केवल बछिया पैदा करने की जादुई तरकीब रक्षक या भक्षक?

एक तरफ देश के कई राज्यों में गोवंश की हत्या को लेकर बड़े कानून बनाए जा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ देश में नर गोवंश पर  अपराध बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि मशीनीकरण की वजह से बैलों का प्रयोग करीब-करीब खत्म हो गया। लेकिन प्राकृतिक या ऑर्गेनिक खेती के बढ़ते प्रचलन से बैलों के प्रयोग की एक नई आशा जागी है।

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा सेक्स शॉर्टेड सीमेन टेक्नोलॉजी के शुभारंभ की खबरें प्रकाशित की गईं थीं, जिसमें बताया गया था कि सेक्स शॉर्टेड सीमेन टेक्नोलॉजी के तहत गाय से सिर्फ बछड़ी ही पैदा होगी और इससे किसानों को अत्यधिक मुनाफा होगा। सुनने में तो यह बात किसी को प्रभावित कर सकती है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होंगे, क्योंकि नर-मादा पशुओं के वंशज का विकास एक प्राकृतिक संरचना है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़  कभी भी लाभदायक नहीं हो सकती है।

सरकार को देसी जाति के गोवंश के विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए। साथ ही साथ पशु प्रजनन की पारंपरिक व्यवस्था हेतु स्वस्थ  एवं अनुवांशिक गुणों से युक्त सांड़ों के रखरखाव की परंपरा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। आज भारत ही नहीं समूचे विश्व में  ऑर्गेनिक या प्राकृतिक खेती का प्रचलन बढ़ रहा है। गोबर-गोमूत्र  की उपयोगिता अब लोगों की समझ में आ रहा है क्योंकि खेत की मिट्टी इतनी जर्जर और जहरीली हो गई है कि उसमें उगाए गए खाद्यान्न खाकर कोई व्यक्ति स्वस्थ नहीं रह सकता। सरकार को  बैलों से प्राप्त होने वाली श्रम-शक्ति के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए।  आज मशीनीकरण के युग में भी देशभर में तकरीबन 1.50लाख बैलगा़डियों का प्रयोग किया जाता है। ना पर्यावरण के प्रदूषण की शिकायत है और न डीजल-पेट्रोल की जरूरत। आंकड़ों के अनुसार  खेती के कुल 25% भूभाग पर छोटे एवं मझोले किसान तकरीबन 26% कार्य 476 लाख बैलों के श्रम-शक्ति के सहारे करते हैं।

सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ ऐग्रिकल्चरल इंजीनियरिंग, भोपाल के अनुसार अब खेती में 90 फीसदी मशीन शक्ति का प्रयोग होने लगा है और मानव शक्ति महज 5 फीसदी तक सिमट गई है। एक अध्ययन के अनुसार खेती में अब 90 फीसदी श्रम योगदान मशीनों का हो रहा है, जिनमें सबसे अधिक 47 फीसदी ट्रैक्टर और बिजली चलित हल, 27 फीसदी इलेक्ट्रिक मोटर और 16 फीसदी डीजल इंजन का इस्तेमाल होता है। आज से करीब तीन-चार दशक पहले की स्थिति बिल्कुल अलग थी। उस समय खेती में 60 फीसदी योगदान मानव और पशुओं (45 फीसदी पशु और 15 फीसदी मानव श्रम) का होता था।  वर्ष 1991-92 में इस सामूहिक भागीदारी में 26 फीसदी की गिरावट आ गई और ट्रैक्टर खेती में एक बड़ी सहायक शक्ति के रूप में सामने आया और खेती में 47 फीसदी योगदान दिया। वैसे देखा जाए तो एक आदमी 0.15 किलोवॉट शक्ति प्रति हेक्टेयर श्रम-शक्ति पैदा करता है ।

खेती के कामों में मशीनों का दखल बढ़ने पर इस सेक्टर में काम करने वाले लोगों की संख्या में बहुत ही गिरावट आ गई होगी। जनगणना के मुताबिक 1991 में 11.1 करोड़ कृषक और 7.5 करोड़ लोग कृषि मजदूर थे। यानी कुल 18.60 करोड़ लोग खेतों में काम कर रहे थे। लेकिन, 2011 की जनगणना में यह संख्या 2.63 करोड़ हो गई। इन 20 सालों में 43 फीसदी जनसंख्या बढ़ी है, लेकिन खेती में काम करने वाले भूमिहीन मजदूरों की संख्या 93 फीसदी बढ़ गई है।

मशीनीकरण एवं तकनीकी आधुनिकरण से पैदा होने वाली समस्याएं सुरक्षित धरती और पर्यावरण के लिए बिल्कुल ठीक नहीं हैं। इस समय देश में  ग्रीन एनर्जी की बहुत जरूरत है। समूची दुनिया में ऊर्जा की खपत दिनों दिन बढ़ती जा रही है और बढ़ते औद्योगीकरण के दौर में  कार्बन उत्सर्जन की समस्या जलवायु परिवर्तन के लिए बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है। कार्बन उत्सर्जन जो कि भारत में वर्ष 1993 में 1.4 प्रति व्यक्ति था, वर्ष 2016 में 2.44प्रति व्यक्ति हो गया और ग्रीनहाउस गैसेस बढ़ती जा रही हैं।  इसी प्रकार भारत में ऊर्जा की वर्तमान खपत 6 % से बढ़कर वर्ष 2040 तक 11 % पर पहुंच जाएगी। इसलिए पशु आधारित शक्ति- ऊर्जा का महत्व जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से सामना करने के लिए बहुत बड़ा महत्त्व रखता है। कुल मिलाकर पशु शक्ति या ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था पर हमें जोर देना होगा। घासफूस खाकर योगदान देने वाले पशुओं का संरक्षण संवर्धन अत्यंत आवश्यक है ।

एक तरफ देश के कई राज्यों में गोवंश की हत्या को लेकर बड़े कानून बनाए जा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ देश में नर गोवंश पर  अपराध बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि मशीनीकरण के वजह से बैलों का प्रयोग करीब-करीब खत्म हो गया। लेकिन प्राकृतिक या ऑर्गेनिक खेती के बढ़ते प्रचलन से बैलों के प्रयोग की एक नई आशा जागी है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में कुल मवेशियों की संख्या लगभग 30 करोड़ है। इसमें 8.1 करोड़ दुधारू गाय 10.9 करोड़ बैल और शेष 11 करोड़ अन्य पशु हैं। खेती में बैलों का इस्तेमाल काफी घट गया है, जिस वजह से नर गोवंश अनुपयोगी हो गए हैं। केंद्र सरकार कह रही है कि मशीनीकरण के समय में इनके लालन-पालन और उपयोग को एक अतिरिक्त बोझ माना जा रहा है। इस समस्या के निदान के लिए सेक्स
शॉर्टेड सीमेन टेक्नोलॉजी अर्थात लिंग वर्गीकृत वीर्य तकनीक के जरिए बछड़ों की जन्म दर को कम करके बछियों  की जन्मदर बढ़ाने की योजना चलाने का निर्णय लिया गया है।

अभी केंद्र सरकार ने मादा गोवंश बढ़ाने की जिस नई टेक्नोलॉजी  की चर्चा की है, उसमें नर गोवंश के विकास की गुंजाइश ही नहीं है।  यह बिलकुल सही नहीं है। सेक्स सॉर्टेड सीमेन टेक्नोलॉजी के तहत सामान्यतः वीर्य में एक्स तथा वाय शुक्राणु लगभग बराबर अनुपात में होते हैं। वाय-शुक्राणु से नर तथा एक्स-शुक्राणु से मादा संतान पैदा होती है। इस प्रकार सामान्य विधि से गर्भाधान करने पर बछड़ा या बछिया होने की संभावना 50% तक रहती है। लेकिन सेक्स
सॉर्टेड सीमेंन टेक्नोलॉजी में, प्रयुक्त होने वाले वीर्य में से जब प्रयोगशाला में  आधुनिक मशीन के जरिए वाई-शुक्राणु को अलग कर दिया जाता है तो सिर्फ एक्स-शुक्राणु  ही शेष रह जाते हैं। सरकार की इस परियोजना के अनुसार  इस प्रकार मादा बच्चा होने की संभावना 90% अधिक हो जाती है। इस विधि से प्राप्त वीर्य की मूल अवस्था से वांछित लिंग चयन की सुविधा होने से सिर्फ बछिया पैदा की जाती है।

बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत सेक्स
सॉर्टेड सीमेन तैयार करने के लिए प्रथम प्रयोगशाला के रूप में उत्तराखंड राज्य को मंजूरी दी गई है। जहां पर सेक्स सॉर्टेड सीमेन के उत्पादन का कार्य आरंभ हो गया है। इस प्रकार उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है जहां पर अप्रैल 2019 में इस परियोजना को स्वीकृति दे दी गई है। सेक्स सॉर्टेड सीमेन के उत्पादन के लिए अमेरिका की एक फर्म से अनुबंध किया गया है क्योंकि इसकी तकनीक का उस कंपनी के नाम पर पेटेंट है। यह टेक्नोलॉजी भारत में प्रयोग के लिए एक निश्चित समय के लिए खरीदी गई है।  उत्तराखंड की यह प्रयोगशाला फिलहाल अभी देसी नस्ल के पशुओं के लिए सेक्स सॉर्टेड सीमेन तैयार कर रही है।

जानकारी के अनुसार प्रयोगशाला में तैयार की जाने वाली इस योजना के तहत अब संकर नस्ल के पशुओं का भी सेक्स
सॉर्टेड सीमेन तैयार किया जाएगा। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सेक्स
सॉर्टेड सीमेन के प्रयोग में खामी इस बात की है कि प्रयोगशाला में लिंग निर्धारण के बाद शुक्राणुओं की संख्या तथा इनकी क्रियाशीलता कम हो जाती है। जिससे गर्भधारण क्षमता सामान्य गर्भाधान के तरीकों के मुकाबले  कम होती है। साथ ही साथ इस टेक्नोलॉजी के प्रयोग से प्रत्येक पशु के गर्भधारण के लिए खर्च भी अधिक आता है। हालांकि किसानों को यह सुविधा प्रदान करने के लिए राज्य और केंद्र सरकार ने सब्सिडी देना आरंभ कर दिया है। आगे क्या होगा यह तो सब आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन नफा कम घाटा ज्यादा वाला धंधा होगा।

आपकी प्रतिक्रिया...