मेरा यूरोप सफर

एक समय ऐसा था जब व्यक्ति सेवानिवृत्ति के बाद विदेश भ्रमण के स्वप्न पूरे करता था। परंतु अब वैश्वीकरण के जमाने में आय. टी. और अन्य कंपनियों के माध्यम से मिलनेवाले मोटी आय के कारण आज की युवा पीढ़ी युवावस्था में ही विदेश भ्रमण का स्वप्न पूर्ण कर लेती है। मेरा यह स्वप्न मेरी आयु के 79 वें वर्ष में पूर्ण हुआ।

मुंबई की एक नामांकित टूर कंपनी के साथ मैंने मई के आखरी सप्ताह में यूरोप के 10 दिन की यात्रा की बुकिंग की। कतार एयर लाइन्स से मैंने लंदन के लिये प्रयाण किया। तीन घंटे की यात्रा के बाद दोहा हवाई अड्डे से हमें लंदन के लिये दूसरा हवाई जहाज से यात्रा करनी थी। आठ घंटे की यात्रा के बाद लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर हमारा आगमन हुआ। हवाई अड्डे पर की जाने वाली जांच के बाद बस के द्वारा आधे घंटे में हम होटल हॉलिडे इन में पहुंचे। मई महीना होने के बाद भी वातावरण बहुत ठंडा था। चुभती हवा के कारण अधिक ठंड का अहसास हो रहा था। मुझे लगा था कि मई महीने में थंड की तकलीफ नहीं होगी। मेरे एक मित्र ने मई महीने में यूरोप की यात्रा की थी, परंतु उसकी सलाह गलत थी।

दूसरे दिन सुबह आठ बजे हम लंदन घूमने के लिये एक आरामदायी बस में बैठे। ‘जेट लैग’ के कारण बहुत थकान महसूस हो रही थी। बस में बैठकर लंदन घूमते हुए रास्ते पर कहीं भी भीड़भाड़ नहीं दिखी। हार्न का कर्कश शोर लंदन ही नहीं पूरे यूरोप में भी नहीं सुनाई दिया। शहर में हमने टॉवर ब्रिज, शेम्स नदी, हाइड पार्क, बिग बेन टावर, ट्राफल्गार स्क्वेयर, सेंट वॉक केथेड्रल, हाउस आफ पार्ल्यामेंट इत्यादि स्थानों के दर्शन हुए। बस में लोकल टूर गाइड की कामेंट्री शुरू थी। लंदनवासी कितने अनुशासन प्रिय हैं यह हमें इस गाइड के कारण समझ में आया। बस में किसी भी पर्यटक ने सीट बेल्ट नहीं लगाये थे। उसने बाताया कि जब तक सारे यात्री सीट बेल्ट नहीं बांधते बस आगे नहीं जायेगी। यहां यातायात में भी अनुशासन था जो कि भारत में बहुत कम देखने को मिलता है।

बाहर रिमझिम बारिश हो रही थी। अलग-अलग फिल्म थियेटर और डिस्को थेक के लिये न्यूयार्क में टाइम्स स्क्वेयर का जो महत्व है वही लंदन में पिकॅलडी सर्कस को है। यह ब्रिटिश मान्यता है कि विश्व का सारा कामकाज पिकॅडली सर्कस के आसपास की घूमता हैै। यहां इरॉस का पुतला लगे हुए फव्वारे हैं। हाईड पार्क लंदनवासियों का विश्रांति स्थान, जागिंग पार्क, जलविहार इत्यादि का विकल्प है। यहां के पार्क की विशेषता यह है कि उद्यान कई मीलों तक फैले हैं। दूसरी विशेषता है स्वच्छता। लंदन शहर का 33% भाग मैदानों के लिये आरक्षित रखा गया है इसके विपरीत मुंबई में एक छोटा सा भूखंड भी किस तरह हडप लिया जाये इसके लिये स्पर्धा चलती रहती है। हाईड पार्क के सीमेंट के स्टेज पर खडे होकर कोई भी किसी भी विषय पर सार्वजनिक भाषण कर सकता है। टॉवर ऑफ लंदन जैसा ही सेंट पॉल कैथेड्रल लंदन के मुख्य भाग में है। रोम के सेंट पीटर्स कैथेड्रलके बाद सेंट पॉल दुनिया के भव्य कॅथेड्रल में से एक है। दूसरी ओर सवा तीन सौ फीट ऊंचा बिगबेन नामक विश्व प्रसिद्ध घडी टावर है। किसी काल में इस घडी की आवाज बी. बी. सी. के माध्यम से पूरे साम्राज्य में सुनाई देती थी। ट्रेफ्लार स्क्वेयर स्थित स्तंभ 185 फीट ऊंचा है। स्तंभ पर नेल्सन का पुतला है। व्हेनिस के सेंट मार्कस स्क्वेयर की तरह ही ट्रेकल्गर स्क्वेयर में भी कबूतर डोलते रहते हैं। राजकीय सभा के लिये यह चौक प्रसिद्ध है।

इस स्क्वेयर से बंकिंगघम पॅलेस की ओर जाते समय सबसे पहले दर्शन होते है पॅलेस के सामने बने विक्टोरिया मेमोरियल शिल्प के। पॅलेस के सामने साफ स्वच्छ हरित मैदान है। इस राजवाडे में इंगलैंड की महारानी का निवास होता है। यहां रोज सुबह साढ़े ग्यारह बजे और शाम को चार बजे राजवाड़े के सुरक्षा रक्षक बदलने की प्रथा है। राजवाडे के सामने इस भव्य उत्सव को देखने के लिये देश विदेश से अनेक पर्यटक आते हैं। लाल रंग का कोट और सिर पर विशेष तरह की टोपी पहनें सुरक्षा रक्षक और बैंड पथक की अनुशासन बद्ध तालीम चलती है। रिमझिम बारिश के बीच भी हम यह कार्यक्रम उत्साह पूर्वक देख रहे थे। घोडे पर सवार लंदन का बोबी (पुलिस) अनुशासन बद्ध संचालन करते हुए रानी को हमेशा की तरह मानवंदना दे रहा था। रिमझिम बारिश के कारण फोटो निकालना आसान नहीं था फिर भी हम सभी प्रयत्न कर रहे थे।

लंदन का दर्शन करने के बाद हम सभी ‘लंदन आई’ नामक भव्य चक्र के पास पहुंचे। थेम्स नदी पर ब्रिटिश एयरवेज द्वारा बनाये गये ‘लंदन आई’ के माध्यम से लंदन का विहंगम दृश्य देखना एक अविस्मरणीय कार्यक्रम था। ‘लंदन आय’ विश्व की चौथे क्रमांक की ऊंची वास्तु है। इसमें 32 वातानुकूलित कैप्सूल हैं। एक झूले में 20-22 व्यक्ति आराम से बैठ सकते हैं। एक चक्कर पूरा करने में आधे घंटे का समय लगता है। चक्र अत्यंत धीमी गति से चलने के कारण इसे ‘स्कायबस’ भी कहा जाता है। यहां से मैंने लंदन के कई फोटो खींचे एक भारतीय हॉटेल में दोपहर का भोजन करने के बाद हम हॉलिडे इन में वापिस आ गये। शाम को हमें पॅरिस जाने के लिये हवाई यात्रा करनी थी। हालांकि सभी पर्यटकों की इच्छा थी कि लंदन से पेरिस की यात्रा यूरोस्टाव (ट्रेन से) से करने की इच्छा थी परंतु टूर कंपनी ने हवाई यात्रा का ही टिकिट करने की वजह से हमारा समय बच गया।

पॅरिस में हम नोवोटेल हॉटेल में ठहरे थे। इससे आगे हमारी यात्रा एल. डी. सी. अर्थात लांग डिस्टेंस कोच से होनेवाली थी। इस आरामदायक कोच में चालक के सामने जी. पी. एस. यंत्र होता है। जिसके कारण हम कहां हैं, कितने किलोमीटर यात्रा कर चुके है, ट्रेफिक कहां अधिक है, इत्यादि जानकारियां तुरंत मिल जाती हैं। इस कोच के चालक को ‘कैप्टन’ कहा जाता है। ये मुख्यत: जर्मन या स्विस नागरिक होते हैं। बस में प्रवास कर रहे सभी नागरिकों का सामान बस के अंदर रखना उसका ही काम होता है। यहां क्लीनर नहीं होता। सुबह आठ बजे कैप्टन ने लॉग बुक में एन्ट्री की और हमारा प्रवास शुरु हुआ। प्रत्येक दो घंटों के बाद बीस मिनिट के लिये किसी उपाहार गृह के पास रुकना और रात को आठ बजे प्रवास रोकना, ये नियम हर कीमत पर पाले जाते हैं।

पेरिझ शहर की पहचान माने जाने वाले एफिल टावर को देखने के लिये हमारी यात्रा दूसरे दिन सुबह आठ बजे शुरु हुई। सात हजार टन के इस टावर का उद्घाटन सन 1889 में प्रिंस ऑफ वेल्स सातवें एडवर्ड के द्वारा हुआ। इसके सबसे ऊपरी माले पर टेलीविजन ट्रांसमिशन टावर है। सन 1925 तक यह दुनिया की सबसे ऊंची इमारत थी। इसकी दूसरी और तीसरी मंजिल से पूरे पेरिस के दर्शन होते हैं। इसके बाजू में ही सीन नदी है।

पेरिस के कुछ चौराहों पर वहां की सरकार ने साइकिलें रखीं हैं। कोई भी व्यक्ति इन्हें लेकर अपनी इच्छित जगह पर बिनामूल्य जा सकता है। नियम केवल यही है कि दूसरे चौक पर इन साइकिलों को पार्क कर दिया जाये। ये साइकिलें कभी चोरी नहीं होती। क्या भारत में ऐसा हो सकता है?

पेरिस के एक दिन के भ्रमण के बाद चौथे दिन हम स्विड्जरलैंड के ल्यूसर्न शहर में में पहुंचे। अल्पस से घिरे और प्रकृति के सौंदर्य से सुसज्जित इस देश में घूमने की कल्पना हर भारतीय के मन में होती है। ल्यूसर्न में हमारी दस हजार फीट की माऊंट टिटलिस की सवारी थी। छोटी सी केबिन कार से हम पर्वतारोहण के पहले स्थल पर पहुंचे। सामने हिमाच्छादित सफेद आल्पस पर्वत की श्रेणियां आखों को सुकून दे रहीं थीं। दूसरे स्थल पर पहुंचने के लिये चालीस पर्यटकों की व्यवस्था वाली केबिन थी। इसके बाद आखरी पडाव के लिये हम ऊपर-ऊपर उठने लगे। थोडी-थोडी बर्फ गिर रही थी। थंडी हवा बह रही थी। पर्वत की सबसे ऊंची जगह पर पहुंचने के बाद बर्फ के गोले बनाकर खेलने का कार्यक्रम शुरु हुआ। दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे के पोस्टर के साथ खडे होकर भारतीयों में फोटो खींचने की होड लगी थी। इस माउंट टिटलिस के पास वडा पाव का स्टाल है। पर्वत पर हमें सब्जी और पाव खाने को मिला। यहां हिंदी में लिखा हुआ सूचना फलक भी दिखाई दिया। बर्फ की गुफा में छ: देशों के राष्ट्रगीत सुने जा सकते हैं जिसमें से एक भारत का भी राष्ट्रगीत है।

पहाड से नीचे उतरने के बाद ल्यूसर्न शहर में स्थित लायन मान्यूमेंट देखा। यह शिल्पकला का अनूठा नमूना है। फ्रांस की क्रांति में अनेक नागरिक उध्वस्त हो गये थे। यह उसी का प्रतीक है। शाम को लेक ल्यूसर्न के क्रूज पर स्विस फोक म्यूझियम का आनंद लेते हुए गरमा-गरम भजिये का भी आनंद लिया।

छटवें दिन ल्यूसर्न से वडूज के लिये कूच किया। वडूज लिचरस्टिन देश की राजधानी है। इस शहर में यहां का राजा स्वतंत्र रूप से राज करता है। केवल बीस मिनिट में ट्राम के जरिये इस देश को पूरा देखा जा सकता है। वडूज बैंकों के शहर के रुप में जाना जाता है। संसार के कई धनाढ्य व्यक्तियों के गुप्त बैंक खाते इन बैंकों में है।

ऊंचे-ऊंचे पर्वत शिखर और विंटर स्पोटर्स के लिये मशहूर आस्ट्रिया में हमारा आगमन हुआ। यहां ‘ऑलिम्पिया’ नामक हॉटेल में हमारे ठहरने की व्यवस्था की गई थी। यहां का स्वारोस्की क्रिस्टल म्यूजियम एक आकर्षक जगह है। स्वारोस्की कट क्रिस्टल ग्लास उत्पादन का ‘ब्रैंड नेम’ है। इस म्यूझियम के भव्य कमरों मे नाजुक कलाकरी किये हुए अलग-अलग आभूषण हैं। म्यूजियम के एक भाग में हरे-हरे पत्तों से सज्जित मानवी चेहरे के मुंह से निकलता हुआ पानी दिखाई देता है। यह दृश्य आपने कई फिल्मों में देखा होगा।

शाम को हम इन्सब्रूक पहुंचे। इन्स नदी के किनारे चलते-चलते रात को होटेल पहुंचे। सातवें दिन हमारा बस से इटली प्रवास शुरु हुआ। हम इटली के व्हेनिस शहर पहुंचे। यूरोप के अन्य किसी भी देश की अपेक्षा इटली में आनेवाले पर्यटकों की संख्या अधिक होती है। पर्यटकों के पसंदीदा शहरों में से एक व्हेनिस दलदल पर बसा है। यहां पहुंचने के लिये वाटरबस की सुविधा है। सान मार्को चौक में पहुंचने पर सबसे पहले दिखाई देता है ब्रोझ के पंख वाले शेर का पुतला। दूसरे स्तंभ पर सेंट थिओडोर का पुतला है। इस चौक में पर्यटकों से ज्यादा कबूतर दिखाई देते हैं। यहां का डोजेश पैलेस स्थापत्यकला का उत्कृष्ट नमूना है। व्हेनिस की सबसे ऊंची इमारत अर्थात पौने तीन सौ फीट ऊंचा बेल टावर। व्हेनिस में छोटे बडे मिलाकर पौने तीन सौ कैनाक हैं और उस पर साढे चार सौ सुंदर और आकर्षक पुल है। अत: गंडोला राईड एक सुंदर अनुभव रहा।

शाम को हम फ्लोरेन्स के पाडोवा पहुंचे। झुकी हुई इमारत के लिये यह प्रसिद्ध है। किसी भी इमारत की नींव मजबूत न हो तो जल्द ही गिर जाती है परंतु यहां इस इमारत की नींव मजबूत न होने के कारण वह अमर बन गई। 1173 में इस इमारत का निर्माण शुरु हुआ था। खिसकनेवाली जमीन के कारण इमारत एक ओर झुक गई परंतु फिर भी उसका काम पूर्ण किया गया।
नौवें दिन हमने रोम के लिये प्रस्थान किया। ‘ऑल रोड लीड टू लंडन’ इस वाक्य से यह वैश्विक आकर्षण केन्द्रबिंदु है यह सिद्ध होता है। रोम का ट्रेबी फाऊंटेन पर्यटकों को आकर्षित करने का स्थल है। यहां एक छोटे से चौक में नेपच्यून देवता का फवारा है। कहा जाता है कि इस फव्वारे की ओर पीठ करके अगर अपने सिर के ऊपर से सिक्का उछाल कर फेंका जाये तो दोबारा रोम आने का मौका मिलता है या कोई इच्छा पूर्ण होती है।

रोम शहर में प्राचीन रोम साम्राज्य का भूषण कहलाने वाला कोलोसिअम है। प्राचीन काल में सत्तर से अस्सी हजार प्रेक्षक यहां बैठते थे। अब ये इमारत भग्नावस्था में है।

इटली चोरों के लिये प्रसिद्ध है। रोम के स्टेशन पर चोरों से सावधान रहने के लिये सभ्य भाषा में एक सूचना लिखी गई है। ‘इफ यू डू नॉट वॉन्ट टू ट्रॅव्हल लाइट, टेक केअर ऑफ योर लगेज.’ यहां कुछ जगहों पर भिखारी भी दिखते हैं। अपने पासपोर्ट और विदेशी चालान का यहां बहुत ध्यान रखना पडता है।

दसवें दिन हमने रोम से मुंबई के लिये प्रस्थान किया। मन में संजोये हुए सपनों को पूरा करने की जगह अर्थात यूरोप। प्राकृतिक सुंदरता क्या होती है इसकी अनुभूति स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया जाने के बाद पता चलता है। यूरोप के शहरों की प्रमुख विशेषता यह है कि उन्होंने पुरानों को जतन करते हुए नये निर्माण किये हैं। यूरोप देखना चाहिये इतिहास और कला के लिये।

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