टूटने की कगार पर कांग्रेस!

लोकसभा चुनाव 2014 के बाद से कांग्रेस का पतन होता दिख रहा है इसकी पकड़ लगातार राजनीति से दूर होती जा रही है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर किसी भी राजनीतिक दल का पतन क्यों होता है? तो आप उदाहरण के लिए कांग्रेस को देख सकते है। आजादी के बाद से यह देश की सबसे शक्तिशाली पार्टी थी और पिछले 70 सालों में सिर्फ 3 बार ही सत्ता से बाहर रही, फिर इसका पतन क्यों हो रहा है? आखिर कांग्रेस के नेता अपनी ही पार्टी से क्यों भाग रहे है। किसी पार्टी के पतन के कई कारण हो सकते है इसे किसी एक कारण के दौर पर नहीं देखा जा सकता है।

कांग्रेस ने सत्ता में रहने के बाद भी क्या देश का विकास नहीं किया? जनता कांग्रेस के खोखले वादों से ऊब चुकी है, जनता अब कुछ परिवर्तन देखना चाहती है या फिर सच में मोदी की कार्यशैली से जनता इतनी प्रभावित हुई कि कांग्रेस को फिर से सत्ता में नहीं आने देना चाहती है। कांग्रेस के पतन का कारण कोई भी हो लेकिन कुल मिलाकर सच्चाई यह है कि अब जनता फिर से कांग्रेस को सत्ता में नहीं देखना चाहती है इसलिए उसे लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है। देश के प्रमुख राज्यों के साथ साथ अब छोटे राज्यों से भी कांग्रेस की विदाई शुरु हो गयी है। ऐसे राज्यों में बीजेपी या फिर स्थानीय पार्टी अपना परचम लहरा रही है। पिछले कुछ समय से देखा जा रहा है कि स्थानीय पार्टियों का अस्तित्व बढ़ा है और जनता उन पर ज्यादा भरोसा कर रही है। लोकसभा चुनाव में भी स्थानीय पार्टियों ने अपना लोहा मनवाया है।

कांग्रेस पार्टी के पतन में राहुल गांधी को भी काफी हद तक जिम्मेदार माना जा रहा है और शायद यही वजह है कि राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष भी नहीं बन पा रहे है। राहुल गांधी अध्यक्ष पद के लिए कभी रेस में भी नहीं रहे लेकिन आंतरिक खबरों के मुताबिक यह एक परिवार की पार्टी है इसलिए अध्यक्ष पद के लिए किसी और नाम आगे नहीं किया जा सकता है। चुनाव में मिली करारी हार के बाद राहुल ने यह पद त्याग दिया और फिर कभी इस पर दावा नहीं किया। साल 2014 के बाद के चुनाव पर नजर डालें तो राहुल गांधी ने सैकड़ों रैलियां की लेकिन उसका कोई सकारात्मक असर चुनाव परिणाम में नहीं देखने को मिला और यह बात खुद राहुल गांधी ने भी स्वीकार किया है।

राहुल गांधी का राजनीतिक कार्ड जब नहीं चला तो फिर प्रियंका गांधी को मैदान में लाया गया और उन्हे पार्टी में पद भी दिया गया लेकिन प्रियंका गांधी का भी प्रभाव कुछ ज्यादा नहीं चला। हालांकि कांग्रेस के चश्में से देखें तो प्रियंका अच्छा काम कर रही है लेकिन एक राष्ट्रीय पार्टी को किसी अकेले के द्वारा नहीं ऊपर उठाया जा सकता है। राहुल गांधी के खास लोग भी पार्टी से दूरी बना रहे है ज्योतिरादित्य सिंधिया इसके सबसे सटीक उदाहरण है लेकिन ऐसे कई और लोग भी है जो पार्टी के कामकाज से खुश नहीं है। दरअसल पार्टी में विवाद की एक वजह यह भी है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता अभी भी पार्टी में अपनी पकड़ को कमजोर नहीं करना चाहते है जबकि कांग्रेस पार्टी के युवा नेता अब पार्टी की कमान को अपने हाथों में लेना चाहते है इसलिए सभी राज्यों में वरिष्ठ नेताओं और युवा नेता के बीच विवाद नजर आता है और राजस्थान इसका प्रमुख उदाहरण है। राहुल गांधी के जोश के साथ युवा इसलिए ही जुड़े थे लेकिन पार्टी में राहुल गांधी के हिसाब से कुछ नहीं हो रहा है इसलिए कांग्रेस के युवा नेता पार्टी से दूरी बना रहे है।

कांग्रेस पार्टी टूटने की तरफ बढ़ रही है और इसका अंदाजा गांधी परिवार को भी हो चुका है। गांधी परिवार को भी यह पता है कि अगर इस समय कांग्रेस पार्टी टूटती है तो उसका उबरना मुश्किल हो जायेगा क्योंकि हालात पार्टी के खिलाफ है। हालांकि कांग्रेस कोरोना महामारी को ढाल बनाकर खुद को अस्तित्व में फिर से लाना चाहती है। कांग्रेस देश की सबसे अधिक पुरानी पार्टी है और इसकी स्थापना करीब 135 वर्ष पहले की गयी थी जिसका अंत धीरे धीरे होता दिख रहा है। वर्तमान में इस पार्टी के पास 52 लोकसभा सीट, 36 राज्य सभा सीट और मात्र 6 राज्यों में सरकार बची है कुछ राज्यों में गठबंधन की सरकार है लेकिन उसमें भी कांग्रेस का कोई अहम रोल नहीं है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अब अगर पार्टी ने खुद को टूटने से बचा लिया तो भी इसका राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बन कर रहना मुश्किल होगा।

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