बीज से सीखें समर्पण का भाव – डॉ. मोहन जी भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा कि बीज की ताकत उसका समर्पण है। बीज से वृक्ष बनता है लेकिन इसके लिए बीज को मिट्टी में मिल जाना पड़ता है। डॉक्टर हेडगेवार जी ने ऐसे ही प्रतिभाशाली तरुण की पहचान की और उन्हें यह समर्पण सिखाया। मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी ऐसे ही बीज थे। उन्होंने ध्येय के प्रति समर्पित होकर अपना जीवन जिया। डॉक्टर मोहन जी भागवत प्रख्यात पत्रकार एवं विचारक  मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी के जन्म शताब्दी वर्ष के समापन समारोह में संबोधित कर रहे थे। समारोह का आयोजन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र नई दिल्ली में किया गया था। 
 
सरसंघचालक डॉ मोहन जी भागवत ने कहा कि विश्व को अपना बनाना है, तो पहले भारत को अपना बनाना होगा। अपने जीवन में भारत छलकना चाहिए। विश्व गुरु भारत या महाशक्ति भारत का मतलब डंडा चलाने वाला भारत नहीं, बल्कि मानव का हृदय जीतने वाला भारत बनाना है। हमें एक ऐसा भारत बनाना है जो ऐसे भारतीयों को खड़ा करे आत्मीयता भाव से समर्पित होकर कार्य करें। मामा जी ने इसी आत्मीय भाव से अपना सारा कार्य किया। 
 
भारत विभाजन के समय देश भर में दंगे चल रहे थे, तब मामा जी भिंड के जिला प्रचारक थे और चिंता कर रहे थे कि भिंड जिले के एक भी गांव में दंगा नहीं होना चाहिए। मुस्लिम परिवारों ने भिंड छोड़ा तो भी अपने घरों की चाबियां मामा जी को सौंप कर गये क्योंकि वह मामा जी पर खुद से ज्यादा विश्वास करते थे। अपने व्यवहार और कार्य से मामा जी ने यह विश्वास अर्जित किया था। जब संघ पर प्रतिबंध लगा और पुलिस मामा जी को ढूंढ रही थी तब वह मुस्लिम परिवारों में ठहरे थे। यह आत्मीयता मामा जी ने अपने संघ कार्य से बनाई थी। सरसंघचालक ने कहा कि आदमी ने क्या किया और क्या बना, दुनिया इसको गिनती है लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि आदमी क्या है? यश और सार्थकता दोनों अलग-अलग बातें हैं।
 
मोहन जी भागवत ने कहा कि मामा जी का जीवन सार्थक था, मामा जी जैसे लोगों के कारण ही संघ अभी तक चल रहा है। मामा जी के संपर्क में जो भी आया उसे उनसे प्रेम और प्रकाश ही मिला, चाहे उसकी कोई भी विचारधारा रही हो। राजमाता विजयाराजे सिंधिया और नरसिंह राव दीक्षित उनके विरुद्ध चुनाव लड़े लेकिन बाद में उनके साथ ही आ गए। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मामा जी ने उच्च आदर्श स्थापित किए। उन आदर्शों को आज की पत्रकारिता में उतारना चाहिए। मामा जी के विचारों के अनुसरण से पत्रकारिता के समूचे वातावरण में परिवर्तन आ सकता है। 
 
उधर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि मामा जी राष्ट्रीय पत्रकारिता के ब्रांड थे, उन्होंने एक विरासत छोड़ी है जिसका हमें सम्मान करना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यकर्ता निर्माण की जो पद्धति है वह अद्भुत है, मामा जी संघ की उसी पद्धति से तैयार किये गए स्वयंसेवक थे। मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी जी को जो कार्य दिया जाता था उसे वह पूरी प्रमाणिकता से पूरा करते थे। एक प्रखर पत्रकार, संपादक एवं चिंतक के नाते उनकी पहचान है। 
 
भारत विभाजन के दौरान संघ ने कितना महत्वपूर्ण कार्य किया इस संबंध में उन्होंने बहुत परिश्रम से एक पुस्तक की रचना की है। हरियाणा व त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल प्रोफ़ेसर कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा कि संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरु जी के आदर्श को मामा जी ने अपने जीवन में उतारा था। वह सादगी से जीते थे अपने जीवन का सर्वस्व उन्होंने देश की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। मामा जी ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के अद्वितीय उदाहरण थे उन्होंने जो पुस्तक लिखी वह आज भी प्रासंगिक है। जम्मू कश्मीर और राम जन्मभूमि आंदोलन में भी मामा जी ने जो किया उसे हम आज सच होता देख रहे है। 
 
इस अवसर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कहा कि भाषाई पत्रकारिता में मामा जी का महत्वपूर्ण स्थान है उन्होंने पत्रकारिता में एक बड़ी लकीर खींची थी। मामा जी की पत्रकारिता जीवन के प्रति दृष्टिकोण से सिखाती है। हम सब को उनकी पुस्तक ‘आपातकाल की संघर्ष गाथा’ अवश्य पढ़नी चाहिए। आज की पत्रकारिता को मामा जी की पत्रकारिता से प्रेरणा लेनी चाहिए। 

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