भारत की राष्ट्रीय पर्यावरण नीति

भारत जैसे विविध स्वरूपों वाले समाज में आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक तथा पर्यावरणीय क्षेत्रों से सम्बन्धित अनेक चुनौतियां होती हैं। विकास के साथ-साथ ऐसे परिदृश्य उभरने लगते हैं, जिनके कारण स्थानीय पर्यावरण और जलवायु पर गम्भीर प्रभाव पड़ता है। इससे बचने के उपाय के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर कई उपाय किये गये है और अन्तरराष्ट्रीय बैठकों में लिए गए निर्णयों को लागू करने के समुचित कदम उठाए गए हैं।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 48 क तथा 51 तक (छ) अधिदेशित तथा अनुच्छेद 21 की न्यायिक विवेचना द्वारा पुष्ट की गयी स्वच्छ पर्यावरण के प्रति हमारी राष्ट्रीय वचनबद्धता सम्बधी प्रतिक्रिया के रूप में राष्ट्रीय पर्यावरण नीति-2006 तैयार की गयी है। इस नीति के निर्माण का उद्देश्य पर्यावरण सम्बधी उपलब्ध जानकारी तथा प्राप्त अनुभवों के आधार पर इसके कार्यक्षेत्र में वृद्धि करना है। वर्तमान नई राष्ट्रीय पर्यावरण नीति पहले की नीतियों को और अधिक पुख्ता करती है। इस नीति के निर्धारण में राष्ट्रीयन नीति-1988, राष्ट्रीय संरक्षण कार्यनीति तथा पर्यावरण एवं विकास पर वक्तव्य-1992, प्रदूषण उपशसन सम्बधी नीति वक्तव्य-1992 निहित है, जबकि राष्ट्रीय कृषि नीति-2000, राष्ट्रीय जनसंख्या नीति-2000, राष्ट्रीय जलनीति-2000 ने भी योगदान किया है।

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति तय करते समय जिन तीन बुनियादी आकांक्षाओं पर आम राय बनी, वे हैं- सभी मानव उत्तम कोटि का जीवन जीने के योग्य बनें, सभी लोग जैव मण्डल की परिमितता का सम्मान करने में सक्षम बनें और यह कि न तो अच्छे जीवन की अभिलाषा में और न ही भौतिक सीमाओं की मान्यता विश्व में बेहतर न्याय की तलाश में आड़े आए। इस नीति में यह स्वीकार किया गया है कि स्वस्थ पर्यावरण बनाए रखना केवल सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक की भी जिम्मेदारी है। हालांकि सरकार को अपने प्रयत्नों को बढ़ावा देना चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति को प्राकृतिक और संस्थानिक, पर्यावरणीय गुणवत्ता को बनाए रखने तथा उसमें बढ़ोत्तरी के प्रति अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार करना चाहिए।

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति ऐसे विचारों तथा तथ्यों से अभिप्रेरित है तथा इसका उद्देश्य सभी विकासात्मक गतिविधियों को मुख्य धारा में शामिल करना है। इसमें देश के समक्ष मौजूदा तथा भविष्य में आनेवाली प्रमुख पर्यावरणीय चुनौतियों, पर्यावरणनीति के उद्देश्यों, वैधानिक तथा संस्थागत विकास के सामान्य संकेतों तथा कार्यान्वयन सम्बन्धी कार्यतन्त्रों का संक्षेप में उल्लेख किया गया है।

इस नीति को नियामक सुधारों, पर्यावरणीय संरक्षण से सम्बन्धित कार्यक्रमों तथा परियोजनाओं और केन्द्र, राज्य एवं स्थानीय सरकारों की एजेन्सियों द्वारा कानून बनाते तथा उसकी पुनरीक्षा करने के कार्य में एक निर्देशिका के रूप में बनाए जाने की मंशा है। इस नीति की प्रमुख थीम यह है कि यद्यपि पर्यावरणीय संसाधनों का संरक्षण सभी की आजीविका की सुरक्षा तथा बेहतरी के लिइ आवश्यक है, तथापि संरक्षण के लिइ सबसे सुरक्षित आधार यह सुनिश्चित करना है कि लोग उन संसाधनों के अवक्रमण के बजाय उनके संरक्षण द्वारा अपनी बेहतर आजीविका प्राप्त कर सकें।

पर्यावरणीय की चुनौतियां : कारण एवं प्रभाव-
देश के समक्ष जो प्रमुख पर्यावरणीय चुनौतियां हैं, वे पर्यावरणीय अवक्रमण तथा विभिन्न आयामों में मौजूद गरीबी तथा आर्थिक प्रगति के गठजोड़ से सम्बन्धित हैं। ये चनौतियां आन्तरीक तौर पर पर्यावरणीय स्रोतों, जैसे कि भूमि, जल, वायु तथा उनकी वनस्पतिजात एवं प्राणिजात की स्थिति से जुड़ी हुई हैं।

* पर्यावरणीय अवक्रमण निर्धन ग्रामीणों में गरीबी को बढ़ावा देनेवाला एक प्रमुख कारक है। इस प्रकार का अवक्रमण मिट्टी की उपजाऊ शक्ति, स्वच्छ जल की मात्रा व गुणवत्ता, वायु गुणवत्ता, वनों, वन्यजीवन, तथा मत्स्य पालन को प्रभावित करता है।

* पर्यावरणीय स्रोतों के आधार में गिरावट के परिणास्वरूप, यहां तक कि अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहतर दिखाई देने के बावजूद भी, कुछ जनसमूह निराश्रय हो सकते हैं।

* यह बात निरन्तर स्पष्ट होती जा रही है कि पर्यावरण की खराब गुणवत्ता ने मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।

* पर्यावरणीय संसाधनों तथा उनके प्राप्ति व प्रयोग के मामले में अस्पष्ट या अपर्याप्त रूप से प्रवर्तित किए गए अधिकारों के सम्बन्ध में संस्थागत विफलता के परिणास्वरूप पर्यावरणीय अवक्रमण होता है।

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के उद्देश्य-

ये उद्देश्य प्रमुख पर्यावरणीय चुनौतियों की की अवधारणाओं से सम्बन्धित हैं। मे उद्देश्य है-

1) महत्वपूर्ण पर्यावरणीय संसाधनों का संरक्षण, 2) वर्तमान पीढ़ी में समता, गरीबों के लिए आजीविका सुरक्षा, 3) पीढ़ियों में समता, 4) आर्थिक तथा सामाजिक विकास में पर्यावरणीय सरोकारों का एकीकरण 5) पर्यावरणीय संसाधनों के प्रयोग में दक्षता, 6) पर्यावरणीय संचालन, 7) पर्यावरण संरक्षण के लिए संसाधनों में बढ़ोत्तरी।

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के सिद्धान्त-

यह नीति इस तथ्य को पहचान करके तैयार की गयी है कि केवल वही विकास अविच्छिन्न हो सकता है जिसमें परिस्थितिकीय दबावों और न्याय की अनिवार्यताओं पर भी ध्यान दिया गया हो। ये इस प्रकार हैं-

1) सभी मानव अविच्छिन विकास सरोकारों के केन्द्र बिन्दु हैं। 2) सबको विकास का अधिकार अवश्य दिया जाना चाहिए। 3) पर्यावरणीय सुरक्षा विकास प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। 4) एहतियाती दृष्टिकोन अपनाया जाए। 5) आर्थिक क्षमता प्राप्त की जाए- क) प्रदूषण कर्ता द्वारा क्षतिपूर्ति, ख) लागत न्यूनीकरण, 6) अतुल्य महत्व की हस्तियां। 7) समता। 8) वैधानिक उत्तदायित्व। 9) सार्वजनिक न्यास का विचार। 10) विकेन्द्रीकरण। 11) एकीकरण। 12) पर्यावरणीय मानकों का निर्धारण। 13) निवारक कार्रवाई। 14) पर्यावरणीय प्रतिकार इत्यादि।

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के तहत-

मानव निर्मित धरोहरों का संरक्षण किया जाएगा। जलवायु परिवर्तन के विषय में उचित कदम उठाए जाएंगे। पर्यावरणीय मानक, प्रबंधन प्रणालियां, प्रमाणीकरण और संकेतकों का पालन किया जाएगा। स्वच्छ प्रौद्योगिकी का विकास और उनका नवीनीकरण किया जाएगा। पर्यावरणीय जागरुकता, शिक्षा एवं सूचना के लिए समुचित कार्य किया जाएगा। पर्यावरण एवं वन तटीय क्षेत्र, सूक्षम जीव पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र इत्यादि को संरक्षण दिया जाएगा। पर्यावरणीय संसाधनों को बढ़ाया और उनका संरक्षण किया जाएगा। वन एवं वन्य जीवों की रक्षा की जाएगी। जैव विविधता, पारम्पारिक ज्ञान तथा प्राकृतिक धरोहरों की रक्षा की जाएगी। नदी प्रणलियों, भू-जल, नम भूमि, धरातलीय जल, पर्वतीय जल वाहिनियों, समुद्र तटीय संसाधने का संरक्षण किया जाएगा। वायु, जल, मृदा, ध्वनि प्रदूषणों को कम करने और उन्हें दूर करने के उपाय किए जाएंगे। अनुसंधान एवं विकास कार्यों को बढ़ावा दिया जाएगा। पर्यावरण संवर्धन हेतु अन्तरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त किया जाएगा। समय-समय पर्यावरण नीति एवं कार्रवाई की समीक्षा की जाएगी।

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