भारतीय रेल्वे मजदूर संघ

सन् 1962 में चीनने यकायक भारत की उत्तरी क्षेत्रपर आक्रमण किया। चीन के प्रधानमंत्री श्री. चाड एन. लाय. कुछही दिन पहले भारत में आए थे। भारत की सभ्यता, स्वभाव और संस्कृती के अनुसार उनका यथोचित स्वागत किया गया। हिंदी चिनी भाई भाई और पंचशील के नारे अभी भारतभर में गूँज ही रहे थे की अचानक भारत के साथ विश्वासघात किया गया, भारत सरकार सपनोंमे थी। आक्रमण का जवाब देने के लिए कुछ भी तैयारी नही थी। किंतु बिना कोई साधन सामग्री, तैयारी, भारत के शूर सैनिकोने जानकी बाजी लगाकर अपनी पवित्र मातृभूमी की रक्षा करने का जी तोड प्रयास किया। देशवासियोंनेभी अपना दायित्व निभाने में कोई कसर नही छोडी। पैसा दिया, श्रमशक्ती लगाकर कारखानोंमें रातदिन काम किया। संकट काल में पुरे देश ने एकता का मधुर परिचय दिया। किंतु साम्यवादीयोंने इस आक्रमण को शांतीसेना का नाम देकर और चीन के पक्ष में पत्रक और पोस्टर निकालकर देशवासियोंके साथ गद्दारी की, विश्वासघात किया। रेल मजदूर इससे अत्यंत प्रक्षुब्ध हुए। क्यु की ऐसी हरकतें करनेवाले लोग साम्यवादी रेल्वे, युनीयन के लोग थे। गोरखपूर में पूर्वोत्तर रेल्वे के राष्ट्रभक्त रेल्वे मजदूरोंने श्रद्धेय ठेंगडी जी से संपर्क करके, चर्चा करके रेल्वे में भारतीय मजदूर संघ का पहला संगठन खडा किया। इससे प्रेरणा लेकर अलग अलग झोनपर राष्ट्रभक्त रेल्वे मजदूर कार्यकर्ता एकत्रित आकर भारतीय मजदूर संगठन गठीत करने लगे। तीन चार साल में ही तब के आठ झोन और उत्पादन इकाईयोंमें संगठन निर्माण हुए। भारतीय मजदूर संघ का काम रेल्वे में जोर शोर से प्रारंभ हुआ। एक जोश था, उमंग थी, ध्येय था, निश्चित लक्ष्य था।

भारतीय मजदूर संघ से संबंध सभी झोन के कार्यकर्ताओंके मन में स्वाभाविक रुप से अपना एक महासंघ निर्माण करने का विचार आया। 24 दिसम्बर 1965 को आग्रा के माइथान धर्मशाला में सर्व संमत्तीसे केंद्रीय महासंघ बनाने का निर्णय लिया गया। इस महासंघ के नाम के बारे में विस्तार से चर्चा करने के बाद भारतीय मजदूर संघ के बीच में रेल्वे शब्द जोडकर भारतीय रेल्वे मजदूर संघ के नामपर सहमती हुई। वहींपर महासंघ का विधान बनाने और प्रथम अधिवेशन करने के लिए आठ सदस्योंकी संयोजन समिती नियुक्त की गयी।

भारतीय रेल्वे मजदूर संघ भारतीय मजदूर संघ की केन्द्रीय औद्योगिक इकाई है, इसकी स्थापना अधिवेशन दिनांक 26 एवम् 27 मई 1966 को मुंबई में रामायण ज्ञानमंदिर, मुलुंड में प्रखर राष्ट्रवादी द्रष्टा मजदूर नेता श्रद्धेय ठेंगडीजी के अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस अधिवेशन का उद्धघाटन करने के लिए सारे वलयांकित एवम् नामांकित व्यक्तियोंको छोडकर 1965 के पाकिस्तान के आक्रमण में हवाई हमले में अपना नियोजीत दायित्व निभानेवाले रेल्वे इंजिन में कार्यरत फायरमन शहीद हुए प्रथम श्रेणी अशोक चक्र विजेता श्री. चमनलाल की विधवा पत्नी श्रीमती आशारानी के करकमलोंद्वारा किया गया। समुचे देशसे आए हुए हजारो प्रतिनिधी इस ऐतिहासिक घटना के साक्षी थे।

भारतीय रेल्वे मजदूर संघ का कार्य सुचारु रुप से शुरु हुआ। स्थापना अधिवेशन के तुरंत बाद निवृत्त न्यायमूर्ती श्री. गजेंद्रगडकर महंगाई भत्ता आयोग की नियुक्ती 26 जुलाई 1966 को हुई। भा. रे. म. संघ ने आयोग के सामने तर्कसंगत ज्ञापन दिया। और ऐसा ज्ञापन देनेवाला यह एक मात्र संगठन था। मौखिक रुप से भी दो बार आयोग के सामने अत्यंत प्रभावशाली वक्तव्य पेश किया गया। शासन प्रशासन और रेल्वे में कार्यरत दोनो मान्यताप्राप्त महासंघ नही चाहते थे की भा. रे. म. संघ को आयोग के सामने बुलाया जाए। इसलिए सभागृह में भा. रे. म. संघ के तीन प्रतिनिधीओंके लिए बैठने की व्यवस्था ना हो, ऐसी छोटी, घिनोनी हरकतें भी अपनाई गई। किंतु तीनोंने ऐसी परिस्थिती में हताश ना होकर जबरदस्तीने अपना दायित्व और अधिकार निभाया। प्रभावशाली वक्तव्य देकर सभा को चकित कर दिया। गजेंद्रगडकर आयोग की सिफारिशे इतनी निकम्मी और अपमानजनक थी की निराश और क्षुब्ध सभी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियोंने 19 सितंबर 1968 को एक दिन की सांकेतिक हडताल करने की नोटीस दे दी। जिसमें ऑल इंडिया रेल्वे मेन्स फेडरेशन भी शामील था और हडताल की अगुआई करना इन्ही का दायित्व था। भा. रे. मा. संघ ने तहे दिल से हडताल का समर्थन किया। किंतु ऑल इंडिया रेल्वे मेन्स फेडरेशन के संबंद्ध युनीयनोंने अपने स्वभाव के अनुसार या तो हडताल की नोटीस वापस ली या हडताल से विरक्त रहे जिससे रेल मजदूरोंका मनोबल टूट गया। फिर भी भा. रे. म. संघ संबंद्ध युनीयन उत्तर रेल्वे कर्मचारी युनीयन और पूर्वोत्तर रेल्वे श्रमिक संघ ने हडताल में बढ़ चढ़कर भाग लिया। युनीयन के प्रमुख पदाधिकारी और 36 कार्यकर्ताओंको तिहाड जेल में भेज दिया। श्रद्धेय ठेंगडीजी केंद्रीय सरकारी कर्मचारीओंका नेतृत्व करते हुए। अपने अनुयायीओंके साथ जेल गये और दिल्ली में हडताल को शतप्रतिशत बनाने में योगदान दिया। भारतीय मजदूर संघ ने 22 नवम्बर 1969 को महामहिम राष्ट्रपती श्री. व्ही. व्ही. गिरी को भारत के मजदूरोंकी ओरसे राष्ट्रीय माँगपत्र दिया। इस कार्यक्रम में भारत के कोने कोने से कई हजार कार्यकर्ता दिल्ली में जुलुस में शामील हुए। ज्ञापन में भा. रे. म. संघ द्वारा 52 सूत्री माँगपत्र की पुष्टी की गयी। यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज मजदूर आंदोलन में मील का फत्तर माना गया।

19 नोव्हेंबर 1969 को संसद में तृतीय केंद्रिय वेतन आयोग नियुक्ती की घोषणा की गयी। सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश श्री. रघुवीर दयाल इसके अध्यक्ष रहे। भा. रे. म. संघने रेल कर्मचारीयों के लिए स्थायी उभयपक्षी पृथक वेतन वार्ता तंत्र की अपने माँग को सुरक्षित रखते हुए आयोग के सामने लिखित ज्ञापन दिया। और आयोग द्वारा भेजी गयी प्रश्नावली का तर्कपूर्ण व्यवहारिक उत्तर दिया। तथा अपनी अंतरिम राहत की माँग पर भी अलग से ज्ञापन देकर तुरंत आंदोलन छेडने की चेतावणी दी। वेतन आयोग को अपने लंबे कार्यकाल के दौरान तीन बार अंतरिम राहत देने का निर्णय लेना पडा।

भारतीय रेल्वे मजदूर संघ ने रेल मजदूरों के लिए ‘बोनस’ की माँग उठाई। किसी भी संगठन ने इस माँग को नही उठाया था। इतनाही नही तो सरकारी कर्मचारीयों को बोनस की माँग एक हास्यास्पद बात इसलिए मजाक भी उडाई। किंतु जबतक जीवन वेतन नही दिया जाता तब तक डिफर्ड वेज याने विलंबित वेतन इस प्रकार की बोनस की परिभाषा करके अत्यंत उचीत तर्क भी प्रस्तुत किया गया। आगे चलके 1974 के रेल हडताल में जो माँगपत्र सरकार के सामने रखा गया, उसमें प्रमुख बोनस की माँग को रखना सभी संगठनोंने मान लिया। अपनी छ: सूत्री माँग को लेकर रेल्वे में कार्यरत छ: प्रमुख संगठन, इंटक छोडकर और 110 कॅटॅगरी असोसिएशन एकत्रित आए। ऑल इंडिया रेल्वे मेन्स फेडरेशन एक्म् भारतीय रेल्वे मजदूर संघ को कन्व्हेनर इस नाते से मैदान में उतरे। जाने माने लडाकू मजदूर नेता श्री. जॉर्ज फर्नांडिस को इस महान संघर्ष के लिए ए आय आर एफ ने अपना अध्यक्ष बनाया। लगातार चार-पाच महिने हडताल की तैयारी होती रही। सरकार के साथ वार्ता भी चल ही रही थी। हडताल के लिए कानूनी आवश्यकता इसलिए मतदान भी लिया गया। श्री. जॉर्ज फर्नांडिस मैदान में नेतृत्व करते थे। और सरकार से वार्ता करने का अधिकार भा. रे. म. संघ के कार्यकारी अध्यक्ष श्री. गजाननराव गोखले को दिया गया था। रेल मंत्री, रेल राज्यमंत्री से अनेक बार चर्चा होनेपर भी समझौता न होनेपर 8 मई 1974 को मध्यरात्री से हडताल प्रारंभ हुआ। यह हडताल 28 मई तक चली। दुनिया के मजदूर जगत के इतिहास में यह सबसे बडी एवम् शांतीपूर्ण हडताल मानी गई। हडताल शुरु होने के पहले ही श्रद्धेय ठेंगडीजीने कहा था की हडताल जरूर होनी चाहिए किंतु देश की संपत्ती का नुकसान कताई नही होना चाहिए इसलिए विशेष ध्यान दिया जाए। और हडताल के पूरे समय में रेल्वे की संपत्ती का कहीपर भी तोडफोड करकर नुकसान नही हुआ। इसका श्रेय भा. रे. म. संघ को ही अवश्य है। हडताल में भाग लेने के कारण कई कार्यकर्तांओ को गिरफ्तार करके जेल में भेजा गया, कई निलंबित हो गये, नौकरी से निकाले गये। हडताल के समय रेल्वे कॉर्टर्स से बालबच्चेसहित घर का सामान रस्तेपर फेकना, कामपर जाने के लिए सक्ती करना आदी सारे अत्याचार किये गये। सरकारने इस हडताल का वॉरफुटींगपर सामना किया। अपने सभी पीड़ित कार्यकर्ताओं की पूरी सहायता भा. रे. म. संघ ने की।

ऐतिहासिक रेल हडताल के तुरंत बाद देश में आपात काल लागु किया गया। भा. रे. म. संघ के कई कार्यकर्ताओंको फिरसे जेल में भेजा गया। आपात काल में अन्य सारे मजदूर संगठन के काम थप हो गये। लोग आपात काल के गुन गाने लगे। किंतु भा. रे. म. संघ अपना काम इसी लगन और निष्ठा के साथ निरंतर करता रहा। वार्षिक सभाएँ होती रही। अन्य प्रस्ताव के साथ आपात काल को हटाने का प्रस्ताव भी पारित किया जाता। पुरे देश मेंं आपात काल का विरोध जोर शोर से शुरू हुआ। ‘जेल भरो’ आंदोलन में हजारो हजार लोगों ने गिरफ्तारी दी। परिस्थिती के दबाव के कारण सरकार को झुकना पडा। आपात काल समाप्त करना पडा। फिर से लोकतंत्र की स्थापना हुई। आपात काल की विरोध में जनताने तक्ता पलट दिया। जनता पार्टीका शासन शुरु हुआ। स्वतंत्रता, मुक्ती का आनंद और अत्यंत स्फूर्तीले, चैतन्यमय वातावरण में भा. रे. म. संघ का ऐतिहासिक अधिवेशन 23 और 24 सितम्बर 1978 को मद्रास (चेन्नई) में संपन्न हुआ। 5000 से जादा प्रतिनिधी हर झोन से पाँच विशेष गाडियाँ और कई विशेष अतिरिक्त डिब्बोंमें वहाँ पहुँचे। रेल्वे यार्ड में इतने डिब्बे रखने की समस्या निर्माण हुई। रेल्वे में ए आय आर एफ को प्रथम महासंघ होने के कारण मान्यता थी। दूसरा महासंघ सरकारी होने के कारण इसे भी जन्मत: मान्यता दी गयी। भा. रे. म. संघ ने रेल्वे एस्टॅब्लीशमेंट मॅन्युअल के अनुसार लिखी गई सारी शर्ते पूरी करनेपर भी सरकार मान्यता देने के लिए तैयार नहीं थी। अनेकानेक आंदोलन, धरना, प्रदर्शन संसद में लोकप्रतिनिधीओंद्वारा उठाये गए प्रश्न के बावजूद मान्यता का प्रश्न नही हल हो सका। मान्यता की एकसूत्री माँग को लेकर 8 मई 1979 को रेलभवनपर चिलचिलाती धूप में 25 से 30 हजार कार्यकर्ता जुलुस लेकर गये। हर झोन से, हर मंडल से कार्यकर्ता बडी उमंग, जोश और उत्साह के साथ जुलूश में शामील हुए।

बोनस की माँग को भारतीय रेल्वे मजदूर संघ ने फिर उठाया। इस माँग के समर्थन हेतु सभी संगठनों को आवाहन किया गया। उस वक्त चौधरी चरणसिंग की सरकार केंद्र में थी। दुर्भाग्य से अन्य संगठनों के नुमायंदे सरकार में मंत्री होने के कारण कोई भी संगठन आंदोलन करने के मनस्थिती में नही था। ऐसी परिस्थितीमें प्रमुख माँग को हासिल करने के लिए भा. रे. म. संघ ने अकेले 20 दिसम्बर 1979 से अनिश्चित कालीन हडताल का निर्णय लिया। हडताल करने के पूर्व ही मजबूर होकर सरकार को उत्पादकता के आधारपण रेल मजदूरोंको बोनस का निर्णय लेना पडा। हडताल की नोटीस माँग पूरी होनेपर वापस ली गयी। यह भा. रे. म. संघ की सबसे बडी, शानदार विजय रही। रेल मजदूरोंको दिया गया यह सबसे बडा तोहफा भी था।

पचास प्रतिशत से उपर महंगाई भत्ता पहुँचनेपर मूल वेतन में समाविष्ट करके कर्मचारियोंको लाभ देने की सिफारिश पंचम वेतन आयोग ने की थी। सरकारने सिफारसे तो स्वीकारी थी। किंतु इस प्रकार आर्थिक लाभ देने में टालमटाल होती रही। भा. रे. म. संघ एवम् भा. म. संघ का केंद्रीय सरकारी कर्मचारियोंका सरकारी कर्मचारी राष्ट्रीय पीरसंघ का एक प्रतिनिधी मंडल तब के प्रधानमंत्री श्री. अटलबिहारी बाजपेयीजी से मिले और उन्हें इस उचीत मांग की जानकारी दी। उन्होने तुरंत इस अत्यंत उचीत एवम् न्यायपूर्ण मांग को मान लिया। समस्त केंद्रीय कर्मचारियोंको इस कारण आर्थिक लाभ हुआ। मा. प्रधानमंत्रीजीका इस निर्णय के बारे में अभिनंदन करने के लिए 1200 से अधिक केंद्रीय सरकारी कर्मचारी इन्ही के निवासस्थान पर पहुँचकर सभा के माध्यम से इनके प्रति आदर व्यक्त किया गया।

महंगाई भत्ते को मूल वेतन में समाविष्ट करके लाभ पहुँचा इस कारण अब कोई वेतन आयोग नियुक्त नही किया जाएगा, ऐसा प्रचार अन्य संगठनोद्वारा जोर शोर से शुरु किया गया। दुर्भाग्य की बात है की इन संगठनोंने छठा वेतन आयोग नियुक्त करने के लिए कुछ भी प्रयास नही किए। अंततोगत्वा भा. रे. म. संघ और सरकारी कर्मचारी राष्ट्रीय परिसंघने वेतन आयोग के नियुक्ती के लिए अनेकानेक कार्यक्रम किए। जंतरमंतर पर दो बार प्रदर्शन किए। किंतु वित्तमंत्री श्री. चिंदबरम अडे रहे। अत: फिर से एक बार दिल्ली में भारतीय मजदूर संघ के अध्यक्ष श्री. गिरीश अवरथीजीने पत्रकार परिषद लेकर सरकारीयोंकी (केंद्रीय) अनिश्चित कालीन हडताल के निर्णय की घोषणा की। तुरंत ही चिदंबरम् ने छठे वेतन आयोग के नियुक्ती की घोषणा की।

वर्ष 2004 में श्रद्धेय ठेंगडीजी का स्वर्गवास हुआ। भा. रे. म. संघ के हर कार्यक्रम, अभ्यासवर्ग, अधिवेशन में वे उपस्थित होकर मार्गदर्शन करते थे। अपवाद 1973 के वारानसी अधिवेशनका है। इन दिनो प. पू. श्री. गुरुजी अत्यवस्थ होने कारण श्रद्धेय ठेंगडीजी उपस्थित हो न सके। हर कार्यक्रम का समापन श्री. ठेंगडीजीद्वाराही होता था। उनके प्रेरणादायी विचार सुनने के लिए सारे लालाईत रहते थे। पंचतंत्र, गीता, उपनिषद, बायबल, कुराण इन सबका अत्यंत गहन अभ्यास होने के कारण इनमेंसे समयोचित और प्रसंगोचित उदाहरण वे अपने मधुर वाणीसे देकर सबको उत्साहीत करते थे। हिंदी, उर्दू, मराठी, बंगाली, अंग्रेजी और संस्कृत भाषा उन्हे अवगत थी। ज्ञानेश्वर, रामदास, नामदेव, तुकाराम, कबीर, रोहिदास आदी अनेक संतोंका उनका अभ्यास स्तिमीत करनेवाला था। वैसे तो वे हरदम प्रवासपर ही रहते थे। फिर भी अनेक लेख, अनेक पुस्तके वैसेही अनेकानेक विषयों पर व्याख्यान इन सब बातोंके लिए वे समय कैसे निकालते थे यह बात समझने के परे है। भा. रे. म. संघ अत्यंत भाग्यवान रहा की ऐसे एक युगपुरुष द्रष्टा नेता के हम अनुयायी रहे। आज वे नही है फिर भी उन्ही की प्रेरणा आज भी है और कल भी रहेगी। उन्होने दिखाएँ हुए पथपर भा. रे. म. संघ का एक एक कार्यकर्ता चलता रहेगा, मान्यता मिले या ना मिले। वे हरदम कहते थे की भारतीय मजदूर संघ केवल ब्रेड बटर युनीयन नही है। तो राष्ट्रभक्ती जागृत करने का जो विशाल प्रयास देशभर में चल रहा है, उस भव्य दिव्य शृंखला की एक छोटी कडी के नाते हमें काम करना है। हमारा ध्येय छोटा या संकुचित नही तो अपने पवित्र पूजनीय मातृभूमी को परमवैभव तक पहुँचाना यही लक्ष्य है। और तब तक हमें चूपचाप बैठने का अधिकार ही नही है। आज रेल्वे के सारे सोला झोन, मेट्रो और सारे उत्पादन इकाइयाँ में भा. रे. म. संघ कार्यरत है, और आगे बढ रहा है। यह श्रद्धेय ठेंगडीजी के मार्गदर्शन और आशीर्वाद का ही फल है। यह हम सबका विश्वास है।

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