कर्मफल

कन्याकुमारी मंदिर के पीछे चबूतरे पर अनेक यात्री सूर्योदय देखने के लिए एकत्रित थे। सब कुछ बड़ा ही रोमांचक था। अपने सप्तअश्व रथ पर सवार हो बाल सूर्य के आने की घड़ी आ गई थी। नील नभ में लालिमा का जादू बिखर गया था। ऐसा लग रहा था मानो लाल, नारंगी, नीले रंगों को किसी कुशल चितेरे ने मस्ती में आकर फैला दिया हो। सागर की चंचल तरंगों में नभ की अरुणिमा का प्रतिबिंब जैसे समुद्र नभ का रूप धारण कर सूर्य देव के चरण स्पर्श करने को आतुर हो। सभी पर्यटक एक-एक पल को अपनी आंखों में समेट लेना चाहते थे। तभी देखते ही देखते नील नभ में अरुणिमा को विस्तृत करता हुआ बाल सूर्य धीरे-धीरे प्रकट हुआ। सागर के जल में उसका प्रतिबिंब अद्भुत था। सभी मंत्रमुग्ध उस बाल रवि की छवि के दर्शन में लीन थे। सूर्योदय के प्रकाश में समुद्र में स्थित तिरुवल्ल्वर की प्रतिमा और विवेकानंद शिला स्मारक का सौंदर्य अवर्णनीय लग रहा था। धीरे -धीरे उजाला बढ़ने लगा। सूर्य की लाली प्रकाश में परिवर्तित होने लगी। लहरों के साथ लहराती जल में चमकती सूर्य रश्मियां अप्सराओं से कम नहीं लग रही थीं। सूर्योदय का जादू अपना रूप बदलता जा रहा था।

मनीषा और उसके पति महेश भी इस जादू को देखते हुए प्रकृति के सौदर्य में खो गए थे। वे दोनों कुछ देर प्रकृति के उस प्रांगण में बैठ आनंद लेना चाहते थे। तभी वहां एक माला बेचने वाला आ गया और मालाएं दिखाने लगा। मनीषा ने एक माला उठाते हुए कहा, भैया, ये माला कितने की है।

पचास की वह बोला।
मनीषा ने कहा, तीस में देनी है, तो दे दो।

पहले तो उसने कुछ न नुकुर की, पर बाद में उसने तीस रुपये में ही माला दे दी।
सूर्योदय के बाद लोग तितर-बितर होने लगे थे। सब लोग अपने काम में लग गए थे, मानो सूर्य ने सब को आदेश दे दिया हो कि बहुत सो लिए, अब काम में लग जाओ। तरह-तरह का सामान बेचने वाले भी घूम-घूम कर अपना सामान बेचने लगे थे। कोई स्नान करने जा रहा था, तो कोई मंदिर जा रहा था। एक अलग ही नजारा था। तभी महेश ने कहा, तुम्हें मंदिर नहीं जाना हो तो मैं होकर आता हूं। मसिक धर्म होने के कारण मनीषा मंदिर नहीं जा सकी थी।

अचानक मनीषा की दृष्टि कुष्ठ रोग से ग्रसित एक भिखारी पर पड़ी। उसकी स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उसके पास हिलने-डुलने और बोलने की शक्ति भी नहीं बची थी। वह तो अपने शरीर पर बैठी मक्खियां उड़ाने में भी समर्थ नहीं था। पर अपने पापी पेट की खातिर वह कुछ अस्पष्ट सी आवाज निकाल यात्रियों से भीख मांग रहा था। मैला-कुचैला-गंदा अत्यंत घृणित वह अपने टेड़े-मेड़े हाथ- पैरों को इधर-उधर सरकाने की कोशिश कर रहा था, पर असमर्थ था। उसके रिसते घाव और उन पर भिनकती मक्खियां देखकर मनीषा का मन व्याकुल हो गया था। सूर्योदय के सौंदर्य के बाद इतना घृणित एवं दयनीय रूप देख कर अचानक उसके मुंह से निकला,
हे प्रभु, इसे मुक्ति दे दो।

चबूतरे के किनारे जिंदा लाश सा पड़ा, वह बड़ी आशा भरी आंखों से भीख मांग रहा था। किसी के भीख न देने पर मनीषा ने उसके उस अस्पष्ट स्वर में भी क्रोध का अनुभव किया था। मनुष्य की स्थिति चाहें कितनी भी खराब क्यों न हो पर काम, क्रोध लोभ, मोह उसका पीछा नहीं छोड़ते। अरे यह क्या! उससे थोड़ी दूर ऐसी ही कुष्ठ रोगिणी एक स्त्री भी चबूतरे के एक किनारे पड़ी भीख मांग रही थी। उसका भी लगभग वही हाल था,जो उस भिखारी का था। उसने फटे, पुराने, गंदे कपड़े में जैसे तैसे अपने शरीर को छुपाया था। रिसते घावों से भरे उसके हाथ पैर थे। शक्तिहीन, भूखी-प्यासी वह पता नहीं क्या और कष्ट झेलने के लिए जिंदा थी। पर एक बात अच्छी थी- बहुत स्पष्ट तो नहीं, पर वह बोलने में समर्थ थी। उन दोनों को देखकर मनीषा सूर्योदय का जादू भूल चुकी थी। मन की पीड़ा बढ़ती जा रही थी। उस भिखारिन ने अपने एक साथी से अपनी लकड़ी के पट्टे वाली गाड़ी को धकेलने के लिए कहा। उस साथी ने गाड़ी को धकेल दिया और वह पट्टे की गाड़ी पर पड़ी-पड़ी उस कोढ़ी भिखारी के पास आ गई। मनीषा उन दोनों के पास खड़ी उन्हें देख रही थी। मनीषा ने उन्हें नाश्ता कराया और कुछ रुपये और कपड़े ख़रीद कर दिए। उनकी आंखें मनीषा को लाखों आशीष दे रही थीं। मनीषा उस स्त्री से बात करने लगी। बातों ही बातों में पता चला कि वे दोनों पति-पत्नी हैं। यह सुनकर मनीषा की जिज्ञासा और बढ़ गई। मनीषा को कुछ प्रश्न बार-बार परेशान कर रहे थे कि आख़िर दोनों की ऐसी हालत कैसे हो गई? जीते जी ये ऐसा नरक क्यों भोग रहे हैं? इनके किस पाप के लिए भगवान ने इन्हें मृत्यु से वंचित कर असह्य पीड़ा सहने के लिए जीवित रखा है? क्या इन्होंने भी अश्वत्थामा की तरह सोते हुए किसी के पुत्रों को मार डाला है या इससे भी अधिक कोई जघन्य अपराध किया है, जो ईश्वर ने इन्हें घोर कष्ट दिए हैं। कौन से कर्मों का फल भोग रहे हैं ये? इस जन्म के या पूर्व जन्म के? मनीषा उससे बात कर अपने प्रश्नों का उत्तर खोजना चाहती थी। तभी मनीषा ने उस भिखारिन को अपने पति से हिन्दी बोलते हुए सुना। उसने उससे सहज ही पूछ लिया,
अरे! तुम्हें हिन्दी आती है?

मनीषा के मुंह से हिन्दी सुनकर उसके कोढ़ युक्त चेहरे पर खुशी की हलकी सी लहर अनायास ही दिखाई दी। स्वभाषा का प्रभाव ही कुछ ऐसा होता है। वह कहने लगी,

बीबी हम लोग तो उत्तर प्रदेश से पुलिस से बचते- बचाते यहां आए थे । पर बाद में पुलिस ने हमें पकड़ लिया और कन्या कुमारी की जेल में बंद कर दिया। कुछ साल बाद हम जेल से तो रिहा हो गए पर भगवान ने बीमारी की ऐसी जेल में कैद किया कि हमारी जिंदगी ही हम से रूठ गई। पापों के फल तो भोगने ही पड़ते हैं न।
पुलिस की बात सुन मनीषा कुछ घबरा सी गई, तब भी उसने पूछा,
क्या पाप कर्म थे?
पाप कर्म की बात सुनते ही वह भिखारिन रुआंसी सी हो गई थी। अपने पति के प्रति विद्रोह उसकी आंखों में स्पष्ट झलक रहा था।

पता नहीं उसने मनीषा में क्या देखा कि वह अपनी कहानी उसे सुनाते हुए कहने लगी-
यह, मेरा आदमी उत्तर प्रदेश के इटावा के एक बहुत अमीर घर में पैदा हुआ था और बड़े लाड़-प्यार से बड़ा हुआ था। इसकी हर इच्छा पूरी की जाती थी। पर बड़े होने के साथ यह बुरी संगति में पड़ गया और गांजा, चरस, शराब आदि का नशा करने लगा था। चोरी, हत्या, बलात्कार जैसे कामों को करने में भी इसे कोई हिचक नहीं थी। इसके बुरे कामों की वजह से इसके पिता ने इसे घर से निकाल दिया था। परंतु बेटे को घर से निकाल कर वे भी अधिक दिन जिंदा नहीं रहे। बीबी आप तो जानती हैं कि बेटे का प्यार होता ही ऐसा है।

उसकी बात सुन मनीषा ने स्वीकृति में सर हिला दिया, वह रोते -रोते अपने दिल का गुबार निकाल देना चाहती थी। शायद इससे पूर्व उसके दिल की किसी ने सुनी ही नहीं होगी। वह कहने लगी,
बीबी पिता की मौत के बाद भी यह नहीं सुधरा। यह पापों के गड्ढे में गिरता गया। नशा करना और छोटी लड़कियों पर बलात्कार करना, चोरी, डकैती करना इसकी आदत बन गई थी। न जाने कितनी लड़कियों की जिंदगी इसने ख़राब की थी। उत्सुकता वश मनीषा ने उससे पूछा,

ऐसे बलात्कारी से तुमने शादी क्यों कर ली?
उसने आंसू पोंछते हुए कहा, मैं भी इसके द्वारा बलात्कार की शिकार हो गई थी। मैं बहुत रोई-चिल्लाई पर पंचों और मेरे माता पिता ने इसके साथ मेरी शादी करा दी। तब से मैं इसके साथ भटक रही हूं। मैंने इसे सुधारने की बहुत कोशिश की, पर मैं इसे बिल्कुल भी न सुधार सकी। शादी के बाद भी इसका वही हाल था। अब लड़कियां लाने का जरिया इसने मुझे बना लिया था। यदि मैं ऐसा नहीं करती थी तो गरम चीमटे से मुझे जलाता था। मेरी डंडे से पिटाई करता था। उस पर मेरे भाई और माता पिता को मारने की धमकी देता था।

अपनी कहानी सुनाते- सुनाते वह जोर जोर से रोने लगी थी। वह रोते रोते बोली,
मैं अपना दर्द तो सह लेती पर माता-पिता और भाई को मारने की धमकी से डर जाती और इसके पाप में भागीदार बन जाती। धीरे -धीरे मैं भी इसी की तरह हो गई। मैं इसके और इसके दोस्तों के लिए सुंदर लड़कियां बड़े यतन से लाने लगी थी। इसके लिए ये लोग मुझे रुपये देते थे। रुपये की चमक में मेरा भी ईमान डोल गया था। बुरी संगति का मुझ पर भी असर पड़ गया था। अलग-अलग शहरों में अलग-अलग भेष में न जाने कितनी छोटी लड़कियों को हमने शिकार बनाया और रबर की गुड़िया की तरह तोड़-मरोड़ कर ़फेंक दिया। हमारी आत्मा मर चुकी है। बीबी इसी का फल हम भोग रहे हैं। दुनिया में हमें कोई नहीं पूछता और भगवान भी हमें मौत नहीं देते। पापी पेट है कि हरदम चक्की चलाता ही रहता है और खाने को मांगता ही रहता है।
मनीषा की दृष्टि उस अधमरे भिखारी की ओर गई। आज भी उसकी आंखों में कुत्सित भाव ही दिखाई पड़ रहा था। मनीषा की समझ में आ गया था कि भगवान ने इनकी ऐसी हालत क्यों की है। सच ही कहा गया है कि मनुष्य अपने कर्मों से भाग्य को सुंदर बना सकता है और श्रेष्ठ भाग्य को बिगाड़ भी सकता है। स्वर्ग -नर्क तो इसी धरती पर ही मिल जाते हैं। कन्या जो देवी है, उसका अपमान, उसका शोषण, उसका बलात्कार करने वालों को कन्याकुमारी की देवी कैसे माफ कर सकती है? शायद उसने अपने मंदिर के प्रांगण में ही इन्हें तिल- तिल मरने को जिंदा रखा है। जब तक ये अपने गुनाहों का प्रायश्चित नहीं करेंगे, तब तक ऐसे ही इसके घाव रिसते – सड़ते रहेंगे। सब कर्मों के फल हैं, जो यहीं भोगने पड़ते हैं।

मनीषा के पति अपनी शर्ट हाथ में लिए चले आ रहे थे। क्योंकि कन्याकुमारी के मंदिर में पुरुषों को अपना उत्तरीय वस्त्र उतार कर ही मंदिर में जाने की अनुमति है। वह प्रसाद लेकर, दर्शन कर बहुत प्रसन्न थे। पति के द्वारा दर्शन कर लेने पर मनीषा को ऐसा लगा जैसे दर्शन का पुण्य उसे भी मिल गया हो।
महेश कहने लगे,

मनीषा, चलो अब स्टीमर में बैठ कर विवेकानंद शिला स्मारक चलते हैं।
मनीषा जल्दी से उनके पीछे-पीछे चल दी, पर उसके मन में यही विचार चल रहा था कि भोगों की श्रृंखलाओं में बंधकर आख़िर मनुष्य ऐसे कुकृत्य क्यों करता है और ऐसी कठोर यातनाएं क्यों भोगता रहता है।

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