कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले का सच

देश में कोयला आवंटन घोटाला उजागर हुआ तब देश की राजनीति में भारी हडकंप मच गया। कोयला आवंटन घोटाले की वजह से देश के राजस्व की भारी हानि के साथ कोयला उत्पादन व रोजगार के अवसरों पर भी बुरा असर हुआ। कोयला आपूर्ति पर बुरा असर हुआ, कई उद्योग इससे प्रभावित हुए। जिस तरीके से कोल ब्लॉकों का आवंटन यू.पी.ए. सरकार के कार्यकाल में हुआ है इस पर प्रथम प्रकाश डालना चाहता हूं।

कोयला मंत्रालय के अंतर्गत कोल इंडिया एक सरकारी उपक्रम है। इस कोल इंडिया की स्थापना 1973 में हुयी थी। कोल इंडिया ने कोयला खनन व उत्पादन क्षेत्र की देश की एक सफल कंपनी के रूप में कार्य किया है। कोल इंडिया की स्थापना तत्कालिन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी जी द्वारा की गयी। इसके पूर्व मालिकों तथा निजी कंपनियों द्वारा देश में कोयला खनन होता था। इन सभी निजी क्षेत्र की कोयला खानों का राष्ट्रीयकरण किया गया और कोल इंडिया की स्थापना कर देश के सभी उद्योगों को कोयला आपूर्ति के साथ अधिक रोजगार और मजदूरों को उचित वेतन और सुरक्षा इस पर विचार कर कोल इंडिया की स्थापना हुयी थी और यह एक सही निर्णय था। कोल इंडिया की स्थापना के समय 1973 में कुल 70 मिलियन टन कोयले का उत्पादन हुआ करता था। श्रमिकों के परिश्रम और उचित प्रबंधन के चलते सरकार के नियंत्रण में कोल इंडिया ने इस उत्पादन को 500 मिलियन टन तक आगे बढाया और करीब 8 लाख से अधिक स्थायी श्रमिक और 4 लाख के करीब अस्थायी लोगों को रोजगार देने और मुनाफा कमानेवाली सरकारी कंपनी के रूप में सफलता पाई। इस सफलता पर भारत सरकार द्वारा कोल इंडिया को महारत्न कंपनी के रूप सम्मानित भी किया गया था। इस कोल आवंटन घोटाले में सर्वाधिक बुरा प्रभाव इस महारत्न कंपनी पर ही पड़ा है और रोजगार, कोल उत्पादन, श्रमिकों की कटौति का कु-प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

निजी कंपनियों को आवंटन एक षड्यंत्र

कोल इंडिया ने 2007 में 138 कोल ब्लॉकों की मांग की थी। कोयला उत्पादन मांग के अनुरूप बढ़ाना तथा पुरानी कुछ खानों को बंद करने जैसी स्थिति निर्माण होने से नई खानों को शुरू कर उत्पादन बढ़ाने की कोल इंडिया की योजना को यूपीए सरकार के कार्यकाल में अनदेखा किया गया। कोल इंडिया के लिए करीब 20 बिलियन मेट्रिक टन के कोयले के ब्लॉकों की पहचान की गई थी और इन ब्लॉकों को कोल इंडिया को देना निश्चित था। लेकिन कोल मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, कोल इंडिया के प्रबंधकीय वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा एक साजिश रची गयी और कोयला मंत्री के आशीर्वाद से अधिकतर ब्लॉकों को निजी कंपनियों को आवंटित करने की योजना बनाई गई और निजी कंपनियों को विनामूल्य ब्लॉकों का आवंटन किया गया। कोल इंडिया की मांग को जानबूझकर अनदेखा कर कोयला मंत्री और कोल इंडिया के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने इन ब्लॉकों को लुटाया, कुछ उद्योगपतियों को भारी लाभ पहुंचाया और कोल इंडिया की हालत खस्ता कर दी और इन ब्लॉकों में से एक भी ब्लॉक 2012 तक कोल इंडिया को नहीं दिया गया।

अपराधी भूमिका

कोल आवंटन प्रक्रिया के लिए सरकार द्वारा स्क्रीनिंग कमेटी बनाई गई थी। कोयला मंत्रालय के सचिव के नेतृत्व में कई मंत्रालयों के सचिव, ऊर्जा मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, रेल मंत्रालय, उद्योग मंत्रालय के सचिव, योजना आयोग के एक सदस्य, कोल इंडिया के चेअरमन और संचालक और सहायक कंपनियों के सी.एम.डी. इसके अलावा कोयला धारी राज्यों के मुख्य सचिव इस स्कीनिंग कमेटी के सदस्य थे। इतनी बड़ी और शक्तिशाली समिति ने कोल ब्लॉकों का आवंटन नीति के खिलाफ और देश के हित के विरोध में किया। दुर्भाग्य से, बड़े शर्म के साथ यह लिखना पड़ रहा है कि, जिन अधिकारियों ने कोल इंडिया के लिए 138 ब्लॉक मांगे थे उन्हीं अधिकारियों ने इस समिति का हिस्सा बनकर एक ब्लॉक भी कोल इंडिया को आवंटित नहीं किया; बल्कि जो कोल ब्लॉक कोल इंडिया के लिए पहचान किए गए थे उन कोल ब्लॉकों का भी निजी कंपनियों को आवंटन हेतु सहमति दी और अपनी ही कंपनी के साथ बेईमानी और विश्वासघात किया और इस घोटाले के हिस्सेदार बने।

कोल ब्लॉकों की बंदरबाट

जिन निजी कंपनियों को कोल ब्लॉकों का आवंटन किया गया उनमें कई कंपनियां ऐसी हैं जिनका कहीं अस्तित्व भी नहीं है, कोल ब्लाकों की मांग हेतु जो शर्तें रखी गयी थीं, जो दस्तावेज मांगे गये थे, कोयला जिस इंडस्ट्री में अथवा प्लान्ट हेतु मांगा गया था ऐसी कोई इन्डस्ट्री (एछऊ णडए झश्ररपीं) न होते हुए भी उन्हें ब्लॉकों का आवंटन किया गया। एक कंपनी को एक से अधिक ब्लॉक दिए गए और ये सारे ब्लॉक फ्री ऑफ कास्ट में, नीति के खिलाफ आवंटित किए गए हैं। इन कथित कंपनियों को मंत्री और अधिकारियों द्वारा संरक्षण दिया गया, इनकी सिफारिश की गयी। इस आवंटन प्रक्रिया में 2006 से 2009, 2010 तक करीब 17.3 बिलियन मेट्रिक टन के 73 ब्लॉक 151 उद्योग हेतु करीब 120 कंपनियों को आवंटित किए गए। इस बंदरबाट के समय के कोयला मंत्री श्री शिबू सोरेन थे तथा बाद में अधिकतर समय 2006 से 2009 तक स्वयं प्रधानमंत्री कोल मंत्रालय देखा करते थे। उसके बाद 2009 में वर्तमान कोयला मंत्री श्री श्रीप्रकाश जयस्वाल के द्वारा आवंटन प्रक्रिया में निजी कंपनियों को समय-समय पर आशीर्वाद दिया गया और सहयोग किया गया। जिसमें कोल रिजर्व की मार्केट वैल्यू 50 लाख करोड़ से अधिक है। यह आवंटन प्रक्रिया स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिश पर किया करते थे और स्क्रीनिंग कमेटी ने जो सिफारिशें की हैं उन सिफारिशों में भारी अनियमितता और भ्रष्ट नीति की बू आती है। इन सिफारिशों को मंत्री तथा प्रधानमंत्री खारिज तथा इन्कार कर सकते थे। दुर्भाग्य से यह साहस कोयला राज्य मंत्री, मंत्री, प्रधानमंत्री ने नहीं दिखाया। इसका अर्थ स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशें सत्ता पक्ष और मंत्रियों की सहमति से की जाती थीं। यह एक बड़ा आर्थिक अपराध देश में हुआ है और सत्तापक्ष, यूपीए सरकार के प्रमुख घटक, कांग्रेस पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इन धांधलियों से अनभिज्ञ नहीं थे। कई कांग्रेसी नेता इसमें निजी कंपनियों की सिफारिशें और मदद किया करते थे और 50 लाख करोड़ रु. की यह प्रापर्टी लुटाई गयी है। भारत देश के हर बच्चे, हर नागरिक सभी भारतवासियों की यह संपदा थी, इस पर सभी का समान अधिकार था। लेकिन सरकार ने इस बात को सुना नहीं और देश की 120 करोड़ जनता की इस प्रापर्टी को कथित 120 उद्योगपतियों को लुटा दिया, जिसका असर देश के हजारों उद्योगों पर हो रहा है और भविष्य में इसके बहुत ज्यादा दुष्परिणाम दिखाई देंगे। इन सारी बातों की अनदेखी की गई और सरकार द्वारा 2005 के अंत में हमारी शिकायतों पर, मांग पर कोल आवंटन प्रक्रिया में सुधार लाने हेतु 2006 में इन ब्लॉकों को नीलामी पद्धति से उचित कंपनियों को आवंटन करने की नीति को मान्यता दी गयी थी और उस आधार पर एमएमडीआरए 1957 (कोल) में अमेंडमेंट विधेयक बनाया गया था। यह सारा दस्तावेज आज उपलब्ध है। तत्वत: नीलामी पद्धति का स्वीकार होने के बावजूद इसी सरकार ने 2006 से 2009 तक, उसके बाद 2010, 2011 तक ब्लॉकों का आवंटन जारी रखा। यह एक बहुत बड़ा अपराध जानबूझकर साजिश रचकर किया गया है।

बंदरबाट का विपरीत परिणाम

इस आवंटन प्रक्रिया के चलते देश के कोयला उद्योग से जुड़ी सरकारी कंपनियां- कोल इंडिया, निवेली लिग्नाईट कंपनी, सिंगरेनी कोल फील्ड कंपनी (आंध्र प्रदेश) इन पर विपरीत परिणाम हुआ जो कोल उत्पादन क्षेत्र में कार्यरत हैं और थीं। इसके बावजूद केंद्र व राज्यों की सरकारी कंपनियों, बिजली बोर्डों पर भी विपरीत परिणाम हुआ। सेल, एनएमडीसी, नालको, बिजली उत्पादन करनेवाले सभी राज्यों के बिजली बोर्डों को इन कोल ब्लॉकों से वंचित रखा गया। इन पर जो असर हुआ है यह देश के कोने-कोने में विपरीत परिणाम करेगा। कोल इंडिया जैसी कंपनी महारत्न है और नेवेली लिग्नाईट कंपनी जैसी मिनीरत्न कंपनी है। इन कंपनियों के साथ सरकार ने सेल, एनएमडीसी जैसी सक्षम और महारत्न कंपनियों को भी ब्लॉक नहीं देना यह अपराध की परिसीमा है। दुर्भाग्य यह भी है कि, ये सारी सरकारी कंपनियां बहुत बड़ा रोजगार देश को दे रही थी और देश के विकास में भारी योगदान इन सरकारी कंपनियों का है। इस आवंटन प्रक्रिया से उत्पादन पर बुरा असर हुआ है और रोजगार कटौती करनी पड़ी। कोल इंडिया में 8 लाख से अधिक स्थायी श्रमिक कार्यरत थे, वही आज 3 लाख 60 हजार तक स्थायी श्रमिक (मैनपावर) तक कमी हुई है। ऐसा ही सभी सरकारी कंपनियों पर असर हुआ, रोजगार कम हुआ, रोजगार के अवसर समाप्त हुए। इन कंपनियों को वी.आर.एस., सी.आर.एस. जैसे कदम उठाने पड़े, मैनपॉवर कटौती करनी पड़ी। यह देश के बेरोजगार युवाओं के साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ और बेईमानी साबित हुई। कोल उत्पादन क्षेत्र में 2015-16 में 700 मिलियन टन उत्पादन का कोल इंडिया ने लक्ष्य रखा था, जो 500 मिलियन टन तक घटाना पड़ा। यही असर एनएलसी, एससीसीएल पर भी हुआ। वहां भी लक्ष्य घटाना पड़ा। यूपीए सरकार ने विशेषकर कांग्रेस पार्टी के नेताओं व कोयला मंत्रालय के प्रभारी कांग्रेस पार्टी के ही मंत्रियों ने इस देश के साथ बहुत बड़ा अक्षम्य अपराध किया। इस अपराध में तत्कालीन कोयला मंत्रालय के अधिकारी, कोल इंडिया के अधिकारी व योजना आयोग भी इस साजिशकर्ताओं में आते हैं। यह एक अक्षम्य अपराध देश के सामने आया है।

कोल इंडिया के रहते ब्लाकों आ आवंटन गलत

कोल इंडिया ने 138 ब्लॉकों की मांग की थी। उन्हें आवंटित न करने की वजह यह बताई गई कि कोल इंडिया की क्षमता नहीं है, इसलिए निजी कंपनियों को सरकार द्वारा कहा जा रहा है। यह बात गलत और कोल इंडिया तथा उसमें कार्यरत श्रमिकों व ईमानदार अधिकारियों का अपमान है। सक्षम और मुनाफे में चलनेवाली इस कंपनी को महारत्न से सम्मानित इसी सरकार ने किया था तथा इसी सरकार द्वारा इस कंपनी की क्षमता पहचान कर विदेशों में कोल ब्लॉक आवंटन तथा खरीदने हेतु सरकार द्वारा सुझाव और अनुमति दी गयी। कोल इंडिया विदेश नाम की कंपनी की स्थापना कर इस कंपनी के अधिकारी, कोयला मंत्रालय, विदेशों में जाकर मोजाम्बिक, साऊथ अफ्रीका, इंडोनेशिया जैसे देशों में कोल ब्लॉक आवंटन हेतु कार्य भी कर रहे हैं। फिर इस कंपनी की क्षमता पर प्रश्न लगाकर निजी कंपनियों को ब्लॉक आवंटित करना कितना गलत है, यह एक अपराध है। करीब 35 हजार करोड़ रूपयों का प्रावधान विदेशों में कोल ब्लॉक आवंटन हेतु किया गया। जिसमें 10 हजार करोड़ रूपये विदेश में ब्लॉक आवंटन प्रक्रिया पर बोली बोलने हेतु और 25 हजार करोड़ का एक्प्लोरेशन ब्लॉकों के लिए रखा गया है। देश में एक्प्लोरेशन करने के बाद बिना बोली के ब्लॉक निजी कंपनियों को बांटे गये और वहीं विदेशों में 35 हजार करोड़ रू. का कुछ ब्लॉकों हेतु बजट में प्रावधान किया जाना यह कितनी शर्म की बात है, यह कितना बड़ा अपराध है। सरकार की भ्रष्ट कार्यपद्धति का इससे बड़ा और क्या उदाहरण दिया जा सकता है?

मध्य प्रदेश का अनुकरण लाभदायी

मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य सरकार के माइनिंग कार्पोरेशन को प्राप्त 6 ब्लॉकों की, जिसमें सिर्फ 296 मिलियन टन रिजर्व था, निजी कंपनियों के साथ बोली पद्धति से नीलामी की, जिसमें राज्य सरकार का 51 प्रतिशत हिस्सा रखते हुए ज्वाइंट वेन्चर में नीलामी हुई। इस नीलामी में पारदर्शिता थी। इसका बहुत अच्छा असर और लाभ राज्य सरकार को हुआ। सिर्फ 296 मिलियन टन कोल रिजर्व से राज्य सरकार को भविष्य में 30 वर्षों तक निजी कंपनियों द्वारा 885 करोड़ रूपए फेसिलिटेशन फी के रूप में मिलेंगे। यह बोली प्रक्रिया मध्यप्रदेश के साथ में छत्तीसगड़ और महाराष्ट्र सरकार ने की। इस पद्धति का अनुकरण कोयला मंत्रालय द्वारा भी किया जाता तो देश को भारी मात्रा में आय का स्रोत और साथ में 51 प्रतिशत हिस्सा इन ब्लॉकों में मिल जाता और ब्लॉकों की मिल्कियत भी कोल मंत्रालय अथवा कोल इंडिया की होती।

दुष्परिणाम, आर्थिक अपराध, विपरीत परिणाम

देश की प्रापर्टी की लूट से बेरोजगारी बढ़ना, कोल उत्पादन घटना, विदेशों से कोयले का आयात, देश की अर्थव्यवस्था पर असर, विदेशी महंगा कोयला खरीद जिससे बिजली उत्पादन महंगा होना और विदेशी कोल पर निर्भर रहने की नौबत देश और राज्यों पर आयी। इस वर्ष 135 मिलियन टन कोयला आयात करना पड़ा, अगले वर्ष 185 मिलियन टन कोयला आयात करना पड़ेगा जिसमें 1 लाख करोड़ से अधिक देश की करन्सी इस वर्ष खर्च करनी पडेगी, अगले वर्ष इससे अधिक हमें गंवानी पडेगी और यह मामला जारी रहेगा। रोजगार कम हुआ। 8 लाख से अधिक मैनपावर 3.60 लाख तक घटी, रोजगार संबंधी भविष्य अंधकार में है और यह अपराधिक साजिश का परिणाम कोल इंडिया जैसी महारत्न कंपनी का भविष्य अंधकार में दिखाई दे रहा है। यूपीए सरकार की इस आर्थिक आपराधिक गलती के चलते यह सब सामने आया है।

सन 2005 से लेकर मैं इस सरकार को सचेत करता रहा, कई पत्र लिखे, प्रधानमंत्री को पत्र लिखे, लोकसभा की स्थायी समिति में सतत इस मामले से सरकार, कोयला मंत्रालय, कोल इंडिया को सचेत करता रहा, शिकायत करता रहा लेकिन आवंटन प्रक्रिया को रोका नहीं गया। लेकिन बोली पद्धति हेतु 2006 में जो विधेयक बनाया था उस विधेयक को 2008 में पारित किया गया। दुर्भाग्य से जिसके 2013 तक विनियम नहीं बने और कानून लागू नहीं हुआ। लेकिन सीएजी व सीवीसी में 2009 तथा 2010 में मैंने हमारे वरिष्ठ सहकारी राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री प्रकाश जावडेकर जी के साथ शिकायत की थी। इस शिकायत पर सीएजी व सीवीसी ने अध्ययन किया, सीवीसी द्वारा सीबीआई को जांच हेतु भेजा गया था तथा सीएजी ने 2012 में जो लोकसभा में कोल मंत्रालय की कोल आवंटन प्रक्रिया की रिपोर्ट पेश की। उसमें 1 लाख 86 हजार करोड़ का घोटाला अथवा देश के राजस्व का नुकसान होने की बात स्पष्ट की है। सरकार को इसका सज्ञान लेना चाहिए, इस रिपोर्ट का सम्मान करना चाहिए। हमारी शिकायत पर सीएजी, सीवीसी, सीबीआई, आईएमजी, उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देश, जांच के निर्देश, रिपोर्ट पेश करना, कुछ ब्लॉकों का कैन्सल होना, यूपीए सरकार के मंत्री को मंत्रीपद छोड़ना पड़ा, अंत में प्रधानमंत्री का नाम पूर्व कोयला सचिव द्वारा, इस कोयला घोटाले के संबंध में लिया जाना, इस साजिश में, इस आर्थिक अपराध में जोड़ा जाना यह दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन हमारी शिकायत जो तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितीन गडकरी जी की अनुमति तथा निर्देशानुसार श्री प्रकाश जावडेकर जी (सांसद राज्यसभा) के साथ में मैंने की थी, वह इस घोटाले के सामने आने से सच साबित हुई है। अब सरकार इससे संज्ञान लेकर जितने भी ब्लॉक निजी कंपनियों को आवंटित किए गए हैं उन सारे ब्लॉकों को कैन्सल कर अपने अधिकार में लें और सरकारी कंपनियों कोल इंडिया, निवेली लिग्नाईट, एससीसीएल, सभी राज्यों के बिजली बोर्ड व अन्य सरकारी कंपनियां, जो कोल यूजर हैं, इन्हें आवंटित करें। ताकि सरकार इस कोयला खनन संपदा, जो देश के 120 करोड़ जनता की है, का राष्ट्रहित में दोहन उसी जनता के लिए हो, न कि 120 उद्योगपतियों के लिए। सरकार इसका संज्ञान लें अन्यथा देश की जनता यूपीए सरकार तथा कांग्रेस को कभी क्षमा नहीं करेगी।
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