ठेका मजदूर अधिनियम एक अध्ययन


भारत में नयी आर्थिक नीति के तहत किये जा रहे बड़े बदलाओं के साथ ही वैश्वीकरण, उदारीकण और निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र और निजीक्षेत्र से संगठित मजदूरों की संख्या दिनोंदिन घटती जा रही है। वर्ष 2007-08 के आर्थिक सर्वेक्षण और उसके बाद किये गये अन्य सर्वेक्षणों से निष्कर्ष निकला है कि देश के 90 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्र में है। इनमें वे लोग भी शामिल हैं जो अपना व्यवसाय करते हैं अथवा छोटी-मोटी फैक्टरी चलाते हैं। एक और जो महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है, वह यह है कि देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के मजदूरों का एक बड़ा वर्ग स्थानान्तरित होने के लिए बाध्य हुआ है। उसे जीवन के भरण-पोषण की चिन्ता हमेशा सताती रहती है।

वर्ष 1990 के पश्चात देश में श्रमिकों की स्थिति में व्यापक स्तर पर बदलाव आया है। भारत का पूरा औद्योगिक परिदृश्य बदल गया है, किन्तु दुर्भाग्य से आज भी किसी औद्योगिक-श्रमिक विवाद का निपटारा 42 वर्ष पुराने ‘‘कान्ट्रैक्ट लेबर (रेग्यूलेशन एण्ड अबोलीशन) एक्ट-1970’’ के आधार पर किया जा रहा है।

मुंबई उच्च न्यायालय के एडवोकेट, श्रम कानून के विशेषज्ञ और भारतीय मजदूर संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी श्री श्रीकान्त धारपजी ने महाराष्ट्र के मुंबई, पुणे, ठाणे, नासिक और औरंगाबाद के औद्योगिक मजदूरों के बीच किये गये सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण से निकले तथ्यों के आधार पर ‘इन्क्ल्यूडिंग एक्सक्ल्यूडेड: ए स्टडी आफ दि इम्पैक्ट आफ कान्ट्रैक्ट लेबर एक्ट-1970 (रेग्यूलेशन एण्ड अबोलीशन) पुस्तक की रचना की है। लेखक के अनुसार इस सर्वेक्षण के पीछे सर्वोच्च न्यायालय का वह निर्णय है, जो स्टील अथारिटी आफ इण्डिया के मामले दिया गया था। यह निर्णय इसी कानून के आलोक में दिया गया था। लेखक के अनुसार इस कानून की सबसे बड़ी कमजोरी श्रम विभाग के तहत काम कर रहा वह सरकारी तन्त्र है, जो पूरी तरह से सक्षम, अनुपयोगी और बहुत से मामलों में भ्रष्ट हो चुका है।

सर्वेक्षण में एडवोकेट श्रीकान्त धारप जी ने साक्षात्कार के साथ ही प्रश्नावली का सहारा लिया। इसमें मजदूरों की आपूर्ति करने वाले ठेकेदार, व्यवसाय के मालिक, कम्पनी के प्रशासनिक एवं कल्याण अधिकारी, श्रम सलाहकार, श्रम संगठनों के पदाधिकारी, कर्मचारियों के संघो के नेता इत्यादि शामिल किये गये। इनमें शहरी क्षेत्र के औद्योगिक क्षेत्रों के 571 ठेका मजदूरों से जुड़े आंकड़े और सूचनाएं एकत्र की गयीं। आंकड़ों का विश्लेषण करते समय सरकारी प्रकाशनों, महाराष्ट्र सरकार की श्रमनीति, योजना आयोग के दिशा निर्देश, भारतीय श्रम शोध मण्डल, पुणे, टाटा इन्स्टीट्यूट आफ सोसल साइंन्सेस और नवजीवन समिति, आई. एल. ओ., वी. वी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान, नई दिल्ली के सर्वेक्षणों से निकले निष्कर्षो और देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं से प्राप्त सूचना एवं जानकारियों को ध्यान में रखा गया। अध्ययन में छ: मूल बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया। श्रमिकों की स्थिति का विवरण तैयार करने के साथ ही वर्तमान श्रम कानून में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आवश्यक परिवर्तन करने का सुझाव भी दिया गया है। यह पूरा वृत्तांत पुस्तक के शुरू के तीन अध्यायों में विस्तार से दिया गया है।

पुस्तक के चौथे अध्याय में सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों का सिलसिलेवार विश्लेषण 27 सारणियों में किया गया हैं। इसमें बताया गया है कि पांच जिलों में स्थित विभिन्न 204 औद्योगिक इकाइयों के 571 ठेका मजदूरों सहित 24 ठेकेदारों, 24 मजदूर यूनियनों के पदाधिकारी, 18 सरकारी कर्मचारियों, 34 मालिकों, 24 श्रम सलाहकारों 4 कर्मचारी एसोसियेशनों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया है। शामिल सभी 204 औद्योगिक इकाइयों को 5 प्रकारों में और 4 तरह के प्रबन्ध समूहों में बांटा गया है। 571 ठेका मजदूरों को 9 शिक्षा स्तरों, 6 प्रकार को आश्रितों 2 प्रकार के मकान मालिकों, 5 तरह के कार्य के समय इत्यादि में विभक्त किया गया है।

औद्योगिक ठेका मजदूरों के विभिन्न समूहों को अध्ययन में शामिल करने के साथ ही यदि उनके आंकड़े, जैसे-जाति, उपजाति, लिंग इत्यादि को भी शामिल किया गया होता, तो अध्ययन का परिणाम ज्यादा व्यापक निकलना। क्योंकि ये सब सामाजिक-आर्थिक जीवन को भी स्पष्ट करते हैं। अध्ययन से जो निष्कर्ष निकले है, वे इस प्रकार से हैं- 46 प्रतिशत मजदूर अपने मूल स्थान से स्थानान्तरित हुए हैं। 46.8 प्रतिशत मजदूर 3 से 5 वर्षों ठेका कार्य कर रहे हैं। 68.4 प्रतिशत मजदूरों को दो बार से अधिक बार अपना कार्य बदलना पड़ा है, जबकि 31.6 प्रतिशत को एक बार बदलना पड़ा। 94 प्रतिशत औद्योगिक इकाइयां निजी क्षेत्र में हैं। 26.1 प्रतिशत मजदूर 16-25 वर्ष, 51.8 प्रतिशत 26-35 वर्ष, 19.4 प्रतिशत 36-50 वर्ष और 2.6 प्रतिशत 51-60 वर्ष आयु वर्ग के थे। 67.4 प्रतिशत 10 वीं, 22.8 प्रतिशत 12 वीं, 3.8 प्रतिशत उससे अधिक पढ़े-लिखे थे। 67.4 प्रतिशत अकुशल और 26.3 प्रतिशत कुशल मजदूर, 1.4 प्रतिशत पर्यवेक्षक, 1.6 प्रतिशत क्लर्क और 1.6 प्रतिशत सुरक्षा विभाग के थे। इनमें 72.3 प्रतिशत मजदूर उत्पादन कार्यों से जुड़े थे। औसत वार्षिक आय 2007-08 में 3960, 2008-09 में 4600 और 2009-10 में 5530 रुपये रही। सबसे आश्चर्य जनक बात यह पायी गयी कि समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था कहीं नहीं लागू है। दूसरी बात यह है कि ठेका मजदूरों को साप्ताहिक छुट्टियों का वेतन नहीं दिया जाता। केवल 44 प्रतिशत मजदूरों के लिए कार्यस्थल पर प्राथमिक उपचार की उपलब्ध थी। बहुत कम मजदूरों को बोनस और समयोपरि (ओवरटाइम) भत्ता दिया जाता है। कुल मिलाकर बहुत ही विसंगतियां और असुविधाएं पायी गयीं।

एडवोकेट श्रीकान्त धारपजी ने पांचवे व छठवें अध्याय में मजदूर संगठनों, कानून विशेषज्ञों, शिक्षाशास्त्रियों, सलाहकारों से उनके विचार दिया है। मजदूर संगठनों के सुझाव बहुत ही उपयोगी और निर्भीक मिले। उनकी उपलब्धियां कल्याणकारी रही हैं। अन्य विचारकों ने भी सकारात्मक सुझाव दिये है। सातवें अध्याय में सर्वेक्षण का निष्कर्ष दिया गया है और आठवे अध्याय में लेखक की ओर से अनुशंसाएं दी गयी है। कुल 19 निष्कर्ष निकाले गये हैं, जो इस कानून का बड़ा ही असहाय, आशाहीन और दु:खद स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। यह किष्कर्ष बताता है कि सरकारी मशीनरी बहुत ही अक्षम और भ्रष्टाचार में डूबी हुयी है।

विद्वान लेखक ने इस अधिनियम में बदलाव के लिए ग्यारह महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं। इस अध्ययन में उन ठेका मजदूरों के विषय में अनेक तथ्यात्मक सुझाव हैं, जो एक स्थान से दूसरे स्थान को स्थानान्तरित होते रहते हैं। लेखक ने जोर देते हुए अनुशंसा की है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग की तरह एक राष्ट्रीय असंगठित मजदूर आयोग का गठन किया जाना चाहिए। पुस्तक में तीन परिशिष्ट दिये गये हैं। पुस्तक का समापन इस सुझाव के साथ किया गया है कि देश के तेजी से चतुर्दिक विकास के लिए ठेका मजदूरों को उत्पादक श्रमबल में बदलना होगा तभी समाज खुशहाल होगा। देश के बेहतर विकास और आर्थिक स्थिति की मजबूती के लिए यह नितान्त आवश्यक है।

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