पुणे का धमाका : सुरक्षा पर उठे सवाल

पुणे के बाल गंधर्व थियेटर के पास विगत 11 अगस्त की शाम 7.37 से 8.15 बजे के बीच चार बम विस्फोट हुए। ये धमाके बहुत कम विस्फोटक क्षमता वाले भले थे और इनमें जान-माल का कोई खास नुकसान नहीं हुआ था। लेकिन राज्य में सुरक्षा को लेकर यह एक गंभीर घटना है। विस्फोट की जांच एन.आई.ए. महाराष्ट्र ए.टी.एस. और पुणे क्राइम ब्रांच द्वारा की जा रही है, किंतु कोई भी जांच एजेंसी अब तक इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पायी है कि इन विस्फोटों के पीछे किस संगठन का हाथ है। अभी तक किसी संगठन ने इन विस्फोटों की जिम्मेदारी भी नहीं ली है। कुछ सुराग महाराष्ट्र ए.टी.एस. के हाथ अवश्य लगे हैं। ए.टी.एस. ने दावा किया है कि सीसीटीवी फुटेज में मोटर साइकिल पर दो लोगों को संदिग्धावस्था में घूमते हुए पाया गया है।
घटना के समय कुल चार धमाके हुए थे। इनमें से एक बम विस्फोट मैकडोनल्ड के कचरे के डिब्बे मेंं हुआ, दो बम साइकिलों में रखे सामानों में फटे तथा एक बम दयानंद पाटिल के झोले में फटा।

इनके साथ ही दो बम निष्क्रिय किये गये थे। निष्क्रिय किये गये बमों में से एक साइकिल पर रखे सामान में था, जबकि दूसरा सड़क पर लावारिस पड़ा था। जो बम निष्क्रिय किये गये, उनमें एक जोडिक शो रूम के पास रखा था, जबकि दूसरा बम मल्टी स्टोरी बिल्डिंग के पास था। जिस दयानंद पाटील को संदेह के आधार पर हिरासत में लिया गया है, वह मूलत: कर्नाटक का रहने वाला है और लगभग तीस वर्ष पूर्व महाराष्ट्र के उरलीकांचन में आकर बस गया था। इस समय वह पुणे की एक सिलाई की दुकान में काम करता है और प्रतिदिन बस से आता-जाता है। घटना के समय उसने जब बाल गंधर्व थियेटर के पास अण्णा हजारे के समर्थकों की भीड़ देखा, तो हाथ की थैली जमीन पर रखकर उनका भाषण सुनने लगा। कुछ मिनट उपरांत उसने अपना झोला उठाया, तो वह उसे भारी लगा। जैसे ही उसने, झोला खोलकर देखना चाहा, उसी समय विस्फोट हो गया। दयानंद पाटील 14 साल तक मुंबई में भी रह चुका है और काम की तलाश में जार्डन जा चुका है।

पुणे में बम विस्फोट के लिए वही समय चुना गया, जब देश के नवनियुक्त गृहमंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे अपनी पहली यात्रा पर पुणे पहुंचने वाले थे। यह एक संभावना व्यक्त की जा रही है कि कहीं उनके मनोबल को गिराने के लिए तो इस तरह की घटना को अंजाम नहीं दिया गया। यद्यपि श्री शिंदे स्वयं कहते है, ‘‘केन्द्र ने इन विस्फोटों को गंभीरता से लिया है। जांचकर्ता सुराग हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।’’ विस्फोट की घटना को केंद्रीय गृह सचिव श्री आर. के. सिंह संगठित कार्य के रूप में देख रहे हैं, उनका कहना है, ‘‘यह समन्वित कार्रवाई है। इसे सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया गया है।’’ इन बयानों के साथ ही हमें अमेरिका के विदेश विभाग के उस निर्देश को भी जोड़कर देखना चाहिए, जो उसने भारत में रह रहे अपने देश के निवासियों और पर्यटकों के लिए जारी किया था। उस निर्देश में कहा गया था कि अमेरिका निवासी मुंबई, दिल्ली, गुजरात सहित कुछ अन्य जगहों पर जाते समय सावधान रहें और अपनी सुरक्षा के प्रति विशेष ध्यान दे। इस निर्देश में झलक मिलती है कि अमेरिकी सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को इन विस्फोटों की भनक लग गयी होगी। ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह सूचना भारत की सुरक्षा व खुफिया को भी दी गयी होगी। सवाल यहां यह उठता है कि फिर हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था ने समय रहने समुचित कदम क्यों नहीं उठाये?

बम विस्फोट की घटना को अंजाम देने वालों ने साइकिल का प्रयोग किया है। धमाकों के कुछ मिनट पहले की कसबापेठ के सोनी साइकिल सेंटर से दो साइकिले खरीदी गयी थीं, जबकि एक साइकिल पड़ोस से चुरायी गयी थी। पुलिस दुकान मालिक की सहायता से यह भी जानकारी जुटाने में लगी है कि साइकिल खरीदने वाले कौन लोग थे। सुरक्षा एजेन्सियों ने मुस्लिम आतंकवादी गुट ‘मोडस आपरेंडी इंडियन मुजाहिदीन’ पर अपनी जांच केन्द्रित की है, क्योंकि इसी संगठन द्वारा पहले भी साइकिल से बम धमाकों को किया गया है। सन् 2007 में उत्तर प्रदेश में और सन् 2008 में जयपुर में इस संगठन द्वारा बम धमाकों में साइकिल का इस्तेमाल किया गया था। प्राप्त खबरों के अनुसार इन धमाकों में जिस तरह से छोटे डिटोनेटरों और पेन्सिल सेल की मदद से अमोनियम नाइट्रेट का उपयोग किया गया है, उससे भी शक की सुई इसी संगठन की ओर घूमती है। महाराष्ट्र के गृहमंत्री श्री आर. आर. पाटील ने घटनास्थल का दौरा करने के बाद पुणे में पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा था कि विस्फोट में इस संगठन की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है।

पुणे की बम विस्फोट की घटना से जो सबसे गंभीर बात उभर रही है, शायद उस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया है। विगत कुछ वर्षों की घटनाओं पर नजर डालने से स्पष्ट होता है कि महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य बनता जा रहा है, जहां सबसे ज्यादा प्रकार के बम विस्फोट देखने को मिल रहे हैं। शायद आंतकी गुटों को महाराष्ट्र सबसे सुरक्षित और उपयुक्त प्रयोगशाला लगने लगी हैं। सरकार की नीतियां उनके हौसले बढ़ाने में मदद कर रही है। यहां पर देशी आतंकी गुटों के साथ ही विदेशी आतंकी हमले हो चुके हैं। शरारती लोगों के बेहद छोटे गिरोहों से लेकर अंतरराष्ट्रीय संगठन लश्कर-ए- तैय्यबा तक ने अपने मंसूबे को यहां अंजाम दिया है। दिसंबर, 2002 में घाटकोपर और मुंबई सेन्ट्रल में हुए विस्फोट में मुस्लिम आतंकियों का हाथ था, इससे पहले जनवरी, 2002 में विलेपार्ले और मार्च में मुलुंड के विस्फोट में गुलाम अकबर खोटल और उसके साथियों का हाथ पाया गया।

इन स्थानीय आतंकियों द्वारा 12 लोगों की जानें ली गयीं और 140 लोग घायल हुए। 2003 में जवेरी बाजार, गेट वे ऑफ इंडिया और घाटकोपर की वारदात विदेशी मुस्लिम संगठनों द्वारा की गयी। 2006 में लोकल ट्रेनों में लश्कर-ए तैयबा द्वारा श्रृंखला में बम विस्फोट किये जाने से 187 लोग मारे गये। 2008 में 26 नवंबर को मुंबई पर हुआ हमला पाकिस्तान से योजना बनाकर किया गया था। पुणे की ही जर्मन बेकरी बम विस्फोट में इंडियन मुजाहिद्दीन को दोषी पाया गया, जिसमें कुछ विदेशियों सहित 17 लोग मारे गये थे। इसर्िंलए पुणेे में हुए ये बम विस्फोट कम क्षमता वाले होने के बावजूद परेशान करने वाले हैं। यह गंभीरता से सोचने का विषय है कि आखिर महाराष्ट्र में ही इस तरह की घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं। इन घटनाओं को रोकने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार मिलकर कार्य योजना क्यों नहीं तैयार कर रही हैं? यद्यपि दोनों जगह कांग्रेस की ही सरकार है। अब तो केन्द्रीय गृहमंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे भी महाराष्ट्र से हैं। महाराष्ट्र और यहां के निवासियों की सुरक्षा के लिए समुचित कदम उठाने ही होंगे।

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