असंगठित को संगठीत करो

भारतीय मजदूर संघ का अखिल भारतीय अधिवेशन फरवरी माह 2011 को जलगांव में संपन्न हुआ। इस अधिवेशन के दो घोष वाक्य (थीम) थे। एक असंगठित को सगंठित करो और दूसरा चलो गांव की ओर। असंगठित को सगंठित करने की प्रक्रिया मजदूर संघ ने 2008 मेें ही प्रारंभ की थी, लेकिन चलो गांव की ओर यह एक नया आयाम है। मजदूर संघ का यह अभिनव अभियान भारत वर्ष श्रमिक जगत मेें चर्चा का विषय है। महात्मा गांधी जी ने चलो गांव की ओर का नारा दिया था, उनका लक्ष्य था देहांतों का विकास करना/गावों में सभी सुविधाएं उपलब्ध करना। गांव में लघु तथा कुटीर उद्योगों का निर्माण करना। हालांकि महात्मा गांधी के इस अभियान को ना तो काँग्रेस ने आगे बढ़ाया ना तो काँग्रेस शासित केंद्र तथा राज्य सरकारों ने इसे सराहा। भारतीय मजदूर संघ का यह चलो गांव की ओर अभियान अलग पहचान वाला है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के प्रति देश के विभिन्न संगठनों का ध्यान हटा है, उनका पूरा ध्यान संगठित क्षेत्र की ओर ज्यादा है।

असंगठित को संगठित करो

असंगठित को संगठित करो का नारा जलगांव अधिवेशन में मुख्य रूप से दिया गया, लेकिन उसके पहले हुए अधिवेशनों में इस ओर ध्यान आकर्षित किया गया था। 2008 मेें कटक में हुआ 15 वें अखिल भारतीय अधिवेशन मेें ठेका प्रथा समाप्त करो और ठेका मजदूरों को स्थाई मजदूर के रूप नियमित करो, उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करो, इस विषय में मजदूर संघ ने ताकत जुटाई थी। इस विषय पर देश भर आंदोलन छेड़े गये थे। साथ ही अन्य संगठनों ने भी ठेका मजदूरी प्रथा के पक्ष विरोध किया था। भारतीय मजदूर संघ का जन आंदोलन तथा अन्य संगठनों का दबाव, इस वजह से केंद्र सरकार ने ठेका मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की भविष्य निधि, बीमा योजना, मडिकल सुविधा, पेंशन योजना के रूप सामाजिक सुरक्षा प्रदान की, लेकिन अभी-भी ठेका पद्धति पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुई। अभी-भी ठेका मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती। ठेका पद्धति पूर्ण रूप से समाप्त करने के लिए अभी-भी मजदूर संघ का आंदोलन जारी है

भारत में श्रमिक संगठन

18 वीं शताब्दी मेें ही मुंबई में कपड़ा मिलों का निर्माण हुआ। साथ ही अन्य कारखाने भी आयकर बड़े कारखाने, खदान आदि क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन, भत्ता, बोनस, सामाजिक सुरक्षा आदि मांगों को लेकर आंदोलन करते हैं। इन श्रम संघटनोें ने संघटित क्षेत्र के कर्मचारियों का अच्छे वेतन, बोनस, मंहगाई भत्ता, पेंशन आदि सुविधाएं दिलवाई। इन सभी संगठनों का असंगठित क्षेत्र की ओर ध्यान नहीं। इस वजह से असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों की बड़ी समस्या है।

2010-2011 की जनगणना के आधार पर कहा जाता है कि देश में 3 करोड़ कर्मचारी केंद्र सरकार तथा उसके अधीन कंपनियों में कार्यरत हैं। देश में कुल 51 करोड़ कर्मचारी मजदूर हें। 6 करो ड़ कर्मचारी संघटित क्षेत्र मेें है, तो 45 करोड़ मजदूर असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं। सरकारी आकड़ों के अनुसार देश में गरीबी रेखा के नीचे (बी पी एल) रहने वालीं की संख्या 48 करोड़ है। बी. पी. एल के तहत आने वाले सभी मजदूर असंगठित क्षेत्र में से है। केंद्र सरकार ने इनके लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय खोल रखा है। फिर भी गांवों में रहने वाले मजदूरों को केंद्र सरकारी नीति ने अनुसार लाभान्वित नहीं हुए।

भामसंघ का दायित्व

हमारा संगठन देश में सबसे बड़ा संगठन है। भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त क्रमांक एक का श्रमिक संगठन है। इस देश 51 करो़ड़ श्रमिकों के कल्याण के बारे में सोचना हमारा उत्तदायित्व है। आज तक हमने संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए अच्छे वेतन, भत्ते, कल्याणकारी योजनाएं, सुविधाएं एवं सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर दी है, लकिन देश के 45 करोड़ असंगठित क्षेत्र के मजदूर कल्याणकारी योजनाएं तथा सामाजिक सुरक्षा की विभिन्न योजनाओं से दूर हैं, उन्हें संगठित करके इन योजनाओं का लाभ दिलाना है, उन्हें देश की मूल धारा में लाना है, उन्हें श्रमिक जगत की धारा में लाना है, यह हमारा दायित्व है। भारतीय मजदूर संघ के हर एक कार्यकर्ता का यह उत्तरदायित्व है। गांव के मजदूर विभिन्न क्षेत्र में कार्यरत है, इनका कोई न्यूनतम वेतन निश्चित नहीं, सेवा शर्त नहां एवं सामाजिक सुरक्षा भी नहीं, ये सभी मजदूर शोषित, पीड़ित तथा दलित हैं, इसलिए इन्हें संग ठित करना अत्यावश्यक कार्य है। कपड़ा मिलों में काम करने वाले पुरुष, महिला तथा बाल कामगारों से 12-12 घंटा काम लिया जाता था। इस अन्याय के विरोध में 1885 मे सायल दोरबा जी ने आंदोलन किया। इस आंदोलन के तहत महिला तथा बाल काम कामगारों के काम के घंटे कुछ कम हुए। इन मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी बहुत कम थी, साथ ही मालिक जुल्म करते थे, इसके विरोध में नारायण मेधा जी ने आंदोलन किया, इसके परिणामस्वरुप वेतन में वृद्धि और काम के घंटे कुछ कम हुए, इसी प्रकार का आंदोलन 1910 में अहमदाबाद- सूरत में खड़ा हुआ। सरदार वल्लभाई पटेल ने आंदोलन का नेृतत्व किया था, उधर पंजाब में पंजाब केसरी लाला लजपतराय ने अमृतसर लुधियाना में इसी विषय को लेकर मजदूर आंदोलन शुरु किया।

इस तरह भारत के विभिन्न शहरों में मजदूरों के वेतन तथा काम के घंटे के बारे मेंं आंदोलन किए गए । संगठनों का निर्माण हुआ। 1918 में पहला विश्वयुद्ध समाप्त हुआ। विश्व में शांति स्थापित करने के लिए यूनो की स्थापना हुई, उसके बाद आंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आई. एल. ओ.) की स्थापना हुई। इस संगठन में विश्व के सभी देशों के मुख्य संगठन को सदस्य के रूप में लिया गया। भारत में केंद्रीय स्तर पर काम करने वाला श्रम संगठन नहीं था। आई. एल. ओ. के आदेश पर देश में 1920 में (ऑइटेक) ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काँग्रेस की स्थापना हुई। आरंभ में यह संगठन काँग्रेस के नेता चलाते थे। धीरे-धीरे इस संगठन पर रशियन प्रणित कम्युनिस्टों की छाया आने लगी। 1945 तक यह संगठन पूरी तरह कम्युनिस्टों के हाथ में चला गया। दूसरे महायुद्ध के बाद भारत को आजादी मिलने के आसार दिखाई दे रहे थे, उस समय देश में स्वतंत्रता आंदोलन अधिक जोर से चलाने की जरूरत थी। इस तहत काँग्रेस को मजदूरों के सक्रीय सहयोग की जरूरत महसूस होने लगी। 1920 में सरदार वल्लभाई पटेल की अध्यक्षता में इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन काँग्रेस की स्थापना हुई। आजादी के बाद डॉ. राम मनोहर लोहिया, लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने हिंद मजदूर सभा नामक संगठन स्थापित किया। भारतीय मजदूर संघ की स्थापना के पहले देश में तीन बड़ संगठन स्थापित हो चुके थे।

संगठित क्षेत्र

1920 से कल तक सभी केंद्रीय संगठन संगठित क्षेत्र की ओर ज्यादा आकर्षित थे। कपड़ा मिलें, चिनी मिलें, औद्योगिक क्षेत्र, केंद्र
सरकारी कार्यालय, राज्य सरकार के कार्यालय, कार्पोरेट ऑफिस तक सभी श्रम संगठनों के कार्य सीमिंत थे। रेल, दूरसंचार, संरक्षण, डॉकयार्ड, पोस्ट को उनके कर्तव्य तथा अधिकार की याद दिलाकर इनका संगठन स्थापित करना पड़ेगा, इसीलिए हमने नारा दिया है चलो गांव की ओर।

महाराष्ट्र के जलगांव, जिले में यह अभियान 1994 में ही हो चुका है। 1001 गावों तक जाकर मजदूर संघ, मजदूरों को समझाना, गांव की समस्याएं इकठ्ठा कर, उसे प्रशासन के सामने रखना, यह उद्देश्य सामने रखकर यह अभियान चलाया जा रहा था। जलगांव जिले में भारतीय मजदूर संघ का काम तहसील तक पहुंच चुका है। हर तहसील में मजदूर संघ के कार्यकर्ता हैं, उसी के आधार पर ये 1001गांवों तक जाने का अभियान सफल रहा। जिले के हर गांव में कम से कम पांच सदस्य हैं, उन्हीं के सहयोग के कारण यह आंदोलन सफल रहा। स्व.श्रद्धेय दत्तोपंथ ठेंगड़ी की उपस्थिति में इस अभियान का समापन हुआ। महाराष्ट्र के पुणे तथा कोल्हापुर जिलों में भी इसी तरह के प्रयास किए गए।

असंघटित कौन

अब सवाल उठता है असंगठित कौन है। गाव में रहने वाले खेती हर मजदूर असंगठित है क्या, असंगठित क्षेत्र की सूची इस प्रकार की है।

1) खेतों में काम करने वाला खेती हर मजदूर 2) घर-घर में जाकर काम करने वाली महिला श्रमिक 3) गांव का मोर्चा, लोहार, बढ़ई 4) ग्रामीण बैंक में काम करने वाला मजदूर 5) डाक विभाग का ई.डी. कर्मचारी 6) आशा कर्मी 7) आंगनवाडी शिक्षिका 8) स्वास्थ्य रक्षक 9) मलेरिया फवारणी मजदूर 10)बीडी मजदूर 11) मनरेगा मजदूर 12) बांधकाम मजदूर 13) वनवासी 14) ग्रामीण चौकीदार 15) ईट भट्टी मजदूर 16) ग्राम पंचायत कर्मी 17) मिड डे भोजन कर्मी 18) पशुपालन करने वाला 19) पत्थर व खान मजदूर 20) जंगलों मजदूर

गाव में अन्य प्रकार के विश्वकर्मा सेक्टर के तहत आने वाले सभी मजदूर। इस तरह असंगठित क्षेत्र में मजदूर है। सरकारी विभिन्न योजनाओं को लाभ उठाते बड़े गावों में स्थापित लघु उद्योग में कार्यरत मजदूर, जहां तक कृषि को उद्योग माना गया है। सरकार की नई योजना जल संवर्धन का भी कार्य बढ़ रहा है। इन सभी को संगठित करने से गावों में एक बड़ा सशक्त संगठन स्थापित हो सकता है। कृषि मजदूर, अन्य मजदूर एवं कृषक एकत्रित हों,े तो इसके अच्छे परिणाम होंगे। हमारा जो संकल्प है राष्ट्रहित, उद्योग सहित, मजदूर हितों के माध्यम से राष्ट्र को सशक्त करना संकल्प होगा।

क्या करना है

हमारा नारा है चलो गांव की ओर। अब सवाल उठता है। वहां जाकर क्या करना है, कैसे करना है। मजदूर शहर का हो या गांव का उसे न्यूनतम वेतन मिलना है, उसे भी सरकारी योजनाएं का लाभ मिलना चाहिये, वह भी देश के मुख्य प्रवाह में आये। किसी भी मजदूर संगठन का यह कार्य है। केंद्र सरकार का बजट तथा राज्य सरकार का बजट देखे तो ग्रामीण मजदूरों के लिए बहुत कम पैसा खर्च किया जाता है। हमारी अर्थव्यवस्था में इनका योगदान बढ़ाना है, इन्हें अर्थ व्यवस्था का शास्त्र बनाना है। अर्थव्यवस्था के पहलू उन्हें समझाना है। ग्रामीण बैंक में उनके लिए केंद्र तथा राज्य सरकारी विभिन्न 20 योजनाएं हैं। लाभ के लिए उनसे फार्म भरकर आगे की कार्यवाही करनी होगी। अच्छा वेतन दिलवाव मजदूरों का शोषण रोकना होगा। महिला श्रमिको की परेशानियों को जानकर उसका निपटारा करना होगा। महिला श्रमिकों को सुरक्षा दिलवाना होगा। इस तरह श्रम संगठन शहर की ओर से गाव की ओर लाना होगा। निम्न प्रकार की योजनाऐ हैं, जो उन्हे मालूम नहां।

1) महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना 2) स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना 3) प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना 4) राजीव गांधी स्वास्थ योजना 5) जनश्री बीमा योजना 6) राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना 7) इंदिरा आवास योजना 8) राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम 9) विकलांग व्यक्ति की लाभ योजना 10) अल्पसंख्यंकों की कल्याणकारी योजना 11) मरू भूमि विकास योजना 12) ग्रामीण् जल वितरण योजना 13) समग्र आवास योजना 14) सर्व शिक्षा अभियान योजना 15) ग्रामादय योजना 16) मोर्चा कल्याणकारी योजना 17) मछुआरो के लिए विशेष निधि 18) घरेलू मजदूरों के लिए योजना 19) बांधकाम कर्मियों के लिए योजना 20) गरीबी रेखा के निचले व्यक्तियों के लिए बनी योजना गाव में काम करने के लिए केंद्र स्तर से लेकर गांव तक कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना होगा, उन्हें उपरोक्त योजनाओं की जानकारी देनी होगी। उपलब्ध रोजगार की जानकारी देनी होगी गांव में जाकर वहां के मजदूरों को इकठठा करके उन्हें सभी कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देनी होगी। इन सबको संगठित करके वहां मजदूर सगठन खडा करना होगा। श्रम संघटन का पंजीकरन करना होगा। मजदूरों का शोषण रूकवाना होगा। गाव के सरपंच, मखिया एव सचिव को जानकारी देनी होगा, उनका सहयोग लेकर इस अभियान के दायरे में उन्हें भी लाना होगा, तभी हमारा यह अभियान सफल होगा। यही चलो गांव की ओर अभियान है।

देश के 6 लाख 38 हजार गांवों तक जाकर हमारा उद्देश्य सफल करना यह कोई छोटी बात नहीं है। एक दिन, एक महिना या एक साल यह कार्य पूरा नहीं हो सकता। इसलिए कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करनी होगी, उन्हेंं, प्रशिक्षित करना होगा। यह एक दीर्घकालीन प्रक्रिया इसी अभियान के प्रथम चरण में जलगांव में जुलाई माह में एक प्रशिक्षण वर्ग हो रहा है। देश के हर प्रांत से 80 कार्यकर्ता सहभागी हो रहे हैं, वह जिले के गांव में जाकर जानकारी लेंगे। मजदूर संघ की इस अभियान का श्रमिक जगत में अच्छा स्वागत हो रहा है। समाज से भी इस अभियान को अच्छा प्रतिसाद मिलेगा। इस राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाने का जो भारतीय मजदूर संघ का संकल्प है, वह पूरा होगा।
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