मुंबई के विकास में उत्तर भारतीय

मुंबई या यूं कहिये पूरे महाराष्ट्र से उत्तर भारतीयों का बहुत पुराना नाता है और इसके विकास में उनका महत्वपूर्ण और अनुपम योगदान है। भगवान श्री रामचंद्र ने अपने वनवास काल के एक साल का समय महाराष्ट्र के ही नासिक में बिताया था। यहां पर सुपर्णखा की नाक काटी गयी थी और खर-दूषण जैसे राक्षसों का राम ने वध किया था। यहां से लंकाधिपति रावण ने सीता का हरण किया था। राम और लक्ष्मण ने यहीं से माता सीता की खोज आरम्भ की थी।

यह बात त्रेता युग की है। इससे यह साबित होता है कि अनादिकाल से वीरों की इस भूमि से उत्तर भारतीयों का नाता रहा है।
अब आधुनिक युग को लीजिए। महाराज छत्रपति शिवाजी के दरबार में उत्तर प्रदेश के महाकवि भूषण ने महाराज का यशोगान किया था। वाराणसी के महापण्डित गागाभट्ट‡गंगाधर भट्ट ने मुहूर्त निकालकर शिवाजी महाराज को छत्रपति शिवाजी महाराज की उपाधि से विभूषित किया था।

इस प्रकार मुंबई‡महाराष्ट्र से उत्तर भारतीयों का बहुत पुराना नाता है। 16वीं शताब्दी के आरम्भ से मुंबई में उत्तर भारतीयों का आना तेज हो गया। पहले मुंबई में आने वाले उत्तर भारतीय लोग कोयला का व्यवसाय करते थे। उनका कोयला व्यवसाय पर एकाधिपत्य था।

उत्तर भारतीयों का दूसरे व्यवसाय- आटे की चक्की- पर भी पूरा अधिकार था। आज की तरह पिसा हुआ आटा नहीं बिकता था। लोग गेहूं आदि की पिसाई चक्की से कराते थे। गेहूं के डिब्बों की चक्कियों पर लाइन लगी रहती थी। आज चक्की का धंधा बहुत ही मंदा हो गया है।
तीसरा रोजगार दूध व्यवसाय का है। गुजराती मुसलमान चिलिया के साथ उत्तर भारतीयों का दूध व्यवसाय पर पूरा नियंत्रण था। मुंबई की मुख्य भूमि पर भी तबेले हुआ करते थे। उपनगरों में तो तबेलों की भरमार हुआ करती थी। दूध का व्यवसाय ऐसा था कि इसमें हर स्तर पर आदमियों की जरूरत पड़ती है। भैंसों को चारा देना। तबेले की सफाई करना। दूध की दुहाई और उसके बाद उसे गंतव्य तक पहुंचाने का काम होता था। इस काम में भारी संख्या में लोगों की जरूरत पड़ती थी। अब तो बहुत सारे तबेले मुंबई के बाहर निकाल दिये गए हैं। पहले तबेलों को आरे कालोनी ले आया गया। अब नाम मात्र के तबेले ही मुंबई उपनगरों में रह गये हैं। बाहर से दूध मंगाया जाता है और डेरियों के माध्यम से उसकी बिक्री की जाती है। अब इस व्यवसाय पर उत्तर भारतीयों का एकाधिकार नहीं रह गया है।

मुंबई के चना-कुरमुरा व्यवसाय पर भी उत्तर भारतीयों का अधिकार था। इसका प्राय: सारा व्यवसाय उत्तर भारतीयों के हाथ में था। इसकी काफी खपत होती थी और इस व्यवसाय में अच्छी खासी कमाई थी। इस समय इसकी छिटपुट दुकानें ही उत्तर भारतीयों के हाथ में हैं।
कपड़ा मिलों की चर्चा किये बिना उत्तर भारतीयों के जीवकोपार्जन की कहानी अधूरी रहेगी। मानव जीवन की रक्षा के लिए भोजन, कपड़ा, मकान ये तीन आरम्भिक जरूरतें हैं। भोजन के बाद दूसरी जरूरत कपड़े की है। मुंबई कपड़ा मिलों के लिए विश्व विख्यात था। यहां की करीब 80 कपड़ा मिलों की चिमनियों से 24 घंटे धुआं निकलता रहता था। ये कपड़ा मिलें प्राय: परेल, दादर, वर्ली, लोअर परेल क्षेत्र में थीं। इन मिलों का संचालन उत्तर भारतीय ही किया करते थे। उनके साथ महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों के लोग रहते थे। कपड़ा मिलों का संचालन बड़े ही परिश्रम का काम था। केवल उत्तर भारतीय और मराठी ही अपने श्रम के बल से इन मिलों का संचालन करते थे। मुंबई की अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ करने में कपड़ा मिलों का बहुत अधिक योगदान था। 1982 की हड़ताल ने कपड़ा मिलों का सत्यानाश कर दिया। मुंबई की बहुत बड़ी आमदनी का जरिया खिसक कर गुजरात के सूरत जैसे क्षेत्रों में चला गया। सेंचुरी मिल का सूती कपड़ा, खटाऊ की वायल, अब पुरानी कहानी हो गयी है। कपड़ा मिल के संचालन में उत्तर भारतीयों के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। इस समय तो कपड़ा मिलों की जगह पर बड़ी‡बड़ी अट्टालिकाएं खड़ी हो रही हैं। इंडस्ट्रियल इस्टेट बन गये हैं या बनने की प्रक्रिया में हैं।

वैश्विक विकास के साथ उत्तर भारतीयों ने मुंबई में आशातीत तरक्की की है। जीवन के हर क्षेत्र में उनके योगदान की जितनी अधिक सराहना की जाये, वह बहुत ही कम होगी। हर क्षेत्र में योगदान की उनकी कहानी इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में लिखी जानी चाहिए और भविष्य में लिखी भी जाएगी। देखते ही देखते उत्तर भारतीयों ने मुंबई का खाका ही बदल दिया है। अब वे किसी से किसी भी मायने में पीछे नहीं रह गये हैं। मुंबई के विकास के साथ उन्होंने अपना भी विकास किया है और प्रगति भी की है।

बात 1948 की है। भारत को स्वतंत्र हुए केवल एक साल हुए थे। जौनपुर जनपद के धनियामऊं गांव के निवासी पण्डित भोला नाथ मिश्र ने जहाज मरम्मत के अपने स्वप्न को साकार रूप दिया। उन्होंने रे रोड स्टेशन के पास जहाज मरम्मत का एक कारखाना स्थापित कर दिया। वह समय ऐसा था कि किसी उत्तर भारतीय के मन में कारखाना स्थापित करने का विचार नहीं था। भोला नाथ मिश्र भगवान भोले शंकर के परम उपासक थे। यही कारण था कि उन्होंने अपने प्रतिष्ठान का नाम मानकेश्वर रखा। कालांतर में इस प्रतिष्ठान ने वृहद रूप धारण किया और आज करीब इसकी पांच शाखाएं हो गयी हैं और बड़े‡बड़े जहाजों का मरम्मत कार्य मानकेश्वर के बैनर तले हो रहा है।

1968 में पण्डित भोला नाथ का निधन हो गया। मानकेश्वर के संचालन की जिम्मेदारी उनके पुत्र प्रेम शंकर मिश्र पर आ गयी। उन्होंने बखूबी कारखाने को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। उस जमाने में उत्तर भारतीयों के इने-गिने उद्योगपतियों में मानकेश्वर के मालिक की गणना की जाती थी। उन्होंने नारी शिक्षा के लिए अपने गांव में लड़कियों की स्कूल भी स्थापित की थी।

जिस विरवा (पौधे) को उन्होंने लगाया था, उसने आज एक विशाल वृक्ष का रूप धारण कर लिया है। उसके तले न जाने कितने लोगों को छांव मिल रही है। उनके पुत्र प्रेम शंकर मिश्र अपने पिता की स्मृति को चिर स्थायी करने के लिए अपने गांव में अपने पिता के नाम पर भोला नाथ मिश्र डिग्री कॉलेज का संचालन कर रहे हैं, जहां पर हजारों संख्या में छात्र‡छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

प्रेम शंकर मिश्र अपनी माटी के साथ ही अपनी कर्मभूमि मुंबई का भी विशेष रूप से ध्यान रखे हुए हैं। मुंबई के पास के कल्याण उप नगर के दो डिग्री कॉलेजों में वे ट्रस्टी हैं और उनके विकास में भी वे एक बड़ा योगदान कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपने गांव के कई व्यक्तियों को भी आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उनकी मदद से उनके गांव वालों ने जहाज मरम्मत के कई कारखानों की स्थापना कर ली और वे उसके माध्यम से अपनी सम्पन्नता में वृद्धि कर रहे हैं।

मुंबई के अंधेरी में अम्बिका दुबे का भैंस का बहुत बड़ा तबेला था। वे दूध के बहुत बड़े व्यवसायी थे। उनके छोटे भाई माता प्रसाद दुबे व्यवसाय के संचालन में अपने बड़े भाई की मदद करते थे। अब तो तबेला खत्म हो गया है और उस जगह पर दुबे परिवार ने भवनों का निर्माण कर लिया है। दुबे परिवार में ही माता प्रसाद के लड़के रमेश दुबे हैं। उन्होंने राजनीति में अपना नाम रोशन किया है। अनेक वर्षों तक वे मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन में पार्षद रहे हैं। दो बार वे महाराष्ट्र विधान सभा का चुनाव भी जीत चुके हैंऔर पांच वर्षों तक मंत्री का पदभार सम्भाल चुके हैं। उत्तर प्रदेश जाकर वे लोकसभा का चुनाव भी जीत चुके हैं। भदोही जिले के अपने गांव में उन्होंने एक बहुत अच्छे विद्यालय की स्थापना की है, जिसमें प्रवेश पाने में विद्यार्थियों में भारी ललक रहती है।

दुग्ध व्यवसाय की बात चल रही है तो यहीं पर शारदा प्रसाद शर्मा का जिक्र भी समयोजित होगा। माटुंगा में उनका दूध व्यवसाय काफी फल-फूल रहा था। गोरेगांव में इनका भैंस का बहुत बड़ा तबेला था। वहीं अब शर्मा इंडस्ट्रियल इस्टेट हो गया है। शिक्षा से शर्मा जी का अगाध प्रेम था। आरम्भ में वे नाइट स्कूल के संचालन में योगदान कर रहे थे। हाल ही में तो उन्होंने मालाड़ के एक विशाल क्षेत्र में शिक्षण संस्थान की स्थापना कर ली है, जिसमें छात्र‡ छात्राओं को बहुत अच्छी शिक्षा मिल रही हैं। डॉ. शारदा प्रसाद के शिक्षा क्षेत्र में योगदान को हमेशा याद किया जाता रहेगा।

कवि, लेखक, साहित्यकार, पत्रकार, राजनीतिज्ञ के रूप में डॉ. राम मनोहर त्रिपाठी का नाम चिर स्थायी रहेगा। पण्डित जी में अनेक गुण थे। वे मुंबई के जन-मानस, विशेष रूप से उत्तर भारतीयों‡ हिंदी भाषियों पर अपनी अमिट छाप छोड़ गये हैं।
अनेक वर्षों तक वे मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन के पार्षद रहे। विधान सभा चुनाव जीते। विधान परिषद सदस्य रहे। मंत्री बने, लेकिन कुर्ला स्टेशन के पास का आवास नहीं बदला। वे कई फ्लैट या बंगले के मालिक नहीं बन पाये। आज तो एक बार विधान सभा का चुनाव जीतने पर व्यक्ति न जाने कितने लाख का मालिक बन जाता है और उसके कई बंगले और फ्लैट हो जाते हैं। आखिर क्या बात डॉक्टर राम मनोहर त्रिपाठी में थी कि वे कुर्ला का अपना आवास नहीं बदल पाये। आखिर कोई तो विशेषता उनमें रही ही होगी। वह विशेषता उनकी ईमानदारी थी। जीवन में उनकी पवित्रता थी। उनका स्वाभिमान था, जिसने उन्हें किसी के सामने झुकने नहीं दिया। यदि वे किसी के सामने झुक जाते तो उन्हें बहुत सारा वैभव मिल जाता।

एक बार की बात है। स. का. पाटिल का जमाना था। कांग्रेस ने उन्हें म्युनिसिपल कारपोरेशन का चुनाव लड़ने का टिकट नहीं दिया। पण्डित जी के स्वाभिमान को धक्का लगा और उन्होंने इसे महसूस भी किया। फिर क्या था? उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना स्वीकार कर लिया। वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में कुर्ला से म्युनिसिपल चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतर पड़े। भला ऐसे व्यक्ति को कोई कैसे पराजित कर सकता था। भारी बहुमत से डॉ. राम मनोहर त्रिपाठी की विजय हुई। वे गीतों के यादगार गायक थे। उनका यह गीत आज भी लोग गुनगुनाते हैं‡ ‘आशीष का मूल्य होता बहुत है, देते नहीं लोग अंत:करण से’। वे कवि सम्मेलन के बहुत ही अच्छे संचालक थे और स्वयं मधुर गीतों के गायक भी। पण्डित जी ने अपने जीवन में किसी को भी धोखा नहीं दिया। एक बार उनके पास पहुंचने वाला व्यक्ति उनका हो जाता था और वे उसके हो जाते थे।

नवी मुंबई का नाम लीजिए तो तत्काल हरिवंश सिंह का नाम जुबान पर आ जाता है। यदि आप हरिवंश सिंह कहिए तो लोग तुरन्त नवी मुंबई कहने लगते हैं। दोनों शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची हो गये हैं। हरिवंश जी ने मुंबई आने पर सबसे पहले भवन निर्माण का कार्य आरम्भ किया। इस क्षेत्र में उनकी दिन-दूनी तो रात-चौगुनी वृद्धि होती गयी। इस समय उनकी गिनती सुविख्यात भवन निर्माताओं में की जाती है।
वे शिर्डी के साईं बाबा के भक्त है। साईं के नाम पर ही उन्होंने वाशी में साईनाथ हिंदी हाई स्कूल एण्ड जूनियर कॉलेज की स्थापना की है। उसी भवन में उनके एक महाविद्यालय का संचालन होता है, जिसमें अन्य विषयों के साथ कई रोजगारोन्मुख विषयों की पढ़ाई होती है।
मुंबई तो उनकी कर्मभूमि है, लेकिन इसके साथ ही वे उत्तर प्रदेश के जनपद जौनपुर की अपनी जन्मभूमि को नहीं भूले हैं। वहां पर भी उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सारा काम किया है। फार्मेसी जैसे कॉलेज की स्थापना की है। उनके पुत्र रमेश सिंह तो अब पिता हरिवंश सिंह की विरासत को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। वे इस समय जौनपुर जनपद के खुटहन के ब्लाक प्रमुख हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव से हरिवंश सिंह के नजदीकी सम्बन्ध हैं।

भायंदर में रहने वाले लल्लन तिवारी ने आरम्भ में भवन निर्माण क्षेत्र में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसमें आगे बढ़ने के साथ ही उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में भी काम करना आरम्भ किया। शिक्षा क्षेत्र में उन्होंने शिक्षण संस्थाओं का जाल बिछा दिया। इस समय उनके पास अंग्रेजी माध्यम, हिंदी माध्यम के अनेक विद्यालय हो गये। विद्यालयों की स्थापना के बाद उन्होंने महाविद्यालय की स्थापना की दिशा में कदम बढ़ाया और नियमित विषयों के महाविद्यालय की स्थापना के बाद इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना कर दी। इस समय उनके विद्यालय, महाविद्यालय नामचीन शिक्षण संस्थाओं में गिने जाते हैं। किसी प्रकार का अभाव नहीं हैं, इसलिए आवश्यक शिक्षण सामग्री उनके स्कूलों और कॉलेजों में प्रचुर मात्रा में है। उनके इस कार्य मैं उनके पुत्र राहुल तिवारी बखूबी हाथ बढ़ा रहे हैं।

कल्याण में पण्डित राम उजागर तिवारी का बड़ा नाम है। सर्व प्रथम उन्होंने भवन निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा और अनेक भवनों का निर्माण किया। कोलसेवाड़ी क्षेत्र में उन्होंने साकेत के नाम से बंगला बनवाया और यहां सपरिवार निवास करने लगे। एक समय था, जब कल्याण के कोलसेवाड़ी क्षेत्र में जाने पर केवल साकेत बंगला ही दिखाई पड़ता था। आसपास की पूरी जमीन खाली पड़ी थी। साकेत बंगला क्षेत्र का लैण्ड मार्क हो गया था।

पण्डित राम उजागर तिवारी आरम्भ से शिक्षा प्रेमी रहे हैं। प्रयाग विश्वविद्यालय से उन्होंने एम. ए. तक की पढ़ाई की है। इसके पहले ही वे साहित्य रत्न की उपाधि धारण कर चुके हैं। इसी शिक्षा प्रेम ने पण्डित राम उजागर तिवारी को शिक्षा की ओर प्रेरित किया और साकेत बंगले के साथ साकेत नाम के शिक्षा संस्थान की स्थापना की। साकेत‡अयोध्या का अशीर्वाद तिवारी जी को मिला।

पण्डित राम उजागर तिवारी ने अपने जन्म स्थान पर लेदुका इण्टर कॉलेज के उत्थान में काफी योगदान किया है। धार्मिक प्रवृत्ति के पण्डित राम उजागर तिवारी ने मुंबई की अनेक संस्थाओं को दान देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

कृपाशंकर सिंह उत्तर भारतीयों के मानस पटल पर छाये हुए हैं। राजनीतिक क्षेत्र में उनका सभी लोहा मानते हैं। सर्वप्रथम वे महाराष्ट्र कांग्रेस के महामंत्री बने। इसके बाद महाराष्ट्र विधान परिषद के लिए चुने गये। पहली बार वे महाराष्ट्र विधान सभा का चुनाव लड़े और उन्हें भारी बहुमत से विजयी घोषित किया गया और उन्हें गृह राज्यमंत्री बना दिया गया। दूसरी बार भी वे महाराष्ट्र विधान सभा के चुनाव में मैदान में उतरे और इस बार भी वे भारी बहुमत से विजयी घोषित किये गए।

इसके बाद वे मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। उनके मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यकाल में लोकसभा का चुनाव हुआ और उनके नेतृत्व में मुंबई की सभी सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों ने विजय वरण किया। प्रोफेसर जावेद खान ने भी उत्तर भारतीयों में अपनी सफलता का झण्डा फहराया है। उनके नेतृत्व में अनेक शिक्षण संस्थाओं का बड़ी ही सफलता के साथ संचालन हुआ है। वे महाराष्ट्र में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। सिडको के अध्यक्ष पद को भी उन्होंने सुशोभित किया है। सानपाड़ा, वाशी और मुंबई में उनके ओरिएन्टल एजुकेशन ट्रस्ट के बैनर तले कई शिक्षण संस्थानों का संचालन हो रहा है। महाराष्ट्र में शिक्षा के क्षेत्र में उनका असीमित योगदान है।

नसीम खान इस समय महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री हैं। उत्तर भारतीय समाज में उनका बड़ा नाम और सम्मान है।
उत्तर भारतीयों की बात हो तो भला कुमार बिहारी पाण्डेय का नाम लिए बिना कैसे रहा जा सकता है। उद्योग क्षेत्र में मुंबई में उन्होंने जिस कामयाबी का ध्वज फहराया है, उसका सर्वत्र स्वागत किया जा रहा है। कुमार बिहारी पाण्डेय अपने व्यवसाय में अग्रदूत हैं। उनकी इंजीनियरिंग कला का बड़े‡बड़े इंजीनियर लोहा मानते हैं। वसई में उनका कारखाना सफलता के उच्च शिखर पर पहुंचा है।
उद्योग के साथ वे अच्छे लेखक भी हैं। उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मां नारायणी के वे परम भक्त हैं और गोकुल धाम में नारायणी बंगले में रहते हैं। उनकी कामयाबी का मूल मंत्र कठिन श्रम और ईमानदारी है।

उत्तर भारतीयों की चर्चा हो तो चिर युवक चित्रसेन सिंह का जिक्र किये बिना नहीं रहा जा सकता है। कठिन लगन का परिणाम है कि उन्होंने पेट्रोलियम व्यवसाय में आशातीत सफलता प्राप्त की है। मुंबई कांग्रेस के वे महामंत्री हैं और इस पद पर बहुत पहले से विराजमान हैं। उनके पुत्र दीपक सिंह बड़ी ही कुशलता से अपना व्यवसाय सम्भाल रहे हैं।

नवी मुंबई के वाशी में पेट्रोलियम का व्यवसाय करने वाले मेजर एस. पी. सिंह (संकठा प्रसाद सिंह) का हाल में निधन हो गया है। वे बड़े ही स्पष्ट वक्ता थे। इसके साथ ही वे बड़े दयालु व्यक्ति थे। वे गरीबों और जरूरतमंदों की भरपूर मदद करते थे, लेकिन किसी को मालूम नहीं पड़ पाता था कि वे किसकी और क्यों मदद कर रहे हैं।

उनके पिता का मुंबई में दुग्ध व्यवसाय था। मुंबई के उत्तर भारतीयों की कोई भी पंचायत उनके बिना निपट नहीं पाती थी। वे स्पष्टवादी थे। बिना किसी दबाव या लगाव के वे पंचायत में अपना फैसला सुनाते थे। मेजर एस. पी. सिंह के भाई भी अपने बड़े भाई की परम्परा को आगे बढ़ाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। मेजर एस. पी. सिंह ने जौनपुर स्थित अपने गांव में लड़कियों के लिए एक महाविद्यालय की स्थापना की है, जो उनका जीवंत स्मारक है।

डॉ. राजेन्द्र सिंह ने समाज सेवा के क्षेत्र में बहुत कार्य किया है। उनके नेतृत्व में घाटकोपर में हिंदी हाई स्कूल और एक महाविद्यालय का संचालन हो रहा है। दोनों शिक्षा संस्थाओं का बड़ा नाम है।

कल्याण में विजय पण्डित का बहुत बड़ा व्यवसाय है। उनकी देखरेख में अग्रवाल कॉलेज और सोनावणे कॉलेज का संचालन किया जा रहा है।
वी. के. सिंह मुंबई के उत्तर भारतीयों में अग्रणी नाम है। इन्होंने कांदिवली पूर्व का कायापलट ही कर दिया है। 19 वीं शताब्दी के सातवें दशक तक कांदिवली पूर्व सूनसान इलाका था। वी. के. सिंह के नेतृत्व में यहां निर्माण कार्य आरम्भ हुआ और होता ही चला गया। अब तक ठाकुर कॉम्प्लेक्स और ठाकुर विलेज नाम से दो नगर बस गये हैं।

उन्होंने यहां शिक्षण संस्थाओं का जाल बिछा दिया है। पहले ठाकुर विद्या मन्दिर, फिर ठाकुर डिग्री कॉलेज इसके बाद पॉलिटेक्निक और फिर ठाकुर इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की गयी। इन शिक्षा संस्थाओं का देश के साथ ही विदेशों भी नाम है। इनके चचेरे भाई रमेश सिंह महाराष्ट्र विधान सभा और भतीजे मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन के सदस्य हैं।

आर. एन. सिंह का बड़ा नाम है। सुरक्षा गार्ड व्यवसाय में उनका कोई मुकाबला ही नहीं कर सकता है। सबसे बड़ा काम उन्होंने उत्तर भारतीय संघ के भवन का निर्माण करके किया है। उनकी अध्यक्षता में बांद्रा के पूर्व में बना उत्तर भारतीय संघ का भवन उत्तर भारतीयों के गौरव का प्रतीक है। वे हिंदी दैनिक ‘हमारा महानगर’ के मालिक हैं। संघ भवन में महाविद्यालय का संचालन किया जा रहा है, जिसमें गरीब, जरूरतमंद छात्रों को प्रवेश एवं सुविधा मिल रही है। उन्होंने गोरखपुर के अपने गांव के विकास में बड़ी भूमिका अदा की है। इनके नेतृत्व में वहां महाविद्यालय का संचालन किया जा रहा है।

मुंबई के विकास में उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों के विशिष्ट महानुभावों ने अपना योगदान दिया है। चूंकि यह लेख केवल उत्तर प्रदेश से जुड़ा है इसलिए उत्तर भारत के अन्य राज्यों या क्षेत्रों के महानुभावों का इसमें जिक्र नहीं है। इसी कारण उत्तर प्रदेश का विभाजन कर नए बने राज्य उत्तराखंड के पं. नंदकिशोर नौटियाल जैसे श्रेष्ठ पत्रकार और अन्य का इसमें विवरण समाविष्ट नहीं कर पाया।
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