बिजली कामगार निधि संस्था ने पूरे किए डेढ दशक

विद्युत विभाग में कार्यरत मजदूरों के कल्याण के लिए काफी संघर्ष के बाद एक ऐसी योजना अमल में लाई गई, जिसके आधार पर दुर्घटना की स्थिति में मजदूरों के परिजनों को आर्थिक मदद दी जा सके। विद्युत मंडल में ढा़ई दशक पहले बिजली का कार्य करते समय अगर किसी दुर्घटना में किसी मजदूर की मौत हो जाए तो उसके परिजनों को काफी अल्प मदद दी जाती थी और वह भी बहुत कम। दुर्घटना में मारे गए कामगारों के परिजनों को गुजारे के तौर पर अच्छी धनराशि मिले, इसके लिए बालासाहेब साठये के मन में ऐसा विचार आया कि मजदूरों के बढे वेतन से कुछ धनराशि निकाल कर उसके माध्यम से कामगार निधि तैयार की जाए?और जब किसी मजदूर की विद्युत संबंधी कार्य करते समय मौत हो जाए, को उसके परिजनों को राहत के तौर पर उक्त राशि दी जाए, लेकिन दुर्भाग्यवश इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिली। साठये के इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिल पाई। साठये प्रस्ताव को मंजूरी न मिलने से थोड़े परेशान तो हुए, पर उन्होंने अपनी हार नहीं मानी और कामगारों के लिए कल्याण निधि योजना को अमल में लाने का अभियान जारी रखा और इस बारे में दूसरा प्रस्ताव विद्युत मंडल के पास मंजूरी के लिए भेजा।

इस प्रस्ताव में मजदूरों के वेतन से कुछ राशि हर माह काट कर उतनी ही धनराशि विद्युत मंडल की ओर से भी जमा की जाने की बात कही गई थी, पर इस प्रस्ताव को भी मंजूरी नहीं मिल पाई। इसके बाद साठये ने कामगार संघ से अपील की कि वह खुद ही एक ऐसी योजना बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसके अंतर्गत मजदूरों की आसामायिक मृत्यु के समय उसके परिजनों को आर्थिक मदद दिए जाने का लक्ष्य सामने रखा गया। इस प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान कर दी गई। सांगली में 10 अगस्त, 1986 में शुरु की गई इस योजना का 2011 में पच्चीस वर्ष पूरे हो गए। इन वर्षों में कमागार कल्याण निधि के कार्य में कई उतार-चढ़ाव भी आए। इस कल्याण निधि के पहले 6 माह में 2000 सदस्य बने तथा इस योजना के तहत मृत कामगार (मजदूरों) के आश्रितों को 5000 रुपए ं(प्रति मजदूर) की धनराशि मदद के तौर पर देने की घोषणा की गई। प्रारंभ में इस संस्था के विश्वस्थों ने एक अध्ययन करके यह जानने की कोशिश की कि विद्युत से निगणित कार्य करते वक्त मारे गए मारे गए मजदूरों की संख्या की गणना की गई, इस गणना के बाद भुग्तभोेगियों को दी जाने वाली आर्थिक मदद राशि 5000 से बढाकर 15000 रुपए कर दी गई, लेकिन दुर्भाग्य से मृतक मजदूरों का आकड़ा बढता ही चला गया। कामगारों की ओर से जमा की गई राशि से उनको मदद देने का निर्णय लिया गया ।

वर्तमान में संस्था के 11746सदस्य हैं। इस वर्ष 3442 सदस्य सेवानिवृत या मृत होने के कारण कम हो गए हैं। इस संस्था ने 25 साल की कालावधि में 1031 मृत सदस्यों के परिजनों को आर्थिक मदद के रुप में 1 करोड़, 21 लाख रुपए की आर्थिक मदद दी है। उल्लेखनीय है कि यह संस्था सिर्फ बिजली विभाग के कामगारों को ही आर्थिक सहायता नहीं, देती अपितु समाज के सभी दुर्बल, आर्थिक रुप से दुर्बल लोगों के जीवन का ख्याल रखते हुए 25 वर्ष के लंबे इतिहास में गरीब लोगों को 7 लाख तक की आर्थिक मदद प्रदान की है। वर्तमान में इस संस्था में 88 लाख सदस्य हैं, तथा इन सदस्यों की ओर से जमा की गई धनराशि से मिलने वाले व्याज की राशि से मजदूरों की आर्थिक सहयोग प्रदान किया जा रहा है।

इस कामगार निधि में धीरे-धीरे जब कोश घटने लगा तो मजदूर में रोष उपजा। मजदूरों से जुड़ी समस्याओं का निराकरण करने के लिए जिस तरह से बालासाहेब साठये लड़ते रहे, कुछ वैसा ही साठये के बाद संठगन के नए अध्यक्ष रमणभाई शहा ने किया। कई बैठकें आयोजित करके मजदूरों की समस्याओं का समाधान करने की संभावनाएं तलाशी गई। कामगार संघ के सभी पदाधिकारियों तथा कर्मचारियों ने संघ के काम-काज में किसी भी तरह की आर्थिक कमी नहीं होने दी जाएगी। बैठकों में विचार-विमर्श के बाद संघ के काम-काज के लिए आवश्यक निधि कम नहीं पड़ने दी जाएगी। मजदूरों की किसी भी समस्या का समाधान जल्दी से जल्दी कराने के बारे में हर दिन समस्याएं होने लगी। कामगार संघ के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली पतसंस्थाओं की ओर से भी कल्याण निधि दी जाने लगी, इससे कल्याण निधि में वृद्धि होने लगी, इसी के साथ मृतक मजदूरों की संख्या में फेर-फार होने की भी शिकायतें मिलने लगीं, इसलिए रमण शाह ने मृत कर्मचारियों के वारिसों की आर्थिक मदद की राशि में कटौती करने का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का पहले तो सभी ने एक सिरे से विरोध किया, पर जब इस मसले के सदर्भ में व्यापक चर्चा हुई तो शाह के प्रस्ताव को सभी ने स्वीकार्य कर लिया, इसके बाद तो संस्था की निवेश राशि में वृद्धि होती दिखाई देने लगी। इस कारण संस्था की व्याज राशि में भी विस्तार होने लगा। धीरे- धीरे संस्था के काम-काज में भी पारदर्शिता आने लगी और उसकी प्रगति सभी के सामने दिखाई देने लगी।

इस संस्था की स्थापना को 10 अगस्त, 2012 को 25 वर्ष पूरे हो रहे हैै. इस कालावधि में संस्था के सदस्यों की संख्या में भी आशालीत सफलती मिली है।

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