नादनटी बाँसुरी

 दुनिया के सबसे लोकप्रिय एवं सर्वपरिचित वाद्यों में से एक है बाँसुरी। बाँसुरी बाँस से बनी हुई फूँक कर बजाया जाने वाला वाद्य है और रोज सुने जाने वाले अनगिनत शब्दों में से भावनाओं के कितने-कैसे रूप धारण कर बाँसुरी हमारे सामने हाजिर होती है, तभी तो मोरोपंत पंडित कवि ने (मराठी) उसके लिए ‘नादनटी’ जैसे बड़े ही लोकप्रिय शब्द का प्रयोग किया। भारतीय संगीत के समूचे वाद्यों में से यह आद्य वाद्य माना जाता है।

दिखने में कितना साधारण वाद्य! बाँस की एक खोखली नली और उसमें बनाए कुछ सुराख ऐसी सुलभ रचना। बाँस को संस्कृत में ‘वंश’ कहा जाता है। उससे वंश, बंसी, बाँसुरी, बाँसरी, बाँशी, बँसिया आदि शब्द प्रयोग में लाये जाते हैं। सही मायने में प्रकृति द्वारा निर्मित आदिम वाद्य। बाँस के बन में भौंरों के बनाये हुए सुराखों में से हवा बहने लगी, तो बाँस सीटी बजाने लगते हैं, यह आदमी ने देखा और उससे प्रेरणा पाकर अधिक परिष्कृत रूप में इस वाद्य का निर्माण किया। स्थानीय परिस्थिति के अनुसार बेंत, देवनल, खोखली लताएँं, लकड़ी, धातु की नलियाँं, काँच, पत्थर और तो और हड्डियों का इस्तेमाल कर बनायी हुई बाँसुरियाँ भी उत्खनन में पायी गई हैं।

बाँसुरी के स्वर निर्माण का आधार माने ऐसी खोखली नलियों में अस्तित्व में होने वाला हवा का स्तंभ। इस नली के एक सिरे पर फूँंकने के लिए एक सुराख होता है। इस सुराख के किनारे फूँंकने पर खोखले हिस्से में रहा हवा का स्तंभ कंपित होने लगता है और कुछ विशिष्ट कंपन संख्या का ‘स्वर’ निकलता है। इस स्तंभ की लंबाई जितनी ज्यादा होती है, उतनी कंपन संख्या बढ़ने लगती है और स्वर चढ़ने लगते हैं। बाँंसुरी की रचना में इस सूत्र का बड़ी खूबी से प्रयोग हुआ है। बाँसुरी में आमतौर पर छह सुराख होते हैं, उन पर हाथ की अँगुलियाँ रखकर उन्हें बंद किया जाता है। नीचे की ओर से होंठों की ओर क्रमबद्ध रूप में एक अँगुली उठाते चलें, तो नलिका में हवा के स्तंभ की लंबाई धीरे-धीरे कम होती जाती है और ऊपर वाले स्वर मिलने आरंभ होते हैं। तभी तो उसके लिए इन सुराखों के बीच की दूरियाँ निश्चित करना जरूरी होता है, तभी जाकर संगीत के ‘सारेगमपधनी’ ये आधार स्वर-मूल स्वर सुरीले बजेंगे। बाँसुरी बनाने वाले कारीगर इसमें अनुभवी एवं कुशल होते हैं।

संगीत के शब्दों में जैसे भाव होते हैं, वैसा बाँसुरी का स्वर भी गंभीर अथवा चंचल हुआ दिखाई देता है। भारत में इन बातों को लेकर प्राचीन काल से ही चिंतन हुआ है। बारहवीं सदी के लगभग शारंगदेव नामक संगीतज्ञ थे, उनके ‘संगीत रत्नाकर’ नामक ग्रंथ में विभिन्न प्रकार की छोटी-बड़ी बाँसुरियों का उल्लेख किया है। भरत ने अपने ‘नाट्याशास्त्र’ ग्रंथ में ‘कुलप’ नामक वाद्यवृंद का उल्लेख किया गया है। शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में इस वाद्य को सम्माननीय स्थान प्राप्त करा देने का श्रेय पं. पन्नालाल घोष को देना होगा। उन्होंने विभिन्न बाँसुरियों पर प्रयोग करते हुए आलाप, भींड, गमक, तान, तत्कार आदि सांगीतिक अलंकार बजाने का तंत्र विकसित किया और शास्त्रीय संगीत में इस वाद्य को प्रतिष्ठा प्राप्त करा दी।

नादों के बहुत सारे पोत निर्माण करने के लिए आधुनिक ध्वनि मुद्रण एवं ध्वनि प्रक्षेपण तंत्र का प्रयोग किया जा रहा है। लोक-संगीत से लेकर वैश्विक संगीत तक के सभी क्षेत्रों में बाँसुरी आज सिर ऊँचा कर विचरण कर रही है। सीडी, इंटरनेट आदि माध्यमों द्वारा इस वाद्य का परिचय प्राप्त कर लेना आज काफी आसान बना हुआ है, जो चाहते होंगे, वे यह वाद्य अवश्य बजाकर देखें। वैसे तो यह वाद्य काफी सुगम-सुलभ है। इसके दाम भी आम आदमी के लिए कुछ खास महँगे नहीं होते (व्यावसायिक कलाकार बजाते हैं, उन बाँसुरियों के दामों पर यहाँ ध्यान नहीं दिया गया है ) बाँसुरी सीखने के लिए उपयुक्त किताबें भी बाजार में उपलब्ध हैं।
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