प्रगति की मिसाल भीलवाड़ा टेक्सटाइल उद्योग

भीलवाड़ा जिला काफी समय से पानी की कमी के चलते डार्क जोन में रहा है। अत: यहां नए प्रोसेस की अनुमति प्रशासन द्वारा नहीं दी जा सकती। इसलिए कपड़ा फिनिश करवाने के लिए यहां के उद्यमियों को बालोतरा भेजना पड़ता है परंतु पिछले दो-तीन वर्षों में कुछ क्षेत्रों में पानी की कमी दूर हुई है, परंतु इसका तहसील के अनुसार पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है। जिससे नए प्रोसेस हाउस की अनुमति मिल सके।

पुरुष वर्ग के धोती, कुर्ता और सिर पर पगड़ी, राजस्थानी वेशभूषा की विशिष्ट पहचान रही है। वर्तमान जीवन शैली में पुरुष वर्ग की इस वेशभूषा का स्थान पैंट और शर्ट ने ले लिया तथा पैंट अर्थात सूटिंग का देश भर का उत्पादन केंद्र बना राजस्थान का भीलवाड़ा। भीलवाड़ा में लगभग 250 वीविंग इकाइयों तथा 20 प्रोसेस हाउस में प्रतिमाह 8 करोड़ मीटर कपड़ा उत्पादित होता है। जो देश की घरेलू आवश्यकताओं को तो पूरा करता ही है बड़ी मात्रा में निर्यात भी कर रहा है। यहां विविंग सेक्टर में सोल्जर तथा आधुनिक एयरजेट  मशीनें लगी हैं और प्रोसेसिंग क्षेत्र में भी आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। पिछले कुछ समय में भीलवाड़ा के उद्यमी सूूटिंग के अतिरिक्त शर्टिंग, बेडशीट, फर्निशिंग, क्लॉथ में भी मेहनत कर रहे हैं। लॉकडाउन पीरियड के बाद मजदूरों की कमी से जूझ रहे भिवंडी के शर्टिंग उत्पादन की पूर्ति बड़ी मात्रा में भीलवाड़ा ने ही की है तथा इस सारे विकास के पीछे यहां के उद्यमी वर्ग के परिश्रम तथा साहस की भूमिका रही है। भीलवाड़ा के उद्यमी ने उत्पादन के हर क्षेत्र में हमेशा नई तकनीक को अपनाया है। सरकारी सहयोग भीलवाड़ा उद्योग के लिए लगभग नगण्य ही रहा है। इसके बावजूद भीलवाड़ा टेक्सटाइल उद्योग ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग एक लाख व्यक्तियों को रोजगार दे रखा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश एवं अन्य कई राज्यों के श्रमिकों को भीलवाड़ा ने रोजगार दिया है।

भीलवाड़ा जिला काफी समय से पानी की कमी के चलते डार्क जोन में रहा है। अत: यहां नए प्रोसेस की अनुमति प्रशासन द्वारा नहीं दी जा सकती। इसलिए कपड़ा फिनिश करवाने के लिए यहां के उद्यमियों को बालोतरा भेजना पड़ता है परंतु पिछले दो-तीन वर्षों में कुछ क्षेत्रों में पानी की कमी दूर हुई है, परंतु इसका तहसील के अनुसार पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है। जिससे नए प्रोसेस हाउस की अनुमति मिल सके।

राजस्थान में औद्योगिक बिजली की दरें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे टेक्सटाइल उत्पादन राज्यों के मुकाबले अधिक है। इस कारण उत्पाद की ऊंची लागत आने से यहां से उद्यमी या तो पलायन करते हैं या उद्योग बंद कर देते हैं। जिन उद्योगों ने सोलर प्लांट लगा रखें हैं, उनसे भी राज्य सरकार प्रति यूनिट चार्ज वसूल रही है। लॉकडाउन कालखंड में उत्पादित सौर ऊर्जा की क्रेडिट राज्य सरकार ने नहीं दी तथा बंद उद्योगों से फिक्स
चार्जेस बढ़ाकर भी वसूल किए। राज्य सरकार के इस रवैए से उद्योग जगत सहमा हुआ है।

भीलवाड़ा में औद्योगिक क्षेत्र में उद्योग हेतु भूमि उपलब्ध नहीं है। जिससे नए उद्योग नहीं लग पा रहे हैं। बहुत लंबे समय से रिको ने नए औद्योगिक क्षेत्र की योजना नहीं बनाई है। शीघ्र नए औद्योगिक क्षेत्र की योजना बनाई जानी आवश्यक है।

वर्तमान में मैन मेड यार्न पर जीएसटी 12% है तथा इस यार्न से निर्मित कपड़े पर 5% जीएसटी है, अतः कपड़े में जीएसटी का रिफंड लेना पड़ता है, इस कारण से अनावश्यक श्रम एवं शक्ति व्यर्थ होती है तथा उद्यमी की कार्यशील पूंजी भी ब्लॉक रहती है। यदि मैन मेड यार्न पर 5% जीएसटी कर दिया जाए तो इस समस्या से बचा जा सकता है। इससे सरकार को रेवेन्यू का कोई नुकसान नहीं होगा, तथा उद्यमी रिफंड प्रक्रिया में लगने वाले समय को उत्पादन में उपयोग कर सकेगा। टेक्सटाइल अपग्रेडेशन फंड में अनुमति और रिफंड में देरी से उद्यमी निरुसाहित होता है। इसमें भी शीघ्रता एवम् विस्तार की आवश्यकता है।

भीलवाड़ा में एयर कनेक्टिविटी नहीं होने के कारण व्यापारी को आवागमन में लंबा समय लगता है। यहां की व्यापार की आवश्यकताओं को समझते हुए भीलवाड़ा में एयरपोर्ट की आवश्यकता है। मनरेगा में काम मिलने के कारण ग्रामीण क्षेत्र के श्रमिक अब उद्योगों को मिलने कम हो गए है॥ जबकि कुछ स्थानों पर मनरेगा में किये जा रहे कार्यों की उत्पादकता कम है। ऐसे में मनरेगा की सहयोग राशि को उद्योगों से जोड़े जाने का सुझाव है। इससे श्रमिक को काम मिल सकेगा, उद्योगों को श्रमिक मिल सकेंगे तथा मानव श्रम का उत्पादकता में उपयोग हो सकेगा। साथ ही उद्योगों की लागत में कमी आएगी।

उपरोक्त सभी विषयों के लिए राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को पत्र लिखा गया है। दोनों ही सरकारों से उद्योग हित में समस्याओं के शीघ्र समाधान की आशा है।

 

आपकी प्रतिक्रिया...