बांध : विकास या विनाश?

उत्तराखंड अब पहाड़ी राज्य नहीं बल्कि बांधों का राज्य बन रहा है, और सरकार की अनदेखी केदारनाथ एवं चमोली जैसी आपदाओं का कारण बन रही है। इन योजनाओं का पर्यावरणीय आकलन ठीक से नहीं किया जाता और पारिस्थितिकी से लगातार छेड़छाड़ कर विनाश को बुलावा दे दिया जाता है।

‘हिमालय’ धरती पर जीवन का आधार है। धरती पर जीवन की धारा को प्रवाहवान रखने वाली जीवनदायिनी नदियोंं का उद्गम भी हिमालय से ही होता है। हिमालय की सुंदरता और भव्यता हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है, लेकिन हिमालय जितना विशाल है, उतना ही संवेदनशील भी है। हिमालय के प्राकृतिक परिवेश से थोड़ी-सी छेड़छाड़ विभिन्न आपदाओं के रूप में बड़े विनाश का कारण बनती है। प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम पूरी दुनिया 2013 में केदारनाथ आपदा और 2021 में चमोली आपदा के रूप में देख चुकी है। इन आपदाओं का कारण प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से पर्वतीय इलाकों की जलविद्युत परियोजनाएं भी हैं। इसने सभी को सोचने पर मजबूर किया कि क्या प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर पहाड़ोंं पर बांधों का निर्माण विनाश को बुलावा दे रहा है? लेकिन ये बातें केवल ‘सोचने’ तक ही सीमित रह गईं और लगातार बनते बांध अब धीरे-धीरे पहाड़ को निगलते जा रहे हैं।

इंसान की पानी और बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए बांध और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण पहाड़ों पर किया जा रहा है। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को उनके उद्गम से निकलने के कुछ किलोमीटर बाद ही बांध बनाकर रोक दिया जाता है। उत्तराखंड की बात करें, तो नेशनल रजिस्टर ऑफ लार्ज डैम्स (2019) की रिपोर्ट के अनुसार 1970 के दौरान उत्तराखंड में केवल 5 बड़े बांध थे, लेकिन तब से अब तक 12 बांध और बन चुके हैं, जबकि 8 बांध अभी निर्माणाधीन हैंं। इनमें ‘टिहरी बांध’ सबसे बड़ा बांध है, जिससे करीब 50 किलोमीटर का क्षेत्र जलमग्न हो चुका है। उत्तराखंड में बांधों की इतनी संख्या तब है, जब 24 जलविद्युत परियोजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट रोक लगा चुकी है।

‘बांध बनेगा तो देश का विकास होगा, आपका विकास होगा। आपके घर में बिजली आएगी, रोड़ आएगी, रोजगार मिलेगा।’ बांध बनाने के नाम पर सरकार अक्सर लोगों को ऐसा लालच देती है, लेकिन बांध बनने के बाद होता इसके विपरीत है। बांध का असर न केवल लोगों के जीवन और आजीविका पर पड़ा, बल्कि मानसिक रूप से भी लोगों को प्रभावित किया है। बांध प्रभावितों को आज भी न्याय नहीं मिल सका है और न उनसे किए गए सभी वादों को पूरा किया गया है। बांध ने उत्तराखंड की कई सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहरों एवं विरासत को डुबो दिया। इसके साथ ही लाखों लोगों की भविष्य की उम्मीद और यादें भी डूब गईं। पर्यावरण को भी उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों पर बांध बनने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है, लेकिन इसकी परवाह किसी को नहीं। इसलिए आज भी बांध बन रहे हैं और विश्व का दूसरा सबसे ऊंचा ‘पंचेश्वर बांध’ भी उत्तराखंड में बनाने की तैयारी चल रही है। पंचेश्वर बांध के कारण लगभग 134 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र पानी में डूब जाएगा। इसके अलावा एशिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध ‘किसाऊ बांध’ भी उत्तराखंड में ही बनाने की योजना है।

भागीरथी नदी घाटी में बांध और बैराज किस तरह वहां पर्यावरण पर असर डाल रहे हैं, ये जानने के लिए एस पी सती, शुभ्रा शर्मा, वाई पी सुंदरियाल, दीपा रावत और मनोज रियाल ने एक शोध किया था। शोध को जर्नल जियोमैटिक, नेचुरल हैजार्ड्स एंड रिस्क में प्रकाशित भी किया गया है। शोध में बताया गया कि “भागीरथी नदी घाटी में बने विभिन्न बांधों और बैराज के कारण न केवल नदी का प्राकृतिक स्वरूप प्रभावित हुआ है, बल्कि नदी का बहाव भी रुका है और इकोसिस्टम पर गहरा असर पड़ा है। साथ ही ग्लेशियरों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है।” इकोसिस्टम पर असर कहीं न कहीं बाढ़ का भी कारण बन रहा है।

बाढ़ आने का कारण बड़े पैमाने पर वनों का कटाव भी है। 1970 में अलकनंदा नदी में भयानक बाढ़ आई थी, जिसने यहां के जनजीवन को प्रभावित किया था। शोध में बताया गया कि “बाढ़ अपने साथ केवल पानी ही नहीं लाती है, बल्कि हजारों टन मलबा बाढ़ के पानी के साथ बहता हुआ आता है, जो पूरे इलाके में व्यापक असर डालता है।” बांध बनाने से जो पानी ठहरता है, उससे पहाड़ की ढलाननुमा जमीन ढीली पड़ने लगती है। धीरे-धीरे पहाड़ कमजोर हो जाते हैं। उस क्षेत्र की जलवायु में परिवर्तन आने लगता है। मैदानी इलाकों में पानी का बहाव कम या न के बराबर होने से नदियों के कैचमेंट तक सूखने लगते हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन का असर भी ज्यादा पड़ता है। इसके अलावा बांध को बनाने के लिए बड़े पैमाने पर वनों का कटान किया जाता है, जो पारिस्थितिक तंत्र को अलग प्रकार से नुकसान पहुंचाता है। बांध बाढ़ का कारण इसलिए भी है, क्योंकि बरसात के दौरान बांध का पानी ओवरफ्लो होने लगता है, तो इसे नीचे की धाराओं में छोड़ दिया जाता है, जो कई बार मैदानों में बाढ़ लेकर आता है। यदि मैदानों में बारिश के कारण पहले ही बाढ़ आई होती है, तो बांध से छोड़ा पानी बाढ़ को और विकराल बना देता है।

इस प्रकार की किसी भी योजना को शुरू करने से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) किया जाता है। साथ ही कई वैज्ञानिक अध्ययन किए जाते हैं, लेकिन आजकल न तो वैज्ञानिक अध्ययन ठीक प्रकार से किया जा रहा है और न ही पर्यावरण प्रभाव आकलन। ईआईए की जो भी रिपोर्ट भेजी जाती है उसमें पर्यावरण, पारिस्थितिकी और मानव आदि पर पड़ने वाले प्रभावों को ठीक प्रकार से नहीं बताया गया होता। पंचेवश्वर बांध के संबंध में ईआईए सहित विभिन्न रिपोर्ट की वास्तविकता सभी देख ही चुके हैं। इसलिए ईआईए निष्पक्ष तौर पर सख्ती से किया जाना चाहिए। शोध में बताया गया कि “जलविद्युत योजनाओं के लिए पेड़ों को काटा गया है। जिससे ढलाननुमा चट्टाने कमजोर हो रही हैं। ऐसे में भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है, जिसका असर पर्यावरण पर ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड में इन इलाकों में रहने वाले लोगों पर भी पड़ रहा है। भूस्खलन के कारण कई लोगों के मकान जर्जर हो गए हैं, या टूटने की स्थिति में हैं। खेतों पर भी इसका विपरीत असर पड़ रहा है।”

शोध के अनुसार इस प्रकार की योजनाओं में पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जाना बेहद जरूरी है, लेकिन पर्यावरणीय प्रभाव को जाने बिना बांधों का निर्माण काफी खतरनाक हो सकता है। शोध में इससे पहले हुए शोधों का जिक्र करते हुए कहा गया कि “इससे पहले हुए शोधों में भी न वैज्ञानिक अध्ययन पूरी तरह किया गया और न ही पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को समझा गया, जिसका असर इंजीनियरिंग पर साफ तौर पर दिखता है।” ‘उत्तराखंड में कई योजनाएं चल रही हैं, जिसका प्रतिकूल प्रभाव न केवल पर्यावरण पर पड़ रहा है, बल्कि लोगों का जीवन भी असुरक्षित है। इसलिए इन परियोजाओं का व्यापक अध्ययन किया जाना बेहद जरूरी है।’

वास्तव में यदि हम पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन ठीक प्रकार से करें तो दुनिया भर में गहरा रही विभिन्न समस्याओं का समाधान आसानी से किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और दूरद़ृष्टि की जरूरत है, जिसका शायद हमारी सरकारों में अभाव है। यही कारण है कि उत्तराखंड़ अब पहाड़ी राज्य नहीं बल्कि बांधों का राज्य बन रहा है, और सरकार की अनदेखी केदारनाथ और चमोली जैसी आपदाओं का कारण बन रही है।

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