अनकही कहानी का इतिहास

पुस्तक का नाम – जम्मू कश्मीर की अनकही कहानी
लेखक – कुलदीप चंद अग्निहोत्री
प्रकाशक – प्रभात प्रकाशन, 4/19 आसफ अली रोड, नमी दिल्ली-2
पृष्ठ- 279+ 19 मूल्य – 175

जम्मू-कश्मीर की अनकही कहानी, वास्तव में अपने शीर्षक को अक्षरश: चरितार्थ करने में पूरी तरह सफल रही है। विद्वान लेखक ने बड़ी मेहनत से पुस्तक की सामग्री एकत्र की है। एक बार पुस्तक पढ़ना आरंभ कीजिए, उसे छोड़ने का मन ही नहीं करता है। मन में लालसा रहती है कि पूरी पुस्तक पढ़कर ही विश्राम किया जाये। लेखक ने पाठकों की लालसा को कायम रखने में कामयाबी हासिल की है। पुस्तक में उन वृत्तांतों का विस्तार से वर्णन किया है, जो जम्मू-कश्मीर समस्या के बारे में कभी सुना ही नहीं गया है। जम्मू-कश्मीर की समस्या जहां पहले थी, वहां पर आज भी है। लेखक ने जिन वृत्तांतों का वर्णन किया है और जिन प्रश्नों को उठाया है, यदि उनके बारे में पहले से विचार कर लिया गया होता तो आज जम्मू कश्मीर नाम की कोई समस्या ही नहीं रह गयी होती।

पुस्तक की प्रस्तावना जाने माने वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी है। श्री आडवाणी पूरे जम्मू-कश्मीर समस्या के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। उनका कहना है कि डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 1953 में कानपुर में जनसंघ के पहले अधिवेशन में नारा दिया था ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान (झंडा) नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे।’ वास्तव में शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के लिये ध्वज, विधान और अपने लिये अलग विधानसभा चाहते थे। इसी अधिवेशन में यह निर्णय किया गया कि जनसंघ के कार्यकर्ता जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलीनीकरण के लिये राज्य में जाकर गिरफ्तारी देंगे। डॉ. मुखर्जी ने यह भी घोषणा की कि इसके लिये वे स्वयं राष्ट्रव्यापी आंदोलन का नेतृत्व करेंगे।

कश्मीर और भारत सरकार ने डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के कश्मीर प्रवेश पर उन्हें बंदी बना लिया। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी डॉ. मुखर्जी के साथ थे। डॉ. मुखर्जी ने श्री वाजपेयी से कहा कि जाओ देश वासियों को बता दो कि मैंने बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश पा लिया है, लेकिन एक बंदी की हैसियत से। जेल में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का 23 जून, 1953 को अकस्मात देहावसान हो गया। इस रहस्यमयी मृत्यु पर आज भी पर्दा पड़ा हुआ है। भारत ने अपने एक सपूत को खो दिया। पंजाब सरकार ने डॉ. मुखर्जी के सम्मान में रावी तट स्थित माधोपुर में उनकी प्रतिमा का 20 मार्च, 2010 में अनावरण किया।

स्वायत्ततावादी शेख अब्दुल्ला की नेशनल कांफरेंस अपने अलग ध्वज की बात पर अड़े हुई थी, लेकिन डॉ. प्रेमनाथ डोंगरा के नेतृत्व में उनकी पार्टी प्रजा परिषद जम्मू-कश्मीर के पूरी तौर पर भारत के साथ विलीनीकरण की बात पर अड़ी हुई थी। डॉ. डोगरा अपना आंदोलन अपने कार्यकर्ताओं के बल पर चला रहे थे, लेकिन शेख अब्दुल्ला को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का पूरा सहयोग प्राप्त था, इस कारण वे अपने को परम शक्तिशाली समझ रहे थे और थे भी।

अपनी प्रस्तावना में श्री आडवाणी ने कहा है कि प्रश्न यह उठाया जा सकता है कि साठ साल बाद 2013 में इस पुस्तक को लिखने की क्या जरूरत पड़ गयी। इसका साफ सटीक उत्तर यह है कि अभी तक प्रजा परिषद का सही इतिहास नहीं लिखा गया है। प्रजा परिषद के बारे में उस समय भ्रामक प्रचार किया गया। प्रजा परिषद से संबंधित कार्यकर्ताओं ने कोई पुस्तक लिखी ही नहीं है। प्रजा परिषद के आंदोलन में 15 से अधिक लोग शहीद हुए और न जाने कितने कार्यकर्ताओं को जेल में असहनीय पीड़ा दी गयी।

जिस समय प्रजा परिषद का आंदोलन आरंभ हुआ उसी समय के आसपास कुलदीप चंद अग्निहोत्री का जन्म 26 मई 1951 में हुआ था, लेकिन पुस्तक देखकर ऐसा लगता है लेखक आंदोलनकारियों के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है। सारे वृत्तांत का सजीव वर्णन किया गया है। जहां पर भी प्रजा परिषद का जिक्र आया है, उससे लगता है कि लेखक उनके साथ रहा है, जेल भी उनके साथ गया है और उनकी हर सभा में उनके साथ बैठा रहा है।

लेखक ने प्रस्तावना और भूमिका के अतिरिक्त पुस्तक को नौ खंडों में विभाजित किया है। पहला खंड जम्मू कश्मीर की सियासत की पृष्ठभूमि है। दूसरा प्रजा परिषद की स्थापना, तीसरा शेख अब्दुल्ला का शासन काल, चौथा जम्मू का छात्र आंदोलन का देश भर में विस्तार, आठवां डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान और शेख अब्दुल्ला का पतन और नवां उपसंहार है।

प्रथम खंड के आरंभ में ही लेखक ने कहा है कि कश्मीर का इतिहास बहुत ही पुराना है। प्राचीन स्रोतों के अनुसार यह कश्यप मुनि से आरंभ होता है। कश्मीर ही ऐसा क्षेत्र है, जिसका विधिवत इतिहास लिखा गया है। जम्मू का इतिहास भी उतना ही प्राचीन है। महाभारत काल से ही इसके सूत्र पकड़े जा सकते हैं। हिमालय पर्वत की भांति ही जम्मू-कश्मीर की गाथा पुरानी है।

जम्मू राज्य की स्थापना महाराजा गुलाब सिंह ने 1822 में की। लद्दाख, गिलगित, बल्तीस्थान को जोड़ते हुये वे एक विशाल क्षेत्र के महाराज बन गये। बाद में कश्मीर भी उनके राज्य का क्षेत्र बन गया। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर भारत की सबसे बड़ी दूसरी रियासत बन गयी। 1931-32 में अंग्रेजों ने उस समय गद्दी पर आसीन महाराजा हरि सिंह के विरुद्ध षड्यंत्र रचना आरम्भ कर दिया। अंग्रेज जानते थे कि महाराजा हरि सिंह का झुकाव भारत के स्वतंत्रता समर्थकों के साथ है। इसी बीच कश्मीर में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में मुस्लिम कान्फरेंस की स्थापना हुई, जो बाद में नेशनल कान्फरेंस हो गयी। 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ। देश की करीब 570 रियासतों का किसी न किसी प्रकार अंत हो गया। इसी बीच जम्मू-कश्मीर के तिहाई भाग पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया, जिस पर अभी भी पाकिस्तान पैर जमाये हुए है। इसका अंत कब होगा, इसका पता नहीं है।

प्रजा परिषद के जम्मू-कश्मीर में सत्याग्रह का विशेष स्थान है। इस परिषद का गठन 17 नवंबर, 1947 में ही हो गया था।
26 अक्तूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने जम्मू कश्मीर के भारत गणराज्य में विलीनीकरण की संधि पर हस्ताक्षर कर दिया, जिसके अतर्गत रियासत भारत का अभिन्न अंग हो गयी।

जम्मू-कश्मीर के भारत में विलीनीकरण में विलम्ब हुआ, जिसका फायदा उठाकर पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के एक तिहाई भूभाग पर अवैध कब्जा बना लिया। ब्रिटेन-अमेरिका चाहते थे कि रियासत पाकिस्तान को मिल जाये, जिसका उन्हें सामरिक लाभ मिलने वाला था। उस समय शीत युद्ध चल रहा था। अमेरिका और ब्रिटेन रूस और चीन पर नकेल रखने के लिये चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान में जाने से उन्हें वहां पैर जमाने में सुविधा होगी।

विलीनीकरण में महाराजा हरि सिंह के हस्ताक्षर के बाद भारत सरकार को पाकिस्तानियों से अवैध कब्जा हटाने का हक मिल गया और भारतीय सेना बहादुरी के साथ क्षेत्र को खाली कराने के काम में जुट गयी। जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान के पक्ष में लाने में ब्रिटेन का बड़ा हित सध रहा था। उसकी मंशा थी कि सबल पाकिस्तान ही एशिया में उसके सामरिक हितों की रक्षा कर सकता है।

लार्ड माउंटबैटन ब्रिटेन की इसी रणनीति पर काम कर रहे थे और पाकिस्तान का मार्ग प्रशस्त करने में जुटे थे। लार्ड माउंटबैटन महाराजा हरि सिंह को यह समझाने में जुटे हुए थे कि पाकिस्तान में जाने में ही उनका कल्याण है। सारी बातें चल ही रही थीं, इसी बीच पाकिस्तानी फौज ने कबाइलियों से मिलकर जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण करने की योजना बना ली और हमला भी कर दिया। भारतीय सेना नें जम्मू-कश्मीर का काफी हिस्सा आक्रमणकारियों से मुक्त करा लिया।

लार्ड माउंटबेटन चुप रहने वाले व्यक्ति नहीं थे। इसी बीच उन्होेंंने मामले को राष्ट्रसंघ में ले जाने के लिये पटा लिया। सरदार पटेल और महात्मा गांधी इस बात से सहमत नहीं थे, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। पण्डित जवाहरलाल नेहरू आदर्शवादी बहुत थे, लेकिन व्यावहारिक बिलकुल नहीं। राष्ट्रसंघ में पाकिस्तानी आक्रमण की शिकायत दर्ज करायी गयी। वह शिकायत आज भी राष्ट्रसंघ की फाइल में जैसी की तैसी पड़ी हुई है। कब तक पड़ी रहेगी, इसका पता नहीं है।

दूसरे खंड में लेखक ने प्रजा परिषद की स्थापना और तीसरे खंड में शेख अब्दुल्ला के शासनकाल का विस्तार से वर्णन किया है। पंडित जवाहरलाल नेहरू आंख मूंद कर शेख अब्दुल्ला पर विश्वास कर रहे थे। इससे शेख को अपनी मनमानी करने का अवसर मिल रहा था। नेहरू को विश्वास था कि शेख के कारण अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को बल मिलेगा। राष्ट्रसंघ में भी वे भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिये शेख को ही भेज रहे थे। उन्हें लगता था कि शेख के कारण कश्मीर के मुसलमान भारत के पक्ष में रहेंगे। उन्हें शेख की असलियत का पता नहीं चल पा रहा था। शेख अपनी सार्वजनिक सभाओं नें जवाहरलाल नेहरू की जय का नारा लगवाते थे। जम्मू-कश्मीर में नेशनल कान्फरेंस के अलावा कोई दूसरी राजनीतिक पार्टी नहीं थी। केवल प्रजा परिषद उनका विरोध कर रही थी।

चौथे खंड में लेखक ने जम्मू में छात्र आंदोलन का विस्तार से वर्णन किया है। पांचवें खंड में शेख की पोलपट्टी खुलने का जिक्र किया गया है। छठे खंड में प्रजा परिषद के आंदोलन के तीव्र होने का जिक्र है। सातवें खंड में प्रजा परिषद के आंदोलन के देश भर में विस्तार की वृहद् कहानी है। पुस्तक में पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. श्यामप्रसाद मुखर्जी और सदरे रियासत कर्ण सिंह के पत्राचारों का जिक्र है।

आठवें खंड में डॉ. श्यामप्रसाद मुखर्जी की रहस्यमय परिस्थियों में मौत और शेख अब्दुल्ला के पतन की कहानी है। नववा खंड उपसंहार और सारी घटनाओं का पटाक्षेप है।

निष्कर्ष यह है कि यदि प्रजा परिषद के आंदोलन को ठीक से समझ लिया गया होता तो आज जम्मू-कश्मीर की समस्या रह ही नहीं गयी होती। जम्मू-कश्मीर की समस्या को राष्ट्रसंघ में ले जाने की गलती का बुरा परिणाम आज भी राष्ट्र को भोगना पड़ रहा है। यदि एक सप्ताह और भारतीय सेना को लड़ने की स्वतंत्रता दे दी गयी होती तो आज कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में न रहा होता और तीन बार भारत तथा पाकिस्तान के बीच लड़ाई न हुई होती।

पुस्तक सर्वथा पठनीय है। इसमें प्रजा परिषद के सत्याग्रह का विस्तार से वर्णन किया गया है।
लेखक कहता है कि प्रजा परिषद के ऐतिहासिक आंदोलन का इतिहास अभी तक लिखा नहीं गया था और न ही उसका मनौवैज्ञानिक विश्लेषण हुआ था। जम्मू-कश्मीर का यह एक ऐसा अध्याय है जिसके जाने बिना राज्य के मनोविज्ञान को समझा नहीं जा सकता। प्रस्तुत पुस्तक राज्य की अनकही कहानी को प्रकाश में लाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। प्रजा परिषद राज्य में भारतीय संविधान को पूर्ण रूप से लागू करने की सबल समर्थक थी।
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