कर लो दुनिया मुठ्ठी में

नये-नये आविष्कारों की जानकारी देनेवाले लेखों की शृंखला हम अगले अंकों में प्रकाशित करने जा रहे हैं। इस लेख के लेखक महेश अटाले स्वयं आविष्कारक हैं। उन्होंने छोटी-छोटी आवश्यकताओं को पूर्ण करनेवाले कई बड़े आविष्कार किये हैं। नई-नई बातों को जानने के लिये सदैव उत्सुक रहनेवाले अटाले विभिन्न प्रश्नों के जरिये टाटा और इसरो जैसी संस्थाओं से भी पत्र व्यवहार कर चुके हैं। महेश अटाले इसके अतिरिक्त मलखंब विद्या के राष्ट्रीय प्रशिक्षक हैं और भारतीय मलखंब विद्या को विश्व में मान्यता दिलाने के लिये प्रयत्नशील रहे हैं।
आज दुनिया आधुनिक विश्व के रूप में पहचानी जाती है। पिछले दो दशकों में की गई खोजों के कारण विश्व का चेहरा बदल गया है। कर लो दुनिया मुठ्ठी में की तर्ज पर आज पूरा विश्व सचमुच मुठ्ठी में आ गया है। चिकित्सा क्षेत्र में की गई खोजों के कारण मनुष्य की आयु में बहुत ज्यादा वृद्धि हुई है। दूसरे शब्दों में कहें तो नित नए रोग को नष्ट करके मानव की आयु में बढ़ोत्तरी भी की है। इतना ही नहीं, इससे भी आगे बढ़कर एकदम मनुष्य की तरह ही दिखने वाला और कभी न मरने वाले रोबोट अस्तित्व में आ सकता है। तकनीकी क्रांति तथा यातायात के आधुनिक साधनों के कारण विश्व बहुत छोटा दिखाई देने लगा है और वह जनता की मुठ्ठी में आ गया है। इंटरनेट के कारण आज घर बैठे ही विश्व के किसी भी कोने में पहुंचा जा सकता है।

यह वैज्ञानिक क्रांति डेढ़-दो शतकों में हुई है, एक रात में नहीं। इस क्रांति में अनेक क्रांतिकारी वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं तथा उनके सहयोगियों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। ग्राहम वेल ने 150 वर्ष पूर्व टेलिफोन की खोज की, लेकिन उसके बाद अनेक शोधकर्ताओं की लगातार कोशिशों के बाद मोबाइल अस्तित्व में आया, जो आज लगभग सभी व्यक्ति के हाथ में दिखाई दे रहा है। यह केवल आधुनिक तकनीकी के कारण न होकर मानव की जरूरतें, उसकी फोन पर निर्भरता की भी देन है। अनेक पदार्थों, वस्तुओं में आधुनिकीकरण के कारण मानव का नजरिया बदला है।

एक भारतीय के रूप में हम सबके सामने यह सवाल उठता है कि इस क्रांति में भारतीय योगदान क्या है?
आज नासा (नेशनल एरोनाटिक्स एंड स्पेस एडमिशट्रेशन) जैसी समूचे विश्व की प्रथम क्रमांक की संस्था में लगभग 30 प्रतिशत भारतीय शोध कार्य कर रहे हैं। कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स जैसे नाम हम सभी को ज्ञात हैं। डा. जगदीशचंद्र बोस, सी.वी. रमन, डा. होमी भाभा से लेकर डा. अब्दुल कलाम,श्री जयंत नारलीकर तक कई भारतीयों का इस क्रांति में अहम योगदान है। आज भी कई भारतीय वैज्ञानिक, शोधकर्ता रात दिन एक करके शोध कार्य में जुटे हैं। वे अथक परिश्रम करके इस क्रांति में शामिल हो रहे हैं।

इन सब विशेषज्ञों के साथ-साथ सर्वसामान्य मानव भी खोजबीन करता रहता है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। एक छोटे से काम के लिए होने वाली छोटी सी परेशानी किसी नए निर्माण को जन्म देती है। किसी पृथक कारण के लिए उत्पन्न हुई कोई वस्तु अथवा उसका कोई हिस्सा, दूसरी वस्तु अथवा उसके किसी अन्य हिस्से में जोड़कर अलग कार्य में उपयोग में आने वाली तीसरी वस्तु का निर्माण करना ही नवनिर्मिति है। इसी नवनिर्मिति को आधुनिक काल में आविष्कार या देशज भारतीय भाषा में जुगाड़ कहते हैं।

हमारे यहां की गृहणियां बासे भोजन को दूसरे दिन किसी अन्य रूप जैसे पराठे-पुलाव में रूपांतरित कर देती हैं। बासे भोजन को फेकने की जगह यह नये व्यंजन बनाने की गृहणी कोशिश भी जुगाड़ ही कही जाती है। अगर ये मुश्किलें न आयें तो उपाय भी नहीं निकलेंगे। इनकी सर्वसामान्य व्यक्ति को अच्छी जानकारी मिलनी चाहिये, समाज को उसका उपयोग होना चाहिये। कई बार ऐसे नवनिर्मित प्रयोग, जुगाड़ व्यक्ति विशेष तथा क्षेत्र तक ही सीमित रहते हैं। परंतु जब ये जुगाड़ चर्चित होते हैं,तो उसमें विश्व बदलने की ताकत होती है।

राइट भाईयों ने अंतरिक्ष में विचरण की क्षमतावाले हवाई जहाज की खोज की, लेकिन जब जुगाड़ के सहारे मशीनगन उस विमान पर लगाई गई तो मानो महाक्रांति ही हो गई और आकाशीय युद्ध की शुरूआत हो गई।

विद्युत बल्ब की खोज करने वाले थॉमस अल्वा एडिसन ने टंगस्टन तार से पहले विद्युत प्रवाह करने वाले और ज्यादा से ज्यादा प्रकाश देने वाला पदार्थ तैयार हो, इसके लिये उस समय उपलब्ध प्रत्येक धातु के तारों से लेकर मानव के बालों तक कई वस्तुओं का जुगाड़ किया। और इस तरह के असफल प्रयोगों से हार न मान कर खुद के ज्ञान तथा कल्पनाशक्ति का प्रयोग करके पूरे विश्व में इस दिव्य शोध (जुगाड़) का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है। एडिसन सिर्फ यही नहीं रूका, बल्कि बिजली निर्माण करने वाले जनरेटर से विद्युत प्रवाहित करने वाले तारों तथा उनके समुचित जोड़ से बिजली पैदा करने वाली प्रणाली उन्होंने विकसित की।

आज विश्व भर में एक बड़े ड्रैंगन ने तहलका मचाना शुरू कर दिया है। यह चीनी ड्रैगन विश्व भर में अपने पांव पसार रहा है। अत्याधुनिक इलेक्ट्रानिक्स सामग्रियों से लेकर टूथब्रश,टूथपेस्ट जैसी दैनिक उपयोग में आने वाली असंख्य वस्तुओं पर मेड इन चाइना की मुहर लगी रहती है। कुछ समय पहले छोटे बच्चों के खिलौनों में विषैले पदार्थ होने की खबर मिलने के बाद चीन कुछ पिछड़ सा गया था। फिर उसने अपने उत्पाद पी.आर.एस.(पीपल्स रिपब्लिक आफ चाइना) नाम से विश्व भर में फैला दिये। नई संकल्पना तथा बहुत अल्प कीमत जैसे पायदानों पर अपना व्यवसाय चलाकर चीन विश्व में अपनी छाप छोड़ने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है। नित नई संकल्पना ही इस विस्तार का मूलाधार है। चीन में वर्तमान मेंं 1500 से अधिक अविष्कार केंद्र अस्तित्व में हैं और केवल इसी के बूते पर चीन विश्व में महासत्ता बनकर उभर रहा है।

वस्तुतः भारत में आई.आई.टी., इस्त्रो, आरती, टाई, डी.आर.डी.ओ, टी.आई.एफ.आर, बी.ए.आर.सी जैसी अनेक संस्थाओं में शोध कार्य बहुत तेजी से जारी हैं। केंद्र सरकार की ओर से इन सभी को सहयोग मिल रहा है। इसके अतिरिक्त इग्नाइट, आई-थ्री जैसी आविष्कार प्रतियोगिताओं के माध्यम से सामान्य आविष्कारकों को प्रदर्शन का अवसर प्रदान किया जा रहा है। इसी के साथ एफ.आई.टी.टी. जैसी हाईबर्नेशन प्रोग्रॅम्स तो हैं ही, पर ये सिर्फ उंगुलियों पर गिनने जितने ही हैं। जरूरत तो इस बात की है कि कम से कम जिला स्तर पर एक जिला नवनिर्माण केंद्र तथा आविष्कार केंद्र की स्थापना की जाए।

मुंबई के अंधेरी उपनगर के आंबेवाड़ी क्षेत्र में आर्थिक रूप से दुर्बल लोगों के लिए श्री गोविंद बाल मंदिर में 15 अगस्त, 2012 को एक आविष्कार केंद्र शुरु किया गया। वर्तमान में यहां आठ इनोवेटर कार्यरत हैं। यहां तैयार हुए आविष्कारों को समाज तक सीधे पहुंचाने के लिए शीघ्र ही एक कारगर योजना भी तैयार की जाएगी।
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