भारत, पाकिस्तान और अमरीका

कम्युनिस्ट चीन के आक्रमण के विरुद्ध भारत के प्रति अमरीकी जनता की सहानुभूति है, किन्तु उसके मन में यह संदेह भी काम कर रहा है कि शायद हम चीन का समुचित रीति से सामना करने के इच्छुक नहीं हैं। हमारी पिछली नीति, जो निश्चित रूप से और निर्लज्ज तरीके से चीन समर्थक रही और आक्रमक के प्रति हमारी नरमी का वर्तमान रुख बड़ी सीमा तक इस भावना का कारण है। इसके लिए यह समझ पाना कठिन है कि जिस देश पर हम आक्रामक होने का आरोप लगा रहे हैं, उसके साथ हम कूटनीतिक संबंध क्यों बनाये रखे हुए हैं? कोलंबो-प्रस्तावों के प्रति हमारे रुख को वे पसंद नहीं करते। वस्तुत: हमारी चीन-नीति उनके लिए एक पहेली है; असंगत और विरोधाभास-युक्त है। यह वह नीति है, जो इेसे राष्ट्र की नीति नहीं हो सकती जो अपने को आक्रान्त मानता है, जिसे भविष्य में भी खतरा दिखाई देता है और जो स्थिति को बदल देने की इच्छा रखता है। इससे हमारा पक्ष दुर्बल हुआ है।

अमरीकी गुप्तचर विभाग के इस मत ने कि निकट भविष्य में कम्युनिस्ट चीन का नया आक्रमण होने की संभावना नहीं है, और भारत सरकार की नीति ने भी उस देश में उस उत्साह को ठण्डा कर दिया है जिस उत्साह के साथ वह अक्तूबर-नवंबर 1862 में हमारी सहायता के लिए दौड़ पड़ा था। भारत को सैनिक सहायता के प्रश्न को एक तात्कालिक विपत्ति के विरुद्ध अविलंब तैयारी की अपेक्षा दीर्घकालिक सामरिक तैयारी की पृष्ठभूमि में लिया जा रहा है। इन परिस्थितियों में वह भारत को शस्त्रास्त्र न देने की पाकिस्तान की माँग को स्वीकार करने में कोई भी हानि नहीं देखता।

पूर्व-पश्चिम के बीच तनाव मे कमी और चीन-रूस के बीच फूट के कारण भी इस नीति को बल मिला है। अमरीका में अब यह भावना दृष्टिगोचर हो रही है कि अब दो ध्रुवों वाला विश्व नहीं रह गया है। क्यूबा में रूस के पीछे हटने के कारण भी अमरीका में आत्मविश्वास जागृत हुआ प्रतीत होता है। अब एक बाजी जीत लेने के बाद वह दूसरी बाजी लगाने का खतरा मोल लेने को तैयार नहीं है। शीत युद्ध की गरमी से उसकी इच्छा एवं व्यूह रचना की पूर्ति हो जाती है। वर्तमान मन:स्थिति में अमरीका निश्चय ही भारत के साथ मैत्री करना चाहता है, परंतु वह यह भी नहीं चाहता कि भारत अमरीकी गुट में शामिल हो, जिससे रूस की अस्वस्थता बढ़ जाय। यह विचित्र दिखाई पड़ता है, परन्तु है बिल्कुल सही कि पश्चिम अब भारत की गुटविहीनता की नीति से खिन्न नहीं अनुभव करता। कुछ सीमा तक यह उसके लिए अनुकूल भी है। मैं अमरीका में अनेक लोगों से मिला, जिन्होंने अपनी इस भावना को छिपाकर नहीं रखा।

पश्चिमी विश्व कम्युनिस्ट ब्लॉक में फूट बढ़ने से स्वाभाविक रूप से ही प्रसन्न है। यह सामान्यतया स्वीकार किया जाता है कि अंतत: यदि कम्युनिस्ट और गैरकम्युनिस्ट विश्व के बीच सशस्त्र युद्ध छिड़ा तो एक ही ब्लॉक के आंतरिक मतभेद आड़े नहीं आयेंगे, पर अब सशस्त्र युद्ध की संभावना कम हो गयी है और उस संभावना को समुचित नीति-निर्णयों के द्वारा और कम किया जा सकता है। चूँकि कम्युनिस्ट चीन ने कम्युनिस्ट विश्व के एकमात्र मार्गदर्शक होने के सोवियत दावे को चुनौती दी है, उस पर एक भिन्न दृष्टिकोण से विचार करना होगा। यदि चीन की रूस से ठन जाये, तो उस समय यदि पश्चिमी देश खुले आम चीन की पीठ भले न थपथपा सकें, वे चीन की पीठ में छुरा भोंकने ेवाला भी कोई काम नहीं करेंगे, उनमें से कुछ तो कुछ सीमा तक चीन की पीठ भी ठोकेंगे, ताकि वह लड़खड़ा कर फिर से रूस के पैरों पर न गिर पड़े। इसमें इन सब बातोंं का उत्तर मिल जाता है कि उस समय कुओमिंतांग को चीन की मुख्य भूमि पर क्यों आक्रमण नहीं करने दिया गया, जब वह पश्चिमी सीमा पर उलझा हुआ था, या भारत के विरुद्ध बर्बर आक्रमण के बाद ब्रिटेन ने चीन को विमानों की आपूर्ति करने का क्यों निर्णय किया और फ्रांस ने अब तक के अपने प्रिय मित्र च्यांग काई शेक के साथ विश्वासघात करके भी कम्युनिस्ट चीन के साथ क्यों कूटनीतिक संबंध स्थापित किये।

इससे इस बात का भी यथार्थ उत्तर मिल जाता है कि कम्युनिस्ट चीन के साथ पाकिस्तान की मैत्री को अमरीका क्यों सहन कर रहा है। जहाँ तक अमरीकी जनता का संबंध है, वह पाकिस्तान की भड़ैती से क्रुद्ध है। पाकिस्तान को केवल कम्यूनिस्ट-विस्तारवाद को रोकने के लिए आनखशिब शस्त्र तैयार किये गये थे। किन्तु ऐसे समय पर, जब एक गैर कम्युनिस्ट देश भारत कम्युनिस्ट शक्ति के आक्रमण का शिकार हुआ, तब पाकिस्तान न केवल एक निष्क्रिय दर्शक बना रहा, बल्कि उसने भारत से शत्रुता चुकाने के लिए उसे एक स्वर्णावसर समझा, ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जिनका कहना था कि पाकिस्तान मूर्ख है, कृतघ्न है और अविश्वसनीय है।

किन्तु अमरीकी प्रशासन का यह मत नहीं है, उसका विदेश विभाग अब भी पाकिस्तान को एक मित्र राष्ट्र मान रहा है और वह चीन के साथ पाकिस्तान की साँठ-गाँठ या चीन को पाकिस्तानी भू-क्षेत्र दिये जाने पर चिंतित नहीं है। वाशिंगटन के नीति-निर्माता यह चाहते हैंं कि भारत कम्युनिस्ट चीन के विरुद्ध तो दृढ़ रुख अपनाये, पर साथ ही पाकिस्तान के प्रति नरम रहे। दूसरी ओर, पाकिस्तान के चीन के प्रति नरम रुख रखने और भारत के साथ कठोर रुख रखने पर उसे कोई आपत्ति नहीं है, इसमें स्पष्ट विरोधाभास है, पर यही उसके लिए अनुकूल है।

जहाँ तक चीन का संबंध है, पश्चिमी शक्तियाँ अब वही भूमिका निभा रही हैं जो पिछले वर्षों में भारत निभाता रहा है। अंतर इतना ही है कि भारत सरल भाव से, बल्कि निर्बोध भाव से, वैसा करता रहा। भारत की चीन-नीति को पश्चिमी ब्लॉक के भागीदारों में से एक देश का आशीर्वाद प्राप्त था। अनेक प्रसंगो में भारत ने ब्रिटेन का अनुकरण किया या उसके साथ लग गया। फिर भी, भारत ने आवश्यकता से अधिक अपनी भूमिका निभायी और इसीलिए उसे कष्ट भी उठाना पड़ा। अब चूँकि भारत और चीन के संबंध तनावपूर्ण हो गये हैं, अब पाकिस्तान को उस भूमिका-निर्वाह करने के लिए चुना गया है। पाकिस्तान के साथ पश्चिमी देशों को एक सुविधा यह भी है कि वह सदैव उनसे ही संकेत ग्रहण करेगा, जबकि अनेक अवसरों पर भारत ने स्वतंत्र मार्ग अपनाया था और कई बार तो उसके कार्यों से पश्चिमी देशों को विरक्ति हुई और परेशानी भी उठानी पड़ी।

अमरीका की जनता और सरकार दोनों भारत-पाक एकता के लिए उत्सुक हैं। किंतु वे भारत का दृष्टिकोण पसंद करने की बात तो दूर, उसे समझने में भी विफल हैं। न केवल सर्व साधारण अमरीकी, बल्कि वहाँ के विश्वविद्यालय-प्राध्यापक जैसे उच्च-शिक्षित व्यक्ति भी भारतीय जीनव के तथ्यों के बारे में सर्वथा अनभिज्ञ हैं। वहाँ यह भावना व्यापक रूप में विद्यमान है कि भारत का विभाजन हिन्दू-मुस्लिम आधार पर हुआ था, और भारत में कोई मुसलमान नहीं रहता। एक विश्वविद्यालय में विदेशी छात्रों के एक डीन के साथ वार्ता करते समय मैंने उनसे पूछा कि विभिन्न देशों से आने वाले छात्रों से क्या उन्हें कोई कठिनाई अनुभव होती है? उन्होंने उत्तर दिया-अरब छात्र इस्राइल के यहूदी छात्रों के साथ रहना पसंद नहीं करते। मैंने उनसे पुन: यह प्रश्न किया कि क्या भारत और पाकिस्तान से आने वाले छात्रों के बारे में भी उनका यही अनुभव है, तो उन्होंने इसका नकारात्मक उत्तर दिया और कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि दोनाेंं देशों के बीच तनावपूर्ण संबंध होते हुए भी भारतीय और पाकिस्तानी छात्र मैत्री की भावना के साथ कैसे रह लेते हैं।

मैंने उनको यह कहकर पूर्ण स्थिति समझाने का प्रयत्न किया कि भारत का विभाजन कृत्रिम आधार पर हुआ है और पूरे इतिहास में हम एक ही रहे हैं, अत: केवल एक राजनीतिक रेखा जनता को विभाजित नहीं कर सकती। मैंने उनसे यह भी कहा कि यदि वहाँ का कोई व्यक्ति उनके पास आ जाये तो वे शायद ही यह पहचान पायें कि वह भारतीय है या पाकिस्तानी। उन्होंने कहा, ‘‘क्यों, यह तो बिल्कुल सरल बात है।’’ मैंने पूछा कि ‘आप कैसे पहचानेंगे?’ उन्होंने कहा, ‘‘बहुत सरल है। यदि उसका नाम मुसलमानी है तो वह निश्चय ही पाकिस्तानी है, अन्यथा भारतीय है।’’ मुझे यह अंगूठा छाप सरल तरीका सुनकर बड़ा आघात लगा। मैंने उनसे विश्वविद्यालय के भारतीय छात्रों की एक सूची देने का अनुरोध किया। उन्होंने वह सूची प्रदान करने का आदेश दे दिया। उसमें लगभग एक दर्जन मुस्लिम छात्र थे। मैंने पूछा कि क्या यह सूची सही है, क्योंकि इसमें कई ‘पाकिस्तानी नाम’ गलती से शामिल हो गये प्रतीत होते हैं। उन्होंने उसके सही होने की गारंटी दी। तब मैंने उनको वे मुस्लिम नाम दिखाये और उनसे पूछा कि क्या वे यह जानते हैं कि ये मुस्लिम छात्र हैं, और तब भी उनके नाम भारतीय सूची में शामिल हैं। उन्होंने यह स्वीकार किया कि ये मुस्लिम नाम हैं, किंतु वे यह नहीं बता सके कि इस सूची में कैसे हैं। वे कुछ चकित और हतप्रभ दिखाई पड़े। जब मैंने उन्हे यह बताया कि उस सूची में मुस्लिम नामों का शामिल होना गलत नहीं है, क्योंकि भारत में अब भी 4.5 करोड़ मुसलमान रहते हैं, तब कहीं जाकर वे सूची के शुद्ध होने के बारे में आश्वस्त हो पाये, उनके लिए यह एक नयी जानकारी थी।

वे लोग भी, जो इस विद्वान डीन की भाँति अनभिज्ञ नहीं हैं, भारत-पाक समस्याओं को हिन्दू और मुस्लिम की दृष्टि से ही देखते हैं। ‘न्यूयार्क टाइम्स’ का एक स्तम्भ-लेखक ‘हिन्दू’ विशेषण जोड़े बिना भारत का उल्लेख नहीं कर सकता। वह सदैव ‘हिन्दू भारत’और ‘मुस्लिम पाकिस्तान’ लिखता है, विशेषत: कश्मीर के विषय में लिखते समय। मैंने उसके संपादकीय विभाग के एक सदस्य से इस परंपरा के बारे में प्रश्न किया कि क्या वे जानते हैं कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, और वहाँ 4.5 करोड़ मुसलमान रहते हैं। उस सदस्य ने कहा कि ‘‘हाँ, हम जानते हैं कि भारत में मुसलमान रहते हैं, परन्तु उससे क्या? आपका देश निस्संदिग्ध रूप से वैसे ही एक हिन्दू देश है, जैसे पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है।’’

मुझे यह बात याद हो आयी कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सदैव इससे इंकार किया कि वह एक हिन्दू-संगठन है और उसने सदैव मुस्लिम लीग को उसके मुस्लिमों का एकमात्र प्रतिनिधित्व करने के दावे पर चुनौती दी। अपने इस कथन की पुष्टि के लिए उसने मुसलमानों को प्रसन्न करने के उद्देश्य से न्यायोचित हिन्दू-हितों की उपेक्षा तक की, परंतु अंग्रेजो ने कांग्रेस को सदा एक हिन्दू संगठन और मुस्लिम लीग को मुस्लिम संगठन के रूप में ही मान्य किया। पुराना इतिहास अपने को फिर से दुहरा रहा है। भारत यह दिखाने के लिए कि वह हिन्दू देश नहीं है, चाहे जो करे, विश्व उस पर विश्वास नहीं करेगा। पाकिस्तान भी चाहे जितना इस्लाम रहित बने, विश्व उसे मुसलमानों का देश मानेगा। अमरीका में ऐसे बहुत-से लोग थे, जिन्हें यह ज्ञात नहीं था कि श्री चागला, जो अमरीका में भारत के राजदूत थे, मुसलमान हैं, और जब उनको यह बताया गया तो उन्हें इस पर विश्वास नहीं हुआ। जो लोग इसे जानते थे, वे भी यह स्वीकार करने को तैयार नही थे कि केवल इसी कारण भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं है।

जब मैंने इस विषय पर एक अन्य प्रोफेसरों से चर्चा की तब उन्होंने मुझ से कहा-और मैं समझता हूँ कि ठीक ही कहा-कि मुसलमानों को भारत में रहने देने में और उनमें से योग्य व्यक्तियों को विभिन्न कामों के लिए चुनने में कोई गलती नहीं है। उन्होंने कहा कि जब किन्हीं विशेष पदों के लिए विदेशी नागरिकों को नियुक्त किया जा सकता है, तो यदि आपने अपने ही नागरिकों को नियुक्त किया तो उसमें गलत क्या है। किन्तु उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘चागला ने यदि हिन्दू भारत का प्रतिनिधित्व नहीं किया तो और किसका प्रतिनिधित्व किया?’’ और यह भी कि ‘‘कुछ समय के लिए लार्ड माउंटबेटन को गवर्नर जनरल रखकर भारत अंग्रेजों का देश तो नहीं बन गया?’’ मैंने उनसे कहा कि यह तुलना सही नहीं हैं। भारत के मुसलमान अन्य देश के नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘‘मैं यह बात मानता हूँ। परंतु जब तक भारत और पाकिस्तान मिलकर फिर से एक नहीं हो जाते, वे हिन्दू और मुस्लिम देश बने रहेंगे।’’ मुझे प्रसन्नता हुई कि कम से कम ऐसे व्यक्ति से तो मेरी भेट हुई जो ‘अखंड भारत’ को असंभव नहीं मानता। यह आश्चर्य की ही बात है कि जब कांग्रेसी नेता अखंड भारत का विरोध करते हैं, तब वे अपने रुख की सुस्पष्ट विसंगति को नहीं देख पाते। विभाजन और धर्मनिरपेक्षता में कोई मेल नहीं है।

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