सन 1857 का स्वातंत्र्य समर

अंग्रेज इतिहासकारों की यह धारणा भ्रमपूर्ण है कि स्वधर्म और स्वराज्य का अधिष्ठान रखकर सन 1857 ई. में प्रारम्भ हुए रणयज्ञ का संकल्प लार्ड डलहौजी के कार्यकाल में लिया गया था। वास्तव में, इस क्रांतियुध्द का संकल्प तो सन 1757 ई. में ही ले लिया गया जब लार्ड क्लाइव ने स्वार्थ और अन्याय का साम्राज्य स्थापित करने के लिए प्लासी के मैदान में रक्त-मांस की नींव रखी। हिन्दुस्तान की जन्मजात स्वतंत्रता का हरण कर उसके बदले गुलामी और स्वधर्म के स्थान पर ईसाइयत लादने का पातकी विचार जब पहले पहल अंग्रेज व्यापारियों के मन में आया, तभी से हिन्दूभूमि के हृदय में क्रांति चेतना का संचार हुआ। जिस देश को हिमालय ने उत्तर और समुद्र देवता ने दक्षिण की ओर से सुरक्षित किया हुआ है, उस निर्सगत: बलिष्ठ हिन्दुस्तान पर अंग्रेजों की सत्ता चलने देना है या नहीं है; यह मुख्य प्रश्न सन् 1857 ई. के समर पट पर हल किया जा रहा था।

सन् 1857 ई. का विप्लव केवल सैनिक विद्रोह नहीं था बल्कि स्वातंत्र्य युध्द था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन के अंतिम गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी की राज्य हड़पने की नीति के कारण भारत के राजवंशों एवं वहां की जनता में तीव्र असंतोष उत्पन्न कर दिया। डलहौजी ने गोद लेने का निषेध कर सातारा, नागपुर, झांसी आदि राज्यों को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया। कुशासन का आरोप लगाकर अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता निर्वासित कर दिया और उनकें पुत्रों को भी उनका अधिकार न देते हुए अवध के राज्य को समाप्त कर दिया। इस क्रांति के दूसरे प्रमुख कारणों में थे मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर का अनादर, क्रांति के नेताओं का व्यक्तिगत असंतोष, अंग्रजों का अहंकारपूर्ण व्यवहार, ईस्ट इंडिया कम्पनी का कुशासन, देश के अपने उद्योगधंधों का र्‍हास, देश की धन सम्पदा का इंग्लैण्ड जाना, भारतीयों का बेरोजगार हो जाना और किसानों का कष्टमय जीवन। इसके अलावा सरकार द्वारा भारत के सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप और भारतवासियों को पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित करने का प्रयास भी एक अन्य कारण था। अंग्रजों ने भारत में भारतीय साहित्य तथा भाषाओं के प्रति उचित व्यवहार न करते हुए पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति का प्रचार किया तथा ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा हिन्दू तथा इस्लाम धर्म की निन्दा की गयी एवं शिक्षण संस्थाओं में भी ईसाई धर्म का प्रचार किया जा रहा था।

1857 ई. तक आम जनता उथल-पुथल के लिए तैयार थी, उसे प्रज्वलित करने के लिए केवल एक चिंगारी की जरूरत थी और जनता के अन्दर दबे हुए असंतोष को एक केन्द्रबिन्दु की आवश्यकता थी जिसे संकेन्द्रित किया जा सके। चर्बी लगे कारतूसों की घटना ने सिपाहियों में असंतोष को भड़काने के लिए चिंगारी का काम किया और उनकी बगावत ने आम जनता को विद्रोह करने का मौका दिया।

सन् 1857 ई. की घटना एक सुनियोजित और व्यापक विप्लव था। क्रांति की रूपरेखा को सर्व प्रथम रंगो बापूजी तथा अजीमुल्ला ने बनाया था। रंगो बापूजी लंदन से सीधे सातारा आए किन्तु अजीमुल्ला ने वहां से भारत आने से पूर्व समस्त यूरोप की यात्रा की। अजीमुल्ला की इस योजना को ब्रह्मावर्त (विठुर) के नेताओं ने पसन्द किया और अब नाना साहब भी युध्द की तैयारी में लग गये और भारत भर में अपने प्रचारकों को भेज दिया। दिल्ली से मैसूर तक के सभी नरेशों को क्रांति यज्ञ में सम्मिलत होने के लिए आवाहन किया गया। दिल्ली का बादशहा बहादुर शाह एवं उनकी चतुर बेगम जीनत महल अपने गत वैभव को फिर से प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील थे। मुसलमानों की सहानुभूति दिल्ली के बादशाह और अवध के नवाब के साथ थी और वे उनका गत वैभव पुन: दिलवाना चाहते थे। दक्षिण में रंगो बापू, विठुर में नाना साहब, दिल्ली के दीवान-ई-खास, फैजाबाद का देशभक्त मौलवी अहमद शाह, जगदीशपुर (बिहार) का वीरवर कुंअर सिंह इस सारे प्रचार का केंद्र थे। कलकत्ता में अवध का नवाब तथा उनका वजीर अलीनकी खां, हैदराबाद, कोल्हापुर तथा नानासाहेब के श्वसुर सांगली के राजा सभी इस महत्वपूर्ण प्रचार कार्य की तैयारी में लगे हुए थे एवं मद्रास तक इस क्रांति युद्ध का प्रचार किया गया। क्रांति को समस्त भारत में 31 मई 1857 ई. को करने का निश्चय किया गया। योजनानुसार सेना के लिए ‘जल कमल’ और नागरिकों के लिए ‘चपाती’ क्रांति के गुप्त संकेत चिह्न थे। कमल का फूल सेना में एक हाथ से दूसरे हाथ में पहुंचाया जा रहा था। समस्त सेना एवं रेजिमेंट में प्रतीक पहुंच जाने का अर्थ था कि वह क्रांति में भाग लेने को तैयार है। इसी प्रकार चपातियां भी देशभर में कोने-कोने में क्रांति का संदेश पहुंचा रही थी। गांवों में चपाती पहुंचाने का कार्य उस गांव का चौकीदार करता था। जिस गांव में जितनी चपातियां पहुंचती थीं गांव वाले उसे ‘प्रसाद’ के रूप में एक-एक टुकड़ा ग्रहण कर उतनी चपातियां बनवाकर दूसरे गांव में भेज देते थे। गांव में चपाती के घूम जाने का अर्थ था कि सारा गांव क्रांति के लिए तैयार है। चपाती से यह अर्थ प्रकट किया गया था कि यदि जनता विद्रोह नहीं करेगी तो उनकी रोटी छीन जाने का भय है।
इन्हीं दिनों सेना में नई ‘एनफिल्ड’ रायफल फौज को पहली बार दी गई थी। उसके कारतूसों की टोपी पर एक विशेष प्रकार की चिकनाई लगा कागज होता था, जिसके किनारों को दांतों से काटना पड़ता था और फिर कारतूस को राइफल में भरना पड़ता था। कतिपय स्थितियों में चिकनाई में गोमांस और सुअर की चर्बी मिली होती थी। जनवरी 1857 ई. में चर्बी लगी कारतूसों का भेद दमदम की छावनी में खुल गया। इस समाचार के फैलते ही हिंदू और मुसलमान सैनिकों में क्रोध की लहर दौड़ गई और वे समझने लगे कि अंग्रेज उनका धर्म भ्रष्ट करने पर तुले हुए हैं। यह समाचार सारे देश में फैल गया और अपने धर्म पर किए जाने वाले इन प्रहारों का बदला लेने की भावना तीव्र हो उठी तथा क्रांति की शुरुआत मंगल पांडे के ऐतिहासिक कृत्य के रूप में फूट पड़ी।

इन्हीं दिनों कलकत्ता के बैरकपुर में 19वीं तथा 34वीं पलटन थी। 19वीं पैदल सेना ने नए कारतूसों को काम में लाने और परेड़ के लिए आने से इनकार कर दिया। इस रेजिमेंट को दण्ड देने और विघटित करने के लिए बर्मा से एक अंग्रेजी सेना बुलाई गई। यह बात दोनों पलटनों के हिंदुस्तानी सिपाहियों को मालूम हो गई और वे क्रोध से भर गए तथा अपनी रेजिमेंट का एक सिपाही मंगल पांडे अपने क्रोध को रोक न सका। यद्यपि विद्रोह की तारीख 31 मई तय की गई थी। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में ब्राह्मण कुल में जन्मा और क्षात्र धर्म में दीक्षित, स्वधर्म पर प्राणों से अधिक निष्ठा रखने वाला, आचरणों से सुशील, स्वभाव से तेजस्वी और आयु से तरुण मंगल पांडे के रक्त में देश की स्वतंत्रता की विद्युत चेतना प्रवेश कर गई थी। 21 मार्च सन 1857 ई. को मंगल पांडे ने परेड़ के मैदान में आकर अपने साथियों को अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए ललकारा। सार्जेंट मेजर ह्यूसन ने सैनिकों को उन्हें गिरफ्तार करने की आज्ञा दी, परंतु कोई भी सिपाही अपने स्थान से हिला नहीं और इधर मंगल पांडे की बंदूक से सन् सन् करके निकली गोली ने ह्यूसन का शव तत्काल भूमि पर पटक दिया। उसी समय लेफ्टिनेंट बॉ भी वहां आ गया और वह भी मंगल पांडे की दूसरी गोली का शिकार बन गया। इसके पश्चात कर्नल ह्वीलर ने गोरे सैनिकों को उन्हें पकड़ने की आज्ञा दी। इस पर मंगल पांडे ने अपनी बंदूक से स्वयं को मारने का यत्न किया किंतु वह केवल घायल ही हुए। मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल किया गया और उन पर दबाव डाला गया कि वे अपने अन्य साथियों का नाम बताए। किंतु मंगल पांडे ने किसी का नाम नहीं बताया और कहा कि ‘मैंने जिस पर गोलियां चलाई उन अंग्रेज अधिकारियों से मेरा किसी तरह का व्यक्तिगत द्वेष नहीं है। मैंने स्वदेश और स्वधर्म की रक्षा के लिए उनका वध किया। न्याय का नाटक करते हुए 8 अप्रैल 1857 ई. को मंगल पांडे को फांसी दे दी गई तथा 19वीं और 34वीं पलटनों को निशस्त्र कर दिया गया।

इसके बाद उत्तर प्रदेश में अलीगढ़, इटावा, मैनपुरी, मुरादाबाद, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर तथा रूहेलखंड में क्रांति की आग भड़क उठी और वहां से अंग्रेजी शासन समाप्त कर दिया गया। अंग्रेज अधिकारी भय से भागने लगे। इसके बाद इस विद्रोह का असर कानपुर, झांसी, मध्य भारत और बिहार में जबरदस्त पड़ा और वहां क्रांति की अग्नि प्रज्वलित हो गई। कानपुर में क्रांति का नेतृत्व नाना साहब, झांसी में महारानी लक्ष्मीबाई, मध्य भारत में तात्या टोपे ओर बिहार की क्रांति का नेतृत्व जगदीशपुर के जमींदार कुंअर सिंह ने किया। क्रांति की ज्वाला पूर्वी उत्तर प्रदेश में पहुुंच गई। आजमगढ़ व बलिया में क्रांति 3 जून को, गाजीपुर व बनारस में 4 जून को तथा जौनपुर में 5 जून को शुरू हुई। 6 जून को इलाहाबाद में 10वीं पलटन ने क्रांति करके अंग्रेजी शासन को समाप्त कर दिया और मौलवी लियाकत अली को वहां का मुखिया तथा दिल्ली के सम्राट को प्रतिनिधि घोषित कर दिया। इस समय कानपुर में नाना साहब उनके भाई बाला साहब तथा भतीजे राव साहब तथा तात्या टोपे जैसे वीर उपस्थित थे। तात्या टोपे ने नाना साहब तथा लक्ष्मीबाई के साथ शिक्षा प्राप्त की थी। कानपुर के साथ 4 जून को झांसी में भी क्रांति हुई और कानपुर में नाना साहब ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर अंग्रेजों को भगा दिया और क्रांतिकारियों ने 7 जून को झांसी से अंग्रेजों को भगाकर 8 जून को वहां का राज्य राजकुमार दामोदर की पालकर्ता महारानी लक्ष्मीबाई को सुपूर्द कर दिया। लखनऊ से 51 मील दूर सीतापुर की छावनी थी। उसके सैनिकों ने 3 जून को क्रांति करके अपने अंग्रेज अफसरों को मार डाला और वहां से फर्रुखाबाद की ओर चल दिए और वहां भी अंग्रेजों को मार कर भगा दिया। सिफोरा, गोंडा, बहराईच तथा मेलापुर को भी अंग्रेजों से मुक्त कर दिया गया। फैजाबाद के राजा मान सिंह तथा ताल्लुकेदार मौलवी अहमद शाह अंग्रेजों के विरोधी थे। अंग्रेजों ने मौलवी अहमद शाह को गिरफ्तार करके उन्हें फांसी का दण्ड दिया था, किंतु फैजाबाद की सेनाओं ने क्रांति का शंखनाद कर उनको जेल से छुड़ा लिया और अहमद शाह के नेतृत्व मेें क्रांतिकारियों ने फैजाबाद को अंग्रेजों से शून्य कर दिया तथा अंग्रेजों को जीवित चले जाने तथा व्यक्तिगत सामान ले जाने की छूट दे दी। इस प्रकार 10 जून तक सारा अवध स्वतंत्र हो गया और वहां वाजिद अली शाह का शासन स्थापित हो गया। इस तरह से क्रांति की ज्वाला सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश, उसके पश्चिमी छोर दिल्ली तथा पूर्वी छोर बिहार के कुछ भागों में फैल सकी थी। ग्वालियर, इंदौर, राजपूताना, भरतपुर आदि की जनता अपने नरेशों के विरोध के कारण इच्छा होते हुए भी क्रांति-यज्ञ में भाग न ले सकी। किंतु ग्वालियर की सेना ने 14 जून को क्रांति का शंखनाद कर ही दिया।

इस समय गवर्नर लार्ड कैनिंग ब्रिटिश राज्य का संचालक था। उसने क्रांति के इतने भीषण रूप को देखा कि उसके धैर्य का बांध टूट गया, परंतु उसने अपनी शक्ति को दृढ़तापूर्वक एकत्रित किया और क्रांति के दमन के लिए हर संभव प्रयास शुरू किए। भारत में विरोधी जातियों को एक दूसरे से लड़वाना प्रारंभ किया ताकि उनकी संगठित शक्ति नष्ट हो जाए।

लार्ड कैनिंग ने सब से पहले दिल्ली पर अपना अधिकार करने के लिए सर हेनरी बनार्ड और ब्रिगेडियर विल्सन के साथ एक विशाल सेना दिल्ली भेजी। बहादुर शाह ने सुबेदार बख्त खां को क्रांतिकारियों का प्रथम सेनापति नियुक्त किया और इसी समय बहादुर शाह का सम्बंधी इलाही बख्श अंग्रेजों से मिल गया और समस्त गुप्त सूचनाएं अंग्रेजों को पहुंचाने लगा। क्रांतिकारियों और अंग्रेजों के बीच 15 सितम्बर से 24 सितम्बर तक दिल्ली के अंदर भीषण युद्ध हुआ और अंत में अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार पा लिया। सेनापति बख्त खां ने बहादुर शाह को दिल्ली से बाहर चलकर युद्ध करने की सलाह दी परंतु इलाही बख्श के बहकावे में आकर उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इलाही बख्श के परामार्श पर सम्राट ने जान बचाने का आश्वासन लेकर कैप्टन हडसन के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, परंतु हडसन ने बहादुर शाह तथा उनकी बेगम जीनत महल को बंदी बनाकर गुप्त रूप से लाल किले में भेज दिया तथा उनके दो पुत्रों व एक पौत्र की गोली मारकर हत्या कर दी तथा तीनों राजपुत्रों के शरीर चांदनी चौक के बड़े दरीबे के दरवाजे पर फेंक दिए और इस तरह बाबर व अकबर के अंतिम चिह्न को मिटा दिया।

उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में क्रांति का दमन करने के लिए जनरल नील मद्रास से एक विशाल सेना लेकर आया। उसने बनारस, गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़ तथा इलाहाबाद पर अधिकार करके अनेक स्त्री-पुरुषों व बच्चों को मौत के घाट उतार दिया। 12 जुलाई को मेजर रेनाल्ड तथा हैवलॉक की संयुक्त सेना ने कानपुर के पास फतेहपुर में ज्वाला प्रसाद तथा टिक्कासिंह के नेतृत्व वाली क्रांतिकारी सेना के साथ युद्ध किया और अंग्रेेजों ने फतेहपुर को लूट कर क्रांतिकारी सैनिकों को जिंदा जला दिया। इस घटना के समाचार से कानपुर के क्रांतिकारी अधीर हो गए तथा उन्होंने बीवीगढ़ नामक स्थान में कैद 150 अंग्रेज स्त्री-पुरुषों को मार दिया तथा उनकी लाशों को पास के एक कुएं में डाल दिया। 1 दिसम्बर से 6 दिसम्बर तक कानपुर में क्रांतिकारियों तथा अंग्रेजों के बीच भीषण युद्ध हुआ। जब क्रांतिकारियों ने देखा कि उनकी पराजय निश्चित है तो तात्या टोपे अपनी सेना के साथ कालपी चले गए और नाना साहब भी वहां से भाग गए। इस प्रकार जनरल कैम्पबेल ने 23 फरवरी 1958 ई. तक कानपुर की क्रांति को पूरी तरह से दमन कर दिया। क्रांति का सब से भीषण स्वरूप लखनऊ में था किंतु हैवलॉक एक विशाल सेना के साथ लखनऊ पहुंच गया और 23 सितम्बर को आलमबाग में क्रांतिकारियों को बुरी तरह परास्त किया। इसके बाद अंग्रंजों ने वहां की जनता पर अमानुषिक और पाशविक अत्याचार किए। सम्पूर्ण शिष्टता, भद्रता व मानवता का परित्याग कर दिया। उनकी पाशविक प्रवृत्ति पूर्ण रूप से जागृत हो चुकी थी। जनरल नील और हैवलॉक की सेनाओं के अमानुषिक कृत्यों ने चंगेज खान और हलाकू के कारनामों को भी निम्नतर बना दिया।

रूहेलखंड में बरेली क्रांतिकारियों का प्रमुख केंद्र था। यहां पर अहमद शाह, नाना साहब तथा बेगम हजरत महल आदि नेताओं ने एकत्रित होकर अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। अंत में भीषण युद्ध में जनरल कैम्पबेल ने बरेली पर अधिकार कर लिया। 80 वर्षीय कुंअर अपने भाई अमर सिंह तथा अन्य दो जागीरदारों- निस्तार सिंह तथा जवान सिंह- के साथ अंग्रेजों से मुकाबला कर रहे थे। उन्होंने आरौलिया, आजमगढ़ में अंग्रेजी सेना के साथ भीषण युद्ध किया तथा अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। इसके पश्चात उन्होंने जगदीशपुर को अंग्रेजों से छीन लिया लेकिन अंत में मेजर आयर ने उन्हें परास्त कर दिया। अंत में 26 अप्रैल 1858 को उनकी मृत्यु हो गई। सन 1857 के जून मास में झांसी में भी क्रांति की लपटों ने भीषण रूप धारण कर लिया था। रानी लक्ष्मीबाई का दमन करने के लिए सर ह्यूरोज के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने झांसी को घेर लिया। आठ दिन तक लगातार युद्ध होता रहा, रानी स्वयं युद्ध का संचालन कर रही थीं। इस बीच रानी की सहायता के लिए कालपी से तात्या टोपे अपनी 22 हजार की सेना लेकर बेतवा नदी तक आ गए किंतु ह्यूरोज ने उन्हें परास्त कर दिया और तात्या की तोपें व रसद अंग्रंजों के हाथ में लग गई किंतु झांसी लेने के ह्यूरोज के प्रयास असफल रहे। अंत में उसने कूटनीतिक चाल चलकर फितुरों को अपनी ओर मिलाकर दुर्ग का द्वार खुलवा लिया और राजमहल पर अधिकार कर सहस्रों रुपये लूट लिए तथा झांसी के मंदिर व मूर्तियों को भी तोड़ दिया। रानी लक्ष्मीबाई ने यह द़ृश्य देखकर अपने 1500 सैनिकों के साथ अंग्रेजों के साथ युद्ध किया और अनेक गोरों को मार डाला। अंत में सुरक्षा का अभाव देखकर रात्रि में पुरुष वेश पहनकर अपने दत्तक पुत्र दामोदर को पीठ पर बांधकर श्वेत घोड़े पर बैठकर शत्रु सेना को चीरती हुई कालपी की ओर चल पड़ी। लेफ्टिनेंट वॉकर ने रानी का पीछा किया। रानी ने वॉकर तथा उसके अनेक साथियों को मार दिया तथा शेष को भागने के लिए विवश कर दिया। अंत में रानी 102 मील की यात्रा समाप्त कर आधी रात में कालपी पहुंची। वहां तात्या टोपे के साथ राव साहब और बांदा का नवाब व दूसरे अनेक क्रांतिकारी नेता विद्यमान थे। ह्यूरोज रानी का पीछा करते हुए कालपी पहुंचा। यहां भी घमासान युद्ध हुआ और यहां से भी निकल जाने में रानी सफल हुई। इसके पश्चात तात्या टोपे तथा रानी ने ग्वालियर पर आक्रमण कर दिया। ग्वालियर का राजा जीवाजीराव सिंधिया तथा उनका मंत्री दिनकरराव, जो अंग्रेजों के समर्थक थे, मैदान छोड़कर भाग गए और रानी ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। ह्यूरोज रानी का पीछा करते हुए ग्वालियर आ पहुंचा और दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। वह स्मिथ की भी सेना को साथ लेकर रानी से युद्ध करने लगा। रानी के साथ उनकी दो सहेलियां मंदार और काशी भी मर्दाने वेश में युद्ध कर रही थीं। ह्यूरोज के जोरदार आक्रमण से क्रांतिकारी सेना तितर-बितर हो गई। विजय की आशा न देखकर रानी ने वहां से हट जाना ही बेहतर समझा। मंदार को गोरे ने गोली मार दी और उसी समय दुर्भाग्य से रानी का घोड़ा एक नाले के पास रुक गया तथा उनका पीछा करते हुए अंग्रेज सैनिक आ गए। एक अंग्रेज सैनिक ने पीछे से रानी पर वार कर दिया, जिससे सिर का दाहिना भाग कट गया। घायल अवस्था में भी रानी ने अनेक अंग्रेज सिपाहियों का वध कर डाला और अंत में वहीं गिरकर वीर गति को प्राप्त हुई।

इस प्रकार अंग्रेजों ने सभी बड़ेे-बड़े क्रांतिकारियों को समाप्त कर दिया। केवल तात्या टोपे ही शेष रह गए, लेकिन उन्होंने संघर्ष जारी ही रखा। उन्होंने 20 जून 1858 ई. को ग्वालियर से चलकर नर्मदा को पार कर दक्षिण भारत में पहुंचने का प्रयास किया। अंग्रेजों ने सोचा कि यदि तात्या कहीं दक्षिण में पहुंच गए तो वहां भी भीषण क्रांति होगी। अंग्रेजों ने विशाल सेना लेकर नर्मदा की घेराबंदी की। इसके बावजूद तात्या नागपुर पहुंचे। अंग्रेज लगातार उनका पीछा कर रहे थे। इसके बाद तात्या बड़ौदा, उदयपुर तथा अलवर पहुंच गए। उसी समय ग्वालियर का एक दरबारी सरदार मान सिंह तात्या के साथ हो गया। अंत में अंग्रेजों ने मान सिंह को घूस देकर उसकी सहायता से तात्या को 8 अप्रैल 1858 को अलवर के जंगलों में बंदी बना लिया। न्याय का नाटक करते हुए अंग्रेजों ने वीरवर तात्या टोपे को 18 अप्रैल 1859 ई. को फांसी दे दी। इसके तीन वर्ष बाद रावाव साहब पकड़े गए और 20 अगस्त 1862 ई. को उन्हें कानपुर में फांसी दे दी गई। फिरोज शाह भेस बदल कर ईरान चले गए और करबला में जा बसे।

इस प्रकार सन 1857 ई. की क्रांति का दमन कर दिया गया और लगभग सभी क्रांतिकारी मारे गए। 1857 की क्रांति असफल जरूर हुई लेकिन यह क्रांति स्वतंत्रता संग्राम में पहला अध्याय था। इस क्रांति से हिंदुस्तान की एकता, अखंडता, स्वतंत्रता व जनशक्ति के जागरण की दिशा में भरपूर प्रगति हुई। सन 1857 ई. की क्रांति में देशभक्त क्रांतिकारियों ने अपनी उष्ण रक्त प्रवाहित करने वाली तलवारों को उठाकर क्रांति के अग्निमय रंगमंच पर प्रवेश किया था और प्रत्यक्ष मृत्यु का आलिंगन कर झूम उठे थे। उनकी पावन प्रेरणा से भारत माता की गहन निद्रा भंग हुई थी और पराधीनता की बेड़ियों को काटने के लिए सम्पूर्ण हिंदुस्तान जागृत हो उठा था।
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