रभक्ति की भावना से भर दिया। मजदूरों को एक राष्ट्रव्यापी पहचान दिलाया। प्रत्येक हाथ को काम मिले, इस लिए उन्होंने अंधाधुंध मशीनीकरण का जोरदार विरोध किया। उन्होंने सबके मन में श्रम की प्रतिष्ठा का भाव जगाया। देश की प्रगति के लिए वे शरीर-वाणी-मन से परिश्रम करते थे। मजदूर क्षेत्र में आदर्शवाद और राष्ट्रवाद की स्थापना होने के साथ ही अन्य विचारों की यूनियने क्षीण होने लगी और भारतीय मजदूर संघ सबसे आगे निकल गया।

मनुष्य की परख-

मनुष्य के स्वभाव की परख बड़े भाई की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी। कौन व्यक्ति क्या काम कर सकता है, और क्या नहीं कर सकता, इस विषय में उनका अनुमान शत-प्रतिशत सही होता था। जिस व्यक्ति को वे कार्य सौंपते उस व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ाने का लगातार प्रयास करते रहते। यही कारण है कि बड़े भाई ने जिस व्यक्ति को भी संगठन से जोड़ा, उसने अनेक कष्ट सहते हुए अड़चनों का सामना करते हुए संगठन को आगे बढ़ाने में योगदान किया।

देश और मजदूर आन्दोलन में बड़े भाई के योगदान का शब्दों में वर्णन करना बहुत कठिन काम है। विचार करते हुए उनके कार्यों के अनेक पहलू मेरी दृष्टि के समक्ष है। जिस समय बड़े भाई मजदूर संघ में गये, उस समय मजदूर यूनियनों में कम्यूनिस्ट यूनियनों का प्रभाव था। राजनीतिक और मजदूर क्षेत्र में कम्यूनिस्टों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए लोगों के मन में विचार आने लगा था कि पं. नेहरू के बाद देश में कम्यूनिस्टों की ही सत्ता स्थापित होगी। शिक्षक, विद्यार्थी, श्रमजीवी बुद्धिजीवी सभी वर्ग के लोगों का झुकाव उनकी ओर था। उस परिस्थिति में कम्यूनिस्टों से बड़ा मजदूर संगठन भी कोई खड़ा कर सकता है, यह हास्यास्पद लगता था। कम्यूनिस्ट बड़ी सावधानी और कुशलता से समाज को राष्ट्रवादी विचारों से दूर कर रहे थे। विशेष करके मजदूर वर्ग को लाल क्रान्ति की ओर ढकेलने का उनका प्रयत्न था। परिणामस्वरुप मजदूर वर्ग भारतीयता से दूर होता जा रहा था। उन्हें पुन: राष्ट्रवादी बनाना स्वतन्त्रता दिलाने जैसा कष्टकरी हो गया था। ऐसी दशा में मजदूरों को साम्यवादी विचार धारा छोड़वाने का काम बड़े भाई ने दृढ़ता पूर्वक किया।

आज भारतीय मजदूर संघ की स्थापना हुए 57 वर्ष बीत जाने पर मजदूर क्षेत्र में नजर डालने पर ज्ञात होता है कि राष्ट्रवादी विचार धारा से ओत-प्रोत मजदूरों की संख्या देश में सर्वाधिक है। उस समय जो लोग भारतीय मजदूर संघ की उपेक्षा करते थे, वे ही आगे चलकर भारतीय मजदूर संघ और बड़े भाई को स्वीकृति प्रदान की। उसे सबसे बड़े और प्रभावशाली मजदूर संघ की मान्यता प्रदान की। यही नहीं, वे भारतीय मजदूर संघ की सलाह मानने लगे और इसके नेतृत्व में संयुक्त आन्दोलन चलाने लगे।

दृढ़ निश्चय-

जो काम करने का निश्चय बड़े भाई करते, उसे पूरा करके ही दम लेते है। यह उनके व्यक्तित्व की एक और खास बात थी। एक प्रसंग स्मरण है। मा. दत्तोपंत ठेंगड़ी का नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं था। इसलिए राज्यसभा का चुनाव लड़ने के लिए वे तैयार नहीं थे। यह बात जब बड़े भाई को मालूम हुई तो उन्होंने ठेंगड़ी जी के सारे कागज-पत्र इकट्ठा किया। मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए पूरी भाग-दौड़ की और नामांकन करने के आखिरी दिन सभी आवश्यक कागजात ठेंगड़ी जी के सामने लाकर रख दिया और उनसे आग्रह किया, ‘‘अब आप केवल हस्ताक्षर कीजिए।’’ कोई भी काम पूरा करने की विशेष सिद्धि बड़े भाई को प्राप्त थी।

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