हिन्दी के विकास में फिल्मी-गीतों का योगदान

अगले वर्ष भारतीय सिनेमा अपनी विकास-यात्रा के 100 वर्ष पूरे करने जा रहा है। दादासाहब फालके ने 1912 में पहली सम्पूर्ण फिल्म ‘मोहनी-भस्मासुर’ का निर्माण किया था। यह फिल्म दिसम्बर 1913 में मुम्बई के ओलंपिया थियेटर में रिलीज हुई थी।
सिनेमा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से हमारे मनोविज्ञान को प्रभावित करता है। हमारा मनोरंजन, आचरण, रहन-सहन, फैशन भी उससे प्रभावित होता है। 1931 में फिल्म ‘आलम आरा’ से जब फिल्मों को ‘बोली’ का वरदान मिला, तो भला ‘भाषा’ कैसे पीछे रहती। हिन्दी के वर्चस्व को स्थापित करने और देश को एक सूत्र में बांधने में सिनेमा और सिनेमा के गीत-संगीत ने एक अहम भूमिका अदा की है।

‘दे दे खुदा के नाम पे बन्दे ताकत है गर देने की।
कुछ चाहे अगर तो माँग ले मुझसे हिम्मत हो गर लेने की॥’

फिल्म ‘आलम आरा’ के इस गाने को फिल्मी गानों का पितामह या जन्मदाता माना जा सकता हैं। यह गाना एक सम्मोहन, एक चमत्कार, एक अदा, एक सदा बनकर हर छोटे-बड़े के सिर चढ़कर बोला। इस गाने की कामयाबी ने फिल्म निर्माताओं को एहसास दिलवा दिया कि फिल्म के चलने में फिल्म के गाने बेहद महत्वपूर्ण हैं। अच्छे गाने लिखने वाले खोजे जाने लगे। लेकिन ज्यादातर साहित्यिक प्रतिभाएँ फिल्मों के लिये लिखने को तैयार नहीं थीं। उन्हें लगता था कि यह माध्यम उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं है। कइयों ने लिखा भी किन्तु छदम नाम से पैसों के लिये। लेकिन चालीस के दशक में कई साहित्यिक पृष्ठभूमि के लोगों ने फिल्मों में प्रवेश किया। अब तक आरजू, लखनवी, आगा हश्रकश्मीरी, और अंजुम पीलीभीति जैसे गीतकार स्थापित हो चुके थे। डी.एन मधोक, नारायणप्रसाद ‘बेताब’, जिया सरहदी, पंडित भूषण, पंडित मधुर और ‘कवि प्रदीप’ के आगमन से फिल्मी-गायन-लेखन में एन नई ऊर्जा का संचार हुआ और फिल्मी गानों के रथ पर सवार होकर हिन्दी घर-घर पहुंचने लगी।

1936 का वर्ष कई मायनों में लाजवाब उपलब्धियों का वर्ष रहा, जिसमें फिल्मकारों की रचनात्मकता में सुघढ़ता और दर्शकों की रुचि में परिवर्तन आया। इसी वर्ष ‘धूप छांव’ उर्फ ‘भाग्य चक्र’ से फिल्मों में प्ले बैक सिंगिंग की शुरुआत हुई। और इसी के साथ फिल्मी गानों को जैसे पंख लगे। अभी तक लोगो को अपनी पसंद के फिल्मी गाने सुनने के लिये बार-बार थियेटर जाना पड़ता था। अब उन गानों के रिकॉर्ड भी बनने लगे, जिन्हें खरीद कर आप लोग बैठे-जितनी बार सुनना चाहें सुन सकते थे। ‘तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा’ और ‘बाबा मन की आंखे खोल’- इन दो गानों ने नेत्रहीन गायक के. सी. डे रातों को रात चमकता सितारा बना दिया। इन गानो ने रहीम और कबीर की परम्परा को आगे बढ़ाया।

‘मैं बन की चिड़िया बनके-बन बन डोलूं रे’- फिल्म ‘अछूत कन्या’ के इस गाने ने उसे भारत की पहली बम्पर हिट फिल्म बना दिया।

1937 में हिन्दी फिल्म संगीत ने अपने बालपन से लड़कपन में कदम रखा। भारत की सर्वोत्तम फिल्मों में कुछ का निर्माण इसी वर्ष हुआ। वी. शांताराम की ‘दुनियान याने’ शृंगार रस के मूर्धन्य और कृष्ण भक्त महाकवि विद्यापति की जीवनी पर आधारित ‘विद्यापति’, अवैध बच्चे के लालन-पालन करने वाली औरत की कहानी- ‘जागीरदार’ कृषि और उद्योग के बीच टकराव की कहानी- ‘धरती माता’ और गलियों में गाने वाले एक गायक की कहानी- ‘स्ट्रीट सिंगर’ जिसका हृदय विदारक गीत ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये’- आज भी इल्मी और फिल्मी गानों के माथे का तिलक बनकर चमक रहा है।

हिन्दी के विकास के साथ-साथ फिल्मी गीतों ने स्वातंत्र्य चेतना, स्वतंत्रता-आन्दोलन, जनजागृति, सामाजिक कुरीतियों के दमन, जन आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति और बदलते सामाजिक रुखों, को भी उजागर किया। इन्ही की बदौलत, आजादी की लड़ाई में गांधीजी ने हिन्दी को सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त किया और अन्तत: उसे राष्ट्रभाषा का सम्मान मिला।

प्रारम्भिक गीत-संगीत पारसी थियेटर, मराठी नाट्यशैली, पारम्परिक महाफिलों और कोठों के संगीत से प्रभावित था। लेकिन गीत बड़े ही पायेदार थे। 1939 की फिल्म ‘दुश्मन’ के एक गीत मे ‘कोल्हू’ की उपमा देखिये- ‘प्रीत में जीवन जोखों जैसे कोल्हू में सरसों’। फिल्म जिन्दगी का यह गीत- ‘करूँ क्या आस निरास भई’ निराशा के अंधकार से निकलने की राह सुक्राता, सहगल का गाया यह गीत आने वाले युग के कई गीतों का आधार बना। मसलन- ‘रात भर का है मेहमां अन्धेरा किसके रोके रुका है सवेरा’ अथवा- ‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार-किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार-जीना इसी का नाम है’’

1943 में आई बॉक्स-आफिस की सबसे सुपर हिट फिल्म ‘किस्मत’ और आया अब तक का सबसे सूपर हिट गीत:
‘दूर हटो ऐ दुनिया वालो हिन्दोस्तॉ हमारा है।

हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबका यहां गुजारा है॥’

कवि प्रदीप का लिखा यह गीत गांधी जी के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की अनुगूंज बन गया। इस गीत से प्रेरित होकर कई गीतकारों ने इसी तर्ज पर कई रचनाओं की रचना की।

‘आना मेरी जान, मेरी जान सन्डे के सन्डे’….(फिल्म-शहनाई) इस गाने की लोकप्रियता ने सिद्ध कर दिया कि हिन्दी के विशाल शब्द सागर में अन्य भाषाओं के शब्दों को भी स्थान प्राप्त है। इस गाने की लोकप्रियता ने अंग्रेजी, तामिल, मराठा, बंगला और पंजाबी आदि भाषाओं के चुनिन्दा शब्दों के लिये हिन्दी ने अपने द्वार खोल दिये:

‘‘गुत्तुकुड़ी कवाड़ी हड़ा’’… लारा लप्पा लारा लप्पा लिइ रखदा’’…

‘‘इल्लू इल्लू’’…‘हाय हुक्कु हाय हुक्कु’’…‘‘धितंग धितंग बोले’’…जैसे अनेकानेक शब्द और भाव हिन्दी के विशाल सागर मे समा गये…और हिन्दी और भी स्वीकार्य भाषा के रूप में उभरी।

फिर आया वो दौर जब देश भक्ति का स्थान राष्ट्रवाद ने ले लिया और पिघला हुआ सीसा बनकर भारतीय नौजवानों के खून में दौड़ने लगा-

‘‘वतन की राह में वतन के नौजवॉ शहीद हो।
पुकारते है ये जमीं ये आस मां शहीद हो॥’’

और फिर आई आजादी-लोग खुशियों के बताशे बांटते हुए देने लगे एक-दूसरे को दिलासा-

‘‘अब डरने की कोई बात नहीं-अंग्रेजी छोरा चला गया वो गोरा-गोरा चला गया’’

बापू के नेतृत्व में मिती आजादी के लिये सारा देश इस गीत का सहारा लेकर उन्हे धन्यवाद देने लगा-

‘‘दे दी हमे आजादी बिना खड़ग बिना ढ़ाल।
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल॥’’

भारत विभाजन के बाद फिल्म संगीत के जुड़ी कई हस्तियां पाकिस्तान पलायन कर गई। इनमें से कुछ थी- आरजू लखनवी, फैयाज हाशमी, जोश मलीहाबादी, नक्शब नाजिम पानीपती, वली साहब, वहजाद लखनवी। पर बँटवारे के इस अभिशाप में एक वरदान भी छिपा था। इस दौर में कई ऐसे संगीतकार और गीतकार उभरे जो फिल्म-संगीत को उसके स्वर्णिम युग की ओर ले गये। संगीतकारों में शंकर जयकिशन, एस. डी. वर्मन, रोशन, मदन मोहन, खैय्याम और गीतकारों में शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, शकील बदायूॅनी, पंडित नरेन्द्र शर्मा, मजरूह सुल्तानपुरी, भरत व्यास, इन्दीवराजेन्द्र कृष्ण, राजा मेहदी अली खान, और साहिर लुधियानवी जैसे प्रतिभाशाली गीतकारों का उदय हुआ। काव्यात्मकता और भावनात्मकता इस दौर के गानों की बुनियाद बनी, जिसने गैर भाषी लोगों को भी हिन्दी से जोड़ दिया। ‘मेरा जूता है जापानी’ और ‘आवारा हूँ…’ जैसे गीत सरहदों को तोड़कर विदेशों मे भी हिन्दी के डंके बजाने लगे।

इसके बाद वाली पीढ़ी में कई इल्मी शायरों और कवियों का फिल्मी दुनिया में प्रवेश हुआ। असद भोपाली, गुलशन बावरा, कैफी आजमी, खुमार, नक्श लायलपुरी, कमर जलालावादी एस. एच. बिहारी और आनन्द बक्शी जैसे शायरों और गीतकारों ने हिन्दी, उर्दू और पंजाबी भाषाओं के मिलन से कई नये शब्दों को गढ़ा…अलंकारों की नई दुनिया ईजाद की, हिन्दी साहित्य में उपलब्ध हर- रस का अपने अपने अंदाज में प्रयोग किया। ‘बोली जाने वाली हिन्दी’ इनके गानों के जरिये हर गली-कूचे मे पहुंचने लगी। हिन्दी का रहस्यवाद भी अब फिल्मी गानों के कैनवास पर अपनी घटा बिखेरने लगा- ‘‘मोरा गोरा रंग लै ले’’।

‘‘आज सजन मोहे अंग लगलो।’’
‘‘तू प्यार का सागर है।’’ ‘‘तू छुपी है कहां।’’

आठवें दशक के आते-आते हिन्दी फिल्मी गानों का स्वर्णकाल लगभग समाप्त हो गया। गानों के भाव, काव्यात्मकता और अर्थ खोने लगे। द्वि अर्थी शब्दों की भरमार हो गई- ‘एक आँख मारू तो पर्दा हट जाये- दूजी आंख मारू तो लड़की पट जाये’ या ‘धक्कम धक्का हुआ-प्यार पक्का हुआ’..। लेकिन गीतों की इस फिश-मार्केट से अलग-थलग ऐसे गीतकार भी आये जिन्होंने हिन्दी फिल्मी गीतों के उच्च स्तर को बनाये रखा। देव कोहली, कुलवन्त जानी, इन्द्रजीत सिंह तुलसी, नीरज, निदा फाजली, गुलजार, योगेश और जावेद अख्तर- ‘गीत गाता हूँ…मेरा जीवन कोरा कागज…स्वप्न भरे फूल से…इक प्यार का नगमा है…सीने में जलन आंखो में चुभन…जिन्दगी कैसी है पहेली हाय…जैसे कालगयी नगमें भी इसी दौर में आये।
आज के वर्तमान गीतकारों में आनन्दराज आनन्द, इब्राहीम अश्क, इरशाद कामिल, पी. के. मिश्रा, समीर, प्रसून जोशी और संजय छैल भी अच्छा काम कर रहे हैं।

मीराबाई, सूरदास, कबीर, रैदास, रहीम, कालीदास जैसे संत कवियों और मिर्जा गलिब, बहादुरशाह ‘जफर’, दाग, डॉ. अल्लामा इकबाल, वाजिद अली शाह, जिगर मुरादाबादी, डॉ. राही मासूम रजा जैसे शायरों और अमृतलाल नागर, अमृता प्रीतम, भगवती चरण वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत, जैसे साहित्यकारों की रचनाओं को भी फिल्मी गीतों में स्थान मिला, जो इस बात का प्रतीक है कि फिल्मी गीतों ने, न केवल हिन्दी बल्कि हिन्दी और उर्दू के साहित्य को लोकप्रिय बनाने में भी कितना बड़ा योगदान दिया है।

सवाक फिल्मों के निर्माण से लेकर अब तक, करीब 3,000 गीतकारों ने फिल्मों मे गीत लेखन का कार्य किया। इनमें से 2,500 ऐसे है जिन्होंने 1-4 फिल्मों में लिखा या गुमनाम हैं…फिर भी हिन्दी के विकास में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। हमारा उन्हें सलाम।

हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें-हम दर्द के सुर में गाते हैं।
जब हद से गुजर जाती है खुशी, आंखों में ये आंसू आते है।

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