मुजफ्फरनगरः बहू, बेटी सम्मान की आस

मुजफ्फरनगर की घटनाओं के पीछे चार कारण गिनाए जा सकते हैं। पहला- राज्य सरकार की मुस्लिम परस्ती। दूसरा- राजधर्म का निर्वाह न करना। तीसरा- छद्मी धर्मनिरपेक्षता और चौथा एकगट्ठा वोटों की राजनीति। इन सभी बातों का मिलाजुला परिणाम दंगों के रूप में सामने आया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के अलावा शामली, बागपत, मेरठ, शाहजहांपुर जिले इसमें झुलस रहे हैं। ये उपद्रव शहरी इलाकों तक ही सीमित नहीं रहे; ग्रामीण इलाकों में भी इसका जहर फैल गया। ये इलाके दिल्ली के आसपास ही हैं। इस तरह आंच देश की राजधानी की दहलीज पर है, जो खतरनाक तथ्य है।

कोई 40 से 50 हजार लोग अपने गांवों/घरों से पलायन कर चुके हैं। ये सभी दिल्ली से सटे गाजियाबाद जैसे नगरों में पनाह लिए हुए हैं। कोई 50 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और सौ से अधिक घायल हैं। हजार से अधिक लोगों को पुलिस ने पकड़ा है। इनमें विभिन्न दलों के स्थानीय नेता भी हैं। ये लोग देर-सबेर रिहा हो जाएंगे; लेकिन उन पर मुकदमे चलेंगे। लिहाजा, मामला ठण्डा पड़ने वाला नहीं है। असंतोष की ज्वाला भभकती रहेगी। ऐसा इसलिए है कि मुजफ्फरनगर की घटना इकलौती घटना नहीं है। पिछले डेढ़ बरस से इसी तरह की लगभग 50 घटनाएं हो चुकी हैं। मार्के की बात यह है कि सभी घटनाओं की जड़ में हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़का है। इनमें से कितने प्रेम प्रकरण और कितने छेड़छाड़ के प्रकरण है यह खोज का विषय है। लेकिन, एकजैसे ऐसे प्रकरणों से किसी सोची-समझी चाल की बू आती है। कहीं ये घटनाएं ‘लव जिहाद’ के मामले तो नहीं हैं?

मुजफ्फरनगर की घटनाओं को मीडिया ने दबी-जुबान से लिया है। वास्तविकता कभी ठीक तरह से पेश नहीं की गई। बहुतों ने तो इसे महज एक प्रेम प्रकरण करार दिया है। लेकिन, अब साफ हो गया है कि यह प्रेम प्रकरण नहीं, छेड़छाड़ का मामला है। घटना यूं हुई-

मुजफ्फरनगर से 15 किलोमीटर दूर गांव है कावाल। वहां की एक 14 वर्षीय किशोरी की शाहनवाज रोज छेड़खानी किया करता था। किशोरी तंग आ गई। अंत में उसने यह बात अपने परिवार में बताई। किशोरी का भाई सचिन, शाहनवाज से जवाब तलब करने उसके घर गया। दोनों में कहासुनी हुई। सचिन घर लौटा और अपने चचेरे भाई गौरव के साथ फिर वापस आया। मारामारी शुरू हुई। मुहल्ले के लोग शाहनवाज के पक्ष में आए। सचिन, गौरव की इतनी पिटाई की कि दोनों ने वहीं दम तोड़ दिया। शाहनवाज की अस्पताल के रास्ते में मौत हो गई।

मुजफ्फरनगर कोई 5 लाख आबादी का शहर है। हिंदू और मुस्लिमों की संख्या लगभग आधी-आधी है। पीड़ित युवती जाट समुदाम से थी; इसलिए जाटों ने ‘खाप पंचायत’ आयोजित करने का फैसला किया। घटना के चार दिन बाद 31 अगस्त को जनसाथ कस्बे में जाटों की पहली पंचायत हुई। पंचायत में जाट किशोरों को मारने वालों पर कार्रवाई और शामली के पक्षपाती पुलिस अधीक्षक अब्दुल हमीद को हटाने की मांग की गई। भाजपा ने मुजफ्फरनगर बंद का आवाहन किया। हमीद को हटाने की मांग को लेकर पांच दिन बाजार बंद रहे। लेकिन राज्य सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। इसके विरोध में 7 सितम्बर को मुजफ्फरनगर के निकट नागला मंदौर में ‘महापंचायत’ का आयोजन किया गया। उत्तर प्रदेश, हरियाणा व दिल्ली के कोई डेढ़ लाख लोग इसमें मौजूद थे। महापंचायत का विषय था- बहू, बेटी सम्मान बचाओ।
इस बीच हुई एक घटना से विद्वेष और फैल गया। महापंचायत से लौट रहे लोगों पर गंगा नहर के पास दो हजार की भीड़ ने यकायक हमला किया। जाट जिन ट्रेक्टर ट्रालियों में सवार थे उन 18 ट्रालियों और तीन मोटर साइकिलों को आग लगा दी गई। निहत्थे लोगों पर गोलीबारी हुई। कई लोग लापता हुए। कोई छह शव गंगा नहर में मिले। पुलिस ने तत्परता से कोई कार्रवाई नहीं की। हमलावरों को भाग जाने दिया। इस घटना से जाट क्रुद्ध हुए और हमलावरों के कई घरों में उन्होंने आग लगा दी।

इस तरह जाट विरुद्ध मुस्लिम अर्थात हिंदू विरुद्ध मुस्लिम दंगों की शुरुआत हुई। सरकार और प्रशासन मूक दर्शक बने रहे। यहां तक कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की चेतावनी को भी अनदेखा किया गया। मुस्लिमपरस्ती के चक्कर में सपा सरकार ने राजधर्म का भी पालन नहीं किया। इस तरह सरवर्त नामक नगर को उजाड़ कर 1633 में सईद मुनव्वर अली द्वारा अपने वालिद मुजफ्फर अली के नाम पर बसाए गए इस शहर की मुस्लिमपरस्ती को अखिलेश यादव की सपा सरकार ने पुनः 400 वर्षों बाद कायम किया। लोकतंत्र में इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है!

यह सभी जानते हैं कि मुस्लिमों के वोटों पर ही अखिलेश सरकार सत्ता में आई है। अखिलेश युवा हैं, अपरिपक्व हैं। अपने राहुल बाबा की तरह! प्रशासन चलाना उनके बस की बात नहीं है। वैसे उनकी चलती भी नहीं है। असली काम उनके पिता मुलायम सिंह, चाचा शिवराज सिंह और आजम खान चलाते हैं। उनके निर्णयों या सुझावों को नकेल कस कर अपने निर्णय करना अखिलेश के लिए संभव नहीं है। आजम खान और मंत्रिमंडल के मुस्लिम मंत्रियों की इतनी चलती है कि पूरे प्रशासन पर मुस्लिमों का लगभग कब्जा है। यहां तक कि जावेद उस्मानी को केंद्र से राज्य में लाकर मुख्य सचिव बना दिया गया। कहते हैं कि उस्मानी इसके लिए तैयार नहीं थे, लेकिन मुस्लिम नेताओं के आगे उनकी एक न चली और उन्हें राज्य में आना पड़ा। आजम खान मुजफ्फरनगर के पालक मंत्री भी हैं। उन्होंने जिला स्तर से लेकर तहसील और खंड स्तर तक हर काम की जगह मुस्लिमों की नियुक्ति करवा दी है। यही नहीं, सचिन और गौरव के हत्यारों के खिलाफ कदम उठाने वाले जिला मजिस्ट्रेट सुरेंद्र सिंह और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मंजिल सैनी का 48 घंटों के भीतर तबादला करवा दिया। जाट पंचायत की एक प्रमुख मांग थी कि इन वरिष्ठ अधिकारियों को न हटाया जाए, लेकिन मुस्लिमपरस्त चेहरे को साबूत रखने के लिए उनकी एक न मानी गई।

केंद्र सरकार मौन बनी रही। कांग्रेस की मजबूरी यह है कि केंद्र में सपा के सिवा उसका कोई दोस्त नहीं बचा है। तिस पर कांग्रेस मुस्लिमपरस्ती का अपना नकाब भी उतारना नहीं चाहती; क्योंकि 2014 के चुनाव आगे हैं। छद्मी धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस का पुराना इतिहास है। कांग्रेस एक पत्थर से दो पंछी मारना चाहती थी। मुजफ्फरनगर में होहल्ला होने दिया जाए; ताकि मुस्लिम वोट बैंक सपा से टूट कर कांग्रेस की राह पकड़े। हिंदुओं को भी पुचकारा जाए ताकि पार्टीपरस्त नाराज न हो। फलस्वरूप, अंतिम समय में केंद्र ने कुछ कदम उठाए। राज्य सरकार को चेताया और 600 से अधिक गांवों में पुलिस चौकियां बनाईं, 536 मोबाइल पुलिस दस्ते बने, जिनमें से हरेक के जिम्मे तीन गांव थे, प्रादेशिक पुलिस हरकत में आई, सीआरपीए, आरएएफ के जवान तैनात किए गए। अशांति के पूर्व की शांति फिलहाल वहां दिखाई देती है।

लेकिन इससे भी मुस्लिम खुश नहीं हैं। देवबंद के दारुल-उलूम के मोहतमीन (उपकुलपति) मौ. अब्दुल कासिम नोमानी ने सीबीआई जांच की मांग की है। जमायत-उलेमा-ए-हिंद समेत लगभग सभी मुस्लिम संगठनों ने अखिलेश यादव सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। लेकिन, कांग्रेस की मजबूरी यह है कि वह ऐसा नहीं कर सकती, क्योंकि केंद्र की सरकार सपा की बैसाखियों पर ही चल रही है। इसलिए सपा के भीतर ही दबाव बनाए रखने की मुस्लिम नेताओं की कोशिश है। आजम खान का मंत्रिमंडल की बैठकों या पार्टी की आगरा में हुई कार्यकारिणी की बैठक में शामिल न होना इस बात का स्पष्ट संकेत है। आजम खान की यह एक तरह से बगावत है, परंतु उन्हें हाथ लगाने की मुलामय सिंह की अभी हिम्मत नहीं हो रही है। शायद मुलायम 2014 का इंतजार करना चाहते हैं। इसके बाद उनका अमर सिंह बनने में देर नहीं लगेगी।

मुस्लिम और जाट-हिंदू वोटों को पाने की जद्दोजहद में राजनीतिक दलों की होड़ लगी है। मुस्लिमों को खुश करने के लिए बसपा और कांग्रेस के कई राज्यस्तरीय नेता जुम्मे की तकरीर के बाद कावाल के शहीद चौक में हुई सभा में मौजूद थे और उन्होंने भड़काऊ भाषण किए। चौ. चरण सिंह जाटों के वोटों के पैतृक दावेदार हैं। उनके पिता चौ. चरण सिंह ने लोकदल के माध्यम से जाटों को एकत्र किया था और उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो गए थे। यही विरासत चौ. अजित सिंह चला रहे हैं और अपने बेटे चौ. जयंत सिंह को भी सौंपना चाहते हैं। वे केंद्र में मंत्री हैं। इसीसे केंद्र की मुश्किलों का अंदाजा लग सकता है। उन्हें महापंचायत में आने से राज्य सरकार ने रोक दिया, लेकिन दिल्ली से सूत्र- संचालन करते रहे। उन्हें भय है कि जाट उनसे तितर-बितर होकर भाजपा का हाथ थाम लेंगे; क्योंकि भाजपा ही एकमात्र दल है जो हिंदुओं के हितों की बात करता है। विश्व हिंदू परिषद की चौरासी कोस परिक्रमा को अनुमति न देने और वर्तमान दंगों के दौरान मुस्लिमपरस्ती के कारण जाटों का एक बड़ा वर्ग सपा से नाराज है। ऐसी स्थिति में उन्हें अजित सिंह के लोकदल के मुकाबले भाजपा अधिक नजदिक लगने लगी है। स्थानीय कई जाट नेताओं ने यह बात सार्वजनिक रूप से कही भी है।

अंत में एक और बात। इन दंगों के कुछ माह पहले से ही मुजफ्फरनगर इलाके में अवैध हथियारों का कारोबार अचानक बढ़ गया। हथियार बनाना उत्तर प्रदेश और बिहार में गृह उद्योग है। देसी कट्टे से लेकर एके-47 तक सभी आसानी से मिल जाता है। हथियारों के वैध लाइसेंस भी वहां बड़े पैमाने पर हैं। उनकी गोलियों की मांग अचानक बढ़ गई। क्या प्रशासन इससे अनभिज्ञ था? ऐसा तो नहीं लगता, लेकिन यह जरूर लगता है कि इसे होने दिया गया। पुलिस महकमा जिनके अधिकार में था उन्होंने होने दिया।

सारी चर्चाओं का सार यह है कि दंगे पूर्व-नियोजित थे, केवल बहाने बनाए गए। मुस्लिमपरस्त सपा, कांग्रेस, बसपा जैसे राजनीतिक दल वोट बैंक के खातिर उनके साथ हो गए। भारतीय लोकदल अर्थात अजित सिंह जाटों के स्वयंघोषित मुखिया हैं; लेकिन वे जाटों के लिए कुछ नहीं कर पाए। हिंदू हितों की रक्षा अब भाजपा के हाथ में है।
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