उत्तर प्रदेश में संघकार्य

सच पूछा जाए, तो उत्तर प्रदेश में संघकार्य का शुभारंभ मा. भाऊराव देवरसजी के बहुत पहले याने सन 1931 में ही हो चुका था। वीर सावरकर के बड़ेे भाई श्री बाबाराव सावरकर से डॉ. हेडगेवार के बड़े घनिष्ठ संबंध थे। वे डॅा. साहब से सदैव इस बात का आग्रह करते थे कि, देश के विभिन्न भागोंमें संघ की शाखाएं प्रारंभ कर संघ के कार्य का शीघ्र विस्तार करना चाहिए। काशी में तब भाऊराव दामले नामक एक हिन्दुत्वनिष्ठ विद्वान रहते थे। वे नागपुर के कार्य से परिचित थे।

भाऊराव दामले तथा बाबाराव के आग्रह तथा प्रयत्नों के कारण डॅा.साहब ने उत्तर प्रदेश की पहली शाखा काशी नगर में प्रारंम्भ की। यह शाखा ब्रम्हाघाट – दुर्गाघाट के पास स्थित धनधान्येश्वर मंदिर में शुरू की गई थी।

उन दिनों पं. मदन मोहन मालवीय जैसे महर्षि काशी हिंदू‡विश्वविद्यालय से जुड़े होने के कारण तरुण विद्यार्थी देश के सब भागों से उसमें शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी आते थे। उस समय मा. भय्याजी दाणी भी शिक्षा ग्रहण करने काशी विश्वविद्यालय में थे। विश्वविद्यालय शाखा का प्रारम्भ करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। उन्हींके प्रयत्नों से पू. गोलवलकर गुरुजी का संघ से संबध जुड़ा।

काशी की तीसरी शाखा भी मा. भाऊराव के उत्तर प्रदेश में पहुंंचने के पहले प्रारम्भ हुई थी। नागपुर के श्री बाबासाहब घटाटे का काशी के गोदौलिया में एक पुरातन राम मंदिर है। श्री बाबासाहब ने 1933 में नागपुर के श्री अण्णाजी वैद्य को इस मंदिर का व्यवस्थापक नियुक्त किया था। यह नियुक्ति डॉ. साहब की योजना के अनुसार की गई थी। श्री अण्णाजी वैद्य के सुपुत्र श्री वसंत वैद्य भी उनके साथ काशी गये थे। वसंतजी संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक थे। उन्होंने विश्वविद्यालय शाखा के स्वयंसेवक श्री तात्या लोखंडे की सहायता से काशी नगर के मध्य भाग में स्थित सनातन धर्म हाईस्कूल में काशी की तीसरी शाखा प्रारम्भ की। सन 1940 में श्री भाऊराव दामले इस शाखा के संघचालक थे।

काशी शाखा का वृत्त संक्षेप में देते समय वहां के विख्यात देशमुख परिवार का विशेष रूप से निर्देश करना आवश्यक है। इस परिवार ने संघकार्य के लिए तीन प्रचारक दिये – माधवराव देशमुख, केशवराव देशमुख और यादवराव देशमुख। माधवराव देशमुख ने उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर, जौनपुर तथा अन्य स्थानों में संघ का कार्य किया।

सन 1943 में काशी मा. भाऊराव का केंद्रस्थान बना। वे गोदौलिया में रहते थे और काशी में काफी समय बिताते थे। काशी विश्वविद्यालय शाखा की ओर उनका विशेष ध्यान रहता था। उन्होंंने विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करनेवाले विद्यार्थियों का एक ऐसा गुट बनाया, जो संघकार्य के लिए कहीं भी जाने तत्पर रहता था। सन 1946-47 में लगभग 70 विद्यार्थी प्रचारक के नाते संघ का काम करने निकल पड़े। इसी कारण बहुत ही थोड़े समय में संघ का कार्य उत्तर प्रदेश के हर जिले में पहुंचा। मा. भाऊराव की लोकसंग्रह करने में कुशलता, कार्यकर्ता की सही परख तथा कार्यकर्ता के प्रति असीम आत्मीयता आदि गुणों के कारण ही यह हो सका।

ग्वालियर शाखा

ग्वालियर शाखा सन 1938 के आसपास प्रारम्भ हुई थी। यह शाखा आरंभ मेंसीधे नागपुर के अतंर्गत थी। पर बाद में उसे उत्तर प्रदेश से जोड़ा गया। मा. भाऊराव देवरस के उत्तर प्रदेश में जाने के बाद ग्वालियर समेत मध्य प्रदेश के चार जिले उत्तर प्रदेश से जोड़े गये। परंतु पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 12 जिलों को दिल्ली प्रांत से जोड़ा गया। दिल्ली प्रांत का काम मा. वसंतराव ओक की देखरेख में होता था।
नागपुर के शारीरिक शिक्षा वर्ग के समापन के बाद मा. नारायणराव तर्टे डॉ. साहब के आशीर्वाद लेकर ग्वालियर जाने निकले। आशीर्वाद देते समय डॉ. साहब ने दो अनमोल वस्तुएं उन्हें दीं -अपने हाथ से लिखा हुआ संघ की प्रतिज्ञा का कागज और ‘गीतारहस्य’ की वह पुस्तक, जो डॉ. साहब स्वयं हर रोज प़ढ़ा करते थे।

अकोला-इंदौर होते हुए श्री तर्टेजी सन 1938 के जून-जुलाई में ग्वालियर पहुंचे। शीघ्र ही उन्हें स्टेशन के पास ‘श्रीकृष्ण धर्मशाला’ मिल गई। परंतु धर्मशाला के नियमानुसार वहां केवल तीन दिनों तक रहने की व्यवस्था हो सकती थी। बाद में धर्मशाला बदली, लेकिन वहां भी तीन दिनों का ही नियम होने के कारण हर तीन दिनों बाद धर्मशालाएं बदलते हुए एक महीना उन्होंंने बिताया।

अब संघकार्य शुरू करने किसी सुयोग्य कार्यकर्ता को खोजने के लिए तर्टेजी ने एक अनोखा मार्ग ढूंढा। वे हर रोज स्कूल-कॉलेज जानेवाले मार्ग पर घंटों खड़े रह कर वहां से आने जाने वाले प्रत्येक विद्यार्थी का बड़ी बारीकी से निरीक्षण किया करते थे। इन विद्यार्थियों में से उन्हें किसी ऐसे चेहरे की खोज करनी थी, जो उनकी दृष्टि से संघ कार्य सुचारू रूप से करने के योग्य लगे। कई दिनों तक उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। आखिर एक दिन उन्हें कॉलेज से लौटनेवाला एक विद्यार्थी मिला। वह विद्यार्थी आपटे की पागा मुहल्ले का रहनेवाला था। वह अपने घर में प्रवेश कर ही रहा था कि तर्टेजी ने पीछे से उसे पुकारा। उस विद्यार्थी का नाम था दत्तात्रय त्र्यंबक कल्याणकर।

कल्याणकर परिवार के माध्यम से तर्टेजी का अनेक लोगों से परिचय हुआ। उसके परिणामस्वरूप जनकगंज में पोतनीस धर्मशाला में उनके रहने की अच्छी व्यवस्था हो गई। उस बड़ी धर्मशाला में वे अकेले ही रहते थे। दोपहर के समय वहां कोई पाठशाला अथवा वर्ग चलता था। तर्टेजी का तरुण लोगों से संबंध बढ़ने लगा। वे उन्हें संघ का ध्येय, कार्यपद्धति आदि क ी जानकारी देते। उनसे इस संबंध में बातचीत – विचार विनिमयहोता था। पोतनीस धर्मशाला में साप्ताहिक बैठक अथवा एकत्रीकरण हो ऐसा निश्चय हुआ और शीघ्र ही उसे कार्यान्वित भी किया गया। उसी को आगे चल कर दैनंदिन शाखा का रूप देने का प्रयत्न किया गया।

इस बीच साप्ताहिक एकीकरण में आनेवाले स्वयंसेवकों की संख्या बहुत बढ़ गई। इस कारण एकत्रीकरण का स्थान पोतनीस बाड़े से बदलकर लक्ष्मीगंज अख़ाड़ा करना पड़ा। अखाड़े के व्यवस्थापकों ने इसके लिए सहर्ष अनुमति दी।

लक्ष्मीगंज की शाखा ग्वालियर की पहली तथा मुख्य शाखा थी। वहां के स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ने लगी और वहा दंड आदि सब कार्यक्रम व्यवस्थित रूप से होने लगे। इस शाखा के प्रारम्भ होने के कुछ दिनों बाद नया बाजार, छत्री बाजार, आंग्रे का बाड़ा, शिंदे की छावनी, ग्वालियर तथा मुरार में भी शाखाएं शुरू हुईं। उन दिनों ग्वालियर की सभी शाखाओं में खड्ग, छुरिका आदि चलाने की शिक्षा देने के लिए सचमुच की तलवारों तथा छूरियों का प्रयोग होता था। इस प्रकार सचमुच के शस्त्रों की शिक्षा प्रदान करनेवाली ग्वालियर की शाखा शायद भारत की एकमात्र शाखा रही होगी।

हिंदी भाषा लोगों को संघ में आने के लिए प्रेरित करने के तर्टेजी ने विशेष प्रयत्न किये। उन्हें इस काम में नया बाजार आर्य समाज में रहनेवाले श्री भूदेव शास्त्री नामक एक तरुण विद्वान कार्यकर्ता से बड़ा सहयोग मिला। तर्टेजी के कारण उन्हें भी संघकार्य करने की प्रेरणा मिली और वे स्वयंसेवक बने। वे स्वयं शाखा में आने लगे तथा अपने साथ औरों को भी संघ में आने की लिए प्रेरित करने लगे। उनके प्रयत्नों के कारण ही देश के पूर्व प्रधानमंत्री मा. अटलबिहारी वाजपेयी संघ के संपर्क में आये।

अटलजी के पिताजी श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी के कट्टर आर्यसमाजी होने के कारण अटलजी भी शालेय विद्यार्थी अवस्था से ही आर्य समाज में और विशेष तौर पर आर्यकुमार शाखा में नियमित रूप से जाते थे।

श्री भूदेवजी ने उन्हें उनके घर के पास ही चलनेवाली एक शाखा का पता बताया। यह शाखा लक्ष्मीगंज राम मंदिर के पासवाले मैदान में लगती थी। लक्ष्मीगंज में मराठी और हिंदी भाषी लोगों की मिश्रित बस्ती थी। उन लोगों को शाखा पर खेले जानेवाले खेल तथा साप्ताहिक बौद्धिक ये दोनों बाते अच्छी लगीं और वे सब शाखा में नियमित रूप से जाने लगे। सन 1939-40 तक अटलजी उनके ब़ड़े भाई श्री अवधेश बिहारी तथा अन्य अनेक हिंदी भाषी युवक गणेशधारी स्वयंसेवक बन गये थे।

सन 1939 में ग्वालियर शाखा के स्वयंसेवकों की पहली टुकड़ी संघशिक्षा वर्ग में भाग लेने के लिए नागपुर गई थी। सन 1940 में भी ग्वालियर के अनेक स्वयंसेवक नागपुर गये थे।

श्री अटलजी को डॉ. साहब का वह ह्रदयस्पर्शी भाषण सुनने का सौभाग्य मिला था। वे उस वर्ग में शिक्षार्थी के नाते गये न थे परंतु वर्ग के समापन समारोह के कार्यक्रम मेंअटलजी उपस्थित थे। यह उनकी तथा डॉ. हेडगेवार की पहली और अंतिम भेंट थी। डॉ. साहब उस समय मृत्युशय्या पर थे। अटलजी के अंत:पटल पर उनकी एकमात्र भेंट की छाप सदैव के लिए अंकित हो गई। अटलजी ने सन 1941 में नागपुर से संघशिक्षा वर्ग का प्रथम वर्ष पूरा किया। इसी वर्ग में उन्होंने अपनी प्रसिध्द कविता ‘हिदू तनमन, हिंदू जीवन। रग रग में हिंदू मेरा परिचय।’ पहली बार सुनाई थी।

सन 1948 में संघ पर पहला प्रतिबंध लगने तक ग्वालियर विभाग उत्तर प्रदेश से संलग्न था। बाद में उसे मध्य प्रदेश जोड़ा गया। श्री तर्टेजी को सन 1943 के अंत में अथवा 1944 के प्रारम्भ में ग्वालियर छोड़ना पड़ा। उनकी नियुक्ती संघकार्य के लिए उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में की गई थी। उनके स्थान पर ग्वालियर में मा. भैय्याजी सहस्त्रबुध्दे की नियिुक्त की गई थी।

झांसी शाखा

झांसी शाखा सन 1938-39 के लगभग प्रारम्भ हुई थी। इस शाखा का प्रारम्भ करने में टिमरनी के सरदार मा. भाऊसाहब भुस्कुटे का महत्वपूर्ण योगदान था। झांसी की पहली शाखा पचकुइयां मुहल्ले की गौशाला में लगती थी। झांसी की शाखा प्रारम्भ करने में ग्वालियर के श्री दत्तात्रय कल्याणकर की भी प्रेरणा थी। वे झांसी की शाखा पर ध्यान रखने के लिए समय – समय पर ग्वालियर से आते थे। उसके अतिरिक्त सागर के श्री विठ्ठल ओगदे भी शाखा के दैनंदिन कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से सहभागी होते थे। सन 1940 के फरवरी-मार्च में डॉ. हेडगेवार की योजनानुसार मा. यादवराव जोशी की विस्तारक के नाते झांसी में नियुक्ति हुई।

उसी समय सिप्री बाजार में दूसरी शाखा प्रारम्भ हुई। इस शाखा के मुख्य शिक्षक श्री बापूराव ढमढेरे थे। बापूराव ढमढेरे जी के पिताजी दादासाहब ढमढेरे की झांसी की दूसरी शाखा प्रारम्भ करने में विशेष प्रेरणा थी। सन 1941 के लगभग श्री बालासाहब सकदेव को झांसी का प्रचारक नियुक्त किया गया। वे सन 1947 तक झांसी मेंथे। बाद में झांसी तथा आसपास के भागों में संघकार्य का विस्तार होता रहा।

कानपुर शाखा

कानपुर शाखा सन 1938 के आसपास शुरू हुई होगी। कानपुर की शाखा विदर्भ से शिक्षा के लिए आये स्वयंसेवकों ने ही प्रारम्भ की थी। यह शाखा नवाबगंज बस्ती में थी। इन स्वयंसेवकों में सर्वश्री मदनलाल संचेती, भाऊ जुगादे, बाबा सोनटक्के , अण्णा केदार आदि प्रमुख थे। उस समय इंदौर के बापू महाशब्दे तथा मुबंई के वसंतराव दीक्षित भी कानपुर में ही थे।

सन 1937 में प. दीनदयाल उपाध्याय बी.ए. की पढ़ाई के लिए कानपुर आये। वे मेधावी छात्र थे। ऐसे बुद्धिमान तथा होनहार तरुणों की ओर मा. भाऊराव का सदैव ध्यान रहता था। उन्होंने दीनदयालजी से संपर्क प्रस्थापित किया और उन्हें संघ से परिचित कराया।

लगभग उसी समय श्री सुंदरसिंह भंडारी भी पढ़ाई के निमित्त कानपुर आये थे। इस तरह कानपुर की शाखा में हिंदी भाषी स्वयंसेवकों की संख्या धीरे‡धीरे बढ़ने लगी। कानपुर शाखा को ध्वज प्रदान करने का कार्यक्रमवेदमूर्ति पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर के हाथों किया गया था। उस अवसर पर उनका पं. दीनदयालजी से परिचय हुआ। तभी उन्होंने यह भविष्यवाणी की थी कि, एक दिन यह मेधावी युवक सारे देश के लिए गौरवस्पद होगा। दीनदयालजी कानपुर शाखा के पहले प्रतिज्ञित स्वयंसेवक बने। सन 1942 मेंवे प्रचारक हुए। उत्तर प्रदेश से संघकार्य के लिए निकलने वाले पहले प्रचारक का सम्मान पं. दीनदयालजी का ही है। उन्हेंलखीमपुर जिले का प्रचारक नियुक्त किया गया। सन 1947 में वे उत्तर प्रदेश के सहप्रांत प्रचारक हुए। तब उनका केंद्रस्थान तथा निवास लखनऊ में हुआ करता था। लखनऊ में रहकर पं. दीनदयालजी ने वहां से प्रकाशित होनेवाली मासिक पत्रिका – राष्ट्रधर्म, साप्ताहिक – पाञ्चजन्य तथा दैनिक स्वदेश के प्रकाशन का यशस्वी मार्गदर्शन किया।

सन1942 में मा. अनंतराव गोखले नगर प्रचारक के नाते कानपुर आये। कानपुर शाखा के विस्तार का सारा श्रेय श्री गोखलेजी को ही देना होगा। उत्तर प्रदेश के प्रांत संघचालक स्व. बैरिस्टर नरेंद्रजीत सिंहजी का संघ से संबंध गोखलेजी द्वारा ही प्रस्थापित हुआ। सन 1944 के मकर संक्रांति के उत्सव के अवसर पर बै. नरेंद्रजीत सिंह अध्यक्ष थे। उन्हें सन 1945 में विभाग संघचालक तथा सन 1947 में प्रांत संघचालक नियुक्त किये जाने की घोषणा पू. गुरुजी ने की। सन 1993 में बैरिस्टर नरेंद्रजीत सिंहजी का देहावसान हुआ।

लखनऊ शाखा

उत्तर प्रदेश में संघकार्य का विस्तार करने के लिए डॉ. हेडगेवार ने मा. भाऊराव देवरस को भेजा था। उनकी यह योजना कितनी सफल रही, यह भाऊराव के वहां किये गये विशाल कार्य से सिद्ध होता है। मा. भाऊराव देवरस तथा मा. वसंतराव ओक एक ही गाड़ी से नागपुर से चले थे। झांसी स्टेशन पर भाऊराव लखनऊ जानेवाली गाड़ी में बैठे और वसंतराव उसी गाड़ी से दिल्ली चले गये।

लगभग उसी समय मा. बापूराव मोघे काशी विश्वविद्यालय से बी.एस्सी. करने के बाद एम्.एस्सी. करने की इच्छा से लखनऊ आये थे। वे दोनों नागपुर से ही एक दूसरे को जानते थे। अब लखनऊ में वे दोनों एकसाथ रहकर वहां संघ की शाखा आरंभ करने का प्रयास करने लगे।
अपने स्नेहभरे स्वभाव तथा प्रखर प्रतिभा के कारण भाऊरावजी ने विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा और उसमें विजयी हुए। सन 1938 में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को विश्वविद्यालय के छात्रों के समक्ष भाषण देने आमंत्रित किया। नेताजी ने भी भाऊराव का आमंत्रण स्वीकार किया। भाऊराव की अध्यक्षता में ही नेताजी के भाषण का कार्यक्रम संपन्न हुआ।

लखनऊ की पहली शाखा सन 1938 में कानपुर की शाखा शुरू होने के बाद प्रारम्भ हुई। लखनऊ की शाखा भाऊराव के प्रयत्नों का ही फल है।
उस वर्ष उसी संघस्थान पर मा. दादाराव परमार्थ के अत्यंत ओजस्वी भाषण का एक कार्यक्रम भी हुआ। श्री अयोध्या प्रसाद सिंह, वकील उस शाखा के कार्यवाह और श्री श्रीराम, वकील मुख्य शिक्षक नियुक्त हुए। आगे चलकर श्री तेजनारायणजी लखनऊ के संघचालक नियुक्त किये गये।

कुंड्री शाखा को ही लखनऊ की पहली शाखा कहना चाहिए। कुंड्री शाखा के बाद शीघ्र ही गणेशगंज की प्रभात शाखा शुरू हुई और उसके साथ-साथ वहां सायं शाखा भी प्रारम्भ हुई। थोड़े ही समय बाद आर्यनगर की प्रभात शाखा शुरू हुई। लखनऊ के अन्य मुहल्लों में भी धीरेधीरे नई शाखाएं खुलने लगीं।

सीतापुर शाखा

सीतापुर शाखा सन 1939-40 के आसपास शुरू हुई होगी। काशी के एक स्वयंसेवक श्री नारायण कृष्ण पावगी का सीतापुर में एक प्रेस था। पावगीजी के दो और भाई भी प्रेस का काम सम्हालते थे। उनका भी संघ से संबंध था। श्री पावगी सीतापुर में संघ की शाखा प्रारम्भ करने का प्रयास बहुत दिनो ं से कर रहे थे। उसी समय लखनऊ के एक और कार्यकर्ता श्री जगदंबा प्रसाद वर्मा (दादाजी) नौकरी के बहाने सीतापुर आये। पावगीजी तथा दादाजी के संयुक्त प्रयत्नों से सीतापुर की शाखा शुरू हो सकी।

देवरिया शाखा

देवरिया उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग का एक जिला स्थान है। यहां की शाखा सन 1942 के आसपास शुरू हुई। यहां संघ का काम करने के लिए आनेवाले पहले प्रचारक श्री भैयाजी सहस्त्रबुद्धे थे। यहां की शाखा भी भैयाजी ने ही शुरू की।

शाहजहानपुर शाखा

शाहजहानपुर जिला पीलीभीत जिले से सटा हुआ है। शाहजहानपुर शाखा सन 1942 में प्रारम्भ हुई थी। दिसंबर 1941 में शाहजहानपुर के एक सज्जन ने वहां संघ की शाखा शुरू करने की प्रार्थना की थी। भाऊराव ने उनका पता देकर श्री जयगोपालजी को शाहजहानपुर भेजा। श्री जयगोपालजी शाहजहानपुर में जब उनसे मिले, तब उन्होंने बड़ी भावुकता से आंखों में आंसू भरकर जयगोपालजी से शाहजहानपुर में यथाशीघ्र संघ की शाखा शुरू करने की प्रार्थना की।

कुछ दिनों बाद जयगोपालजी का शहाजहानपुर के दूसरे एक व्यक्ति से परिचय हुआ। उनके पुत्र ने लखनऊ में संघ का काम देखा था। उससे प्रभावित होकर उसने अपने पिताजी को पत्र लिखकर सूचित किया था कि, शाहजहानपुर में संघ की शाखा शुरू करने का पूरा प्रयत्न करें। जयगोपालजी के रहने की व्यवस्था इन्हीं सज्जन के घर पर की गई।

बाद में निधिपाल सिंह नामक एक वकील से जयगोपालजी का संपर्क हुआ। उनका काकोरी बमकाण्ड के प्रसिध्द क्रांतिकारी हुतात्मा रामप्रसाद बिस्मिल से संबंध था। उनका संघ से कोई संबंध नहींथा। एक बार श्री निधिपाल सिंह-माथुर वकील साहब के घर संघ के एक कार्यक्रम में गये थे। वहां उन्हें संघ को निकट से देखने का अवसर मिला। वे अत्यंत प्रभावित हुए और उनमें बड़ा बदलाव आया। आगे चलकर वे वहां के नगर कार्यवाह और बाद में जिला कार्यवाह बने।

शाहजहानपुर जिले में दूसरे एक स्थान पर शाखा शुरू करने के पहले एक व्यक्ति ने ढिंढोरा पीट कर संघ की शाखा प्रारम्भ होने की घोषणा की थी। बाद में वहां के 20-25 हिंदुत्वनिष्ठ लोगों की बैठक होने के बाद वहां शाखा शुरू हुई।

पीलीभीत शाखा

पीलीभीत लखनऊ के उत्तर पश्चिम दिशा में तराई भाग में स्थित एक जिला है। यहां की शाखा पं. दीनदयाल उपाध्याय ने शुरू की थी। जून 1942 में पंडितजी कुछ दिनों के लिए अपनी बहन के यहां पीलीभीत गये थे। उस थोड़ीसी अवधि में उन्होंने पीलीभीत के ललित हरि आयुर्वेद कॉलेज के डिसेक्शन हॉल से लगे मैदान मेंशाखा शुरू की और वहां संघकार्य का श्रीगणेश हुआ।

सन 1943 में नारायणराव तर्टे पीलीभीत के जिला प्रचारक नियुक्त किये गये। तब वे ग्वालियर में प्रचारक थे। पीलीभीत में तर्टेजी के आने तक संघ का कोई कार्यालय नहीं था। पीलीभीत के राजा श्री ललित हरि साहूकार का साहूकार मुहल्ले में खंडहर जैसा एक पुराना बंगला था। इस बंगले के एक बड़े कमरे में आयुर्वेद कॉलेज के तीन छात्र बाबूलाल शर्मा, महेंद्र गुप्ता तथा द्वारका प्रसाद दुबे रहते थे। संयोग से तर्टे जी का उनसे परिचय हुआ और वे भी उन विद्यार्थियों के साथ उसी बंगले में रहने लगे। आगे चलकर उसी बंगले में पीलीभीत संघ शाखा का कार्यालय स्थापित हुआ।

पीलीभीत की इस शाखा में आनेवाले अधिकतर स्वयंसेवक उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद, अलिगढ़, हाथरस, एटा, बरेली, मेरठ आदि जिलों के रहनेवाले होते थे। पढ़ाई पूरी होने के बाद जब वे अपने घरों को वापस जाते थे, तो वहां भी संघ की शाखा शुरू करते थे। इस प्रकार पीलीभीत शाखा के सवयंसेवकों के कारण उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी संघकार्य का विस्तार होने लगा। आगे चलकर उनमें से अनेक स्वयंसेवकों ने संघचालक, कार्यवाह तथा अन्य अनेक प्रकार की जिम्मेदारियां सम्हालीं।

इसके साथ पीलीभीत शहर के अन्य भागों में तथा पीलीभीत जिले के दूसरे स्थानोंपर भी संघ की शाखाएं शुरू हुईं। पीलीभीत कॉलेज के विद्यार्थी तथा अन्य तरुण-प्रौढ़ कार्यकर्ताओं का एक बड़ा उत्साही गुट तैयार हुआ। इस गुट के अथक प्रयास के कारण पीलीभीत शहर में संघ की 12 शाखाएं तथा पीलीभीत जिले में 29 शाखाएं शुरू हो गईं। उन दिनों संघ का प्रथम तथा द्वितीय वर्ष का शिक्षा शिविर काशी में हुआ करता था। इस वर्ष में सहभागी होने के लिए पीलीभीत जिले से प्रति वर्ष 40-45 स्वयंसेवक जाया करते थे।

रामपुर शाखा

रामपुर शहर बरेली शहर से लगभग 40 कि.मी. की दूरी पर है। स्वाधीनता के पहले यहां एक नवाब का शासन था। इस कारण वहां प्रकट रूप से संघ की शाखा शुरू करना संभव न था। परंतु ऐसी परिस्थिति में भी सन 1946 में रामपुर में संघ की शाखा शुरू हो गईं। यहां शाखा प्रारम्भ करने का श्रेय श्री कैलाशचंद्र टंडन को देना होगा।

एक दिन टंडनजी की श्री रामरूप गुप्त नामक एक व्यक्ति से भेंट हुई। वे रामपुर के निवासी थे और काशी विश्वविद्यालय में अध्ययन करते थे। सौभाग्य से वे काशी विश्वविद्यालय शाखा के स्वयंसेवक थे। रामपुर मेंसंघ का काम प्रारम्भ करने में टंडनजी को गुप्तजी से बड़ी अनमोल सहायता प्राप्त हुई। राजव्दारा मुहल्ले की धर्मशाला में व्यायामशाला के रूप मेंशाखा शुरू करना तय हुआ।

कभी कभी दोपहर को भी संघस्थान पर (तबेले में) विद्यार्थी एकत्रित होते थे। वहां टंडनजी ओ.टी.सी. में सीखे हुए संघ के कुछ गीत सांघिक रूप से परंतु धीमे स्वर में गाया करते थे। सायंकाल शाखा समाप्त होने के बाद भी एक सामूहिक प्रार्थना कही जाने लगी। उस प्रार्थना की ये पंक्तियां टंडनजी को सदा याद रहीं :‡

भारत माता जग विख्याता, तू हम सब की प्यारी मां।
हम तेरे प्रिय पुत्र हैं जननी, तू हम सब की प्यारी मां।
धरती सोना उगल रही है, किसी चीज की कमी नहीं है।
कौन तुझे बतलाए माता, निर्धन और भिखारी मां॥

इसी बीच गुप्तजी ने टंडनजी का परिचय रज़ा कॉलेज के हिंदी के प्राध्यापक श्री कैलाशचंद्र बृहस्पति से कराया। बाद में बृहस्पतिजी संघ की भूमिका से समरस होकर संघ के अत्यंत निकट आ गये।

टंडनजी के बाद श्री गिरिवर सिंह को प्रचारक के नाते रामपुर भेजा गया। उन्होंने रामपुर शाखा का विस्तार किया। परंतु वहां की शाखा की अधिकृत घोषणा दि. 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र होने के बाद ही की जा सकी। उसने बाद वहां भी अन्य शाखाओं की तरह संंघ के सभी कार्यक्रम प्रकट रूप से होने लगे।

उत्तर प्रदेश की सभी शाखाओं का पूरा इतिहास विस्तार से बताना कठिन ही नहीं, असंभव भी है। पर कुछ अन्य स्थानों की जानकारी संक्षेप में प्रस्तुत है। प्रयाग में संघ का काम मा. बापूराव मोघे ने खड़ा किया। जयचंद की भूमि कन्नौज में कानपुर के श्री गयाप्रसाद त्रिवेदी ने शाखा प्रारम्भ की थी। उन्नाव शाखा कानपुर की भांति विदर्भ से उच्च शिक्षा के लिए आये हुए विद्यार्थी स्वयंसेवकों ने शुरू की थी। हरदोई शाखा सन 1942 में श्री राजाभाऊ इंदुरकर द्वारा शुरू की गई। बांदा का संघकार्य श्री बापूजी जोशी के प्रयत्नों का फल है। आगरा शहर का काम श्री भाऊ जुगादे ने खड़ा किया। फरुखाबाद की शाखा श्री विजय मुंजे ने शुरू की। गोरखपुर विभाग में संघ का काम खड़ा करने का पूरा श्रेय मा. नानाजी देशमुख का है। फैजाबाद में संघ का कार्य श्री भैया जुगादे ने खड़ा किया।

उत्तर प्रदेश में संघ का पहला शिक्षावर्ग सन 1942 में लखनऊ में हुआ था। उसके बाद उत्तर प्रदेश का शिक्षावर्ग काशी में होने लगा। उसमें बंगाल तथा बिहार प्रांतों के स्वयंसेवक भी सम्मिलित होते थे। ब्रिटिश सरकार का इन वर्गों की ओर बड़ी बारीकी से ध्यान रहता था। सन 1945 के शिक्षणवर्ग का विशेष उल्लेख करना पडेगा। मैं उस वर्ष उस वर्ग में प्रथम वर्ष की शिक्षा के लिए गया था। परंतु उस वर्ग का विशेष उल्लेख करने का यह कारण नहीं है। उस वर्ष ब्रिटिश सरकार ने वर्ग को अपने तृतीय नेत्र का लक्ष्य बनाया था। वर्ग काशी के दयानंद कॉलेज में लगा था और उसमें लगभग 400 स्वयंसेवक उपस्थित थे।

वर्ग एक महिना चलनेवाला था, परंतु वर्ग प्रारम्भ होकर 5-6 दिन ही बीत े होंगे कि, एक दिन प्रात:काल पिुलस ने वर्ग को चारों ओर से घेर लिया। सुबह से दोपहर दो बजे तक तलाशी जारी थी। प्रत्येक वस्तु की कड़ाई से जांच की जा रही थी। पर पिुलस को एक भी आपत्तिजनक बात मिली नहीं। एक स्वयंसेवक चुपचाप दीवार लांघ कर पिुलस के घेरे से निकल भागा और काशी के संघचालक को पिुलस की कार्रवाई की सूचना दी। संघचालक तुरंत दयानंद कॉलेज पहुंचे। पुलिस ने उन्हें बताया कि, ‘आप इस वर्ग मेंसैनिकी प्रशिक्षण दे रहे हैं और ऐसा करना नियमों के विरुध्द है। अत: आप 24 घंटों के अंदर इस वर्ग को बद कर के उसमें सहभागी लोगों को उनके घर वापस भेज दें।’

हमें उसी दिन शाम को दयानंद कॉलेज से हटाया गया। पुलिस को ऐसा लगा कि, सब स्वयंसेवक अपने अपने घर वापस लौट गये। परंतु हमें छोटे छोटे गुटों में शहर के अनेक घरों में रखा गया था। हमारे रहने -भोजन आदि की व्यवस्था वहीं पर की गई थी। रोज विभिन्न स्थानों पर हमारी बैठक चर्चा आदि कार्यक्रम होते थे। कभी कभी हम नावों में बैठकर गंगा के उस पार जाकर बालू में घंटों खेलते तथा मस्ती करते थे। वर्ग बंद किया गया है, उसकी हमें याद भी नहीं आती थी। पुलिस को इस बात का पता चल गया था। पर वह कोई कानूनी कार्रवाई कर न सकती थी। यह सब मा. भाऊरावजी की योजनानुसार हो रहा था।

बाद में पू. गुरुजी का ऐसा आदेश आया कि, सरकार को उसकी कार्रवाई का करारा जवाब दिया जा चुका है। अत: वर्ग समाप्त कर देना चाहिए। इस कारण एक महीना चलनेवाला वर्ग केवल 10-12 दिनों बाद ही समाप्त कर दिया गया। तत्कालीन सरकार की ओर से संघ के काम में ऐसी छोटी-बड़ी बाधाएं समय-समय पर आती ही रहती थीं। उन परिस्थितियों में भी संघ बढ़ता ही रहा और ऐसी कठिनाइयों में भी आगे बढ़ने का मार्ग कैसे निकालना चाहिए इसकी शिक्षा संघ के स्वयंसेवकों को मिलती रही। सन 1946 का शिक्षावर्ग उसी स्थान पर बिना किसी कठनाई के संपन्न हुआ।

पहला प्रतिबंध

महात्मा गांधीजी की हत्या के बाद सन 1948 में संघ पर पहला प्रतिबंध लगाया गया था। उसके पहले ब्रिटिश सरकार ने संघ के मार्ग में अनेक बार बाधाएं खड़ी की थीं। परंतु संघ पर प्रतिबंध लगाने की बात अतिबुध्दिमान अंग्रेजों को भी कभी सूझी नहीं थी। औरों के बजाय अपने ही लोगों द्वारा बाधाएं उपस्थित की जाना अपने देश के लिए एक पुराना अभिशाप है। स्वदेशी राज्यकर्ताओं ने स्वाधीनता प्राप्ति के बाद संघ को कुचल कर समाप्त करने का एक भी अवसर हाथ से जाने न दिया। गांधी हत्या से संघ का किंचित भी संबंध नहीं है, यह निश्चित रूप से ज्ञात होने के बावजूद स्वदेशी राज्यकर्ताओं ने संघ पर प्रतिबंध लगाया।

संघ पर लगे प्रतिबंध को हटवाने के लिए संघ के अधिकारी तथा सरकार के बीच वार्तालाप जारी था। अंत में दि. 12 जुलाई 1949 को संघ पर लगा प्रतिबंध हटा लिया गया। उस दिन पाञ्चजन्य साप्ताहिक का विशेष संस्करण जल्दी जल्दी में प्रकाशित किया गया। हम लोगों ने सड़कों पर घूम कर लखनऊ के सब भागों में उसकी प्रतियां बेचीं।

संघ के लिए प्रतिबंध का काल एक कठिन परीक्षा का काल था। सभी प्रकार के असत्य और गंदे आरोप लगाये जाने के बाद भी स्वयंसेवकों ने पूरा संयम रखा। उनकी ओर से कहीं भी कोई अविवेकी प्रतिक्रिया प्रकट न हुई। आश्चर्य तो इस बात का लगता है कि, वह अत्यंत कठिन, कष्टप्रद तथा घोर तपस्या का काल होने के बाद भी स्वयंसेवकों का उत्साह, संघ के प्रति निष्ठा तथा संघ के लिए कोई भी त्याग करने की पूरी तैयारी उस काल में सबसे अधिक थी। आज भी उन दिनों का स्मरण होते ही हृदय भर आता है।

वर्तमान स्थिति

संघ की कार्यप्रणाली के अनुसार उत्तर प्रदेश में संघकार्य की सबसे छोटी इकाई ग्रम अथवा नगर में बस्ती की इकाई बनती है। इसके बाद मंडल (न्याय पंचायत), विकास खंड (ब्लॉक), तहसील, जिला, विभाग, प्रांत तथा क्षेत्र आते हैं। इस समय मा. शिवनारायणजी पूर्वीय उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक तथा मा. शिवप्रकाशजी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र प्रचारक हैं। क्षेत्र के छह प्रांत बनाये गये हैं ‡ काशी, अवध, मेरठ, ब्रज, कानपुर और गोरक्ष।

काशी प्रांत में उत्तर प्रदेश के पूर्वीभाग के —– जिलों का समावेश है। मा. डॉ. कृष्णगोपालजी सहसरकार्यवाह हैं। प्रांत में शाखाओं की कुल संख्या लगभग 2500 है। अवध प्रांत में लखनऊ से झांसी तक के 32 जिले समाविष्ट हैं। मा. कृपाशंकरजी पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं पूर्वीय उत्तर प्रदेश संयुक्त क्षेत्र के प्रचार प्रमुख हैं। उत्तर प्रदेश की सभी शाखाओं की संख्या लगभग 7-8 हजार होगी। प्रांत में पूर्ण कालिक काम करनेवाले प्रचारकों की संख्या लगभग 600 हैं। हर शाखा की दैनंदिन उपस्थिति औसतन 10-15 के आसपास होती है।

नई रचना के अनुसार अब उत्तर प्रदेश को ‘संयुक्त क्षेत्र’ कहा जाता है और उसके दो भाग किये गये हैं। ‡ 1) पूर्वी उत्तर प्रदेश, जिसमें गोरखपुर, काशी, लखनऊ तथा कानपुर ऐसे चार प्रांतों का समावेश है। 2) पश्चिम उत्तर प्रदेश -इसमें ब्रज और मेरठ ऐसे दो प्रांतों का समावेश है। इसके माने यही कि, संघ की रचना नुसार उत्तर प्रदेश को वर्तमान में छह प्रांतों में बांटा गया है।

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