संघ की स्थापना आधुनिक राष्ट्र निर्माण की नींव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वतंत्रता के पश्चात देश का सबसे शक्तिशाली संगठन है। जब देश स्वतंत्र हुआ तब भारत में मुख्य रूप से चार विचारधाराएं कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समाजवादी और संघ थीं। कांग्रेस के साथ स्वतंत्रता संग्रम की पार्श्वभूमि थी। उसकी जड़ें पूरे देश मेें जमी हुई थीं। उसके नेतृत्व को न केवल भारत में,वरन भारत के बाहर अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्राप्त थी। ‘कांग्रेस अर्थात भारत’ के इसी अहंकार में कांग्रेस चल रही थी। उधर रूस के बाद चीन में क्रान्ति होने के कारण कम्युनिस्टों को विश्वास हो गया था कि वे पूरा संसार जीत लेेंगे। मार्क्स ने गणितीय पद्धति के द्वारा इसकी सैद्धांतिक कल्पना भी कर ली थी। समाजवादियोंके साथ स्वतंत्रता संग्रम में मिली लोकप्रियता थी और साथ ही लोक क्रान्ति के स्वप्न भी थे। अत: अखबारों के माध्यम से उनकी प्रतिमा क्रान्तिकारी की बन गयी। इसके ठीक विपरीत रा. स्व. संघ की प्रतिमा बनी थी। लोग उन्हें सामान्यत: ‘आधी चढ्ढी पहने बच्चे और बाल-बुद्धि के लोग’ के रूप में जानते थे। उस समय के विद्वान अपने मत के इतने पक्के थे कि वे इसी मत के कारण सदैव संघ पर टीका‡टिप्पणी करने में लगे रहते थे। कई के लिए तो यह उपेक्षा का विषय था। उसी समय गांधी की हत्या का कलंक माथे पर लगने के कारण संघ का सामाजिक व राजकीय बहिष्कार किया जाने लगा। परन्तु अब स्वतंत्रता के बाद के पैंसठ वर्षों में ऐसा नजर आता है कि संघ की ही निरन्तर प्रगति हुई है और अन्य विचारधाराओं का प्रभाव कम हुआ है। डार्विन का सिद्धांत है कि जो बदलते समय के अनुसार स्वयं को बदलता है, वही जीवन‡संघर्ष में आगे बढ़ता है, वरना डायनासोर जैसे शक्तिशाली जीव भी स्वयं को न बदल सकने के कारण काल के गाल में समा चुके हैं। यही सिद्धांत अगर विचारधाराओं पर लगाया जाये तो कहना पड़ेगा कि जो विचारधाराएं कालानुरूप सुसंगत होंगी वे टिकेंगी और जो नही होंगी, वे नष्ट हो जाएंगी। इसके अनुसार संघ बीसवीं शताब्दी के अन्त का सर्वाधिक सफल संगठन है, क्योंकि इसके तत्व तथा कार्य पद्धति कालानुरूप सबसे अधिक सुसंगत हैं। संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी ने संघ की स्थापना का अत्यधिकप्रचार नहीं किया, फिर भी जिस तरह वृक्ष से बीज के स्वरूप का अनुमान हो सकता है, उसी प्रकार संघ की अभी की स्थिति, उसका स्वरूप और वृद्धि से संघ स्थापना की प्रेरणा की खोज करनी होगी।

बीसवीं सदी और जागरण का समय-

सन 1857 के स्वतंत्रता संग्रम में इंग्लैण्ड की विजय के बाद भारत में राज घरानों के शासन के लौटने के आसार खत्म हो गये। भारत में भी इंग्लैण्ड की तरह ही सुशिक्षित मध्यम वर्गीय राजनीति शुरू हुई। लोकतंत्र, उदारवाद, मानवीय मूल्यों का महत्व इत्यादि इसकी नयी विशेषताएं थीं। इंग्लैण्ड में राष्ट्रवाद और इन मूल्यों का विकास समान्तर रूप से हुआ अत: भारतीयों के समक्ष भी यही उदाहरण था। आधुनिक शिक्षा के कारण जैसे‡जैसे भारतीयों को इन मूल्यों का परिचय हुआ वैसे‡वैसे इस भावना के कारण युवकों के मन में भी देश को स्वतंत्र कराने की भावना जन्म लेने लगी, साथ ही उन्हें यह बात भी समझ में आयी कि इंग्लैण्ड को किसी युद्ध में हराने के बजाय देश में जनजागृति लाकर अंग्रेजों का शासन चलाना ही असम्भव करना होगा, इसी से आजादी प्राप्त होगी।

यूरोप के पुनरुत्थान काल में विकसित हुए राष्ट्रवाद की भी कुछ विशेषताएं थीं। यूरोप में आधुनिकता का युग शुरू होने से पहले वहां की समाज-रचना या तो धर्माधिष्ठित थी या राजाधिष्ठित । धर्म पर श्रद्धा या राजा के प्रति निष्ठा ही समाज को बांधने वाली कड़ी थी, परन्तु धर्मनिरपेक्षता और लोकतंंत्र की कल्पना ने ये दोनों आधार छीन लिये थे। अत: राष्ट्रवाद और राष्ट्रनिष्ठा समाज को बांधने और जोड़ने वाले नवीन आधार के रूप में उभरे। यह अनुभव किया गया कि किसी विशिष्ट भूमि से ऐतिहासिक और भावनात्मक रूप से जुड़े समान भावविश्व से ही राष्ट्र भावना निर्माण होती है। उस देश का इतिहास रचने वाले महान राष्ट्र-पुरुषों के प्रति और ऐतिहासिक घटनाक्रमों से निर्माण होने वाले शत्र्ाु‡मित्र भावना से भी यह राष्ट्र भावना निर्मित होती है। हालांकि उपरोक्त सभी बीसवीं सदी की धारणाएं हैं जिनका अनुभव अभी भी होता है। भारत को भी अगर आधुनिक युग में कदम रखना है तो देशभक्ति की भावना का निर्माण ही उसकी नींव होगी। आधुनिक भारत को मजबूत करने के लिए इस आधुनिक देशभक्ति की भावना का मजबूत होना आवश्यक था।

आधुनिक राष्ट्र निर्माण की समस्याएं-

भारत के आधुनिक राष्ट्र निर्माण में मुख्यत: तीन समस्याएं थीं। पहली समस्या मुस्लिम मानसिकता की थी। इस्लाम किसी भूमि के प्रति निष्ठा रखने की अनुमति नहीं देता। अत: वह आधुनिक राष्ट्रनिष्ठा की भावना से भी समरस नहीं हो पाता। आज भी प्रत्येक मुस्लिम देश में राष्ट्रनिष्ठा और धर्मनिष्ठा के बीच द्वंद्व है। इस्लाम किसी भी देश में इस्लाम आने के पूर्व के इतिहास से अपने को जुड़ा नहीं मानता। अत: इस्लाम पूर्व के काल का जो भावविश्व है उसमें यह मानसिकता समायोजित नहीं होती। अपने आस‡पड़ोस में रहने वाले राष्ट्र-बन्धुओं के बजाय वे अन्य देशों में रहने वाले अपने धर्म-बन्धुओं को अधिक अपना समझते हैं। ऐसे में उनकी मानसिकता कुरान में बताये गए जीवन मूल्यों से विसंगत जीवन मूल्यों का स्वीकार नहीं करती। वे इस मानसिकता से बाहर ही नहीं निकलना चाहते कि उन्होंने किसी देश पर राज किया था और अब वे अभी भी उसी तरह रहेंगे। अत: हिंदू और मुसलमानों को एक साथ लाकर नवीन राष्ट्र का निर्माण करने में कई व्यावहारिक समस्याएं थीं।

हिंदू समाज के दृष्टिकोण से भी यहां दो महत्वपूर्ण मुश्किलें थीं। पहली यह कि हिंदू समाज का भावविश्व हजारों वर्षों से इस भू-भाग से जुड़ा हुआ था, परन्तु उसमें सामूहिक भाव से अधिक व्यक्तिगत मोक्ष का भाव अधिक था। प्रयाग के कुम्भ का मेला संसार में सबसे अधिक संख्या वाला मानवीय मेला होता है, परन्तु इसमें आये हुए लोगों के मन में एक ही देश के लोग होने का भाव नहीं होता। वह तो मोक्ष प्राप्ति की आस में आये कराड़ों अकेले इन्सानों का समूह होता है। अत: उससे आधुनिक राष्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक समान राष्ट्रीय आकांक्षाओंका निर्माण नहीं होता। अब समस्या यह थी कि एक व्यक्ति के रूप में भारतीय भू‡भाग से मोक्ष भावना के कारण जुड़े हुए ‘धार्मिक हिंदू’ को सामूहिक आकांक्षा रखने वाले ‘राष्ट्रीय हिंदू’ में कैसे तब्दील किया जाये।

इसके साथ की ही दूसरी समस्या अधिक गम्भीर थी। जिस धार्मिक और सांस्कृतिक परम्परा ने िंहंदू समाज के समान भावविश्वों को जन्म दिया था, उसी ने जातिगत विषमता को भी जन्म दिया था। यही आधुनिक राष्ट्र निर्माण की डगर का बड़ा रोड़ा था। जिस सांस्कृतिक परम्परा से यह समान भावविश्व तैयार हुआ था, उसे ठेस न पहुंचाते हुए इन जातिगत विषमताओं को दूर करना एक बड़ी चुनौती थी। डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर के शब्दों में इसको समझा जा सकता है। उनका मत कुछ इस प्रकार था- ‘‘किसी जन-समूह के एक होने के लिए अलग‡अलग वंश के लोगों का पूर्णत: एकत्रित होना ही काफी नहीं है। वंशशास्त्र की दृष्टि से केवल सांस्कृतिक एकता ही जन-समूह की एकता की कुन्जी है। यह बात अगर सभी को स्वीकार हो तो मैं यह साहसी घोषणा करता हूं कि लोगों की सांस्कृतिक एकता में भारत का मुकाबला अन्य कोई देश नहीं कर सकता। भारत न केवल भौगोेलिक रूप से एक है, वरन अन्य किसी के मुकाबले यहां की सांस्कृतिक एकता एक कोने से दूसरे कोने तक दिखायी देती है। वस्तुत: अलग‡अलग वंश के रक्त और संस्कृति का मिश्रण होने के बाद ही भारत में जाति व्यवस्था का उदय हुआ। जातिभेद को वंशभेद मानना वस्तु स्थिति का विपर्यास करने जैसा होगा। किसी जाति का प्रचार‡प्रसार करने का कार्य इतना बड़ा है कि वह किसी एक व्यक्ति के सामर्थ्य या धूर्तता से सम्भव नहीं है।’’अत: सांस्कृतिक एकता को कायम रखते हुए जातीय विषमता को कैसे दूर किया जाये, यह महत्वपूर्ण था।

राष्ट्रीय हिंदू बनाने की प्रक्रिया‡

भारत की आधुनिक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के ढांचे में प्रथम स्तर पर जबरदस्ती मुसलमानों का समावेश करना समाजशास्त्र के अनुसार गलत और व्यावहारिक दृष्टि से मूर्खतापूर्ण होता। साथ ही इस ढांचे में ‘धार्मिक हिंदू’ को ‘राष्ट्रीय हिंदू’ बनाने की योजना होना आवश्यक था। ढांचा बनते समय हिंदुओं की मूलभूत सांस्कृतिक एकता को ठेस लगे बिना उसमें निहित जातिभेद के कलंक को दूर करना था। इस पूरी प्रक्रिया में किसी विशेष वर्ग में परिवर्तन करने से बात नहीं बन सकती थी। लोकतंत्र स्वीकार करने के पश्चात समाज का सामान्य व्यक्ति नव-समाज निर्माण का महत्वपूर्ण सक्रिय घटक बन जाता है। अत: नव-राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में उसे सहभागी करने वाली कार्य पद्धति होनी आवश्यक थी।

जब रा. स्व. संघ की स्थापना हुई तो देश में एक साथ अनेक घटनाएं हो रही थीं। लोकमान्य तिलक ने स्वतंत्रता की लड़ाई को लोकशक्ति का अधिष्ठान बनाया और महात्मा गांधी ने उसे आगे बढ़ाया। परन्तु मुसलमानों ने इस ल़ड़ाई में भी अपनी अलग खिचड़ी पकायी। कांग्रेस के हिंदू लोग इस बात के लिए आशंकित थे कि स्वतंत्रता की लड़ाई में कहीं मुस्लिम समाज अंग्रेजों से जाकर न मिल जाये। मुसलमानों की एक के बाद एक मांगें मानने के कारण हिंदुओं का अपने बलबूते कुछ कर सकने का आत्मविश्वास खोता चला गया। मुस्लिम समाज से सहयोग की उम्मीद करने वाला हिंदू राष्ट्रवाद इस बात से डरता था कि कहीं मुस्लिम दंगे न कर दें। इसी डर के कारण कौन सी बातें राष्ट्रीय हों, इसका फैसला भी मुस्लिम समाज करने लगा था। भारतीय नेताओं की मानसिकता बन गयी थी कि ‘जहां मुसलमान नहीं, वह राष्ट्रीय नहीं’। अत: आवश्यकता थी यह आत्मविश्वास निर्माण करने की कि हिंदू समाज अपने बल पर राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। बाद में स्वा. सावरकर जी के नेतृत्व में हिंदू महासभा ने केवल हिंदुओं की राजनीति करने का वैचारिक धैर्य सामने रखा। परन्तु डॉ. हेडगेवार को केवल हिंदुओं की राजनीति पसंद नहीं थी। उनकी दृष्टि में राजनीति राष्ट्र निर्माण का केवल हिस्सा मात्र थी, इसके लिए पारम्परिक धार्मिक हिंदुओं में से नवीन आधुनिक दृष्टिकोण रखने वाला हिंदू निर्माण करना आवश्यक था। अत: उन्होंने अपनी प्रतिभा से इस तरह की कार्य पद्धति तैयार की जो नव-राष्ट्रवाद का बीज बना। चार धाम यात्रा, चारों दिशाओं में बने शंकराचार्यों के पीठ, देश भर के चार भागों में हर चार साल बाद होने वाले चार कुम्भ मेले, बारह ज्योतिर्लिंग, उत्तर के कैलाश पर्वत पर वास करने वाले महादेव के लिए कन्याकुमारी में तप करतीं पार्वती, देश भर में रामायण-महाभारत से सम्बन्धित स्थल इत्यादि से धार्मिक और भावनात्मक रूप से जुड़ कर हिंदू मानस चतुर्वर्णाधिष्ठित विचार प्रणाली, जातिगत समाज व्यवस्था और व्यक्तिगत मोक्ष भावना के प्रभाव के कारण सम्पूर्ण समाज के रूप में एक होने की भावना की अनुभूति करने में असमर्थ था। इसका परिणाम धार्मिक रूप से एकत्र मुसलमानों से लड़ते समय सामने आ चुका था। मुसलमानों से लड़ते समय हिंदू राजा अकेले लड़ते थे, पर मुसलमानों के पीछे उनका धार्मिक समूह था। अत: कठिन परिस्थिति में अन्य सहधर्मियों को पुकारने और मदद करने, दोनों ही में धार्मिक कर्तव्यपूर्ति की भावना थी। हिंदुओं के मन पर इस्लाम का दबाव होने का एक कारण यह भी था। अंग्रेजों ने भारत के सामने एक और मिसाल रखी कि जब किसी समूह शक्ति का अधिक शास्त्रीय, व्यवस्थित और विज्ञान का आधार लेकर उपयोग किया जाता है, तो समाज में बड़ा परिवर्तन होता है। अत: इस भूमिका के साथ समाज सुधार के कार्य की भी शुरुवात हुई कि अगर राजनैतिक लड़ाई के साथ सामाजिक समरसता निर्माण नहीं हुई तो स्वतंत्रता नहीं टिक सकती । इन सभी पहलुओं को एक ही समय अपने साथ बांधने की नव-राष्ट्र की संकल्पना की आवश्यकता थी। डॉ. हेडगेवार ने इस आवश्यकता को पूरा करने का संकल्प किया।

क्रान्तिकारी प्रक्रिया-

यूरोप में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया श्ाुरू होने से पहले तानाशाही राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था अस्तित्व में थी। जैसे-जैसे विज्ञान का प्रभाव बढ़ता गया, वैसे-वैसे यहां के चिन्तकों का धार्मिक प्रभाव घटता गया और लौकिकता का असर दिखायी पड़ने लगा। इसका प्रभाव आम नागरिकों के साथ ही शासनाधीशों पर भी पड़ा। औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात प्रत्येक राष्ट्र के अपने-अपने हित सामने आये। इसके पीछे मुख्य रूप से यूरोप में बने अलग‡अलग राष्ट्रों के निर्माण की प्रेरणा ही थी। इनमें से इंग्लैण्ड को एक स्थायी और सभ्य लोकतंत्र के रूप में पहचाना जाने लगा। बीसवीं शताब्दी में भारतीय राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था पर भी यूरोपीय वैचारिक मन्थन का असर पड़ा। अपने समाज की सांस्कृतिक विशिष्टता का लोप न हो तथा यूरोपीय सामाजिक मूल्यों को किस तरह से अंगीकार किया जाये, इस बारे में अलग-अलग विचार व्यक्त किये जा रहे थे। इसके अनुसार एक आन्दोलन खड़ा हो रहा था। डॉ. हेडगेवार की नजरों के सामने एक नये प्रकार की सामाजिक व्यवस्था थी, लेकिन डॉ. हेडगेवार की विशेषता यह थी कि उन्होंने इस पर केवल विचार करने की अपेक्षा इसके निर्माण के लिए एक ऐसी कार्य पद्धति को विकसित किया, जिसमें उस समाज के लिए देश भर में एक समान राष्ट्रीय भावना हो। इस तरह की भावना के लिए आवश्यक विशेषताओं का प्रारू प भी उनकी नजरों के सामने था।

एक कार्य पद्धति और कई जवाब-

समाज अपने जिन ग्ाुणों से अभिप्रेरित है, उसी के आधार पर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना और उसकी कार्य पद्धति की रचना की । इसके लिए वह इतिहास में नहीं गये, उनकी द़ृष्टि भविष्य की ओर थी। दैनिक शाखा, शिविर, संचलन और घोष ये सब इतिहास में नहीं मिलते। उन्हें ऐसे हिंदू की आकांक्षा थी जो नित्य अपने मन में विजयाकांक्षा संजोये रखे। कार्य पद्धति भले ही सेना की तरह हो, परन्तु निर्णय तानाशाही पद्धति से नहीं, बल्कि सर्वसम्मति से लेेने की परम्परा का निर्माण किया। उन्होंने हिंदू संगठन के लक्ष्य को सामने तो रखा, लेकिन कार्य पद्धतियों में किसी भी हिंदू धार्मिक क्रियाओं या उत्सवों को स्थान नहीं दिया। उन्होंने जिन विशेष ग्ाुणों का निर्माण किया उनमें उत्सवों की कार्य पद्धति का भी समावेश किया। उदाहरण के रूप में समर्पण की भावना को विकसित करने के लिए ग्ाुरु पूजन, एक-दूसरे की रक्षा की भावना को जागृत करने के लिए रक्षा बन्धन, समाज में विजय की आकांक्षा को जागृत करने के लिए विजय दशमी, परस्पर स्नेह भाव को जगाने के लिए मकर संक्रान्ति इत्यादि। शिवाजी महाराज के कार्यों को याद करने के लिए उन्होंने उनकी जयन्ती को नहीं, बल्कि उनके राज्याभिषेक के दिन को स्मरण किया। उन्होंने कहा कि सभी हिंदू एक-दूसरे के भाई हैं, जाति-पात जैसी विषमता निर्माण करने वाली बातों का समावेश नहीं किया। संघ की शाखा और कार्यक्रमों में सभी हिंदुओं को समान व्यासपीठ पर लाया गया। यहां उन्हें बन्धुत्व के संस्कार की अनुभूति हुई। संघ की स्थापना के समय यह एक अनूठी घटना थी। संघ की कार्य पद्धति की विशेषता यह है कि संघ में शामिल होने के लिए धन, शिक्षा या इस तरह के किसी विशेष ग्ाुण की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सामान्य से सामान्य मनुष्य, चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण या फिर किसी दुर्गम इलाके में रहने वाला हो, सहभागी हो सकता है। इसमें प्रत्येक व्यक्ति का स्थान है। हमारा देश एक मिला-जुला संगठन है, इस बात का अनुभव संघ की शाखा में जाकर किया जा सकता है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने अर्जुन को यह विश्वास दिलाया था कि ‘युद्ध में विजयी हुए तो पर पृथ्वी का राज्य मिलेगा और वीरगति को प्राप्त हुए तो स्वर्ग मिलेगा,’ परन्तु डॉ. हेडगेवारजी नेे सदैव लौकिक बातें ही की। उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया तो केवल राष्ट्रभक्ति के लिए न कि मरने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति के लिए। इसी आधार पर संघ के तत्व ज्ञान, प्रेरणा और कार्य पद्धति लौकिक और सेक्युलर रहे। जिस समय सार्वजनिक कार्यों के लिए स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण की आवश्यकता महसूस की गयी, उसी समय ‘संघ शिक्षा वर्ग’ की रचना की गयी। भविष्य को चीर कर आगे आने वाले समय को देखने की प्रतिभा भविष्यद्रष्टा में होती है। डॉ. हेडगेवार ने अपनी कार्य पद्धति में भाषा, जाति, प्रान्त जैसी पारम्परिक सीमाओं को लांघते हुए विचार करने वाला नया हिंदू देश भर में तैयार किया।

क्रान्तिकारी कार्य पद्धति-

कुछ हलके‡फुलके शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि जिस तरह औद्योगिक संस्कृति की यह विशेषता होती है कि उसमें पूरी दुनिया में समान गुण-धर्म वाले उत्पाद बनाये जाते हैं, उसी तरह संघ की शाखा समान गुण-धर्म वाले कार्यकर्ता निर्माण करने वाला कारखाना है, जिसे केवल भारत में ही नहीं, अपितु विदेशों में बसने वाले हिंदुओं के बीच भी शुरू किया गया। राष्ट्र समर्पण की प्रेरणा देश के लिए कोई भी काम, दुनिया के किसी भी हिस्से में जाकर कार्य प्रारम्भ करने की तैयारी, स्वयंं का ऐसा उत्कर्ष जिसमें राष्ट्रोन्नति निहित हो, स्वयं को भूल कर सामूहिक रूप से कार्य करने की पद्धति इत्यादि समान विशेषताओं के अलग‡अलग स्तर पर कार्य करने वाले लाखों कार्यकर्ता भारत और भारत के बाहर तैयार हुए। इन्हीं कार्यकर्ताओं ने आज देश भर के विविध भागों में कई अलग‡अलग प्रकल्प शुरू किये हैं।

इन प्रकल्पों से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इनसे सम्बन्धित सभी कार्यकर्ताओं के चेतन और अवचेतन मन पर जो प्रभाव पड़े हैं, उनसे एक व्यापक सामूहिक चेताना का विकास हुआ है जो कि संघ शक्ति से होने वाले परिवर्तन का मुख्य आधार है।

स्वतंत्रता के पश्चात का काल-

दूसरे महायुद्ध के बाद जिस तीव्रता से अन्तरराष्ट्रीय स्तर के समीकरण बदले, उससे भारत को स्वतंत्र करने का निर्णय इंग्लैण्ड को तुरन्त लेना पड़ा। तब तक देश में संघ कार्य फैल चुका था। स्वतंत्रता के पूर्व का घटनाक्रम इतना तीव्र था कि उसे प्रभावित करना केवल बीस वर्ष पुराने संघ के लिए नामुमकिन था। स्वतंत्रता के तुरन्त बाद महात्मा गांधी की हत्या कर दी गयी और उसके झूठे आरोप में फंसाकर संघ को खत्म करने का खेल रचा गया। इस संकट पर भी संघ ने विजय पायी और सामाजिक बहिष्कार का सामना करते हुए अपने गुणों के कारण समाज में मान्यता प्राप्त की। डॉ. हेडगेवार की नव-राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा से संघ ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से एक जाल बुना और अपना प्रभाव बढ़ाया। सन 1977 में जब आपात काल लगा तो ताउम्र संघ का विरोध करने वाले लोगों को और विभिन्न पक्षों को भी संघ का आधार लेकर आपात काल के खिलाफ लड़ना पड़ा। कांग्रेस ने हिंदू राष्ट्रवाद के बहाने मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति की। देश का विभाजन उसी राजनीति का परिणाम था। कांग्रेस की इस राजनीति का विरोध करने वाले और उसके परिणाम अर्थात विभाजन की ओर इशारा करने वाले हिंदुत्ववादी संस्थाओं पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाकर समाज से बहिष्कृत करने के कारण कांग्रेस को अपनी गलती की राजनैतिक कीमत नहीं चुकानी पड़ी।अत: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी कांग्रेस का नजरिया नहीं बदला। इसलिए हिंदू विषयक अभिमान मन में संजोने वाले लोगों को गुनहगार की नजर से देखा जाने लगा। परन्तु श्री राम जन्मभूमि आन्दोलन ने इस सोच को बदल दिया। प्रत्येक पक्ष आग्रह पूर्वक यह जताने लगा कि वह हिंदू है। जिस प्रकार आज यह कल्पना नहीं की जा सकती कि तीस वर्ष पूर्व टेलीफोन मिलने में कितनी कठिनाई होती थी, उसी तरह यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि श्री राम जन्मभूमि आन्दोलन ने हिंदुओं की मानसिकता में क्या परिवर्तन किया। इस आन्दोलन ने यह साबित कर दिया कि हिंदू अपने बलबूते पर राजनीति कर सकता है।

कांग्रेस ने अपने परिवारवाद, मुस्लिम अनुयायी और मूल्य-भ्रष्ट सत्ताकांक्षी विचारों के कारण लोगों का विश्वास गंवा दिया है। सांस्कृतिक परम्परा में अपने आन्दोलनों की जड़ें ढूंढ़ने में न तो कम्यूनिस्टों (अपवाद स्वरूप डांगे) और न ही समाजवादियों का (अपवाद स्वरूप लोहिया) विश्वास था। इसके कारण ये आन्दोलन सही मायने में कभी भी अखिल भारतीय नहीं हो पाये।

भविष्य के आह्वान-

डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रभक्ति के आधार पर जो कर्म चेतना जागृत की उसका स्वरूप सर्वव्यापी है। अनेक क्षेत्रों में इस आधार पर समाज पर प्रभाव डालने वाली संस्थाएं कार्यरत हैं। आज नक्सलवाद गम्भीर समस्या बन गयी है, परन्तु वनवासी क्षेत्रों में देश भर में संघ की प्रेरणा से हजारों कार्य किये जा रहे हैं। प्रादेशिक दलों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। ये पक्ष अपने संकुचित हितों के लिए सरकार को ऐसे निर्णय लेने के लिए बाध्य करते हैं, जो राष्ट्रहित में बाधक हैं। हिंदुओं के राजनीतिकरण के लिए लड़ने वाली हिंदू महासभा अब केवल नाम मात्र की रह गयी है। राम जन्मभूमि आन्दोलन के बाद कांग्रेस को एक सुस्थिर विकल्प भाजपा ने दिया। इसका कारण था, संघ ने राजनीति को राष्ट्र निर्माण का एक अंग माना। इसलिए अब, जब कांग्रेस या नेहरू‡ गांधी परिवार की मर्यादाएं स्पष्ट हो रही हैं तो न केवल भारत के वरन विदेशों के लोग भी विकल्प के रूप में मोदी की ओर देख रहे हैं। मोदी का व्यक्तित्व संघ की कार्य पद्धति के कारण ही निखरा है और केवल मोदी ही क्यों, मनोहर पर्रीकर, शिवराज सिंह चौहान, डॉ. रमण सिंह ने भी अपने‡अपने राज्यों में अपने कर्तृत्व की छाप छोड़ी है। भ्रष्टाचार, जातिवाद, अपराध, परिवारवाद और स्वार्थ ने राजनीति इतनी गन्दी कर दी है कि इस वातावरण में केवल अपना अस्तित्व बचाये रखना भी मुश्किल हो रहा है। भारतीय जनता पार्टी पर भी इसका परिणाम होना स्वाभाविक है। लगभग नब्बे साल के अपने प्रवास में संघ ने अनेक उतार‡चढ़ाव देखे, परन्तु डॉ. हेडगेवार की कर्म चेतना इतनी प्रभावपूर्ण और नव निर्मितीक्षम है कि प्रत्येक परीक्षा काल में उसने नये प्रवाहों के दरवाजे खोल दिये हैं।

प्रत्येक राष्ट्र का निर्माण और वृद्धि उस विशिष्ट समाज के सांस्कृतिक पर्यावरण से हुई है। अत: संघ के रोपे हुए बीज भारत के सांस्कृतिक पर्यावरण के सबसे यशस्वी बीज साबित हुए, अनुभवों के द्वारा यह सिद्ध भी हो गया है। महापुरुष वही होते हैं जिनक ी प्रेरणा की छाया आने वाली अनेक पीढ़ियों को स्फूर्ति देती है। इक्कीसवीं सदी में डॉ. हेडगेवार की निर्माण की हुई कर्म चेतना को अब ज्ञान साधना का साथ मिल गया है। अत: बीसवीं सदी में राष्ट्र निर्माण का यशस्वी प्रयोग करके भी उपेक्षित रहने वाले इस प्रतिभाशाली और क्रान्तिकारी महापुरुष को उसका उचित स्थान मिलेगा।

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