हवा का भोजन कर जीवित रहीं अहल्या

भारत समेत दुनिया के वैज्ञानिक आज कल हवा और मीथेन से भोजन बनाने के प्रयास में जुटे हैं। कुछ वैज्ञानिकों को इस प्रयोग में सफलता भी मिली है। वाल्मिकी रामायण के अनुसार गौतम ऋषि पत्नी अहल्या के चरित्र पर शंका कर उसे हवा पीकर, अदृश्य रहने का श्राप देते हैं। केवल हवा पीकर जीवित रहने वाली इसी स्त्री को अन्य रामायणों में शिला की उपमा दी गई है। इस स्थिति में पुत्र शतानंद व चिरकारी तथा पुत्री अंजनी अहल्या की सेवा में रहते हैं। अर्थात हमारे ऋषि हवा से भोजन बनाने की तरकीब न केवल जानते थे, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में उसका सेवन भी किया जाता था।

अभी तक विज्ञान की यही धारणा है कि जीने के लिए कुछ न कुछ आहार बेहद आवश्यक है। पर एक निश्चित समय तक कुछ लोगों की बगैर भोजन-पानी के जिंदा रहने की खबरें वैज्ञानिकों को आश्चर्य में डालते हुए, यह जानने के लिए प्रेरित करती रही हैं कि वे ऐसे अनुसंधान करें, जिनमें बिना आहार के जीवित बने रहने की संभावनाएँ हो। थकी अवस्था में या शोकाकुल रहते हुए मनुष्य में यह विचार पनपता है कि भोजन बनाना और खाना ही न पड़े या कोई ऐसी गोली (दवा) उपलब्ध हो जिसे खाने के बाद भूख लगे ही नहीं। दुनिया के वैज्ञानिक भी भूख नहीं लगने वाली या भूख मिटाने वाले पौष्टिक तत्वों की गोली बनाने की कोशिश में लगे हैं, किंतु अभी पूर्ण सफलता नहीं मिली है। इस हेतु पेड़-पौधों व वनस्पतियों से भी प्ररेणा ली जा रही है, क्योंकि ये प्रकृति में उपलब्ध तत्वों से ही अपना पोषण ग्रहण करके जीवित रहते हैं। पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषन से अपना भोजन ग्रहण करते हैं। गोया, मनुष्य का शरीर पंच तत्वों से सीधे क्यों आहार या ऊर्जा ग्रहण करके जीवित नहीं रह सकता ?

वैज्ञानिकों ने इस दृष्टि से 39 पोषक तत्वों वाला एक चूर्ण बनाया है, लेकिन अभी वह आम-फहम नहीं हुआ है। हमारे वेदों और योग-साधना में ‘प्राणवायु’ का जिक्र है। इसे ‘प्राणा’ भी कहा गया है। इस आधार पर वैज्ञानिकों का एक समूह यह मानकर चल रहा है कि सिर्फ हवा पीकर जिंदा रहा जा सकता है। सूर्य के प्रकाश में खड़े रहकर भी शरीर जीवनदायी तत्व ग्रहण कर लेता है। पश्चिमी देशों में इस प्रक्रिया कों ‘ब्रेथिरियन्य’ कहते हैं। चुनांचे प्राणवायु और प्रकाश की किरणों से जीवनदायी तत्व ग्रहण करने के लिए पहले शाकाहारी होना जरूरी है। फिर मवेशियों से प्राप्त दूध, दही, मठा, मक्खन और घी का सेवन त्यागना होगा। इसके बाद कुछ समय तक केवल तरल पेय पदार्थों को ग्रहण करने की आदत डालनी होगी। तत्पश्चात हवा और रोशनी पर जिंदा रहना संभव बन सकता है।

हवा पीकर जिंदा रहने के संदर्भ में एक ताजा शोध हुआ है। फिनलैंड के वैज्ञानिकों ने हवा, पानी, सूक्ष्म-अणु (माइक्रोब्स) और ऊर्जा को मिलाकर आहार बनाने का काम किया है। वैज्ञानिक इसे भविष्य का भोजन बता रहे हैं। उनका कहना है कि दुनिया के उन गरीब देशों में जहाँ लोगों को खाने के लिए अनाज और जानवरों को चारा नहीं मिलता है, उन्हें यह तकनीक उपयोगी है। हालांकि इस भोजन का स्वाद अभी बहुत अच्छा नहीं है, पर इसमें बेसिक प्रोटीन और खनिज मौजूद हैं। इस भोजन को फिनलैंड के ‘वीटीटी टेक्निकल रिसर्च सेंटर’ ने तैयार किया है। सेंटर के वैज्ञानिकों का दावा है, हवा में मौजूद कार्बन डाईआॅक्साइड, पानी, सूक्ष्म-अणु और सौर्य ऊर्जा से भविष्य का खाना बनाया जा सकता है। इसके लिए इन चीजों को कॉफी कप के आकार के एक बायोरिएक्टर में मिक्स करते हैं। फिर उसमें बिजली का करंट प्रवाहित करते हैं। इससे एक पाउडर बनता है, जिसमें 50 फीसदी प्रोटीन, 25 फीसदी कार्बोहाइड्रेट और बाकी में फैट, न्यूक्लिक एसिड होते हैं। यह भोजन अभी इंसानों के खाने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हो पाया है, पर जानवर आसानी से खा सकते हैं। इंसान के खाने के लायक बनाने के लिए अभी और प्रयोग किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने इसे ‘फूड फ्रॉम इलेक्ट्रीसिटी प्रोग्राम’ नाम दिया है। उनका कहना है कि यह उसी तरह है, जैसे पौधे प्रकाश संश्लेषण से अपना भोजन बनाते हैं, पर उसकी तुलना में इसमें 10 गुना कम ऊर्जा लगती है। वैज्ञानिक जूहा-पेका पिटकानेन कहते हैं कि सभी तरह का आहार योग्य कच्चा माल हवा में मौजूद है। भविष्य में इस प्रौद्योगिकी को रेगिस्तान, बाढ़, सूखा और अकाल पड़ने वाले इलाकों में लोगों को खाना मुहैया कराने में मदद मिलेगी। भारत में इसी तर्ज पर बैंगलुरु की कंपनी ‘स्ंिटग बायो’ काम कर रही है। साफ है, अहल्या प्रसंग हवा से भोजन बनाने का विज्ञान सम्मत सूत्र का उदाहरण है।

आपकी प्रतिक्रिया...