शराईघाट का वीर

असम के इतिहास का एक कलंकित पृष्ठ उनकी आंखों के सामने फिर से फड़फड़ाने लगा। हृदय में उठती टीस ने उन्हें व्यग्र कर दिया। आहोम राज्य की राजधानी गढ़गांव में सभी जन निद्रा देवी के आगोश में समाये थे, परन्तु अपने पर्यंक पर लेटे महाराज चक्रध्वज सिंह की आंखों में नींद प्रवेश नहीं कर पायी। एक दीपक की बाती ही बस उनका साथ दे रही थी। उनके मानस-पटल पर रमणी आइदेव (मातृदेव) का बिम्ब रह-रह कर उभर आता। उन्हें किसी भी क्षण दिल्ली से आइदेव के पत्र की प्रतीक्षा थी। रात्रि का दूसरा प्रहर आरम्भ हुआ। प्रहरी ने आकर उन्हें एक पत्र थमाते हुए कहा, “स्वर्गदेव (महाराज)! आपकी आज्ञानुसार दिल्ली से आये कटकी (दूत) से यह पत्र लेकर उसे विश्राम करने अतिथिशाला भेज दिया है। अब मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

“तुम! अतन बूढ़ागोहाइं (प्रधान मंत्री), बरगोहाइं (उप प्रधान मंत्री) तथा बरपात्रगोहाइं (मंत्री) को अभी उपस्थित होने का संदेश भिजाकर मंत्रणा-कक्ष में जाकर दीप प्रज्वलित कराओ।”

मंत्रणा-कक्ष में मंत्री-परिषद के पहुंचने की सूचना पाकर महाराजा चक्रध्वज सिंह पधारे। अतन बूढ़ागोहाइं ने बात आरम्भ करते हुए कहा, “आप सभी जानते हैं कि हमारे स्वर्गदेव (महाराजा) के स्वर्गीय पिता जयध्वज सिंह के शासनकाल में दिल्ली में मुगल सिंहासन के लिए गृह-कलह चल रही थी जिसका कूटनीतिक लाभ उठाते हुए उन्होंने मुगलों के अधीन गुवाहाटी से उन्हें खदेड़ कर कामरूप और ग्वालपाड़ा का भी उद्धार किया था। इतना ही नहीं उन्होंने सोनकोष नदी तक अपने राज्य का विस्तार कर पूरी ब्रम्हपुत्र उपत्यका को आहोम शासन के अंतर्गत कर लिया।”

बरगोहाइं ने उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “लेकिन औरंगजेब के बादशाह बनने के बाद उसके आदेश पर बंगाल के सुबेदार मीर जुमला ने फिर हम पर आक्रमण किया। उसकी सेना ने पाण्डु, गुवाहाटी, काजली, कलियाबर, शिमुलगढ़ सहित गढ़गांव तक को जीत लिया और हमारी जनता पर अमानुषिक अत्याचार किये। उसने यहां राज परिवार की मैदामों (समाधियों) तक को नहीं छोड़ा। धन की लालच में उन्हें खोदा और उनमें दबी हुई अथाह सम्पति उसने लूटी। उन बातों को हम भूले नहीं हैं।”

“आखिर विवशतावश उससे स्वर्गदेव जयध्वज सिंह को संधि करनी पड़ी और युध्द-क्षति के रूप में तीन लाख रुपये और नब्बे हाथी देना स्वीकारना पड़ा। संधि की जो सबसे लज्जाजनक शर्त थी वह आज भी मेरे हृदय में शूल की भांति चुभ रही है। मीर जुमला औरंगजेब के मुगलिया हरम के लिये स्वर्गदेव की युवा पुत्री रमणि गाभरू और भतीजी तिपाम राजकन्या को दिल्ली भेजने अपने साथ ले गया था।” चक्रध्वज सिंह ने इतना कहकर दीर्घ नि:श्वास लिया।

बरगोहाइं नेे कहा,“ राजकन्याओं और युद्ध खर्च लेकर मीर जुमला ने गढ़गांव तो छोड़ दिया, किन्तु यहां के भयंकर मौसम ने उसे नहीं छोड़ा और असम की सीमा में ही उसकी कब्र बन गयी। जाते-जाते वह अपने अधीनस्थ सीमा में फौजदार रसीद खां को प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त कर गया था।”

“हमारे पिता स्वतंत्रता की अतृप्त प्यास लिये ही स्वर्ग सिधार गये, परन्तु हमें अपने राज्य का कोई भी भाग मुगलों की अधीनता में रहना स्वीकार नहीं था। इसलिए अपने मोमाइ तामुली बरबरुवा के समरकुशल पुत्र लाचित को अपना बरफुकन (सेनापति) बनाया। उसके कुशल नेतृत्व में आहोम सेना ने गुवाहाटी पर पुन: अधिकार कर फिर एक बार मुगलों को असम-सीमा के बाहर खदेड़ा। इन बातों से आप सभी अवगत हैं। अब हमारी सेना और नौ-शक्ति सुदृढ़ है। सेना के लिए धन-धान्य की भी समुचित व्यवस्था है। हम किसी भी आक्रमण को विफल करने में सक्षम है।” चक्रध्वज सिंह इतना कहकर दिल्ली से आये पत्र को बरपात्रगोहाईं को देते हुए कहा, “अब आप इसे पढ़कर सबको सुनायें”

पत्र में लिखा था- “स्वर्गदेव! मराठा वीर शिवाजी के आगरा दुर्ग से पलायन कर जाने से औरंगजेब पहले से ही क्षुब्ध था कि फौजदार फिरोज खां के अधीन गुवाहाटी पर आहोम सेना द्वारा अधिकार कर लिये जाने की बात जानकर और मुगल सेना की हार से वह और तिलमिला गया है। वह शकी स्वभाव का है। उसे यह संदेह भी सता रहा है कि शिवाजी को पलायन कराने में आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह ने सहायता की है, किन्तु वह उसे प्रत्यक्ष रूप से सजा नहीं दे सकता, क्योंकि उसे राजपूतों के विद्रोह कर देने का भय है। इसलिए उसने रामसिंह को सुसज्जित विशाल वाहिनी के साथ फिर से असम विजय करने के लिए भेजा है। उसका शायद यह सोचना है कि असम जैसे खतरनाक मोर्चे पर वह जीतता है तो असम फिर से उसके राज्य के अधीन हो जायेगा और अगर वह मरता है तो एक कांटा निकल जायेगा। रामसिंह असम के काले जादू से भयभीत है। सुना है कि इससे बचने के लिए वह रास्ते में पटना में सिख गुरु तेग बहादुर से मिलेगा और उन्हें सहायता के लिए असम आने के लिए कहेगा।

“स्वर्गदेव! मैं मुगल जनानखाने में रहमन बानू बनकर अपने दुर्दिन कैसे-तैसे काट रही हूं, किन्तु मेरे और तिपाम बाइदेव (भगीनी देव) के भाग्य में जो दुर्भाग्य आया वैसा असम की किसी कन्या के भाग में न आये और उन्हें अपना धर्म बदलने के लिए यह विधर्मी बादशाह मजबूर न कर सके। यही मेरी प्रार्थना है।”- रमणी गाभरू।

पत्र के शब्दों की स्याही सभी की आंखों से बहकर मानो उनके गालों को भी स्याह कर गयी। कक्ष का वातावरण विषादमय हो गया। दीपशिखाएं धुंधला गयीं। सबके गले अवरुद्ध हो गये। वहां छाये सन्नाटे को तोड़ते हुए अतन बूढ़ागोहाइं की आवाज गूंजी, “स्वर्गदेव! आज संध्या बीतने के बाद ही गुप्तचर ने आकर सूचित किया था कि रामसिंह पहले औरंगजेब के मामा और बंगाल के नवाब शाहिस्त खां से ढाका जाकर मिला है। यह वही शाहिस्त खां है जिसकी उंगलियां शिवाजी ने काट ली थीं और किसी तरह वह अपनी जान बचाकर भागा था। रामसिंह उसकी सैन्य सहायता लेकर कुल 63,000 सैनिकों की फौज, जिसमें करीब चालीस हजार पदाति, इक्कीस हजार अश्वारोही, पंद्रह सौ तीरंदाजों के अलावा पांच सौ बंदूकची भी हैं- के साथ असम के विजय-अभियान पर निकल पड़ा है। रामसिंह असम के काले जादू से इतना भयभीत है कि बंगाल से जादू-टोटके के जानकार चार पीरों को भी साथ लेकर आ रहा है।”

अपने अवसाद से मुक्त होकर चक्रध्वज सिंह ने पूछा, “अब आप लोगों की क्या राय है?”
“मेरी समझ में रामसिंह के रंगामाटी पहुंचते ही उसे घेर कर मोर्चा लिया जाए।”- बरपात्रागोहाइं ने कहा।
“रंगामाटी में मुगल सेना से भिड़ना हमारे लिए हानिकारक हो सकता है।” अतन बूढ़ागोहाइं ने सलाह देते हुए आगे कहा, “रंगामाटी समतल क्षेत्र है। शस्त्रास्त्र से सुसज्ज शत्रु-सेना हमसे भारी है और ढाका से वह इलाका नजदीक होने से मुगल सेना को रसद, गोला-बारूद भी आसानी से मिलते रहेंगे। किन्तु गुवाहाटी तक आते-आते उनकी सेना की पूर्ति-रेखा दुगुनी लम्बी हो जायेगी। यहां की भयानक मौसमी बरसात और बाढ़ भी उनके लिए मुसिबत बनेंगे, क्योंकि मुगल सेना इनकी अभ्यस्त नहीं है। छापामार तंत्र से अपनी हानि हुए बिना हम दुश्मन को ज्यादा हानि पहुंचा सकते हैं। ब्रह्मपुत्र को पार करना भी उनके लिए सहज नहीं होगा, फिर गुवाहाटी पहाड़ियों से घिरा है, वहीं मोर्चा लेना हमारे लिए सबसे ज्यादा निरापद होगा।”

सेनापति रामसिंह ने ग्वालपाड़ा के रंगामाटी पर सहज ही अधिकार कर लिया और गुवाहाटी के पास ब्रह्मपुत्र के उत्तर पार के अगियाठुरी पहाड़ तक आ पहुंचा। वहां के हाजो स्थित हयग्रीवमाधव और केदारनाथ मंदिर में जाकर उसने अपनी विजय के लिए पूजा की।
लाचित बरफुकन और रामसिंह की सेना ब्रह्मपुत्र के दोनों किनारों पर खड़ी थी। ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी तट पर बसे गुवाहाटी के इटाखुली पहाड़ स्थित दुर्ग पर स्वयं लाचित अपने सरदारों और सैनिकों के साथ डटे थे। ब्रह्मपुत्र में नावों का बेड़ा तैयार खड़ा था। लाचित को पता चला कि ब्रह्मपुत्र के उस पार स्थित अमीनगांव के पास एक दुर्ग की प्राचीर कमजोर है। उसकी मरम्मत का काम उन्होंने अपने मामा के सुपुर्द कर कहा, “मामा! यह काम रात-दिन एक करके किसी भी तरह सुबह तक पूरा हो जाना चाहिये। शत्रु का क्या भरोसा, कब अचानक आक्रमण कर दे। यह याद रखना कि दुश्मनों की सेना आपसे ज्यादा दूर नहीं है। यह अत्यंत आवश्यक और गुरुत्तर कार्य है, इसीलिए आपके जिम्मे किया है।”

रात को अचानक काम देखने लाचित घोड़े पर चढ़कर आये। काम बंद देखकर उनकी आंखों में लहू उतर आया। सोये हुए मामा को जगाकर लाचित ने पूछा, “मामा! काम कैसे बंद है? शत्रु दहलीज पर खड़ा है और तुम काम छोड़कर चैन की नींद सो रहे हो!”
“अरे लाचित, तुम! जो काम बाकी रह गया है उसे अभी आरम्भ कराये देता हूं। मैं बहुत थक गया था, इसलिए विश्राम करने चला आया। लगता है कि मेरे पीछे दूसरे लोग भी सो गये। तुम चिन्ता मत करो।”

“तुम जैसे लोगों की वजह से ही देश परतंत्र होता है। मौत और दुश्मन कभी पूछकर आते हैं? तुम भी अपने आखिरी प्रयाण के लिए तैयार हो जाओ”- कहते हुए लाचित ने अपनी तलवार म्यान से निकाल ली।

“तुम मेरे पर, अपने मामा पर तलवार का वार करोगे?” भयभीत मामा ने अविश्वास प्रकट किया।
“गद्दार! मेरे लिए देश से बढ़कर मामा नहीं।” इतना कह तलवार के एक आघात से मामा का सिर धड़ से अलग कर दिया। यह दु:साहस देखकर सभी अवाक् रह गये। सैनिकों के कौतूहल को शांत करते हुए लाचित ने आज्ञा दी, “अपना समय और नष्ट किये बिना काम को पूरा करो और जल्द से जल्द इस गद्दार की लाश को मेरे सामने से हटाओ।” अब तक काम फिर शुरू हो चुका था और सूर्योदय के पहले दुर्ग की अभेद्य प्राचीर की मरम्मत पूरी हो गयी। वह दुर्ग ‘मोमाइकाटा गढ़’ कहलाने लगा।

लाचित ने मुगल सेना से लड़ने के लिए कूर्मनीति अपनायी। संकट दिखे तो कछुवे की तरह अपने खोल में सिमट जाओ और अवसर देखकर शत्रु पर आक्रमण कर उसे नुकसान पहुंचाओ। रामसिंह और उसकी सेना इस लुका-छिपी के खेल से तंग आने लगी।

मुगल सेनापति रामसिंह एक अनुभवी सेनापति था उसे असम के विकट जंगलों, पहाड़ों और भयावह जलवायु का पूर्वानुमान था। उसे यह भांपते देर न लगी कि लाचित जो इस वक्त छुटपुट धावे कर रहा है, वह केवल मुगल सेना को उलझाये रखने मात्र के लिए है। असमिया सेना को हराने के लिए उसे मैदानी इलाके में लाना होगा। वह लाचित को इसके लिए उकसाने के तरह-तरह के उपाय करने लगा।
एक दिन रामसिंह ने सरसों के दानों से भरा एक थैला अपने दूत के हाथ में देकर हा, “लाचित के पास जाकर उसे बताओ कि हमारे पास थैले में जितने दानें हैं उतनी हमारी सेना है। तुम्हारे पास बारुद कम हो तो हम भेज देते हैं।”

लाचित बरफुकन ने प्रत्युत्तर में दूत के हाथ सरसों के तेल की शीशी और बालू भरा थैला देकर संदेश भेजा, “लड़ने से हम जरा भी नहीं डरते हैं, किन्तु तुम लोगों को लड़ने की इतनी ही खुजली है तो दक्षिण में शुवा (शिवाजी) के साथ क्यों नहीं लड़े और उन्हें धोखे से क्यों कैद किया? तुम्हारी सरसों के दानों जितनी सेना को पीसकर शीशी जैसा तेल निकाल देंगे। तुम्हारी सेना सरसों के दानों जितनी है तो मेरी सेना बालू के कणों जितनी है। तुम्हें तो गोला-बारुद बहुत दूर से लाना पड़ता है, हमारे पास इसका अक्षय भंडार है, तुम्हें चाहिये तो हम भेज देंगे। किन्तु हम मरते दम तक तुम से लड़ेंगे।”

दो सालों तक छिटपुट लड़ाइयां चलती रहीं। कभी छापामार युद्ध तो कभी संधिवार्ता के प्रयत्न। असमिया सेना अपने गोरिल्ला आक्रमण प्राय: रात में ही करती थी। युद्ध की इस स्थिति से विरक्त होकर रामसिंह ने एक प्रस्ताव भेजा, “दोनों ओर से इतना प्राणनाश करने के बदले असम के राजा मुझसे द्वंद्व युद्ध करें और जिसकी विजय हो उसकी शर्तों पर संधि कर ली जाए।”
इस पर लाचित बरफुकन ने कहला भेजा, “तुम औरंगजेब के नौकर हो। हमारे स्वर्गदेव चक्रध्वज सिंह किसी नौकर से युद्ध नहीं करेंगे, चाहे तो स्वयं औरंगजेब आ जाए, उससे वे अवश्य युद्ध करेंगे।”

आखिर हताश होकर रामसिंह ने भेदनीति का सहारा लिया। लाचित के नाम एक पत्र लिखकर उनके सहयोगी सरदार मिरि संदिकै फुकन के हाथों में चालाकी से उसे पहुंचाया। पत्र में लिखा था, “लाचित बरफुकन, कल ही तो तुमने हमसे एक लाख रुपये लेकर मान्य किया था कि युद्ध नहीं करूंगा। विश्वास है कि तुम मुगल सेना से केवल युद्ध का दिखावा मात्र करते हुए अपने वचन का पालन करोगे। – तुम्हारा शुभचिंतक, राजा रामसिंह”

मिरि संदिकै ने वह पत्र चक्रध्वज सिंह के पास गढ़गांव भेज दिया। पत्र पढ़कर राजा की भौंहें तन गयीं, “अब समझा कि लाचित देशद्रोह पर उतर आया है, तभी तो मुगलों से आमने-सामने की लड़ाई में नहीं उतरता।”

“स्वर्गदेव! ऐसा सोचना तो अपने आप पर संदेह करना है।” बूढ़ागोहाइं ने इतना कहकर आगे समझाया, “इसमें जरूर कोई छलना है।”
“हम कुछ नहीं सुनना चाहते। लाचित को आदेश भिजवाइये कि वह अपनी राजभक्ति का प्रमाण दे अथवा बरफुकन कहलाना छोड़ दे।”
“स्वर्गदेव! आपकी आज्ञा मैं अभी उसे भिजवा देता हूं। आपकी तबियत ठीक नहीं है, इस समय आप अपने शयनकक्ष में जाकर विश्राम कीजिये।”

लाचित ने अपने सैनिकों में जोश भरते हुए कहा, “मैं जानता हूं कि खुले मैदान में मुगल सेना को मात देना मुश्किल है, किन्तु गढ़गांव से मिले स्वर्गदेव के आदेश पर हमें इस युद्ध के लिए मैदान में उतरना पड़ेगा। यह लड़ाई रामसिंह की सोची-समझी योजना के अनुसार हो रही है।”

असमिया सेना ने मुगल सेना का दृढ़तापूर्वक मुकाबला किया। रामसिंह ने लाचित की सेना का अपनी सेना पर भारी पड़ते देखकर अपनी घुड़सवार सेना को दूसरी ओर से आक्रमण करने की आज्ञा दी। अचानक हुए हमले से आहोम सेना के पग उखड़ गये और युद्ध में दस हजार असमिया सैनिक मारे गये। इससे लाचित शोकमग्न हो गये, उनकी आंखें छलछला आयीं।

इतनी सैन्य हानि करके भी रामसिंह कुछ हासिल नहीं कर सका। आखिर अपनी शान बचाने के लिए उसने लाचित को फिर एक संदेश भेजा, “मैं तुम सब लोगों को मुंहमांगा धन दूंगा। केवल गुवाहाटी मुझे सौंप दो। मैं संधि कर वापस लौट जाऊंगा।”
इसका लाचित बरफुकन ने उत्तर दिया, “हमारे स्वर्गदेव उदयगिरी (पूर्व) के राजा हैं और तुम्हारे बादशाह औरंगजेब अस्तगिरी (पश्चिम) के राजा। तुम और हम तो सेवक हैं। हम सेवकों के बीच संधि नहीं हो सकती।”

इस बीच चक्रध्वज सिंह की मृत्यु हो गयी और उनका भाई उदयादित्य राजा बना। उदयादित्य में चक्रध्वज जैसी योग्यता नहीं थी। वह चापलूसों से घिरा था, प्रजा के कष्ट बढ़ गये थे। बड़े-बड़े सरदारों और मंत्रियों के परिवार उसके द्वारा लांछित हो रहे थे। इन समाचारों को जानकर लाचित बड़े व्यथित हुए और उनका मन एकबार गढ़गांव जाने को हुआ, किन्तु उन्होंने गुवाहाटी का मोर्चा नहीं छोड़ा। उन्होंने मन में निर्णय किया, “उनकी निष्ठा किसी व्यक्ति के प्रति नहीं, राज्य और प्रजा के प्रति है। अगर इस समय गुवाहाटी छोड़कर चला जाऊंगा तो सारे बलिदान व्यर्थ चले जायेंगे। दस हजार रणबांकुरों का आत्म बलिदान व्यर्थ चला जायेगा जिसका अभिशाप उसके सिर पर होगा।”
ढाई-तीन साल से डेरा डाले पड़ी मुगल सेना उबने लगी। दिन आते रहे, रातें जाती रहीं। मूसलाधार वर्षा शुरू हो गयी। रामसिंह भी समझ गया कि जलयुद्ध किये बिना गुवाहाटी को नहीं जीता जा सकता। उसने हजारों कारीगर लगाकर सैनिकों, अश्वारोहियों, तोपें चढ़ाने के लिए छोटी-बड़ी अनेक नौकाएं तैयार करा रखी थीं। वर्षाकाल समाप्त होते ही उसने आक्रमण करने की ठान ली।

एक दिन गुप्तचर ने आकर रामसिंह से कहा, “इस समय लाचित बरफुकन सन्निपात ज्वर से पीड़ित होकर मूर्च्छा की स्थिति में पड़ा है। उस पर आक्रमण करने का यह अच्छा अवसर है।” यह जानकर रामसिंह ने हमला करने का आदेश दे दिया। मुगल नौकाएं बंदूक और तोपों की मार करते हुए शराईघाट की ओर आगे बढ़ने लगीं।

बरफुकन की बीमारी की बात सैनिकों में दावानल की तरह फैल गयी। सैनिक हताश होकर अपनी नावों में उलटे भागने लगे। यह स्थिति देखकर ब्रह्मपुत्र के उत्तर पार अश्वक्लांत पहाड़ी पर डटी हुई असमिया सेना में भी खलबली मच गयी। भीषण बुखार में भी लाचित बरफुकन अपने इटाखुली दुर्ग से मुगलों का आक्रमण देख रहे थे। सारी स्थिति को भांपकर वे युद्ध में जाने को उद्धत्त हुए।
“आपकी तबियत इस लायक नहीं कि आप युद्ध कर सकें।”- वैद्य ने लाचित को समझाया।

“मैं भी आपको युद्ध में जाने की सलाह कदापि नहीं दूंगा।”- राजज्योतिषी ने भी वैद्य की बात का समर्थन करते हुए आगे कहा, “मेरी गणना के अनुसार इस समय आपका युद्ध के लिए प्रस्थान करना हानिकारक हो सकता है।”

“इससे बढ़कर क्या हानि हो सकती है कि शत्रु हमारी भूमि को हड़प ले और हम मुंह देखते रह जायें। यहां बिस्तर पर मरने से तो अच्छा है कि मैं युद्ध करते हुए मरूं।” लाचित ने दृढ़तापूर्वक आगे कहा, “मुझे युद्ध में जाने से कोई ज्योतिषीय गणना नहीं रोक सकती।”
बिस्तर से उठने की भी लाचित बरफुकन की अवस्था न थी, फिर भी उन्होंने एक सैनिक का सहारा लेकर उठते हुए अपने सहयोगियों से कहा, “तुम मेरा पलंग उठाकर नौका में रखो। इस वक्त एक-एक पल हमारे लिए भारी है, जरा-सी चूक भी हुई तो सारी सेना का विनाश निश्चित है। सामने देखो, मुगल सेना की नौकाएं अश्वक्लांत से आगे उमानन्द द्वीप तक पहुंच रही हैं।”

इतिहास भी वह अविस्मरणीय दृश्य देख रहा था। एक और ब्रह्मपुत्र में पूर्व की ओर बढ़ती मुगलों की सैकड़ों नौकाएं, दूर भागती असमिया सेना की नावें और दूसरी ओर जलधारा के साथ बहती हुई एकमात्र नौका पर क्रोध से उन्मत्त अपना खड्ग हाथ में लिये खड़े वीर लाचित बरफुकन। ऐसे साहसी क्षण ही इतिहास में अमर होते हैं, इतिहास की धारा पलटते हैं। दुश्मनों पर अपनी रुग्णावस्था के उपरांत भी अकेले टूट पड़े अपने सेनापति को देखकर आहोम सेना में तीव्र आवेश पैदा हुआ। नौकाओं के मुंह फेर दिये गये। नाव से नाव भिड़ गयी। घमासान युद्ध छिड़ गया।

लाचित ने अपनी सेना को ललकारा, “वीरों! मुगलों को इस बार ऐसा सबक सिखाओ कि फिर कभी भविष्य में ये असम की ओर रुख करने का साहस न कर सके। यह इनके साथ आखिरी और निर्णायक युद्ध होना चाहिये। इस अवसर को चूक गये तो असमिया बुरंजी (इतिहास) तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेगी।”

इस वाणी ने असमिया वीरों में नयी स्फूर्ति भर दी और वे दुगुने जोश से जी-जान की बाजी लगाकर लड़ने लगे। असमिया नौवाहिनी के गोताखोरों ने ब्रह्मपुत्र की ऊपर से शांत दिखनेवाली, किन्तु भीतर से अति प्रवाहमान धारा में गोते लगाकर मुगलों की अनेक नावों में छिद्र कर-कर उन्हें डुबो दिया।

इस प्रबल प्रत्याक्रमण से मुगल सेना के पैर उखड़ने लगे। अपने सिपहसालार रहीम खां को असमिया सेना द्वारा मारा गया देखकर वे और हताश हो गये। स्वयं रामसिंह भी उस प्रत्याक्रमण के सामने नहीं टिक पाया। वह समझ गया कि असमिया सेना के साथ जलयुद्ध में और जूझना आत्मघात के समान होगा। आखिर मुगल सेना के सामने शराईघाट छोड़कर पीछे हटने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा।

लाचित की सेना ने भागती मुगल सेना की नौकाओं और शस्त्रों को लूटने की लाचित से अनुमति मांगी, परन्तु लाचित ने कहा, “इन भगौड़ों को लूटकर मैं स्वर्गदेव और अपने मंत्रियों की प्रतिष्ठा पर बट्टा नहीं लगाना चाहता। जाओ, शत्रु को असम की सीमा के बाहर मानाह नदी के पार खदेड़कर आओ।”

शाम ढल रही थी, शराईघाट की पहाड़ियों के पीछे उतरते सूरज की रंगोली का रंग धीरे-धीरे ब्रह्मपुत्र में घुल रहा था, जिसके साथ मिली रणबांकुरों के लहू की लालिमा से उसका जल और भी लाल होकर अपने ‘लोहित’ नाम को सार्थक करने लगा।
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