उचित व्यक्ति ही राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर जाना चाहिए-मा. भैयाजी जोशी

वर्तमान स्थिति में, भारत के अधःपतन के लिए कौन उत्तरदायी है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि इस देश में जो भी समस्याएं हैं उनके लिए बाहरी शक्ति की अपेक्षा हिंदू समाज ही जिम्मेदार है। संघ की आरंभ से ही सोच है कि अगर कोई काम करना है तो वह हिंदू समाज के मध्य ही करना होगा। हिंदू समाज में ही परिवर्तन होता है तो परिणामतः सारे अधःपतन या कई प्रकार की समस्याओं से देश और समाज मुक्त हो जाएगा। इस भूमिका को ही लेकर संघ का कार्य प्रारंभ से अब तक चलता आया है।

विशाल हिंदू समाज में आपसी बिखराव है। वह जातियों, भाषाओं के, पूजा पद्धति के आधार पर है। अपने दायित्व को समझ कर अपने समाज के लिए हमें सक्रिय होकर काम करना चाहिए। अपने समाज में यह आत्मविश्वास आना चाहिए कि हम शक्ति के साथ दुनिया के समक्ष खड़े हो सकते हैं। अपनी संस्कृति तथा अपने विचारों के प्रति स्वाभिमान का भाव होना चाहिए। उस स्वाभिमान की कमी अपने समाज में आज दिखाई देती है। मैं मानता हूं कि स्व का परिचय न होना यही मूल कारण है। इसलिए इन सभी अभावों पर गौर करने की आवश्यकता है। सामाजिक जीवन में अनुशासनहीनता क्षरण का एक कारण है। इसलिए समाज अनुशासित होना चाहिए। सद्गुणों का अतिरेक भी हिंदू समाज के पतन का कारण है। हिंदू समाज के इन अभावों का बाहरी शक्तियां आज तक लाभ उठाती आई हैं। इसी कारण अधःपतन की गति अधिक हो गई है। जब तक हिंदू समाज जागृत होकर खड़ा नहीं होता है तब तक इस प्रकार के क्षरण से, अधःपतन से समाज कैसे सुरक्षित रहेगा?

वर्तमान स्थिति में राष्ट्र में परिवर्तन लाने की उम्मीद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ही समाज क्यों कर रहा है?

संघ सभी प्रकार की संकुचित बातों से ऊपर उठकर कार्य करता है। संघ सम्पूर्ण समाज को स्वस्थ बनाने की बात करता है। इसलिए स्वाभाविक रूप से संघ याने स्व से लोग अपेक्षा रखते हैं। जब संघ ने समाज में व्याप्त दोषों के संदर्भ में क्रमशः सोचना प्रारंभ किया तब ध्यान में आया कि समाज के एक वर्गविशेष के लिए काम करके नहीं चलेगा। समाज के अनपढ़, पढ़े-लिखे, निर्धन, सम्पन्न सभी स्तर के वर्गों, सभी प्रकार की जाति-बिरादरी के सम्मुख जाकर काम करना होगा। संघ का काम उसी दिशा में चलने के कारण स्वाभाविक रूप से लोग संघ से अपेक्षाएं रखते हैं। इसका एक अन्य पहलू भी है। जब समाज में कई प्रकार के दोष निर्माण होते हैं तब समाज जीवन से जुड़े सभी क्षेत्रों में जाकर हिंदू जीवन प्रणाली के, चिंतन के आधार पर रचना बनाना आवश्यक है। संघ की प्रेरणा से हिंदू जीवन-चिंतन पर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करना प्रारंभ किया। इस रचना के आधार पर ही देश में सभी क्षेत्रों में हो रहे अधःपतन को रोका जा सकता है। देश की सज्जन-शक्ति संघ से यही अपेक्षा रखती है।

राष्ट्र जीवन समृद्ध करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 6 सरसंघचालकों ने अब तक अपना योगदान संघ-कार्य के विस्तार के लिए दिया है। संघ-कार्य के विस्तार में इन सभी की अपनी-अपनी खास कार्य-विशेषताएं रही हैं। आपकी राय में ये विशेषताएं क्या हैं?

पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने रा.स्व.संघ के कार्य का प्रारंभ किया है। डॉक्टरजी ने उस समय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही एक प्रकार का ऐसा भिन्न कार्य आरंभ किया, जो इस देश की मूलभूत समस्याओं का समाधान करेगा। प्रारंभ में इस कार्य में कई प्रकार की कठिनाइयां आईं। जब कोई भी नया कार्य आरंभ करना हो और प्रचलित पद्धति से हटकर करना हो तो उसमें समाज का सहयोग प्राप्त करना बहुत कठिन बात होती है। विद्वजन, डॉक्टरजी के विचार से सहमत होते हुए भी, विश्वास के अभाव के कारण पूजनीय डॉक्टरजी के कार्य के साथ खड़े नहीं हो पा रहे थे। इसलिए पूजनीय डॉक्टरजी ने समाज से यह नहीं पूछा कि यह कार्य कौन करेगा? उन्होंने कहा, ‘यह कार्य मैं करूंगा।’ इस तरह उन्होंने अपने आप को इस कार्य के लिए समर्पित कर दिया। डॉक्टरजी की सोच थी कि समाज में सब से पहले यह विश्वास पैदा होना चाहिए कि हिंदू समाज संगठित हो सकता है। दूसरी बात उन्होंने यह सोची कि साधन क्या होगा। उन्होंने हिंदू समाज का संगठन खड़ा करने के लिए ‘शाखा’ के रूप में साधन भी दिया। शाखा में लोग निस्वार्थ भाव से आएंगे, समाज के संदर्भ में सोचना प्रारंभ करेंगे। ‘हम सब एक हैं’ यह भाव संघ स्थान पर निर्माण होगा। इस प्रकार का प्रभावी साधन डॉक्टरजी ने प्रस्तुत किया। सिर्फ साधन ही पर्याप्त नहीं होता है, साधन को क्रियान्वित करने के लिए कुछ पद्धतियां विकसित करनी पड़ती हैं। ये पद्धतियां पूजनीय डॉक्टरजी के चिंतन की देन हैं। जो भी आते गए उन्हें अपने समाज की ओर देखने की दृष्टि देते गए, राष्ट्रीय सोच देते गए। वे हमेशा कहा करते कि, ‘हम किसी के शत्रु नहीं, न कोई हमारा शत्रु है।’ डॉक्टरजी ने इस प्रकार की सकारात्मक सोच संघ स्वयंसेवकों को दी है। उन्हें 1925 से लेकर 1940 तक का समय मिला। इन 15 वर्षों में उन्होंने हिंदू समाज के सामने यह सशक्त उदाहरण पेश किया कि हिंदू संगठन हो सकता है, यह केवल कल्पना नहीं है। पू. डॉक्टरजी का संघ के प्रथम सरसंघचालक के रूप में यह महत्वपूर्ण योगदान है।

इसके बाद पूजनीय श्रीगुरूजी का कालखंड प्रारंभ होता है। पूजनीय श्रीगुरुजी को 33 वर्ष की प्रदीर्घ अवधि मिली। पूजनीय श्रीगुरुजी ने संघ-कार्य को वैचारिक अधिष्ठान दिया। उन्होंने यह विचार दिया कि केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, केवल चुनौतियों को सामने रखकर नहीं; बल्कि संघ-कार्य एक वैचारिक अधिष्ठान पर खड़ा है उसके लिए हमें काम करना है। 1940 से लेकर 1973 तक की प्रदीर्घ अवधि में संघ-कार्य के विस्तार में उनकी बहुत बड़ी भूमिका रही है। एक शक्ति के रूप में संघ खड़ा हुआ यह उनका योगदान है। राष्ट्र के समग्र विकास के लिए असंख्य संघ स्वयंसेवकों को प्रेरणा देकर उन्हें विभिन्न प्रकार के सामाजिक क्षेत्रों में कार्य करने के लिए प्रेरित किया और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश की मूलभूत समस्याओं की ओर देखने की दृष्टि कार्यकर्ताओं को दी।

उनके बाद पूजनीय बालासाहब देवरसजी संघ के सरसंघचालक बने। उनके कार्यकाल में परिवर्तन की प्रक्रिया को गति मिली। उनकी दृष्टि थी कि समाज की कई समस्याओं पर सोच विकसित होनी चाहिए और एक सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया आरंभ होनी चाहिए। उनकी सोच थी कि हिंदू समाज की संगठित शक्ति से ही सामाजिक विषमता समाप्त होगी। समाज में आपस में खाई रही तो समाज की समस्याएं समाप्त कैसी होगी? यह संभव नहीं है। सभी प्रकार की विषमताओं से मुक्त, अन्यायों से मुक्त, भेदभाव से मुक्त, शोषण मुक्त समाज का चित्र उन्होंने स्वयंसेवकों के समक्ष रखा। उनका कहना था कि जब तक समाज अंतःकरण में हमें स्वीकार नहीं करेगा तब तक इन समस्याओं का हल नहीं होगा। संघ के जिन सफल सेवा कार्यों की आज हम चर्चा करते हैं उन सेवा कार्यों की नींव उनके कार्यकाल में रखी गई। निमित्त बना पू. डॉक्टरजी की जन्म शताब्दी।

उनके बाद पूजनीय रज्जू भैयाजी सरसंघचालक बने। संघ को केवल महाराष्ट्र का संगठन कहने वालों ने नागपुर के बाहर व्यक्ति के सरसंघचालक बनने के साथ ही स्वीकार किया कि संघ ऐसा नहीं है। वास्तव में संघ में इस प्रकार की सोच बिल्कुल नहीं है। रज्जू भैया वैज्ञानिक थे और विश्वविद्यालय की अपनी नौकरी छोड़कर संघ समर्पित जीवन जीने वाले व्यक्तित्व थे। वैज्ञानिक होने के कारण हर बात का विश्लेषण करने, गहराई से सोचकर बातों को रखने का उनका अभ्यास था। जिस प्रकार के हिंदू समाज की हम कल्पना करते हैं उस प्रकार का आदर्श नमूना खड़ा करना चाहिए यह उनकी सोच थी। उनके ही कालखंड में ग्राम विकास की चर्चा शुरू हुई। देश भर में हम ऐसे सैंकड़ों गांव खड़े करेंगे जो समाज के लिए आदर्शरूप होंगे। संघ जो कहता है उसका प्रतिरूप वहां दिखाई देगा। ग्राम विकास की कल्पना उन्होंने स्वयंसेवकों के सामने रखी। दूसरी एक बात है- रज्जू भैया जी के कालखंड में प्रसार माध्यमों के क्षेत्र में संघ ने प्रवेश किया। देश भर में भिन्न-भिन्न प्रकार की मासिक, साप्ताहिक पत्रिकाएं निकलती हैं। उनका ठीक प्रकार से संचालन हो इसके लिए उनका मार्गदर्शन रहा। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उनका जो स्थान था उस स्थान के कारण विभिन्न प्रकार के लोगों को संघ के साथ जोड़ने में उन्हें सफलता मिली। समाज के प्रबुद्ध वर्ग तक संघ को पहुंचाने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा, ऐसा मैं मानता हूं।

उनके बाद पूजनीय सुदर्शनजी संघ के सरसंघचालक बने। रज्जू भैया जी ने जो कार्य प्रारंभ किया था उसी को अधिक सक्षम करने का कार्य उनके कालखंड में हुआ है। भारतीय संस्कृति-चिंतन के अनुकूल देश का विकास यह उनकी सोच थी। उस सोच के आधार पर देश के विद्वानों से उनकी चर्चा होती थी और अनुभव ऐसा है कि उनके विचारों से बहुत से लोग सहमत होते थे। ऐसी चर्चाओं के कारण ही हमारी आज की नीतियां देश के लिए हानिकारक हैं इस निष्कर्ष पर कई विद्वान आते थे। मैं समझता हूं कि देश के विकास के संदर्भ में एक सही सोच स्थापित करने का काम पूजनीय सुदर्शनजी के कालखंड में हुआ है। यही नहीं, समाज में भिन्न-भिन्न प्रकार के विवाद निर्माण करने वाली जो बातें थीं, उन्हें सुलझाने में पूजनीय सुदर्शनजी ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है जैसे कि केशधारी सिख और सहजधारी में संघर्ष। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहब का ही आधार लेकर सिख बंधुओं में संवाद की प्रक्रिया प्रारंभ की थी। जब असम का आंदोलन चला तब उस आंदोलन को एक नया मोड़ देने में वे सफल रहे। उन्होंने कहा कि असम में बांग्लाभाषी शत्रु नहीं है, बांग्लादेशी शत्रु हैं। बांग्ला और असमिया भाषा के आधार पर निर्माण हुए भेदों को भूलकर विदेशी नागरिक कौन है इसे समझें। बाहर से आया हुआ विदेशी मुस्लिम है, घुसपैठी भी है। लेकिन आया हुआ हिंदू निराश्रित है। उस हिंदू को सम्हालना हमारा कर्तव्य है। यह भाव देशवासियों में स्थापित करने का प्रयास सुदर्शनजी ने किया। मुस्लिम समाज में सकारात्मक सोच लेकर चलने वाले कई लोगों से उनके अच्छे सम्बंध थे। ईसाइयों के बीच भी उनका बहुत संवाद चला। उन्होंने उनके सामने विषय रखा- आप चर्च में जाते हैं तो ठीक है; पर आपका चर्च विदेशी शक्तियों से प्रेरित नहीं हो। आप राष्ट्रीय चर्च की कल्पना लेकर चलें। आप यहां पर ही पले-बढ़े हैं, यहां की परम्परा जानते हैं, इसलिए भारतीय चर्च भारतीय परम्परा के अनुकूल चलें। इसी प्रकार इस्लामी बंधुओं के बीच कई मुल्ला-मौलवियों से उनके सम्बंध थे। समाज में जो अच्छी सज्जन-शक्ति है उसे एक सोच देने का प्रयास सुदर्शनजी ने किया। यह बहुत बड़ा योगदान सुदर्शनजी के कार्य के संदर्भ में कहा जा सकता है।

वर्तमान सरसंघचालक माननीय मोहनजी भागवत का कार्य हम सब के सामने है। उनके कार्यकाल में व्यक्ति-निर्माण की प्रक्रिया अधिक गतिमान करनेे, उसके लिए जो भी आवश्यकता हो उसे साथ जोड़ने और व्यक्ति-निर्माण से समाज को सुदृढ़ बनाने का कार्य चल रहा है। अगर हम क्रम से सोचेंगे तो किसी भी सरसंघचालक के कार्य में कोई अंतर दिखाई नहीं देगा। मार्ग के प्रति, विचारों के प्रति, साधन के प्रति इत्यादि में कहीं भी विचलन नहीं है। समय के अनुसार, परिस्थिति के अनुसार उसमें कई आवश्यक बातें जुड़ती गईं, अनावश्यक कुछ बातें कम होती गईं; परंतु मूल विचार के प्रति कोई विचलन नहीं है और साधन के प्रति भी कोई संदेह नहीं है। पूजनीय डॉक्टरजी से लेकर वर्तमान सरसंघचालक तक संघ की यात्रा जो चली है उसमें एक सूत्र है; कोई भेद नहीं है।

अस्पृश्यता, छुआछूत की बीमारी आज के आधुनिक युग में भी हिंदू समाज को त्रस्त कर रही है। इस स्थिति से हिंदुओं को मुक्त करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्या प्रयास कर रहा है?

हिंदू समाज में व्याप्त की कई गलत धारणा में आने वाले दोषों और समाज का शुद्धिकरण समय-समय पर न होने के कारण ऐसी स्थिति बनी। संघर्ष के कालखंड व तात्कालिक परिस्थितियों के कारण हम इस ओर ध्यान नहीं दे पाए होंगे। इससे रीतियां कुरीतियों में परिवर्तित होती गईं और उन कुरीतियों को ही सामाजिक परंपरा मानने की गलत मानसिकता समाज में निर्माण होती गई। इसके चलते समाज के अंदर के जो प्रश्न हैं, वे निर्माण हुए, ऐसा मैं मानता हूं। छुआछूत का जब प्रश्न आता है तो एक ही देवी-देवता को मानने वाला सारा समाज है, एक ही पूजा-पद्धति को सब अपनाते हैं, एक ही ग्रंथ सब पढ़ते हैं तो छुआछूत का प्रश्न ही कहां आता है? आक्रमणों के कालखंड में इन बातों पर ध्यान न देने से ये बातें समाज में स्थिर हो गईं और दुर्भाग्य से वही गलत बातें श्रेष्ठ मानी जाने लगीं। धर्म के बारे में सही कल्पना नहीं, चिंतन नहीं, दृष्टिकोण नहीं इस कारण भ्रमित अवस्था में समाज रहा है। मूल सिद्धांत में, हिंदू दर्शन में कहीं पर भी इस गलत व्यवहार का आधार नहीं मिलता है। हिंदू दर्शन में, किसी भी ग्रंथ में जन्म के आधार पर ऊंच-नीच की बात नहीं कही गई है। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि कर्म अनुसार व्यक्ति को श्रेष्ठ-कनिष्ठ मानना चाहिए। गीता पठन तो होता है, लेकिन उसकी सीख को व्यवहार में लाना हम भूल गए हैं। सिद्धांत श्रेष्ठ है, दर्शन श्रेष्ठ है और व्यवहार निम्न स्तर का है। यह हमारे समाज में आई विकृति है। परम्परा हमारा आधार बन गई, हिंदू दर्शन प्रभावी ढंग से समाज में प्रस्तुत नहीं हो पाया। इसी कारण समाज में यह स्थिति आ गई।

संघ ने इस समस्या को समझकर एक सकारात्मक प्रयास प्रारंभ किया। संघ का विचार है कि चाहे आपने किसी भी जाति में जन्म लिया हो, लेकिन हम सब हिंदुओं का स्रोत एक ही है- वह है हिंदू जीवन। इसलिए संकुचित बातों के स्थान पर ‘हम हिंदू हैं’ कहना आरंभ किया। संघ ने ‘जातियां नष्ट करो’ ऐसा कभी भी नहीं कहा है। ‘नष्ट करो’ यह नकारात्मक सिद्धांत है। ‘संकुचित भाव से ऊपर उठकर व्यवहार करो’ यह सोच संघ की है। ‘हम हिंदू हैं’ यह कहना हम सहजता से प्रारंभ करें। संघ की शाखा में यह विश्वास, शिक्षा देना आरंभ हुआ। संघ की शाखाओं का स्वरूप जैसे-जैसे बढ़ता गया, ‘भेदभावमुक्त जीवन’ का विचार समाज के मन में बनता गया।

भारतीय समाज धार्मिक, आध्यात्मिक है। मंदिर, कर्मकाण्ड, साधु-संत, कीर्तन-प्रवचन में भारतीय समाज की रुचि है। इसलिए संघ ने कहा कि जिस प्रकार का मानस है उस मानस में से दोषों को हटाना है, जो साधु-संतों के सहयोग के बिना संभव नहीं हो सकता है। इसलिए विश्व हिंदू परिषद की रचना में ऐसे साधु-संतों को, विभिन्न प्रकार के सम्प्रदायों को एक मंच पर लाकर हिंदू समाज के दोषों को चर्चा के द्वारा दूर करने की बात संघ ने की है। 1969 में उडुपी में पूजनीय श्रीगुरुजी के प्रयत्नों से जो धर्माचार्य सम्मेलन हुआ था, उस समय सारे श्रेष्ठ धर्माचार्यों ने इस तथ्य को समझने का केवल मानस ही नहीं बनाया बल्कि यह उद्घोषणा भी की कि अस्पृश्यता का हिंदू धर्म में कोई आधार नहीं है इसलिए इसे मानना पाप है। हिंदू कभी दलित नहीं हो सकता। हिंदू श्रेष्ठ है इस बात का हमें गर्व होना चाहिए। हिंदू समाज में व्याप्त सभी प्रकार की विषमताओं को समाप्त करना चाहिए। मैं समझता हूं कि समाज जीवन के हजारों वर्षों के इतिहास में यह सुवर्ण क्षण था कि सब साधु-संतों ने मिलकर यह प्रस्ताव हिंदू समाज के सामने रखा।

जातिभेद, छुआछूत के प्रश्न पर संघ की दृष्टि यह है कि संघर्ष करने से सामाजिक प्रश्न हल नहीं होते। तत्काल कुछ समय के लिए ढंक जाएंगे, पर समस्या हल नहीं होगी। दूसरी बात यह है कि सरकार या संविधान के बल पर सामाजिक दोषों का निर्मूलन नहीं होता है। संविधान बनने से उसे तोड़ने के रास्ते भी तैयार हो जाते हैं। इसलिए संघ की सोच है कि यह न संविधान से होगा, न संघर्ष से। जब तक समाज की सकारात्मक मानसिकता नहीं बनेगी तब तक नहीं होगा। सकारात्मक सोच लाने के लिए निरंतर प्रयास जारी रखना यही संघ की सोच है, मार्ग है। इसी मार्ग से इस प्रश्न का आज नहीं तो कल अवश्य हल निकलेगा, ऐसा हम मानते हैं।

गांधी हत्या के झूठे आरोप और तीन बार संघ पर पाबंदी लगाने जैसे झंझावात के समय संघ सदा के लिए खत्म हो जाएगा ऐसा लोग अनुमान लगाते थे। परंतु, हर बार यह अनुमान गलत साबित हुआ। संघ संकट-काल में डगमगाया नहीं, बल्कि स्वर्ण की तरह चमकने लगा। संघ में ऐसी कौनसी ताकत है, जो हर बार संघ संगठन के हौसले बुलंद करती है?

संघ का, स्वयंसेवकों का विश्वास है कि ‘हम कभी गलत बातों पर कार्य नहीं करते।’ संघ को नष्ट करने वालों ने विविध प्रकार के मार्ग से प्रयास किया है। संघ को बढ़ता हुआ देखकर विरोधक, देश के नेतृत्व को लगा कि भविष्य में संघ उनके लिए चुनौती बन जाएगा। इसलिए उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या का निमित्त बनाकर उसमें संघ को फंसाने का प्रयास किया। उनके जोरदार प्रयासों के बावजूद भी वे संघ को उस झूठे आरोप में लिप्त नहीं पा सके। सरदार वल्लभभाई पटेल ‘संघ दोषी है’ इस बात से कतई सहमत नहीं थे। 1975 में जो प्रतिबंध आया तभी भी सोच 1948 की ही थी कि भारत में चलनेवाला हिंदू जागरण का कार्य आगे चलकर राजनैतिक क्षेत्र में चुनौती देगा। इसी भाव से लोकतंत्र की हत्या करते हुए रा. स्व. संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। आप समाज की भावनाओं को ज्यादा देर तक दबा नहीं सकते। जब मौका मिलता है तब समाज की भावना उभर कर बाहर आती है। समाज जीवन कभी भी सत्ता की कृपा या अवकृपा पर नहीं चलता है। लोकतंत्र की हत्या के संदर्भ में सारे समाज में जो आक्रोश की भावना थी उसे संघ ने संगठित करने का काम किया। 1977 में बिना किसी शर्त से प्रतिबंध हटाना पड़ा। आज हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि कैसे भी, कितने भी आरोप लगाने दीजिए, कितने भी प्रतिबंध लगाने दीजिए संघ कभी भी समाप्त नहीं होगा।

संघ ने कार्यकर्ताओं की शृंखला निर्माण की है, जिस प्रकार का साधन संघ के पास है, वह संघ का साधन स्वयं आत्मनिर्भर है। मैं समझता हूं कि यह आत्मनिर्भर संगठन का स्वरूप ही इस प्रकार के सभी संकटों, प्रतिबंधों से टकराने की क्षमता रखता है और पुन: अधिक गति से कार्य करने की क्षमता संघ रखता है। अगर आप संघ के रहस्य को जानना चाहते हैं तो मैं कहूंगा कि संघ स्वावलंबी हैं, हम आत्मविश्वास के साथ खड़े हैं और सभी प्रकार की दृष्ट प्रवृत्ति से टक्कर देने का पुरुषार्थ रखनेवाली मानसिकता के सामान्य स्वयंसेवक संघ ने तैयार किए हैं। इसलिए संघ को समाप्त करने के सपने अगर कोई देखता है तो वह कभी भी पूरे नहीं होंगे, ऐसा मैं मानता हूं।

स्वातंत्र्य पूर्व काल में भारत विदेशियों का दास था। आज भी हम विदेशी नेतृृत्व को अपनाते हैं। दासता की यह भावना पीड़ाजनक है। इस परिस्थिति को संघ किस द़ृष्टि से देखता है?

अपनी क्षमताओं का परिचय न होना यह वास्तव में अपनी गुलामी का कारण होता है। 1947 के बाद जो द़ृश्य बनते गए हैं, उसमें भारत ने अपनी क्षमता का परिचय केवल भारत वासियों को नहीं तो पूरे विश्व को दिया है। अब तक चार सीधे युद्ध हुए और पांचवां आतंकवाद के रूप में चलनेवाला युध्द है। इन सभी युद्धों में अपनी सामरिक क्षमता के आधार पर भारत ने विजय प्राप्त की है। कुछ खोया है तो राजनैतिक मंच पर खोया है। साथ में अपने वैज्ञानिकों ने सभी क्षेत्रों में प्रगति की है, जो लाजबाब है। ऊर्जा के क्षेत्र में, शस्त्रास्त्रों के क्षेत्र में हम अपने पैरों पर खड़े होते जा रहे हैं। पोखरण के परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका नाराज क्यों हआ, उसका एक कारण है कि भारत शक्तिशाली बन रहा है। उन्हें दु:ख इस बात का था कि अमेरिका ने इतने उपग्रह छोड़े हैं, पर वे भी भारत के इस पोखरण के परमाणु परीक्षण का पता नहीं लगा पाए। पोखरण विस्फोट होने के बाद अमेरिका को पता चलता है। यह कौनसा आधुनिक तंत्र है, यह अस्वस्थता का भाव अमेरिका में था। यह एक भारत की शक्ति ही हो सकती है।

विविध प्रकार के उद्योग भारत ने प्रारंभ किए हैं। प्राकृतिक, भूमिगत संपदा से भारत समृद्ध है। आज आवश्यकता है तो सभी स्तरों पर विवेक का जागरण करने की। कुंठित भावना से बाहर आकर आत्मविश्वास जगना चाहिए। क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इसका विवेक समाज के अंदर जगने की आवश्यकता है। फिर भविष्य में समाज गुलामी की मानसिकता से बाहर आ सकता है। इस स्थिति के लिए कोई बाहरी शक्ति जिम्मेदार है, ऐसा मैं नहीं मानता। उस संदर्भ में जागृति लाने के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता रहेगी। तत्कालीन लाभ-हानि को देखकर और केवल विदेशी शक्तियों को प्रसन्न रखने के लिए अगर हम देश के संदर्भ में अपनी सोच रखेंगे तो देश फिर गुलामी की ओर जा सकता है। इसलिए स्व-क्षमता को पहचाने, सामान्य जनों की सुप्त शक्ति को आवाहन करने, हमेशा जागरण का काम करने वाली व्यवस्था को अवसर देने की जरूरत है।

सन 2014 में चुनाव होने वाले हैं। इस चुनाव में संघ की भूमिका क्या होगी? क्या भाजपा को सत्ता में लाने की अग्नि- परीक्षा में संघ सफल होगा?

हमने लोकतंत्र को स्वीकार किया है। लोकतंत्र में सामान्य व्यक्ति को अधिकार प्राप्त हैं। इसलिए 2014 के चुनाव को कुछ विशेष मानने की आवश्यकता नहीं। जब-जब देश में चुनाव होते हैं तब-तब जागृत मतदाता ही इस देश की व्यवस्था को ठीक करता है। संघ सोचता है कि मतदाता जागृत हो जाए। अपने कर्तव्य को समझकर वह मतदान करने के लिए बाहर आए। आज अपने देश में जो समस्या हैं वह है मतदाता मतदान के लिए पूरी संख्या से बाहर नहीं निकलते। पढ़े-लिखे वर्ग में भी मतदान टालने की प्रवृत्ति बड़ी मात्रा में है, जो ठीक नहीं है। इसलिए समाज के सभी वर्गों को मतदान के लिए प्रेरित करना यह संघ का लक्ष्य है। अच्छा क्या है, सही- गलत क्या है इसके प्रति समाज का दृष्टिकोण विकसित होता जाए। कौनसा राजनैतिक दल देशहित का विचार कर रहा है यह सोच जन-सामान्य में, मतदाताओं में विकसित होना जरूरी है। इसके बिना लोकतंत्र में अच्छी और सही सरकार नहीं बनेगी। संघ का दृष्टिकोण यही है कि अच्छा मतदान हो, 100 प्रतिशत मतदाता मतदान करें और देश में सही सरकार आए।

अब आपका प्रश्न है कि भाजपा ही क्यों चुनकर आनी चाहिए ऐसा संघ को लगता है? उत्तर यह है कि निकटतम भूतकाल में विभिन्न राजनैतिक दल निर्माण हुए। लेकिन, गत कुछ वर्षों में क्षेत्रीय राजनैतिक दलों की संख्या बड़ी मात्रा में बढ़ी है। क्षेत्रीय दल स्वाभाविक रूप से अपने क्षेत्र तक यानी सीमित क्षेत्र में सोचते हैं। कुछ व्यक्ति केंद्रित दल भी बने हैं। आज दुर्भाग्य यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय राजनैतिक सोच रखनेवाले राजनैतिक दलों का अभाव है। उनकी शक्ति दुर्बल होती जा रही है। आज के संदर्भ में सोचे तो एक है कांग्रेस, दूसरा है वामपंथी समूह और तीसरी है भारतीय जनता पार्टी, जिसकी सोच क्षेत्रीय नहींं, अखिल भारतीय है। उसमें कांग्रेस का हम विचार करते हैं तो वह पूर्ण रूप से हिंदू विरोधी है और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करती है। छोटे से राजनैतिक लाभ के लिए अराष्ट्रीय समझौते करना यह कांग्रेस का चरित्र बना है। वामपंथी दलों के चिंतन में ही दोष है। शोषण के नाम पर वे समाज में खाई निर्माण करना चाहते हैं, संघर्ष का रास्ता अपनाना चाहते हैं। इस प्रकार के वर्ग युध्द की बात करनेवाले, अपने सारे सिध्दातों को विदेशों से आयात करनेवाले वामपंथी दल इस भारत देश के हित की बात कर पाएंगे यह संभव नहीं। ऐसी बाहरी शक्तियों के समर्थन वाले दलों से इस देश को गंभीर खतरा है। आज इस पृृष्ठभूमि में भारतीय जनता पार्टी एक सही सोच लेकर चली है। उसमें भी कुछ कमियां हैं। उन कमियों को दूर करने की जिम्मेदारी उसी की है। परंतु आज स्थिति यह है कि वर्तमान सरकार विदेशी शक्तियों के दबाव में निर्णय करने वाली, देश हित में निर्णय करने में हिचकने वाली सरकार है। ऐसे राजनैतिक दल पर विश्वास करते हुए उसके हाथ में देश की बागडोर सौंपना यह उचित नहीं होगा। इसी कारण निकट भविष्य में सही सोच लेकर देश चलाना है तो आज भारतीय जनता पार्टी ही ऐसा राजनैतिक दल है जो देश के हित का विचार लेकर चलता है। इसलिए हम भाजपा को सहयोग करते है; परंतु वह पार्टी अपने विचारों पर ही चलती है। आज की वर्तमान परिस्थिति में भाजपा का कोई विकल्प नहीं है।

आपने पूछा है कि क्या संघ अग्निपरीक्षा में सफल होगा? मैं तो कहूंगा कि संघ की यह अग्निपरीक्षा है ही नहीं। राजनैतिक क्षेत्रों की है। उस अग्निपरीक्षा में वे सफल होंगे या नहीं यह उन पर निर्भर करता है। केवल इच्छा- आकांक्षाओं पर सफलता नहीं मिलती है। संघ किसी अग्निपरीक्षा में बैठा ही नहीं तो उसके परीक्षा में सफल-असफल होने की बात ही नहीं है।

संघ विचारों के राजनैतिक संगठन को पहली विजय आपातकाल और दूसरी विजय रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन से मिली थी। समाज की समस्याओं के समाधान और राष्ट्र के विकास की दृष्टि से चुनावी विजय संघ विचारों से जुड़े संगठन को मिलनी चाहिए, क्या ऐसा आपको लगता है?

जनभावनाओं की उपेक्षा के परिणाम लोकतंत्र में जनभावना प्रकट होने से ही दिखाई देते हैं। आपातकाल के कारण जो जनभावना प्रकट हुई उसके परिणामस्वरूप जनता जिसके साथ खड़ी हुई उसकी विजय हुई। वह किसी राजनैतिक दल की विजय नहीं थी, वह राजनैतिक क्षेत्र में जो सामूहिक शक्ति प्रकट हुई उसकी विजय थी। लोकतंत्र में एक बात ध्यान देनी चाहिए कि समाज पर मानसिक और श्रध्दाओं के आधार पर जब आघात किया जाता है तब उसकी प्रतिक्रिया समाज से तुरंत आती है। रामजन्मभूमि के सदर्भ में जो रवैया उस समय की सरकार का रहा है, जिस प्रकार की बाधाएं सरकार ने खड़ी की थीं उसका गुस्सा चुनावी वोटों से प्रकट हुआ। ऐसे अवसरों पर जो विजय प्राप्त होती है उसे जन-प्रतिक्रिया में मिली विजय मानना चाहिए। वह विजय जो हुई थी वह केवल संघ विचारों की विजय न मानते हुए जन-भावनाओं की विजय मानना चाहिए।

आज के संदर्भ में सरकार एक शक्ति बन गई है। वास्तव में भारत के मूल चिंतन में सरकार की अपनी एक सीमा मानी गयी है। लोकतंत्रिक व्यवस्था में जनता जैसे चाहेगी वैसी सरकार बना सकती है, इसलिए राष्ट्रहित को सामने रखकर विचार करने वाली सरकार आनी चाहिए। यहां के बहुसंख्यक समाज की भाव- भावनाओं की उपेक्षा करते हुए जो सरकार बनेगी वह जन-सामान्य की सरकार नहीं मानी जाएगी। हिंदू हित की उपेक्षा करनेवाली सरकार कभी भी देशहित की सरकार नहीं बन सकती है। हिंदू समाज के हितों को सामने रखकर ही लोकतंत्र में किसी भी राजनैतिक दल को सोचना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र की एक बात है कि जब तक जनसामान्य जागृत नहीं होगा, जब तक राजनैतिक जागृति नहीं आएगी तब तक उसके परिणाम अच्छे नहीं दिखाई देंगे। संघ की सोच है कि एक राजनैतिक जागृति जनसामान्य में आनी जरूरी है। आज हम देखते हैं कि चुनावी परिणाम छोटी-छोटी बातों पर बदल जाते हैं। पैसों के बल पर मतदाताओं को लुभाया जा सकता है। क्या लालच देकर, शराब की एक बोतल देकर इस देश की सरकार बनेगी? राजनैतिक क्षेत्र में ऐसी चुनावी विजय प्राप्त करने की एक सस्ती राह बनी है। उसके कारण देश का बड़ा नुकसान हो रहा है। ऐसे कैसे चलेगा? लोकतंत्र में सही गलत का अंतर जब तक लोगों में ध्यान में नहीं आता है, अन्याय पर जनसामान्यों का दबाव सरकार पर नहीं बनता है तब तक राजनैतिक क्षेत्र में ठीक से काम नहीं होता है। इसलिए जनतंत्र का भी दबाव हो और जनमानस की जागरूकता का भी दबाव सरकार पर होना चाहिए।

इसलिए संघ का प्रयास है कि समाज के सामने भिन्न प्रकार की जो राष्ट्रीय-सामाजिक समस्याएं हैं उस संदर्भ में प्रामाणिकता से सोचने वाले लोग इस देश की सरकार में आने चाहिए।

परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। संघ-कार्य के 88 सालों में समाज में आई और अब भी जारी परिवर्तन की लहर को संघ ने किस प्रकार स्वीकार किया है?

परिवर्तन यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। समाज एक जीती-जागती ईकाई है। उसमें समय- समय पर परिवर्तन आता रहेगा। समाज में काम करने वाले हम लोगों को सोचना चाहिए कि परिवर्तन की दिशा क्या हो? परिवर्तन का आधार क्या है? केवल वर्तमान में आनंद प्राप्त हो, इस हद तक ही परिवर्तन की बात सीमित हो गयी है। प्रकृति के साथ संतुलन रखते हुए चलना चाहिए, यह सोच कम हो गई और उपभोग केंद्रित जीवन बनता गया। इसीलिए हम जब परिवर्तन की बात करते हैं तो वह विवेकपूर्ण परिवर्तन की बात करते हैं। मानव मात्र के हितों का विचार करते हुए सोचने की आवश्यकता है। अपने स्वार्थ में लीन होकर सोचने की मानसिकता छोड़नी पड़ेगी। विवेकपूर्ण परिवर्तन यह उत्थान का मार्ग है। विवेकहीन परिवर्तन पतन का रास्ता है। हम विवेकपूर्ण परिवर्तन लाने की सोच रखते हैं। अमानवीयता तथा विविध विकृतियों से समाज को बचाना आवश्यक है, यह सोच संघ रखता है। संघ ने परिवर्तन की बात मानी है, पर प्रकृति के नियमों का उल्लंघन न करते हुए, सबके कल्याण की कामना करते हुए चलना पड़ेगा। समाज के हित में मेरा हित है, समाज के उत्थान में ही मेरा उत्थान है इस प्रकार का भाव विकसित करने का प्रयास संघ ने हमेशा से ही किया है। इसलिए संघ की एक समग्र दृष्टि है, उस समग्र दृष्टि के अंदर ही हम परिवर्तन की सोच रखते हैैं। यह रही बाहरी परिवर्तन की बात। जो आंतरिक परिवर्तन की बात है उसमें व्यक्ति सादगी से रहे। अर्थ के संदर्भ में उसकी दृष्टि विकसित होनी चाहिए। पशुता की ओर न जाते हुए मनुष्यता की ओर जानेवाला रास्ता अपनाएं, शोषण का भाव न रखें, दूसरे के पोषण का भाव भी अपनाएं। जब सामाजिक परिवर्तन की बात आती है तब श्रेष्ठ संस्कारों के बिना संभव नहीं होता है। इसलिए परिवर्तन की बात आती है तो व्यक्ति निर्माण का विचार संघ सामने रखता है। संघ की शाखा में आनेवाला, संघ के कार्य के साथ ज़ुडने वाले व्यक्ति की द़ृष्टि व्यापक बनती है। वह देश, समाज के हित में सोचनेवाला, व्यवहार करने वाला बनता है।

उत्तराखंड की त्रासदी के समय संघ स्वयंसेवकों ने जो प्रत्यक्ष सेवा कार्य किया है, उस सेवा कार्य की जानकारी दीजिए।

देश पर जब-जब विपत्ति आती है तब-तब संघ स्वयंसेवक सेवा कार्यों में जुड़ जाता है। उत्तराखंड की त्रासदी में बाहर से आए यात्री ज्यादा प्रभावित हुए थे। अपना समाज है यह मान कर तथा समाज के प्रति समर्पित भाव रखते हुए संघ के कार्यकर्ता कार्य करने लगे। संघ के कार्यकर्ता बिना किसी प्रशिक्षण के काम करने लग जाते हैं। उन्होंने आपदा प्रबंधन का कोई प्रशिक्षण लिया है ऐसी कोई बात नहीं है। संघ ने कर्तव्य भावना को जगाया है, संघ ने समाज के प्रति आत्मीयता की भावना को जगाया है। इस प्रकार की जागृति के कारण भुज का भूकंप हो, लातूर का भूकंप हो, दक्षिण में आई सुनामी हो या उत्तराखंड जैसी त्रासदी हो, किसी भी प्रकार की गंभीर दुर्घटना हो- संघ स्वयंसेवक सेवा देता है। सेवा देते समय किसी का धर्म, जाति नहीं देखी जाती।

दिल्ली के पास चरखी दादरी में दो विमानों की टक्कर हुई थी। दोनों विमान मुस्लिम देशों के थे। उनमें मरनेवाले 90 प्रतिशत मुसलमान थे। वहां संघ के स्वयंसेवक तुरंत पहुंचे। उन्होंने मलबे से शव निकाले, सामान निकाला, जिस देश के मृत व्यक्ति थे उस देश में खबर पहुंचाने की व्यवस्था की। मुस्लिम देशों में संघ के प्रति गलत प्रचार किया जाता है, परंतु उनका अनुभव बिलकुल अलग था। उन देशों के प्रमुखों ने, मस्जिद में संघ के वहां के पदाधिकारियों को बुलाकर उनका सम्मान किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत की सीमाओं को पार कर विश्वभर में संचार किया है। दुनिया में हो रहे संघ कार्य का विस्तार एवं संघ कार्य की जानकारी प्रदान करें ।

सन 1948 में भारत के बाहर समुद्री जहाज पर संघ की पहली शाखा लगी थी। संघ स्वयंसेवक अफ्रीका की ओर जा रहे थे। सन 1950 में संघ का प्रवास प्रारंभ हुआ। पर एक बात मैं स्पष्ट करता हूं कि भारत के बाहर कहीं भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का काम नहीं है। हिंदू समाज के संगठन का काम है, जागरण का काम है। भारत से हिंदू समाज को जोड़ने का काम है। संघ जिस प्रकार भारत में काम कर रहा है उस प्रकार का काम विदेशों में भी हिंदू संगठन के रूप में खड़ा हुआ है। विदेशों में संघ कार्य के दो कालखंड हैं। 1950 से लेकर 1980 तक और 1980 के बाद। हम 1950 से लेकर 1980 तक कीनिया, यूके, नेपाल, यूएसए, नीदरलैंड जैसे देशों में गये थे। लक्ष्मणराव भिडे जी उस काम को देखते थे। 1950 से लेकर 1980 तक के 30 वर्षों में स्वयंसेवकों ने वहां अपना सम्पर्क तंत्र बढ़ाते हुए कठोर परिश्रम से एक सशक्त संगठनात्मक कार्य का निर्माण किया है। 1980 के बाद ज्यादा गति आई। हम खाड़ी के देशों में गये, पूर्व एशियाई देशों में हांगकांग, थायलैंड, मलेशिया जैसे देशों में प्रवेश किया। कुछ प्रचारकों ने यहां से भारत के बाहर जाना प्रारंभ किया। उसमें रवि कुमार अय्यर प्रथम गये। उनके बाद शंकरराव तत्ववादी और अब यह संख्या बढ़ गयी है। कार्य का विस्तार होते-होते आज 36 देशों में कार्य संपन्न हो रहा है।

मैं कहता हूं वहां पर संघ नहीं है, संघ की कई बातें वहां पर नहीं हैं, भारत माता की जय की घोषणा वहां पर नहीं होती है। वहां की प्रार्थना विश्वकल्याण की प्रार्थना है। विश्व का मंगल हो इस भावना से हम वहां कार्य करते हैं। ऐसा भाव वहां की प्रार्थना में है। कार्य का स्वरूप महिला- पुरुष ऐसा अलग नहीं है। सारे परिवार को साथ में लेकर वहां पर काम चलता है। हिंदू स्वयंसेवक संघ, भारतीय स्वयंसेवक संघ इस नाम पर वहां काम चलता है। स्वयंसेवक इंडिया सोसायटी नाम से भी काम चलता है। सेवा इंटर नैशनल संस्था का गठन करके विदेशों में सेवा का कार्य वहां के स्वयंसेवकों ने प्रारंभ किया है। अमेरिका जैसे देशों में भी गरीब और गरीबी है। वहां पर मूल निवासी समूह है, जो अब तक ईसाई नहीं बना है। उनके बीच जाकर सम्पर्क है।

विदेश में कार्य करनेवाले स्वयंसेवकों का भारत के साथ संबंध बना रहे इसलिए 5 वर्षों में एक बार विश्व संघ शिविर का आयोजन भारत में होता है। अब तक ऐसे 6 शिविरों का यशस्वी आयोजन हुआ है। 1990 में पहला विश्व संघ शिविर हुआ था। लगभग 25 प्रचारक भारत के बाहर काम कर रहे हैं।

भारतीय धर्म-संस्कृति का परिचय हो इसलिए वहां कार्यक्रम आयोजित होते हैं। यज्ञ, आरती, भजन, प्रवचन और कर्मकांडों को समझाने का प्रयास इन कार्यक्रमों के माध्यम से होता है। कार्य की आवश्यकता के अनुसार वहां कार्यक्रम होते रहते हैं। एक बात जरूर है कि वहां का व्यक्ति उस देश में जब तक है उस देश के साथ, उस देश के संविधान के साथ अपने आप को जोड़ कर रखें, वहां की रचना का सम्मान करें और इसके साथ-साथ अपनी मातृभूमि भारत के प्रति अपना कुछ कर्तव्य है इस बात का स्मरण रखें, यह प्रयास होता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं का स्वरूप चारित्र्यसम्पन्न देशभक्तों के निर्माण के लिए ‘चैतन्यशाली केंद्र’ के रूप में किया जाता है। संघ की शाखाओं में देश-धर्म के नाम पर एक घंटे का समय देने का प्रत्यक्ष परिणाम क्या है?

संघ की शाखाओं में बहुआयामी व्यक्तित्व का निर्माण हो यह संघ- कार्य की विशेषता है। वहां विवेक का जागरण किया जाता है। परिणामस्वरूप स्वयंसेवक आवश्यकतानुसार व्यवहार करनेवाला व्यक्ति हो सकता है। समाज में चारित्र्यसम्पन्न और देश के लिये मर मिटने वाले लोगों की आवश्यकता है। संघ शाखा में होने वाले सामान्य कार्यक्रमों से ये संस्कार होते रहते हैं। व्यक्तिगत जीवन में भी संघ स्वयंसेवक संघ संस्कारों को लेकर खड़ा है। ऐसे ही संस्कारों की प्रक्रिया संघ ने विकसित की है। संघ की शाखा में एक घंटे के कार्यक्रम में शुद्ध संस्कार तो आपको मिलेंगे ही, साथ में एक विचारधारा, प्रतिबद्धता को लेकर जीवन में खड़े रहने का संस्कार भी उन्हें मिलता है। उनके अंदर की कर्तव्य भावनाओं को जागृत किया जाता है। जिसमें राष्ट्र, समाज, स्वधर्म, सेवा के जागरण होते हैं। समाज, देश के लिये सक्रिय होकर मुझे काम करना है यह भावना स्वाभाविक रूप से संघ के स्वयंसेवकों में आती है। इसी कारण संघ का स्वयंसेवक प्रश्नों को उठानेवाला नहीं तो समस्याओं के साथ-साथ उसका समाधान देने वाला भी बनता है। इस प्रकार की सक्रियता के चलते समस्या के निवारण में संघ की शक्ति लगी है। मैं समझता हूं कि संघ की शाखा में होने वाले अत्यंत सामान्य कार्यक्रमों के द्वारा स्वयंसेवकों में संस्कार निर्माण करने में हम सफल हो गये हैं।

सहज रूप से, स्वयंस्फूर्ति से, योजना से काम करने का उसका मन बनाया जाता है। संघ की योजना में अपने आप को जोड़ कर संघकार्य करनेवाला बनता है। दूसरा पक्ष भी उतना ही मजबूत है कि बिना किसी योजना के उसके सामने जो समस्या दिखाई देती है उस समस्या का हल वह स्वयंस्फूर्ति से पा लेता है। इस संसार में वह राष्ट्रीय, सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन में समर्थ रूप में, विश्वास के साथ खड़ा होता है। मैं समझता हूं कि यही संघ के कार्य की विशेषता रही है। दक्ष-आरम् करते-करते सामूहिकता से काम करते हुए चर्चाओं के द्वारा देश की स्थिति को समझने के साथ स्वयं मार्ग निकालने वाले स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में निर्माण होते हैं। समाज के लिये कुछ करने में मैं साधन के रूप में चिंतक हूं यह भाव प्राप्त करने के लिये वह संघ की शाखा में एक घंटा देता है। संघ की शाखा में वह स्वयं की विवेकपूर्ण रचना के लिये आता है, इसके बाद वह जो कुछ करेगा वह देश-समाज के लिये होता है। इस तरह का भाव उनके मन में संघ की एक घंटे की शाखा में निर्माण करने के कारण आज इतनी बड़ी संख्या में स्वयंसेवक सामाजिक जीवन में प्रभावी रूप से अपना योगदान दे रहे हैं।

संघ ने हमेशा से ही माना है कि राजनैतिक जीवन का अर्थ सम्पूर्ण सामाजिक जीवन नहीं है। राजसत्ता को सर्वस्व मानकर उसमें लिप्त होना उचित नहीं है। इस सोच के बावजूद भी संघ और जनसंघ, संघ और जनता पार्टी तथा अब संघ और भारतीय जनता पार्टी के संबंधों की चर्चा होती रहती है। क्या यह चर्चा योग्य है?

यह चर्चा योग्य है या अयोग्य है यह सवाल उनको पूछना चाहिये जो इस प्रकार की चर्चा छेड़ते हैं। वास्तव में हिंदू चिंतन और हिंदू जीवन शैली में राजसत्ता को समाज जीवन का एक अंग माना गया है। जीवन के सभी क्षेत्रों में हस्तक्षेप करना राजसत्ता का अधिकार नहीं है। यही हमारी पौराणिक, ऐतिहासिक परम्परा रही है। हिंदू चिंतन सत्ता को सर्वोपरि मानने वाला कभी भी नहीं रहा है। संघ भी इसी चिंतन को परम्परा मानता है। इसलिये सत्ता सर्वोपरि है ऐसा भाव हमारे मन में नहीं है। अगर इस राष्ट्र की कोई शक्ति है तो वह इस देश का सामान्य व्यक्ति है। वह व्यक्ति, व्यक्ति समूह राष्ट्र की दृष्टि से सजग बनता जाये इसकी आवश्यकता है। राजसत्ताएं बदलती जाएंगी, समाज स्थायी रहेगा। इसलिये राजसत्ता के आधार पर अपना चिंतन बदलेगा यह संभव नहीं। यह हजारों सालों से चलती आई हिंदू परम्परा है। इसी प्रकार की परम्परा एक स्वस्थ परम्परा के रूप में आगे भी चलती रहनी चाहिये। सत्ता के बल पर समाज जीवन बदले इस बात से हम सहमत नहीं है।

आज लोकतंत्र में ‘राजसत्ता’ शक्तिशाली बन गयी है। पर वह भी सामाजिक प्रश्नों को हल नहीं कर सकती है। परंतु हमने लोकतंत्र को स्वीकार किया है। उसे स्वीकार करने के साथ-साथ हमने सत्ता को समाज जीवन का एकतरफा केन्द्र बना दिया है। 1947 के बाद सभी प्रकार की शक्तियां राजसत्ता के हाथ में केंद्रित हुई हैं। इसलिये समाज के लिये आपको कुछ करना है तो बिना राजसत्ता से आप कुछ नहीं कर सकते। 1947 के बाद बदली हुई यह एक दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति है। राजनैतिक सत्ता में बैठे हुए उस समय के नेताओं के भाषण आप सुनेंगे तो यह स्वर दिखाई देता है कि देश अब स्वतंत्र हुआ है इसलिये जो भी कुछ करना है, आपके भले की जो भी बात करनी है वह हम करेंगे। दूसरी एक बात, अपने संविधान में लिखा गया कि जो गवर्नमेंट है वह कल्याणकारी सरकार है। इससे यह बात आई कि आपका जो भी कल्याण करना है वह हम राजसत्ता में रहनेवाले लोग करेंगे। इसलिये वर्तमान में सत्ता समाज के बीच महत्वपूर्ण शक्ति का केन्द्र बन गयी है। हम इस स्थिति को उचित नहीं मानते। यह स्थायी चिंतन नहीं है। वर्तमान परिस्थिति में जो समस्या समाज के सामने है उसका विकल्प नहीं है, लेकिन राजसत्ता अनिवार्यता बन गयी है। अगर अनिवार्यता बन गयी है तो सत्ता कैसी हो, देश हित को, समाज हित को सर्वोपरि रखकर सोचना यह भाव होना चाहिये, यह स्वाभाविक रूप से अपेक्षा है। इस प्रकार का व्यवहार करनेवाले सत्ता में आने चाहिये। अगर इसके विपरीत स्वार्थ केंद्रित, सत्तालालची लोग सत्ता में आ जायेंगे तो उससे न व्यक्ति का लाभ होगा, न समाज का हित होगा। इसलिये स्वाभाविक रूप से अपेक्षा होती है कि राजसत्ता में कौन होना चाहिये। लोकतंत्र में जो सर्वोच्च पद है उस पद पर कौन होगा इसका विचार जनता को करना होता है। ऐसी अगर आज की रचना है तो उचित व्यक्ति ही सर्वोच्च पद पर जाना चाहिये यह आज की आवश्यकता है।
वर्तमान राजनैतिक दलों की स्थिति देखें तो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण चित्र सामने आता है। इस स्थिति में संतुलन बनाने की बात आती है तो हमें लगता है कि भारतीय जनता पार्टी उस संदर्भ में कुछ कर सकती है आज बड़ी संख्या में स्वयंसेवक भारतीय जनता पार्टी के कार्य में लगे हैं। कांग्रेस में संघ स्वयंसेवकों को प्रवेश नहीं है। उन्होंने ऐसा प्रस्ताव ही पारित किया है कि संघ का स्वयंसेवक कांग्रेस में नहीं आ सकता। अन्य दलों में भी उनको स्थान नहीं है। संघ का स्वयंसेवक यदि राजनीति में रुचि रखता है तो वह भारतीय जनता पार्टी में जाता है। इसके पहले वह जनसंघ, जनता पार्टी में कार्य कर रहा था। भारतीय जनता पार्टी के जन्म का कारण भी संघ ही बना है। संघ के स्वयंसेवकों का एक भावनात्मक संबंध भारतीय जनता पार्टी से है। लेकिन संघ भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता। हमने उनके निर्णयों को प्रभावित करने की बात कभी नहीं सोची। एक राजनैतिक दल के रूप में वह विकसित होता जाये, अपनी भूमिका का निर्वाह करें और संघ जिस सोच को लेकर मार्गक्रमण कर रहा है उस सोच को, उस व्यवहार को राजनैतिक क्षेत्र में प्रभावी ढंग से स्थापित करें यह अपेक्षा संघ भाजपा से करता है। लेकिन राजनैतिक क्षेत्र में उनकी अपनी एक मर्यादा है, इस बात को भी हम स्वीकार करते हैं। इसलिये वह जितना ज्यादा कर सकते हैं उन्हें करना चाहिये यह भाजपा से हमारी अपेक्षा है। भारतीय जनता पार्टी से हमारे संबंध जरूर हैं, उसे हम नकार नहीं सकते और उनको जितना सहयोग चाहिये उतना सहयोग संघ की ओर से हमें करना है।

देश में हिंसा, महिला उत्पीड़न, के विरोध में विविध जन-आंदोलन होते हैं तब यह प्रश्न उपस्थित किया जाता है कि संघ अब कहां है? इस संबंध में आपकी राय क्या है?

सन 1942 से लेकर आज तक जो भी आंदोलन हुए उन सभी में संघ स्वयंसेवक सम्मिलित हुए हैं। देश के विभाजन के समय हिंदू समाज के हित में जो भी करना था वह संघ ने किया था। गोवा मुक्ति आंदोलन हो, कच्छ का आंदोलन हो इन सभी आंदोलनों में संघ का स्वयंसेवक सहभागी था। देश में जो जन आंदोलन हुए वे संघ के आंदोलन नहीं थे, पर समय-समय पर उन आंदोलनों की जरूरत को देखते हुए विविध जन आंदोलनों में संघ स्वयंसेवक सम्मिलित होता गया। आपातकाल के विरोध में बहुत बड़ा सत्याग्रह हुआ था। यह विरोध एक जनांदोलन बनना चाहिये यह सोचकर तब संघ ने लोक संघर्ष समिति बनाई। यह समिति बनाने में और आगे सत्याग्रह को चलाने में संघ की भूमिका प्रभावी रूप में रही है। पर यह आंदोलन संघ ने चलाया है ऐसा हम नहीं मानते हैं। देश और समाज के दीर्घकालीन हित में यह सोच उचित भी नहीं है। इसलिये संघ कभी देश के आंदोलनों में अपने लाभ को देखकर सम्मिलित नहीं हुआ। उन आंदोलनों की सफलता को ध्यान में रखकर जो भी करना है वह किया है। यह भूमिका हमारी हमेशा के लिये रही है। मैं समझता हूं कि संगठनात्मक अभिनिवेश के जोश में आकर जो आंदोलन होते हैं वे आंदोलन विफल हो जाते हैं। देशहित को सामने रखकर समाज के लिये जो आवश्यक है उन बातों को ध्यान में रखकर अगर आंदोलन चलाए जाये तो आंदोलन सफल होंगे। हमारा अनुभव है कि ऐसे सभी आंदोलनों में स्वयंसेवक स्वयं जाता है। अगर भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन चल रहा है, कहीं घुसपैठ के विरोध में आंदोलन चल रहा है, कहीं सीमाओं की सुरक्षा को लेकर आंदोलन चल रहा है तो वहां संघ स्वयंसेवक जाता ही है। यह स्वाभाविक रूप से होता ही है। मैं समझता हूं कि यह पद्धति अच्छी होती है। सभी अपने-अपने बैनर्स और झंडे लेकर जाएंगे तो कभी भी एकरूप आंदोलन नहीं बन सकता है। अच्छे आंदोलनों का भी नुकसान होता है। आंदोलन बिखर जाता है। जहां आज के प्रश्न हैं, राष्ट्र, समाज के प्रश्न हैं वहां हम अपना-अपना अभिनिवेश लेकर खड़ेे हो जायेंगे तो गलत नतीजा निकलेगा। वहां हमें सभी को मिलकर खड़ा होना है। संघ ने अपने नाम की चिंता न करते हुए यह सब किया है।

अगर ऐसा है तो, संघ पर लगनेवाले आरोप और प्रत्यक्ष संघ कार्य में इस प्रकार का अंतर क्यों है?

कई प्रकार के आरोप संघ पर लगाये जाते हैं। इन आरोपों में किसी प्रकार का कोई तथ्य सामने नहीं आया है। जैसा लोगों ने संघ को देखा, अपनी मर्यादा में जितना संघ को समझे उसके आधार पर ये आरोप लगते रहते हैं। प्रारंभ में महाराष्ट्र में संघ ब्राह्मणों का, संघ उच्च वर्गियों का ये आरोप लगते थे। गांव-गांव तक शाखाएं शुरू हुईं, जनमानस तक संघ पहुंचा, तो आगे चलकर इन बातों में कोई दम नहीं रहा। अन्य राज्यों में संघ गया तो यह महाराष्ट्र का संगठन है हमारे राज्य में क्यों ला रहे हो ऐसी बातें उठीं। पर संघ को वहां कार्यकर्ता मिलते गये। उस क्षेत्र के समाज जीवन के सभी क्षेत्र में संघ-कार्य योगदान देने लगा तो ये बातें भी समाप्त हो गईं । इसलिए आज अगर कोई कहता है कि विशेष वर्ग का, विशेष समूह का, विशेष जाति-बिरादरी का यह संगठन है तो समाज उसे स्वीकार नहीं करता। आरोप करने वालों ने यदि यह तय किया है कि संघ को बदनाम करना है तो कभी उच्चवर्गीय, कभी साम्प्रदायिकता का आरोप लगाते हैं। नये-नये आरोप लगाते रहते हैं। लेकिन समाज आज इन बातों को नहीं मानता। समाज का संपन्न, प्रबुद्ध, पढ़-लिखा वर्ग कभी भी इन आरोपों से प्रभावित नहीं होता है। हां, राजनैतिक दृष्टि से थोड़ा-सा वातावरण बनाने में राजनैतिक विरोधी सफल होते होंगे। गलत धारणा बनाने का प्रयास उनके माध्यम से जरूर किया जाता है; पर संघ की सशक्त संगठनात्मक व्यवस्था है, उसके आधार पर आज हम कह सकते हैं कि सामान्य जनों में संघ के संदर्भ में जो विश्वास है उन्हीं के माध्यम से सब प्रकार का सहयोग मिलता रहता है। अगर इन बेबुनियादी आरोपों पर देश की जनता विश्वास करती तो आज संघ के माध्यम से जो हजारों उपक्रम चलाये जा रहे हैं उन उपक्रमों पर संघ काम ही नहीं कर सकता था। सेवा के क्षेत्र में जो आर्थिक सहयोग मिल रहा है वह सरकार से नहीं मिल रहा है। वह समाज से ही मिलता है।

आरोप लगानेवाले एक राजनैतिक, दूषित और सोची-समझी रणनीति के तहत अपना कार्य कर रहे हैं। उसके बारे में संघ को ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है, न ही चिंता करने की जरूरत है। मैं समझता हूं कि समाज का सोचनेवाला वर्ग इन आरोपों के संदर्भ में साफ़ है। वह इस षड्यंत्र को, संघ को शत्रु मानकर काम करने की संघ विरोधकों की पद्धति को समझता है। प्रामाणिकता से सोचनेवाला कोई भी कभी भी संघ का विरोधी नहीं हो सकता है।

गो-हत्या, गो-मांस निर्यात की नीति समाप्त करने की दिशा में संघ कौन से प्रयास कर रहा है?

हम दो तरह से इस बात पर सोचते हैं। एक- शासन की इस विषय पर कोई ठोस भूमिका रहे। आज गो-हत्या संदर्भ में कानून बने हैं। उन कानूनों के प्रति आज का सत्ता पक्ष आग्रही नहीं है। यह दुर्भाग्य है। इसलिये हम अपेक्षा करते हैं कि जहां कानून बनाना आवश्यक हो वहां कानून बनायें और जहां कानून बने हैं उनका कड़ाई से पालन हो ताकि गो-हत्या और गो-मांस का निर्यात रोका जा सकें।

दूसरा मार्ग- समाज में जनजागृति। संघ ने संतों के माध्यम से आयोजित गो ग्राम यात्रा में सहयोग दिया था। सम्पूर्ण देश में जनसामान्य के बीच संघ इस विषय को लेकर गया। इसके बाद संघ ने गोसेवा विभाग शुरू किया। सारा समाज इस विषय से जुड़ना चाहिये इसलिये इस बात को हम चार शब्दों में बांटते हैं। इस समाज का एक वर्ग गो- भक्त बनेगा। इस समाज का एक वर्ग गो-सेवक बनेगा। इस समाज का एक वर्ग गो-पालक बनेगा और एक वर्ग गो-संरक्षक बनेगा। जब हम कहते हैं कि गो-भक्त बनेगा तो उसका अर्थ है कि वह सभी प्रकार के पंचगव्य, गो-उत्पादन के महत्व को समझकर उसे अपने आचरण में लायेगा। जब हम गो-सेवक की बात करते हैं तो भिन्न-भिन्न प्रकार की गोशालाओं की आवश्यकता होती है। अत: गोशालाओं का जाल बनाना चाहिये। जिन गायों को किसान संभाल नहीं पाता है उन गायों को वहां आधार मिलना चाहिये। जब हम गो-पालक की बात करते हैं तो किसान का घर यह गोरक्षा का निश्चित स्थान है। किसान गायों को केवल दूध के रूप में न देखते हुए उसकी भूमि की सुरक्षा के लिये गोरक्षा आवश्यक है ऐसा माननेवाला किसान बन जाये इस दृष्टि से प्रयास होने आवश्यक है। कानून को तोड़ कर जब गोहत्या होती है तो इस प्रकार की हत्या को रोकने के लिये देश का नौजवान युवा वर्ग तैयार होता जाये इस प्रकार की गोरक्षा करनेवाला वर्ग भी आवश्यक है। इस प्रकार गो-भक्त, गो-पालक, गो-सेवक, और गो-रक्षक ऐसे चार प्रकार का विचार करते हुए समाज में जनजागरण लाना चाहिये, ऐसा हम सोचते हैं। इस दिशा में विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा के बाद समाज का बहुत बड़ा सक्रिय सहयोग भी प्राप्त हुआ। गोशाालाओं में वृद्धि हुई है। विज्ञान की दृष्टि से गौ का विषय प्रगति कर रहा है।

राजनैतिक दृष्टिकोण से सोचने वाले लोग इस विषय को मुस्लिम विरोधी मानते हैं। लेकिन गोरक्षा के संदर्भ में जब काम शुरू हुआ तब इस्लाम को मानने वाले भी सामने आये। मेरी जानकारी के अनुसार 15 लाख हस्ताक्षर गोरक्षा के संदर्भ में मुसलमानों ने किये हैं। संघ जो गोहत्या के विरोध में अभियान चला रहा है वह मुसलमानों के विरोध में नहीं है ऐसा वे मानते हैं। गाय यह नहीं देखती कि किसान हिंदू है या मुसलमान। पंचगव्य की दवाइयां बनती हैं तो वे हिंदुओं के लिये लाभदायक है और मुसलमानों के लिये हानिकारक है ऐसा नहीं है। इस बाात को समझने की आवश्यकता है। धर्म, सम्प्रदाय से उठकर गोरक्षा के विषय को समझने की आवश्यकता है। गौ को लेकर यह प्रश्न हिंदू मुस्लिम विषयों से जोड़ा जाता है जो कि गलत है। संघ चाहता है कि यह सारे देशवासियों का प्रश्न बने। अगर यह करना है तो गाय ‘राष्ट्रीय पशु ही नहीं, राष्ट्रीय सम्पदा है’ के रूप में घोषित होना चाहिये। जिससे स्वाभाविक रूप से गाय की रक्षा में गति आयेगी। हम यही मांग कर रहे हैं कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाये।

‘हिंदू जीवन पद्धति’ यह शब्द संघ की प्रचार पद्धति में बार-बार आता है। हिंदू शब्द या हिंदू जीवन पद्धति के मूल तत्व संघ किस प्रकार प्रतिपादित करता है?

संघ कभी हिंदू शब्द की व्याख्या करने में उलझा नहीं है। क्योंकि व्याख्या विद्वान लोग अलग-अलग प्रकार से करते आये हैं। अगर कोई एक पद्धति होती तो बता सकते कि यह हिंदू पद्धति है। हमारी पूजा पद्धति एक नहीं है। हमारे धर्म ग्रंथ एक नहीं हैं। इसलिए हिंदू शब्द को परिभाषित करने का काम बहुत मुश्किल है। डॅाक्टर जी कहते थे कि ‘मैं हिंदू हूं’ यह सिद्ध करने की बात नहीं है, आंकलन से स्वीकार करने की बात है। हिंदू मात्र शब्द नहीं है कि उसे सिद्ध किया जाये। यह कोई कल्पना नहीं है कि उसे स्थापित किया जाये। अंत:करण से और अनुभूति से ही समझा जा सकता है।

हिंदू यह एक राष्ट्रवाचक शब्द है। वह केवल धर्म को परिलक्षित नहीं करता। वह विचारों को परिलक्षित करता है। एक जीवन शैली को परिलक्षित करता है। वह एक राष्ट्र, समाज वाचक शब्द है, ऐसा संघ मानता है। कोई भी पूजा पद्धति अपनाने वाला हिंदू हो सकता है। क्योंकि हिंदू होने का कोई संस्कार नहीं है। इसलिये हम तो कहते हैं कि इस देश में जो जन्म लेता है वह हिंदू है। बाद में संस्कारों के कारण मुसलमान या ईसाई बनता है। जब धर्म की बात करते हैं तो हिंदू धर्म प्रचलित शब्द है, उसका उपयोग हो रहा है। लेकिन वास्तव में जो धर्म की परिभाषा आज विश्व करता है उस परिभाषा में बैठने वाली वह बात नहीं है। धर्म को कर्तव्य के रूप में देखा गया है। इसलिए कर्तव्य को जो मानता है वह हिंदू समाज। हिंदू की कोई विशिष्ट पूजा पध्दति नहीं है। हमारे यहां निर्गुण-निराकार की पूजा श्रेष्ठ मानी गई है। हमारे यहां पूजा करने वाला भी श्रेष्ठ है, न करने वाला भी श्रेष्ठ है। ‘हिंदू’ इस शब्द का हम जब विचार करते हैं तो वह व्यवहार से जीवन जीने की शैली से संबंधित शब्द आता है। हमारी मान्यता क्या है? पहली मान्यता यह है कि यह सर्व समावेशक तत्त्व को मानता है। सब को अपने-अपने मार्ग से जाने का स्वातंत्र्य देता है। प्राणीमात्र में ईश्वरी अंश है इसलिए किसी के साथ भेदभाव नहीं है। समन्वय और सहयोग को स्थान है। प्राचीन काल से हिंदुओं ने संघर्ष अपने अस्तित्व के लिए किया है, दूसरों को दबाने के लिए हिंदुओं ने संघर्ष कभी नहीं किया है। मैं समझता हूं कि विश्व में हिंदू एक ही है जिन्होंने संघर्ष अपनी आत्मरक्षा के लिए किया है। दूसरे समाज पर आक्रमण करने के लिए नहीं किया है।

‘शत्रुबुध्दिविनाशाय’ यह हम अपने बच्चों को सिखाते हैं। मैं समझता हूं, यह है हिंदू। प्रकृति के साथ तालमेल रखने वाला, पर्यावरण के साथ मेल रखने वाला हिंदू है। इस प्रकार से इसका बड़ा व्यापक स्वरूप है । इसलिए जो कहेगा कि मैं हिंदू हूं, वह संघ के लिए हिंदू है। नाम, पूजा पध्दति कुछ भी हो सकती है। इस प्रकार की जीवन शैली को मानने वाला कोई भी हो वह हिंदू है। इसलिए हिंदू शब्द को किसी भी शब्द के साथ बांधना यानी यहां की प्राचीन सभ्यता के साथ विद्रोह करना है, ऐसा मैं मानता हूं।

संघ की ‘परम वैभव’ की संकल्पना क्या है?

भौतिक सम्पन्नता किसी भी समाज के लिए आवश्यक है। उसकी उपेक्षा नहीं हो सकती है। इसलिए ‘परम वैभव’ की संकल्पना जब हम करते हैं, तब सुखी, सम्पन्न, समृद्ध राष्ट्र-समाज यह हमारी कल्पना है। हम दरिद्रि रहे यह हमारी कल्पना नहीं है। परम वैभव में रहने वाला सुखी-समृद्ध व्यक्ति या समाज सादगी में रहे। सादगी यह मानसिक अवस्था है। मनुष्य की दैनंदिन जीवन से संबंधित आवश्यकताएं सुख से, आनंद से पूरी होती जाए। लेकिन सुख की कल्पना को हमने व्यापक बनाया है। इंद्रियों की कल्पना को सुख नहीं माना है। मन का आनंद है, बुध्दि का आनंद है, उसको भी ध्यान में रखकर मानवी विकास की ओर चलना चाहिए। अपनी संस्कृति में पशुता से देवत्व की ओर जाना ही हमारी विकास की कल्पना है। जब हम परम वैभव की बात करते हैं तो मनुष्य पशुता से ऊपर उठकर समृध्द बनता जाए ऐसा समाज यानी परम वैभव संपन्न समाज है। एक निर्दोष समाज जीवन निर्माण होता जाए यह है परम वैभवी समाज। धर्म की ओर म्ाूल्यों के आधार पर चलने वाला समाज यानी परम वैभव संपन्न समाज। इसलिए हमारा समाज भौतिक सुखों से परिपूर्ण बनेगा; लेकिन मूल्यों के आधार पर चलेगा। जीवन में अपने कर्तव्यों को समझकर मार्गक्रमण करेगा। भौतिक सुखों के साथ आध्यात्मिक सुखों के अनुभव से श्रेष्ठता का अनुभव लेगा। भारत का चिंतन कभी भी भौगोलिक क्षेत्र से संबंधित नहीं रहा है। जब हम कहते हैं कि, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः’ तो वह केवल भारत से ही संबंधित नहीं रहा। उसमें विश्व के मंगल चिंतन की कामना है। जब हम परम वैभव की बात करते हैं तो प्रकृति के साथ सारी मनुष्य जाति के बीच तालमेल, सारे समाज के साथ तालमेल यह समाज के परम वैभव का लक्षण है, ऐसा मैं मानता हूं।

रोजगार, ग्राम स्वावलंबन और गरीबी ये तीनों अपनी देश की प्रमुख समस्याएं हैं। हिंदू चिंतन में इन समस्याओं का उत्तर किस प्रकार समाविष्ट है?

रोजगार की या गरीबी निर्मूलन की जब बात आती है तब स्वालम्बन के मुद्दे पर सोचें। परावलम्बन की नहीं, परस्परावलम्बन की बात संघ मानता है। कोई भी स्वावलम्बी नहीं हो सकता। परावलम्बी होना भी अच्छा नहीं। परंतु परस्परावलम्बन की पद्धति को लेकर हमें चलना पड़ेगा। मेरे जीवन की आवश्यक सभी बातों के लिए मुझे दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। क्योंकि मैं स्वयं अनेक बातें निर्माण नहीं कर सकता। वैसे दूसरे भी मुझ पर निर्भर हैं। यें बातें परस्पर आदान- प्रदान की मानसिकता को बनाए रखती है। जब हम स्वावलम्बन की बात करते हैं तो पूर्ण स्वावलम्बन कभी नहीं होता। हमारा जीवन परस्परावलम्बन से जुड़ा है, सहकारिता से जुड़ा है, परस्पर सहयोग से जुड़ा है। इसलिए कभी भी पूर्ण स्वावलम्बन हमें अपेक्षित नहीं है। अपनी आवश्यक बातों के लिए अपने दायित्व को समझें और दूसरों का सहयोग भी लेते जाए।

रोजगारों के बारे में कहा जाए तो इस संदर्भ में बड़ी गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। अपने यहां रोजगार के संदर्भ में बहुत विकेंद्रित व्यवस्था थी। आज बड़े-बड़े उद्योगों के कारण वह व्यवस्था केंद्रित बनती गयी। इसी कारण अपनी आय के स्त्रोतों के लिए दूसरों पर निर्भर होते गये। कुटीर उद्योग यह इस देश का परम्परा से चलता आया उद्योग जीवन है। आज भी वह रोजगार के लिए अच्छा साधन बन सकता है। विकेंद्रित अर्थव्यवस्था, विकेंद्रित उद्योग व्यवस्था महत्वपूर्ण है। कोई भी बेरोजगार न रहे यह स्वाभाविक आवश्यकता है। रोजगार हर व्यक्ति को मिलना ही चाहिए, लेकिन उसका रास्ता केवल केंद्रित उद्योग व्यवस्था नहीं हैं।

गरीबी की बात कहें तो व्यक्ति अगर थोड़ा बहुत कुछ करना चाहे तो गरीब नहीं रहेगा। अपने देश की गरीबी मानसिकता से जुड़ी हुई है। आत्मविश्वास जगाने की आवश्यकता है। मेरे पास कुछ सामर्थ्य है, उस समार्थ्य का परिचय न होने के कारण वह दूसरों पर निर्भर होकर बैठा है। अगर हर व्यक्ति सोचेगा, कुछ करेगा तो भारत में कोई भी गरीब नहीं रहेगा। एक स्वाभिमान का जीवन जीते हुए मैं अपना जीवन जीऊंगा यह भाव हर एक के मन में आना चाहिए।

पूर्वांचल में अराष्ट्रीय गतिविधियों को रोकने के लिए संघ ने वहां अनेक वर्षों से कार्य निर्माण किया है। इस कार्य के वहां के समाज जीवन में कौन से परिणाम दिखाई देते हैं?

पूर्वांचल की समस्या हमारे ही कारण है। पूरे भारतवासियों के कारण यह समस्या बनी हुई है। संघ का प्रयास रहा है कि पूरे पूर्वांचल में जागरण हो। आज यह मानसिकता वहां बन गई है कि पूर्वांचल यह भारत का हिस्सा नहीं है। भारत का अन्य प्रदेश पूर्वांचल को अपना नहीं मान रहा है। इसलिए इस अज्ञान को दूर करने का प्रयास संघ निरंतर करते आया है। दोनों में परस्पर अपनत्व निर्माण करने के लिए पूर्वांचल वासी और देश के अन्य प्रदेशों के वासी इनको परस्पर जोड़ने का कार्य संघ ने किया है। संघ छात्रावास चलाता है, वहां का युवा, तरूण छात्र शिक्षा ग्रहण करने के लिए देश के अन्यान्य प्रांतों में चला जाता है। उसी कारण वह अपने भारत देश की संस्कृति को, प्रदेश को समझ पाता है। इस कल्पना को लेकर किए काम को अच्छा प्रतिसाद मिला तब मेघालय, मणिपुर, अरूणाचल प्रदेश के लोगों को भारत दर्शन कराने की योजना कार्यान्वित हुई है। अपनापन बढ़े और निर्माण हुई खाई को कम करने का प्रयास हुआ है। ‘भारत मेरा घर’ यह कल्पना सामने आई और वहां के छात्रों को भारत के अन्यान्य प्रदेशों का दर्शन करना प्रारंभ हुआ। जो विद्यार्थी उस समय भारत के विभिन्न प्रांतों के संघ के छात्रावास में रहकर पढ़े हैं वे आज पूर्वांचल में एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभा रहे हैं।

आज पूर्वोत्तर के क्षेत्रों में लगभग दस हजार सेवा कार्यों का जाल संघ ने निर्माण किया है। सभी सात राज्यों में यह सेवा कार्य चल रहा है। लगभग 6000 विद्यालय उस क्षेत्र में आरंभ हो गये हैं। उन विद्यालयों के कारण भारतीयत्व, देशभक्ति इस प्रकार की बातें उनके सामने आती हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र के बारे में अगर हम सोचेंगे तो ट्रायबल-नॉन ट्रॉयबल यह बहुत बड़ा संघर्ष वहां पर था। असम के लोग अपने आप को नॉन-ट्रॉयबल मानते थे और अन्य 6 राज्यों के ट्रॉयबल मानते थे। उस कारण जो खाई निर्माण हुई थी उस खाई को कम करने का प्रयास संघ के कार्यक्रमों के द्वारा वनवासी कल्याण आश्रम के द्वारा, विद्या भारती के कार्य के द्वारा हुआ है। उस परिश्रम के अच्छे परिणाम अब सामने आ रहे हैं।

वहां कार्य करते समय वहां की भाषा, वहां की परम्पराओं, वहां की वेशभूषा, वहां की मान्यताओं को हमने कभी समाप्त करने का प्रयास नहीं किया। उन्हें जनजाति सुरक्षा मंच के द्वारा बरकरार रखने का प्रयास हो रहा है। इन कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप वहां पर हिंदी भाषा सिखने का आकर्षण बढ़ गया है। देश की भाषा के साथ जोड़ने का भाव जागृत हो रहा है। वहां संघ की उपस्थिति के कारण ईसाइयों के आक्रमण के प्रति सतर्कता आई है। वहां का जो ईसाई बना हुआ वर्ग है वह अपनी प्राचीन परम्पराओं की ओर लौट रहा है।

हमने वहां पर अनेक विद्यालय निर्माण किए हैं। उन विद्यालयों को वहां के ईसाई लोगों से भी सहयोग मिल रहा है। वनवासी कल्याण केंद्र द्वारा स्थापित एक विद्यालय को ‘नागा विद्यालय’ नाम दिया था। वहां अन्य धर्मीय प्रचारक संस्थाएं सेंट झेवियर्स या ईसाई संतों के नाम विद्यालयों को देते हैं। वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से प्रारंभ हुए विद्यालय का उद्घाटन करने वहां के मंत्री आये थे। वे धर्म से ईसाई थे। भाषण में उन्होंने कहा कि यह हमारा विद्यालय है, क्योंकि नागा संस्कृति से जुड़ा यह पहला विद्यालय है। जोड़ने की जब बात आती है तब भावात्मक मुद्दों पर ही जोड़ा जा सकता है। वहां पर जो देश विरोधी कार्रवाई करने वाले संगठन बने हैं, वे कहीं न कहीं विदेशी शक्तियों के कारण बने हैं। इसलिए हम चाहते हैं कि सरकार को इस विषय को प्रखरता के साथ देखना चाहिए। वहां की देश विरोधी कार्रवाइयों के पीछे के लोगों को समाप्त करना चाहिए। वहां दूसरी समस्या है बढ़ते बांग्लादेशी घुसपैठ की। उस संदर्भ में भी सरकार को कठोरता से पेश आना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद सार्ध शताब्दी महोत्सव संघ के माध्यम से सम्पूर्ण देश में पूरे वर्ष मनाया गया। इस महोत्सव वर्ष का समाज पर कौनसा परिणाम हुआ है?

स्वामी विवेकानंदजी के विचार मूलत: प्रभावी हैं। उन विचारों का व्यापक असर समाज जीवन पर है। स्वामीजी का नाम लेते ही सभी के मन में एक अलग प्रकार का श्रध्दाभाव जागृत होता है। इसलिए मैं समझता हूं, यह केवल संघ का कार्यक्रम नहीं रहा। सार्ध शती समारोह का यह कार्यक्रम सारे देश का बने, सारे समाज का बने ऐसा प्रयत्न संघ ने किया। प्रथम पर्व में जो शोभा यात्राएं सम्पूर्ण देशभर में हर नगर- ग्राम में निकलीं उनमें समाज के हर वर्ग के लोग सम्मिलित हुए थे। देश का बड़ा हिस्सा इस उपक्रम से जुड़ा था। इसमें स्वामीजी का नाम, उनका व्यक्तित्व, उनका कार्य यह महत्वपूर्ण भाग था।

इस समारोह के कारण समाज का विद्वजन, सुसंस्कारित वर्ग साथ आया। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं, सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले मान्यवरों से इस समारोह में सहयोग प्राप्त हुआ यह महत्वपूर्ण बात है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और स्वामी विवेकानंद, शिक्षा और स्वामी विवेकानंद, व्यक्ति निर्माण कार्य और स्वामी विवेकानंद, महिला विकास के संदर्भ में विवेकानंद के विचार इत्यादि विषयों पर आयोजित विचार गोष्ठियों में समाज के विद्वान लोग आ रहे हैं। समाज के अच्छे, नेतृत्व करनेवाले लोग संघ विचारों से ज़ुड़ रहे हैं। हमने विवेकानंद सार्ध शती महोत्सव का विषय शहरों तक सीमित न रखते हुए ग्रामीण क्षेत्र में भी बड़ी जोर से संपन्न किया है। सामाजिक समरसता, जो स्वामीजी के जीवन का एक संदेश है, उसे ध्यान में लेकर वनवासी क्षेत्र में वनवासियों के बीच स्वामी विवेकानंदजी के बारे में कई कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। इस सम्पूर्ण समारोह में समाज का सहयोग और सहभागिता बहुत अच्छी मिल रही है

भारत देश युवकों का देश है। वर्तमान में युवकों की आंतरिक ऊर्जा और सामर्थ्य समाज के विविध क्षेत्रों में प्रभावी रूप से दिखाई देता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ‘राष्ट्र निर्माण’ की संकल्पना को यह युवा वर्ग किस दृष्टि से देख रहा है?

एक बात मैं पहले ही स्वीकार कर लेता हूं कि युवकों के पास जिस गति से हमें पहुंचना था उस गति से हम पहुंच नहीं पाये। गत 7-8 वर्षों से युवकों को केंद्र में रख कर हमारे प्रयास जारी हैं। ये प्रयास सफल हो रहे हैं, ऐसा चित्र है। संघ की जो संगठनात्मक रचना है उसमें साप्ताहिक मिलन है, व्यावसायिक शाखा है। देशभर में महाविद्यालयीन छात्रों का संघ विचारों से जुड़ने का प्रमाण तेजी से बढ़ रहा है। संघ के माध्यम से जब किसी प्रकार का आवाहन होता है तो उसमें युवा शक्ति जुड़ती है। यह प्रमाण संघ के शिविरों, वर्गों, समारोहों में सहभागिता में बढ़ते स्वरूप में दिखाई दे रहा है। आय. टी. के क्षेत्र में जो युवा वर्ग है, उन्हें संघ से जोड़ने का जो प्रयास हुआ है, जिसमें बड़ी मात्रा में सफलता मिली है। मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, पुणे जैसे शहरों में आय. टी. के क्षेत्र के युवा जुड़ गये हैं।

आज युवा वर्ग संवेदनशील है। यह संवेदना उसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। कई प्रकार की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए जब हम युवाओं को आवाहन करते हैं तब देशभर में युवा उत्साह से आगे आते हैं। समस्याओं को देखें, समझें इस प्रकार के उपक्रमों की शृंखला हमने चलाई है। आज के युवकों की संवेदनशीलता को आधार बनाकर उसे देश की समस्याओं के साथ जोड़ना है। दूसरी बात देश के इतिहास, देश की गरीबी के संदर्भ में होगी या हमारी कुछ कमियों के बारे में होगी, देश के विकास संदर्भ में होगी। ऐसे भावात्मक मुद्दों पर उन्हें जोड़ने का प्रयास देशभर में चल रहा है।

‘सरहद को प्रणाम’ उपक्रम के तहत देश की सभी सीमाओं पर भारत का युवक संघ के माध्यम से गया था। राजस्थान का युवक मणिपुर की सीमा पर गया, तो मणिपुर का युवक जम्मू कश्मीर की सीमा पर गया। सीमा दर्शन से राष्ट्रभाव का जागरण उसके मन में हुआ। इस प्रकार की कोई योजना बनती है तो हमें विश्वास है कि देशभर का युवा वर्ग अपने कार्य के साथ जोड़ने में हम सफल रहे हैं।

आज का युवा भारत को जानने के लिए इच्छुक है, भारत के विकास की चुनौती को स्वीकार करने की मानसिकता रखता है। उसके साथ इस प्रकार का संपर्क रखना जरूरी है। उस प्रकार के कार्यक्रम उसे देने जरूरी है। उस प्रकार की कार्य योजना जितनी प्रभावी ढंग से हम करेंगे उतना युवा वर्ग हमसे जुड़ जाएगा। आज का युवा वर्ग राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर गंभीर है। इस गंभीरता को हम किस प्रकार स्पर्श करेंगे, उस पर यह निर्भर है।

अपने देश में भगवा रंग को एक विशिष्ट प्रतिष्ठा है। ऐसा कहा जाता है कि ‘संघ देश में भगवाकरण’ चाहता है। इस प्रचार या टिप्पणी पर संघ में क्या सोच है?

वास्तव में संघ ‘हिंदुत्व’ के संदर्भ में सोचता है और ‘हिंदुत्व’ को विकल्प के रूप में भगवाकरण यह शब्द देते हैं तो मैं समझता हूं कि शब्द का उपयोग करनेवाले विकृत दृष्टि से सोचते हैं। हिंदू यह जीवनशैली है, चिंतन है, अर्थ की ओर देखने की दृष्टि है जो पश्चिमी देशों से भिन्न है। गलत धारणाओं से, पश्चिम के प्रभावों के कारण हमारे रणनीतिकार प्रभावित हैं। इस सारी पद्धति को विरोध करके भारतीय जीवन पद्धति प्रस्थापित करने का प्रयास संघ के माध्यम से होता है। उन प्रयासों को वे भगवाकरण के रूप में मानते हैं। राष्ट्र के हित में चर्चा करना यानी भगवाकरण, हिदुत्व की चर्चा करना यानी भगवाकरण वे मानते हैं। पूर्व के चिंतन पर विचार प्रस्तुत करना इसे वे भगवाकरण मानते हैं। आज भगवाकरण कहते हुए वे लोग सारे देश की मूलभूत व्यवस्थाओं, विचारधाराओं को नकारने में लगे हुए हैं। यह उनकी कृति से स्पष्ट हो रहा है। आज भगवाकरण कहते हुए भारत की प्राचीन संन्यासी परम्पराओं को आप उपेक्षित कर रहे हैं। क्या आप मंदिरों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं? जनसामान्य के अंतःकरण को इस प्रकार की ठेस पहुंचा कर कोई भी देश सम्मान के साथ खड़ा नहीं हो सकता है। राजनैतिक छोटे बड़े स्वार्थ के लिए एक शाश्वत चिरंतन विचारों को आप ठेस पहुंचा रहे हैं। संघ पर भगवाकरण का आरोप करनेवालों को इस बारे में बहुत गंभीरता से सोचना चाहिए।

राजनैतिक शत्रुत्व को आधार बनाकर इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करना बिल्कुल अनुचित है। वे कहते हैं इसलिए हम भारत से जुड़ी शाश्वत जीवन शैली से समझौता करें, ऐसा हम नहीं मानते। हमें विश्वास है कि प्रामाणिकता से सोचनेवाले लोग हमारे साथ खड़े रहेंगे। थोडा-सा धैर्य रखना पड़ेगा। भारत का समाज ऐसे शब्दों से विचलित होते हुए भी अंतत: हमारे साथ खड़ा रहेगा, यह हमें विश्वास है। क्योंकि यह उसके अंतःकरण की भावना है और अंतःकरण की भावना को कोई भी आसानी से निकाल नहीं सकता। माना कि ऐसे शब्दों से उसे ठेस पहुंचती है, कभी-कभार निराशा आती है, लेकिन मूल भावना समाप्त नहीं होती है। इसलिए भगवाकरण शब्द का उपयोग करनेवालों की दूषित मानसिकता राजनीति से प्रेरित मानसिकता है, यह हमें समझना चाहिए।

‘हिंदुत्व ही राष्ट्र की आत्मा है’ यह विचार सदैव संघ के विचारों में व्यक्त होता है। इस विचार का मूलाधार क्या है?

‘राष्ट्र’ यह कल्पना भारत ने सम्पूर्ण विश्व को दी है। अब हम ‘नेशन’ शब्द का प्रयोग करते हैं तब ‘राष्ट्र’ के प्रति जो भाव है वह इससे परिभाषित नहीं होता। मैं एक तुलनात्मक बात आपको बताता हूं- व्यक्ति है तो उसके तीन रूप हैं। एक है शरीर, जो दिखाई देता है। दूसरा रूप है, शरीर की आवश्यकताएं जैसे भोजन, पानी, कपड़ा। परंतु एक चीज है जो दिखाई नहीं देती है। वह है, शरीर के अंदर की आत्मा। वह दिखाई भले न दे लेकिन उसका अस्तित्व है।

अब हम ‘राष्ट्र’ के संदर्भ में इसी कल्पना को लेकर सोचेंगे तो मैं तीन शब्दों का प्रयोग करूंगा। एक है देश, जो शरीर के समान है। दूसरा है राज्य, जिसका कर्तव्य है इस देश की सारी जिम्मेदारियां पूर्ण करना, आवश्यक व्यवस्थाओं का निर्माण करना। यह राज्य का दायित्व बनता है। और, तीसरा है, ‘राष्ट्र’, जो दिखाई नहीं देता, पर इसे सारे समाज की आत्मा के रूप में देखना चाहिए।

आत्मा ‘राष्ट्र’ का भाव है। वह सुविधाओं पर निर्भर नहीं है। देश नहीं होगा तो ‘राष्ट्र’ भी नहीं होगा, यह हमारी मान्यता है। राजा बदलते रहे, पर राष्ट्र वही रहा है। हम कहते हैं कि ‘हिंदुत्व यही राष्ट्र की आत्मा है’। इस भूमि पर रहने वाला समाज, उसकी सब बातें जहां जुड़ी हुई हैं, वह समाज हिंदू नाम से जाना जाता है। इसलिए हम कहते हैं, इस राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र कहा जाता है। इस प्रकार की भावात्मक कल्पना लेकर चलना चाहिए। आक्रमणों से राष्ट्र दुर्बल होता है, आक्रमणों से राष्ट्र उपेक्षित हो जाता है; लेकिन समाप्त नहीं होता है। अगर हमारी कल्पना है कि आत्मा अमर है तो राष्ट्र भी अमर है। जब अवसर मिलेगा तब नई शक्ति के रूप में राष्ट्र खड़ा होता है। एक भौगोलिक क्षेत्र में दो राष्ट्र रहे हैं और एक राष्ट्र कई प्रकार के देशों में बंटा हुआ है। अगर मुस्लिम एक राष्ट्र है तो उसकी एक भूमि नहीं है। वह कई देशों में बिखरा है। हालांकि हम इस कल्पना को नहीं मानते हैं। राष्ट्र एक विचारधारा है, एक समाज है, एक जीवनशैली है, एक परम्परा है, उसी के लिए वह जीता है, उसीके लिए वह मरने के लिए तैयार रहता है।

अगर भारत के क्रांतिकारी मरने के लिए तैयार हुए तो वे अंग्रेजों को हटाने के लिए नहीं, अपने चिंतन के लिए मरने के लिए तैयार हुए थे। राष्ट्र की जो कल्पना व्यक्तिगत जीवन से ऊपर उठकर विचार करनेवाले चिंतन के प्रति भाव रखने वाली है। अब हम हिंदुत्व की बात करते हैं तो इस प्रकार की भावात्मक कल्पना को लेकर चलें। इस कारण संघर्ष होगा, कठिनाइयां आएंगीं। हम त्याग, समर्पण क्यों करते हैं? त्याग, समर्पण सिद्धांतों के लिए होते हैं। फांसी पर जाते समय सरदार भगतसिंह कहता है, ‘मुझे फिर जनम मिले तो भारत माता की गोद में मिले।’ यह कौनसी भावना है? किन विचारों के लिए यह भावना प्रकट होती है?

संघ का भाव यही है- राज्य आएगा, जाएगा। सरकारें बनेंगी, नहीं बनेंगी। लेकिन इस चिंतन के प्रति जो श्रद्धा है, इस चिंतन के लिए मर मिटने की जो भावना है, वह बनाए रखना यानी राष्ट्र भावना है। यह भावना आज हिंदू शब्द से परिचित हो जाती है।

संघ के संस्कारों को लेकर राजनीति में जाने वाले नेताओं को जब सत्ता के लिए आपस में लड़ते देखते हैं, तब आपके मन में क्या भाव उभरते हैं?

वेदना होती है। शास्त्र बताते हैं कि संस्कार क्षरण होते जाते हैं। इसलिए जो क्षरण होने वाली चीज है उसको बनाए रखने के लिए प्रयत्न करने पड़ते हैं। स्वाभाविक प्रक्रिया है क्षरण होना, अस्वाभाविक प्रक्रिया है उसको संरक्षित करते हुए संभाल कर रखना। आज बहुत प्रदूषित वातावरण राजनैतिक क्षेत्र में है। कोई स्वयंसेवक राजनैतिक क्षेत्र में जाता है तो वह भी इस प्रदूषण से गुजरता ही है। अगर उस प्रदूषण से उसे मुक्त रहना है तो नित्य संस्कारों के वातावरण में रहे। बिना प्रदूषित राजनीतिक क्षेत्र में दृढ़ता से रहना कठिन है। इसलिए केवल राजनैतिक क्षेत्र में ही नहीं, सभी क्षेत्रों में संस्कारों से युक्त उसका जीवन रहेगा तभी वह अपने कर्तव्यों का ठीक से पालन कर पाएगा। हम चाहते हैं कि संघ स्वयंसेवक किसी भी क्षेत्र में जाए वह इन संस्कारों के प्रति सजग रहे। लेकिन मैंने कहा न कि पतन का मार्ग बड़ा आसान है, उत्थान का मार्ग कठिन है। बिना प्रयत्नों से आपका पतन हो सकता है, बिना कोशिश के उत्थान नहीं हो सकता है। इसलिए संस्कारों की सुरक्षा करना, सुरक्षा का वातावरण उसे उपलब्ध करना, अपनी स्वयं की मानसिकता संस्कारों में बने रहने की कायम रखना इसके लिए कोशिश करना जरूरी है। हम स्वयंसेवक के नाते मिलते रहते हैं। उनका स्वयंसेवकत्व का भाव बना रहे इसके लिए प्रयत्नशील रहते हैं। कभी सफलता मिलती है, कभी नहीं मिलती। पर हमें लगता है कि मार्ग इसके अलावा अन्य कुछ नहीं है। इसी तरह से उनके संस्कारों की सुरक्षा करते रहना चाहिए। इसके लिए उनकी भी तैयारी चाहिए और हम लोगों की भी सिद्धता चाहिए तब जाकर हो सकता है।

अफगानिस्तान में तालिबानियों ने बामियान में बुद्ध मूर्ति को ध्वस्त किया था। अब बिहार में, बोधगया में बम विस्फोट हुए हैं। इन दोनों घटनाक्रमों में कौनसी समानता है?

प्रवृत्ति समान है। यह असहिष्णु प्रवृत्ति का परिचय है। जो लोग यह मानकर चलते हैं कि उनका ही मार्ग सत्य का है, धर्म का है वे दूसरे को सहन नहीं करते हैं। ऐसे विचारों को ‘सेमेटिक’ श्रेणी का माना जाता है। फिर वह इस्लाम हो या ईसाइयत। दोनों ‘सेमेटिक’ हैं- एकमतवादी हैं। वे दूसरों के विचारों को सहन नहीं कर सकते। इन्हीं विचारों के प्रभाव के कारण धार्मिक क्षेत्र में उनके अनुयायी आक्रामक होते हैं। अफगानिस्तान में अवसर मिला तो तालिबान ने बुद्ध मूर्ति का ध्वंस किया। भारत में अवसर मिला तो बुद्धगया जैसे शांति-स्थल पर विस्फोट करवाए। इन दो घटनाओं में यदि अंतर करना है तो मैं इतना ही कहूंगा कि अफगानिस्तान में इस ध्वंस की घटना को स्वीकार कर लिया गया, लेकिन भारत में इसे स्वीकार नहीं किया गया है। भारत के जनसामान्य ने इसका निषेध किया है।

चीन का भूविस्तारवाद, पाकिस्तान का आतंकवाद देश के लिए सिरदर्द बना है। साथ में बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल जैसे छोटे देशों से विवाद निर्माण हो रहे हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए भारत को किस तरह के राजनैतिक एवं सामरिक रक्षा संतुलन की आवश्यकता है?

तीन बातों के प्रति प्रतिबद्धता होनी चाहिए। देश का स्वातंत्र्य बना रहें, देश का सार्वभौमित्व बना रहें और देश व उसकी अखंडता पर आंच नहीं आए। चीन की विस्तारवादी रणनीति बहुत पहले से रही है। यह उसका इतिहास है। 1962 में आक्रमण कर चीन ने अपनी मंशा प्रकट की थी। उस घटना को अब 50 वर्ष हो गए हैं। अपनी लगभग 38 हजार वर्ग मीटर भूमि उसके कब्जे में है। इस भूमि को वापस लेने के संदर्भ में 1962 से आज तक भारत को सफलता नहीं मिली है। मात्र वार्ताओं के दौर चलते रहे। अब ऐसी स्थिति आ गई है कि नियंत्रण रेखा को ही आप सीमा मान लें। इसका मतलब है कि कब्जा किया हुआ भारत का भूभाग हम छोड़ दें। पर चीन यहीं पर नहीं रुका है। उसने अरुणाचल प्रदेश में कब्जा करने का प्रयास किया। आज वह तवांग पर अपना हक जता रहा है। चीन के इस विस्तारवाद से हम भारतवासी अपरिचित नहीं हैं। परंतु, दुर्भाग्य से देश का नेतृत्व चीन की नीतियों को पहचान नहीं पाया। एक तरफ ‘हिंदी चीनी भाई भाई’ के नारे नेहरू के जमाने में लग रहे थे और दूसरी तरफ उस समय संघ के सरसंघचालक श्रीगुरुजी ने कहा था कि चीन कभी किसी का मित्र नहीं बन सकता तो भाई क्या बनेगा? चीन की इस बात पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। आज की स्थिति में हमारे नेतृत्व को चीन को पहचानने की आवश्यकता है। एक अन्य बात हमें ध्यान में रखनी चाहिए कि जब तक हम चीन की तैयारी को नहीं समझेंगे तब तक हम अपनी तैयारी नहीं कर पाएंगे। चीन विकास के नाम पर पाक के कब्जे वाले कश्मीर में कई प्रकार के सामरिक प्रकल्प बना रहा है। सीमा तक पहुंचने के रास्ते, हवाई अड्डे बनाए गए हैं। इस प्रकार की व्यवस्था भारत की ओर नहीं है। सीमाओं पर ढांचागत व्यवस्था करने की दृष्टि से भारत को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। इसके लिए आर्थिक प्रावधान किए जाए। चीन ने सभी प्रकार के परमाणु अस्त्र सीमा पर स्थापित किए हैं। इसे भारत को समझना चाहिए। हम शस्त्रास्त्रों के मामले में दूसरे देशों पर निर्भर हैं। इस सम्बंध में आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है। पर्वतीय क्षेत्र में काम करने में निपुण सैन्य-बल हमें तैयार करना होगा। सायबर सुरक्षा आज की स्थिति में अत्यंत आवश्यक है। इस नई प्रोद्यौगिकी में माहिर विशेषज्ञ हमें तैयार करने होंगे। समग्रता से राष्ट्रीय सुरक्षा नीति बने यह आवश्यक है। संघ के प्रस्तावों में इन सब बातों का जिक्र किया गया है।
अब पाकिस्तान की बात। पाक प्रशिक्षित आतंकवाद ने आज देश के साथ छद्म युद्ध छेड़ रखा है। पाक से हमारे चार युद्ध हो चुके हैं- 1948, 1965, 1971 और कारगिल युद्ध। कारगिल युद्ध में तो हम खिंचे गए। ये सब युद्ध घोषित युद्ध थे, पर आतंकवाद अघोषित युद्ध है। घोषित युद्धों में जितने लोग मारे गए उससे कई अधिक लोग आतंकवाद के कारण मारे गए हैं। आतंकवाद पाकिस्तान पोषित है। पाकिस्तान को यह सोचना पड़ेगा कि वह अशांति चाहता है या विकास चाहता है। ये दोनों बातें साथ-साथ कभी नहीं चल सकतीं। आज तक का पाकिस्तान का स्वभाव यह बताता है कि वह अशांति के मार्ग पर चलना चाहता है।

जब हम बांग्लादेश की बात करते हैं तो बांग्लादेश का व्यवहार हमारी दुर्बलता है। चारों ओर से घिरा होने के बावजूद वह भारत को दांत दिखाता है। घुसपैठ यह एक छिपा आक्रमण ही है। आज अगर तीन-चार करोड़ बांग्लादेशी भारत में हैं तो यह एक तरह से आक्रमण ही है। बांग्लादेश के कारण असम के दस जिले प्रभावित हुए हैं। बंगाल के सात जिले प्रभावित हुए हैं, जहां पर मुस्लिम बहुसंख्यक हो गए हैं। अभी-अभी असम में जो संघर्ष हुआ है, वह बांग्लादेशियों की घुसपैठ का ही परिणाम था। दुर्भाग्य यह है कि घुसपैठियों को पनाह देनेवाला स्थानीय मुसलमान समाज है। उनके समर्थन से ही बांग्लादेशी घुसपैठिए मुंबई-दिल्ली तक चले आते हैं। इसलिए संघ की मांग है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर अमल हो- बांग्लादेशियों को खोजोे, उन्हें डिटेन करो, डिलिट करो और डिपोर्ट करो। आज तो उनकी मतदाता सूची भी बन गई है। विधान सभा की सीट का निर्णय बांग्लादेशी मुस्लिम समुदाय करता है, जो बड़ी चिंता की बात है।

नेपाल पाकिस्तानी और चीनी घुसपैठ का प्रवेशद्वार बन गया है। नेपाल की सीमा सील नहीं है। वहां पर पासपोर्ट-वीजा देखने की व्यवस्था नहीं है। आज जो माओवाद-नक्सलवाद का पोषण हो रहा है, उन्हें शस्त्रास्त्र मिलते हैं, वे नेपाल के मार्ग से ही आते हैं। अगर भारत जैसा देश नेपाल जैसे छोटे देश को अपना सहयोगी नहीं बनाता है तो हमारी विदेश नीति पर बड़ी गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।

श्रीलंका में हिंदुओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार हो, उनके अधिकारों की रक्षा हो यह आवश्यक है। केवल वह तमिल है या हिंदू है इसलिए उनके साथ भेदभाव हो, उनकी उपेक्षा हो यह संबंधों की दृष्टि से ठीक नहीं है। परस्पर सहयोग से ही इस क्षेत्र में विकास और शांति का मार्ग प्रशस्त होगा।

अविचारी उदारवादी नीतियों और अंधाधुंध वैश्वीकरण के विरोध में संघ ने स्वदेशी का मुद्दा भारतीय जनता के सामने रखा था। इस संदर्भ में संघ की अब क्या नीति है?

वैश्वीकरण वास्तव में साम्राज्यवादी कल्पना है। हमारा जो चिंतन है वह एकाधिकार विरोधी है और विकेंद्रित व्यवस्था पर हमारा विश्वास है। इसलिए ग्लोबलायजेशन से दुनिया एक हो गई यह ठीक है परंतु उसकी मर्यादाओं को समझना चाहिए। स्वावलम्बन एवं उत्पादनक्षम अर्थव्यवस्था अपनी परम्परा रही है। विकेंद्रित अर्थव्यवस्था के संदर्भ में सोचने की आवश्यकता है। सहकारिता के आधार पर, कुटीर उद्योंगों के आधार पर विकेंद्रित अर्थव्यवस्था पर बल देना पड़ेगा तभी भारत का सही विकास होगा। जनता पार्टी की सरकार के समय उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने बड़े उद्योगों के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए थे जैसे बड़े उद्योग छोटे या कुटीर उद्योगों के क्षेत्र के उत्पादनों में प्रवेश नहीं कर सकते। यह छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने जैसा था। आत्मनिर्भरता की दिशा में जाना है तो प्रतिभाओं को भी अवसर देना होगा, साथ में विकेंद्रित अर्थव्यवस्था को भी अवसर देना होगा। जब पूंजी प्रधान या औद्योगिक प्रधान व्यवस्थाएं बढ़ जाती हैं, तब प्रतिभाएं भी समाप्त होती हैं, आत्मनिर्भरता भी समाप्त होती है और आत्मनिर्भर समाज भी साथ-साथ समाप्त होता है।

आज पूरा विश्व भारत को एक बाजार (मार्केट) मान रहा है। 100 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाला देश भारत है। सम्पूर्ण विश्व की बाजार- अर्थव्यवस्था भारत पर नजरें लगाए हुए हैं और हम स्वच्छंद व अनियंत्रित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं। इसकी जड़ में पूंजीवाद है। भारत को विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) से खतरा है। इसलिए उससे बचना पड़ेगा। भारत की राष्ट्रीय सम्पदा का दूसरे देश दोहन न करें यह देखना होगा। विश्व निकट आ रहा है इस बात को अस्वीकार न करें; लेकिन परस्पर सम्मान और परस्पर सम्बंधों की चिंता जरूर करें, अपने सम्बंधों की, अपने अधिकारों की, अपनी प्राकृतिक सम्पदा की सुरक्षा जरूर करें। यह अधिकार हम सबको है यह मानकर चलना चाहिए। सहकारिता इन सारी बातों को जोड़ने का आधार होना चाहिए। जितनी हो सके उतनी आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था हम करेंगे, हमारे संसाधनों का उपयोग हम ही करेंगे, उस पर किसी का कब्जा न हो। आज तो जल पर भी कब्जा जमाने की बात आती है। नदियां खरीदने की बात आती है। अपने जलस्रोत को भी उद्योग क्षेत्र में लिया जा रहा है। मैं समझता हूं कि अपनी आत्मनिर्भरता के लिए ये सब बातें खतरा बन सकती हैं।

देश में जनसंख्या बढ़ रही है। इस बढ़ती जनसंख्या के कारण देश अनेक संकटों से गुजर रहा है। इस विषय पर संघ की सोच क्या है?

भारत में हर दस वर्ष में जनगणना होती है। जनगणना के आंकड़ों का जब हम अध्ययन करें तो यह बात ध्यान में आती है कि जनसंख्या वृद्धि तो हो रही है लेकिन वह असंतुलित है। इस बात को बहुत गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। हमारा इतिहास बताता है कि जब कभी जनसंख्या का असंतुलन हुआ तब अहिंदू शक्तियां बढ़ी हैं। ऐसी बढ़ी जनसंख्या देश के लिए समस्या बनी है। जिस प्रदेश में अहिंदू जनसंख्या बढ़ी है वह प्रदेश संवेदनशील बनता गया है या देश से कटता गया है। इसलिए इस जनगणना से आए परिणाम हमें कुछ सोचने या निर्णय लेने के लिए बाध्य करते हैं। जनसांख्यिक परिवर्तन सामाजिक एवं राजनैतिक परिवर्तन का कारण बनता है इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। अहिंदू जनसंख्या जहां-जहां बढ़ी है वहां-वहां अन्य धर्मियों को सुरक्षा के लिए पलायन करना पड़ा है। वहां सभी प्रकार की सुरक्षा के प्रश्न खड़े हो जाते हैं। मैं समझता हूं कि अहिंदुओं की संख्या असंतुलित होते जाना यह कभी भी देश हित के लिए सुरक्षित नहीं है।

असम के कई जिलों में हिंदू अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। यह भी आने वाले दिनों में बड़ी चुनौती खड़ी करनेवाली स्थिति है। नेपाल की सीमा से लगा हुआ उत्तर प्रदेश और बिहार का जो क्षेत्र है वह आज मुस्लिम बहुल हो चुका है। मुस्लिम बहुसंख्यक होता जा रहा है। विभाजन के पूर्व जिन्ना की मांग थी कि पूर्व पाकिस्तान और पश्चिम पाकिस्तान को जोड़ने के लिए उन्हें एक रास्ता दिया जाए। उस समय देश का भाग्य रहा कि किसी ने उसे स्वीकार नहीं किया। परंतु, जो रास्ता उन्होंने मांगा था वह इलाका ही आज तेजी से मुस्लिम बहुसंख्यक इलाके के रूप में परिवर्तित हो गया है। यह हिंदू समाज और देश के लिए समस्या का क्षेत्र बन गया है। इस संदर्भ में हमारा कहना है कि जनसंख्या संतुलन के संदर्भ में एक समान नीति भारत में होनी चाहिए। समान नीति न होने के कारण भारत के 11-12 राज्यों में मुस्लिम जनसंख्या का जो स्तर है वह तीस प्रतिशत तक हो गया है। अन्य समाज की वृद्धि दर इतनी नहीं है। हिंदुओं की भी वृद्धि दर इतनी नहीं है। यह बड़ी चुनौती है ऐसा हम मानते हैं। साथ में मतांतरण विरोधी कानून बनाने की आवश्यकता है। धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं होना चाहिए, यहां की सामाजिक व्यवस्था के आधार पर आरक्षण आवश्यक है। आज मतांतरण की गतिविधियां इसलिए रुकी दिखाई देती हैं कि उन्हें डर लगता है कि इससे उन्हें प्राप्त आरक्षण खत्म हो जाएगा। धर्म आधारित आरक्षण व्यवस्था किसी भी स्थिति में लागू नहीं होनी चाहिए। आर्थिक- सामाजिक दुर्बलता को सामने रखकर आरक्षण की नीति पर पुनर्विचार हो। जनसंख्या असंतुलन हो ऐसी गलत दिशा में जाने वाली हमारी आरक्षण नीति न हो। जनसंख्या का असंतुलन का सब से बड़ा कारण घुसपैठ ही है। ये घुसपैठी यहां के उद्योगों को प्रभावित करते हैं। यहां के रोजगारों से हिंदुओं को प्रभावित करते हैं। हम अनुरोध करते हैं कि समाज भी जागृत होकर भारत में अभारतीयों को रोजगार देकर देशद्रोह बढ़ाने के काम में, देश में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ाने के काम में अप्रत्यक्ष मदद न करें। जनसंख्या का असंतुलन और गतिमान होती अहिंदुओं की शक्तियां कुल मिलाकर देश की एकात्मता और सामान्य हिंदुओं की सुरक्षा के लिए, देश के विकास के लिए एक चुनौती है। इस चुनौती को केवल राजनीतिक दृष्टि से न सोचते हुए देशहित की दृष्टि से सोचकर गंभीरता से अपनी नीति बनाने की आवश्यकता है।

संघ के माध्यम से मुस्लिम धर्मियों से ‘संवाद सेतु’ निर्माण करने के कौन से प्रयास हो रहे हैं?

मुस्लिम समाज और ईसाई समाज में सकारात्मक सोच रखने वाले कुछ लोग हैं। दुर्भाग्य यह है कि उनके पास उस समाज का नेतृत्व नहीं है। अगर वह समाज के नेतृत्व में शीर्ष में आते हैं तो बहुत कुछ बातें हो सकती हैं। इसलिए हमारा प्रयास है कि सकारात्मक सोच रखने वाले लोग शक्तिशली बनते जाए। वह संगठित होते जाए और वे अपने ही समाज के अंदर एक बड़ी सकारात्मक सोच को दिशा देने का प्रयास करें, ऐसी उनसे अपेक्षा है। वे कभी सहयोग मांगते हैं तो हम सहयोग देते हैं।

ईसाई जगत के संदर्भ में हम सोचते हैं कि ‘राष्ट्रीय चर्च’ की भावना को बढ़ावा देना होगा तब उनके अनेक प्रश्न हल होंगे। पर इस्लाम का प्रश्न केवल चर्चा से हल होगा ऐसा नहीं है, शासन को भी इस संदर्भ में कुछ नीतियां बनानी पड़ेगी। ‘समान नागरी कानून’ जब बनेगा तब बहुत-सी बातें अपने-आप हल होने के रास्ते पर चल पड़ेगी।

‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ क्या है? इसके क्या गलत परिणाम हो रहे हैं? इसकी पकड़ से भारतीयों को कैसे मुक्त कराएं?

यहां पर धर्मनिरपेक्षता को गलत ढंग से ही प्रस्तुत किया जाता है। आज धर्मनिरपेक्षता का सीमित अर्थ हुआ है- हिंदुओं का विरोध करना। अगर इस देश में हिंदू दुर्बल होगा तो यहां कभी सेक्यूलरिज्म सुरक्षित नहीं रहेगा। इसलिए सेक्यूलरिज्म के नाम पर अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने को ही ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ कह सकते हैं। ये न समाज के हित में है, न देश के हित में। इसलिए अगर वास्तव में देश मेंं धर्मनिरपेक्ष समाज व्यवस्था होनी हो तो हिंदू विचार ही इसको बल दे सकता है, ऐसा हमारा मानना है। आज अनावश्यक रूप से सेक्यूलरिज्म शब्द का प्रयोग करते हुए हिंदुओं की सभी बातों का विरोध करने की जो राजनीति चल रही है, जो देश के लिए, समाज के लिए घातक होगी।
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