संन्यासी का संचार शास्त्र

स्वामी विवेकानंद ज्यादा बड़े संन्यासी थे या उससे बड़े संचारक (कम्युनिकेटर) या फिर उससे बड़े प्रबन्धक? ये सवाल हैरत में जरूर डालेगा पर उत्तर हैरत में डालने वाला नहीं है; क्योंकि वे एक नहीं, तीनों ही क्षेत्रों में शिखर पर हैं। वे एक अच्छे कम्युनिकेटर हैं, प्रबन्धक हैं और संन्यासी तो वे हैं ही। भगवा कपड़ों में लिपटा एक संन्यासी अगर युवाओं का रोल मॉडल बन जाये तो यह साधारण घटना नहीं है, किन्तु विवेकानंद के माध्यम से भारत और विश्व ने यह होते हुए देखा। आज के डेढ़ सौ साल पहले कोलकाता में जन्मे विवेकानंद और उनके विचार अगर आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं तो समय के पार देखने की उनकी क्षमता को महसूस कीजिए। एक बहुत छोटी सी जिन्दगी पाकर भी उन्होंने जो कर दिखाया, वह इस धरती पर तो चमत्कार सरीखा ही था। उनकी डेढ़ सौंवी जयन्ती वर्ष पर देश भर में हो रहे आयोजनों और उनमें युवाओं की उत्साह पूर्वक सहभागिता बताती है कि देश के नौजवान आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हैं और स्वामी विवेकानंद उनके वास्तविक हीरो हैं।

स्वामी विवेकानंद की बहुत छोटी जिन्दगी का पाठ बहुत बड़ा है। वे अपने समय के सवालों पर जिस प्रखरता से टिप्पणियां करते हैं, वे परम्परागत धार्मिक नेताओं से उन्हें अलग खड़ा कर देती हैं। वे समाज से भागे हुए संन्यासी नहीं हैं। वे समाज में रच बस कर उसके सामने खड़े प्रश्नों से मुठभेड़ का साहस दिखाते हैं। वे विश्व-मंच पर सही मायने में भारत, उसके आध्यात्म, पुरुषार्थ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को स्थापित करने वाले नायक हैं। वे एक गुलाम देश के नागरिक हैं पर उनकी आत्मा, वाणी और कृति स्वतन्त्र है। वे सोते हुए देश और उसके नौजवानों को झकझोर कर जगाते हैं और नवजागरण का सूत्रपात करते हैं। धर्म को वे जीवन से पलायन का रास्ता बनाने के बजाय राष्ट्र प्रेम, राष्ट्र के लोगोें से प्रेम और पूरी मानवता से प्रेम में बदल देते हैं। शायद इसीलिए वे कह पाये‡ ‘‘व्यावहारिक देशभक्ति सिर्फ एक भावना या मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है। देशभक्ति का अर्थ है अपने साथी देशवासियों की सेवा करने का जज्बा।’’
अपने जीवन, लेखन, व्याख्यानों में वे जिस प्रकार की परिपक्वतादिखाते हैं, पूर्णता दिखाते हैं, वह सीखने की चीज है। उनमें अप्रतिम नेतृत्व क्षमता, कुशल प्रबन्धन के गुर, परम्परा और आधुनिकता का तालमेल दीखता है। उनमें परम्परा का सौन्दर्य है और बदलते समय का स्वीकार भी है। वे आधुनिकता से भागते नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल करते हुए नये समय में संवाद को ज्यादा प्रभावकारी बना पाते हैं। स्वामी जी का लेखन और संवाद कला उन्हें अपने समय में ही नहीं, समय के पार भी एक नायक का दर्जा दिला देती है। आज के समय में जब संचार और प्रबन्धन की विधाएं एक अनुशासन के रूप में हमारे सामने हैं, तब हमें पता चलता है कि स्वामी जी ने कैसे अपने पूरे जीवन में इन दोनों विधाओं को साधने का काम किया। वह समय था; जब मीडिया का इतना कोलाहल न था, फिर भी छोटी आयु पाकर भी वे न सिर्फ भारत वरन दुनिया में भी जाने गये। अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाया और उनकी स्वीकृति पायी। क्या कम्युनिकेशन की ताकत और प्रबन्धन को समझे बिना उस दौर में यह सम्भव था?

स्वामी जी के व्यक्तित्व और उनकी पूरी देहभाषा को समझने पर उनमें प्रगतिशीलता के गुण नजर आते हैं। उनका आध्यात्म उन्हें कमजोर नहीं बनाता, बल्कि शक्ति देता है कि वे अपने समय के प्रश्नों पर बात कर सकें। उनका एक ही वाक्य ‘‘उठो! जागो! और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता।’’ उनकी संचार और संवाद कला के प्रभाव को स्थापित करने के लिए पर्याप्त है। यह वाक्य हर निराश व्यक्ति के लिए एक प्रभावकारी स्लोगन बन गया। इसे पढ़कर जाने कितने सोये, निराश, हताश युवाओं में जीवन के प्रति एक उत्साह पैदा हो जाता है। जोश और ऊर्जा का संचार होने लगता है। स्वामी जी ने अपने जीवन से भी हमें सिखाया। उनकी व्यवस्थित प्रस्तुति, साफा बांधने की शैली, जिसमें कुछ बाल बाहर झांकते हैं; बताती है कि उनमें एक सौन्दर्यबोध भी है। वे स्वयं को भी एक तेजस्वी युवा के रूप में प्रस्तुत करते हैं और उनके विचार भी उसी युवा चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शास्त्रीय प्रसंगों की भी ऐसी सरस व्याख्या करते हैं कि उनकी संचार कला स्वत: स्थापित हो जाती है। अपने कर्म, जीवन, लेखन, भाषण और सम्पूर्ण प्रस्तुति में उनका एक आदर्श प्रबन्धक और कम्युनिकेटर का स्वरूप प्रकट होता है। किस बात को किस समय और कितने जोर से कहना, यह उन्हें पता है। अमरीका के विश्व धर्म सम्मेलन में वे अपने सम्बोधन से ही लोगों को सम्मोहित कर लेते हैं। भारत राष्ट्र और उसके लोगों से उनका प्रेम उनके इस वाक्य से प्रकट होता है‡ ‘‘ आपको सिखाया गया है, अतिथि देवो भवः, पितृ देवो भवः, मातृ देवो भवः पर मैं आपसे कहता हूं, दरिद्र देवो भवः, अज्ञानी देवो भवः, मूर्ख देवो भवः।’’ यह बात बताती है कि कैसे वे अपनी संचार कला से लोगोंके बीच गरीब, असहाय और कमजोर लोगों के प्रति संवेदना का प्रसार करते नजर आते हैं। समाज के कमजोर लोगों को भगवान समझकर उनकी सेवा का भाव विवेकानंद जी ने लोगों के बीच भरना चाहा। वे साफ कहते हैं‡ ‘‘यदि तुम्हें भगवान की सेवा करनी हो तो, मनुष्य की सेवा करो। भगवान ही रोगी मनुष्य, दरिद्र पुरुष के रूप में हमारे सामने खड़ा है। वह नर वेश में नारायण है।’’ संचार की यह शक्ति कैसे धर्म को एक व्यापक सामाजिक सरोकारों से जोड़ देती है, यह स्वामी जी बताते हैं। सही मायने में विवेकानंद जी एक ऐसे युग पुरुष के रूप में सामने आते हैं जिनकी बातें आज के समय में ज्यादा प्रासंगिक हो गयी दीखती हैं। धर्म के सच्चे स्वरूप को स्थापित कर उन्होंने जड़ता को तोड़ने और नये भारत के निर्माण पर जोर दिया।

भारतीय समाज में आत्मविश्वास भरकर उन्हें हिंदुत्व के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान दिया, जिसमें सबका स्वीकार है और सभी विचारों का आदर करने का भाव है। इसलिए वे कहते थे, भारत का उदय अमराइयों से होगा। अमराइयों का मायने था, छोटी झोपड़ियां। वे भारतीय सन्दर्भ में सामाजिक न्याय के सबसे प्रखर प्रवक्ता हैं। वे दिखावटी संवेदना के खिलाफ थे और इसलिए स्वामी जी को जीवन मेंउतारना एक कठिन संकल्प है। आज जबकि कुपोषण, पर्यावरण के सवालों पर बात हो रही है, स्वामी जी इन मुद्दों पर बहुत सधी भाषा में अपनी बात कर चुके हैं। वे बेहतर स्वास्थ्य को एक नियामत मानते हैं। इसीलिए वे कह पाये कि गीता पढ़ने से अच्छा है, फुटबाल खेलो। एक स्वस्थ शरीर के बिना भारत सबल नहीं होगा, यह उनकी मान्यता थी। मात्र 39 साल की आयु में वे हमसे विदा हो गये किन्तु वे कितने मोर्चों पर कितनी बातें कह और कर गये हैं कि वे हमें आश्चर्य में डालती हैं। एक साधारण इंसान कैसेअपने आपको विवेकानंद के रूप में बदलता है, इसमें एक प्रेरणा भी है और प्रोत्साहन भी। आज की युवा शक्ति उनसे प्रेरणा ले सकती है। स्वामी विवेकानंद ने सही मायने में भारतीय समाज को एक आत्मविश्वास दिया, शक्ति दी और उसके महत्व का उसे पुनर्स्मरण कराया। सोते हुए भारत को उन्होंने झकझोर कर जगाया और अपने समूचे जीवन से सिखाया कि किस तरह भारतीयता को पूरे विश्व-मंच पर स्थापित किया जा सकता है। एक बेहतर कम्युनिकेटर, एक प्रबन्धन गुरु, एक आध्यात्मिक गुरु, वेदान्तों का भाष्य करने वाला संन्यासी, धार्मिकता और आधुनिकता को साधने वाला साधक, अन्तिम व्यक्ति की पीड़ा और उसके संघर्षों में उसके साथ खड़ा सेवक, देशप्रेमी, कुशल संगठनकर्ता, लेखक एवं सम्पादक, एक आदर्श शिष्य जैसी न जाने कितनी छवियां स्वामी विवेकानंद से जुड़ी हैं। किन्तु हर छवि में वे अव्वल नजर आते हैं। उनकी डेढ़ सौवीं जयन्ती का साल मनाते हुए देश में विवेकानंद के विचारों के साथ‡साथ जीवन में भी उनकी उपस्थिति बने, तो यही भारत मां के माथे पर सौभाग्य का टीका साबित होगा।

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