सामाजिक समरसता के पुरोधा- स्वामी विवेकानन्द

दासता के काल-खण्ड में हिन्दू-समाज के अन्तर्गत अनेक विकृतियां आ गयी थीं। इनमें अस्पृश्यता हिन्दू-समाज पर लगा सबसे बड़ा कलंक है। इस बुराई को समाप्त करने के लिये हमारे समाज-सुधारकों ने अनथक प्रसास किये। इन समाज-सुधारकों में विशेष उल्लेखनीय नाम ज्योतिपुरूष स्वामी विवेकानन्द का है, जो योद्धा संन्यासी थे। उन्होंने इस अनुचित और अन्यायपूर्ण प्रथा की भर्त्सना की है। वे 19 वीं शताब्दी में वंचित समाज-चेतना के प्रबल उद्घोषक थे। स्वामीजी ने इस बुराई का उल्लेख अपने व्याख्यानों में किया है और जड़-मूल से इसके उन्मूलन का उपाय भी बताया है। स्वामीजी ने कहा था, “अज्ञ भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, चाण्डाल भारतवासी हमारे भाई ह््ैं।” स्वामीजी के विचारों से लगता है कि वे जातिभेद तथा अस्पृश्यता की समाप्ति के संस्कार लेकर पैदा हुए थे। उनके बाल्यकाल की एक बहुत ही रोचक घटना है। जब नरेन्द्र छह-सात वर्ष के ही थे, उनके पिता की बैठक में कई प्रकार के हुक्के रखे थे। एक दिन यह बालक प्रत्येक हुक्के की नली को मुंह में लगाकर गुड़-गुड़ करने का आनन्द उठा रहा था। आकस्मात् नरेन्द्र के पिताजी आ टपके और पूछा, “क्या कर रहे हो?” बालक नरेंद्र ने उत्तर दिया, “मैं देख रहा हूं कि हुक्का पीने से जाति कैसे समाप्त होती है?” पुत्र के अनूठे और बाल सुलभ उत्तर को सुनकर उसके पिताजी आश्चर्यचकित रह गये। वे हंसकर बोले, बड़ा दुष्ट है रे तू! वे बाल्यकाल से ही नटखट, जिज्ञासु और विद्रोही बालक थे; उनको छुआ-छूत में अन्याय और भेद-भाव की बू आती थी। स्वभाव से ही सजग नरेन्द्र के मनस्वी गुरू श्री रामकृष्ण देव ने उनको प्रारंभ से ही अभेद की शिक्षा दी थी। बाद में परिव्राजक के रूप में श्री विवेकानन्द जी लगभग चार साल भारत-भ्रमण करते रहे। इस कालावधि में स्वामीजी थके हुए थे; एक व्यक्ति से दो दम मारने की इच्छा प्रकट की। उस व्यक्ति ने हाथ जोड़कर कहा, ‘महाराज! मैं भंगी हू्ं। मेरी चिलम पीने से आप जाति-भ्रष्ट हो जायेंगे। स्वामीजी थोड़ा चार कदम आगे चले। उन्होंने सोचा “संन्यासी का जाति-धर्म से क्या रिश्ता? वे वापिस लौटे तथा चिलम खींची। स्वामीजी ने अस्पृश्यता का दंश स्वयं भोगा था। परिव्राजक काल में उनसे लोग पूछते थे कि स्वामीजी, संन्यास ग्रहण करने से पहले आपकी जाति कौनसी थी? स्वामीजी ने कहा, यह शरीर कायस्थ कुल में उत्पन्न हुआ। कट्टर रूढ़ीवादियों ने तूफान खड़ा कर दिया कि आप संन्यास के अधिकारी नहीं हैं। स्वामीजी ने निर्भय होकर उत्तर दिया कि मेरा संन्यास शास्त्रानुकूल है। केरल के मालाबार में स्वामीजी को अस्पृश्यता की दु:खद अनुभूति हुई और उन्होंने यह कहकर भर्त्सना की कि मालाबार के निवासी पागलखाने में रखे जाने योग्य हैं।

मालाबार के दृश्य ने स्वामीजी के हृदय को झकझोर दिया और उन्होंने वेदना प्रकट करते हुए कहा, “हम कितनी हास्सास्पद स्थिति को प्राप्त हो गए हैं? यदि कोई मेहतर, मेहतर के रूप में ही किसी के पास आता है तो उसे प्लेग के समान दुत्कारा जाता है। किन्तु जब कोई पादरी कुछ मंत्र पढ़कर उसके सिर पर थोड़ा जल छिड़कर उसका धर्म परिवर्तन कर लेता है और उसे एक कोट पहना देता है…. तब यदि वह बड़े कर्मकाण्डी हिन्दू के कमरे में प्रवेश करे तो मुझे ऐसा कोई व्यक्ति नहीं दिखायी देता, जो उसे तुरन्त बैठने के लिए कुर्सी न दे और तपाक से उससे हाथ न मिलाये। इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है?” उनका कहना था कि हम छह-सात शताब्दियों तक केवल इस विषय पर बहस करते रहे कि हाथों को तीन बार मांजें अथवा चार बार। यह जड़वाद हमारे समाज के पतन का मूल कारण है। इस जड़ता के कारण हमारे भाग्य ने हमारा साथ छोड़ दिया। हम केवल “मत छुओ-वादी” हो गये हैं। हमारा धर्म चूल्हे में घुस गया। यदि यह भाव अगले सौ वर्ष तक चलता रहा, तो हममें से हरेक का स्थान दुनिया के पागलखाने में होगा। इस घटना के पश्चात् उन्होंने अनेक भाषणों में बल दिया सभी मनुष्यों के साथ बराबर भाइयों के समान व्यवहार करना चाहिये। भ्रमण-काल में उन्होंने एक चर्मकार बन्धु के हाथ की बनी रोटी खायी और कहा- ऐसी रोटी के सामने राजसी खाना भी तुच्छ है।

स्वामीजी ने अपनी महा-यात्रा भारत के अंतिम छोर पर आकर पूरी की। वे आसन लगाकर नेत्र बन्द किये हुए गहन चिंतन में डूब गये तब उनको भारत की अवनति का कारण भी समझ में आया और बोले, “क्रूर शासक, ढपोरशंख पाखण्डियों ने भारत की जनता का अंतिम रक्तबिन्दु तक शोषण किया।” वे कहते थे कि समाज को संगठित होना है तो इस अस्पृश्यता के विचार का जड़-मूल से, मस्तिष्क से उच्छेदन करना होगा। उन्होंने समाज-व्यवस्था को भी नवीन दृष्टि से देखा। उनके अनुसार ब्राह्मणत्व जाति से नहीं, त्याग और ज्ञान से संबधित था। स्वामीजी का मत था कि आरंभ में ब्राम्हण धार्मिक, नीतिवान, सदाचारी, निस्वार्थी और ज्ञानी थे। उस समय यह वर्ग मनुष्यत्व का चरम आदर्श था। कालान्तर में इस वर्ग ने अपने गुणों का खजाना जनसाधारण के लिए बन्द कर दिया। तभी भारत गुलाम हुआ। स्वामीजी का विचार था कि ज्ञान का अधिकार समाज के अन्तिम व्यक्ति को मिले।

स्वामीजी उन सुधारवादियों में नहीं थे, जो अपने समाज को हेय मानकर दूसरे समाज को अच्छा समझते हो। उन्होंने देश की धरती पर कुरीतियों की जमकर आलोचना की, परन्तु विदेशी धरती पर भारत के गौरव को स्थापित किया। वे कहते थे कि मैं विध्वंस के लिये नहीं आया हूं। मेरा कार्य निर्माण और सुधार का है। उन्होंने समाज को एकरस बनाने के लिए भावनात्मक तथा सकारात्मक सुझाव दिये हैं। वे कहते थे कि सर्वप्रथम तुम हृदय से अनुभव करो कि सभी हिन्दू सहोदर भाई हैं। वंचित वर्ग केवल रोटी का भूखा नहीं है, उसको सम्मान चाहिए। क्या तुम दे सकोगे! प्रेम असंभव को संभव कर देता है। एक स्थान पर उन्होंने कहा, “मेरे भावी सुधारको, मेरे भावी देशभक्तों, हृदय से अनुभव करो। क्या तुम अनुभव करते हो? देव और ऋषियों के करोड़ों वंशज पशुतुल्य बन गये हैं।” उन वंचित समाज-बन्धुओं को हृदय का स्रेह देकर; उनका हाथ पकड़ कर साथ लेकर चलोगे, तभी वे समाज के सम्मानित घटक बनेंगे। वे आज भटके और बिछुड़े हुये हैं। उनके जीवन को सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कराकर सुसम्पन्न बनाओ। ऊंच-नीच का भाव मिटाकर, अस्पृश्यता को लेशमात्र भी नहीं रहने दो। स्वामीजी की समरस समाज की यह अवधारणा युगानुकूल थी।

स्वामीजी ने एक स्थान पर अपने विचार व्यक्त किये कि उच्च-वर्ग को चिकित्सक की भावना से वंचित समाज की सेवा करनी होगी। जिस प्रकार एक डॉक्टर गाली देने वाले बच्चे के गले में भी दवाई उतार देता है, उसी प्रकार हमें अपने वंचित समाज के साथ व्यवहार करना होगा। स्वामीजी के शब्दों में, “ महा भाग्यवानो! मेरा भी यही विश्वास है कि यदि कोई भारत की पददलित, भूखी जनता को हृदय से स्रेह करेगा तो देश पुन: उठ खड़ा होगा”

वर्तमान संदर्भ में स्वामीजी के विचार सुसंगत हैं। परम्पराग्रस्त अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों को सुधारने का एक कानून बनाने से भी लाभ नहीं होगा। समाज के सभी वर्ग उन्हें सम्मानित घटक के रूप में स्वीकार करें और सम्मान दें। तभी हम इस घातक कुरीति से छुटकारा पा सकेंगे। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी के विचार भी स्वामीजी के विचारों से मेल खाते हैं। श्री गुरुजी ने कहा था, “आज समाज का चित्र ऐसा है कि है कि हृदय पीड़ा से भर जाता है। बहुत बड़ा दु:ख चारों ओर छाया हुआ है। अभावग्रस्त, वंचित व पीड़ित सर्वदूर दिखायी देते हैं। इन सबका भार कोई कहे कि मैं अकेला वहन करूंगा, तो संभव नहीं है। हां, हम सब मिलकर कहेंगे कि हम इस दु:ख-दैन्य को हटाने के लिए अपने बन्धुओं की सहायता के लिए प्रयत्न करेंगे, तो यह संभव है और वह ही करणीय है।”

सामाजिक समरसता मात्र सिद्धांत नहीं है, बल्कि एक व्यवहार का सूत्र है। सभी वर्गों की समाज-कार्य में सहभागिता हो। इसके साथ-साथ उच्च वर्ग में यह अहंकार रहेगा कि हम उच्च हैं, तो क्या समरसता टिक पायेगी? इसका एकमात्र निदान है कि वे उच्चता का अहंकार छोड़ें और वंचित वर्ग हीनता को छोड़ें तभी समाज में स्वाााविक समरसता का भाव जागृत होगा।

आज देश स्वामीजी के जन्म की सार्द्ध शती उत्साह और उमंग के साथ मना रहा है। हम सभी संकल्प करें कि उनके जन्मोत्सव पर्व पर उनके विचारों को व्यवहार में लाकर हजार वर्ष से वंचित, बिछुड़े भाई-बहनों को गले लगाकर सम्मान की स्थिति में लाकर छोड़ेंगे। नि:सन्देह इस कार्य को पूर्ण करने के लिए समय, श्रम और मौन क्रान्ति की आवश्यकता है। हम अपने स्रेह, संवेदना, व्यक्तिगत सम्पर्क से इस समस्या पर विजय प्राप्त करने में सफल होंगे। निचले धरातल पर सहज रूप से परिवर्तन प्रारंभ हुआ, तो समाज में परिवर्तन की लहर आयेगी। उस दिन कलुषित जातिगत भेदभाव समाप्त होगा और समरस, संगठित, समता और ममता युक्त भारत का उदय होगा।

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