मानवीय अतिक्रमण से जंगलों को हानि

जो ‘जंगलधन’ चला गया है उस पर अफसोस करने से कोई लाभ नहीं होगा| नया जंगल पनपे इसलिए अपनी ओर से पौंधे लगाना शुरू कर दें| इससे फिर जंगल पनपेंगे| हमें ‘पौधा लगाओ, हरियाली बचाओ’ नारे पर अमल करना होगा| पर्यावरण की रक्षा में यह अहम् भूमिका अदा करेगा|

हम, भारतवासी बहुत खुशनसीब हैं, क्योंकि हमारा देश सुजलाम्      सुफलाम् कहलाता है| भारत में किसी चीज की कमी नहीं है| हमारा देश प्राकृतिक सौंदर्य और देन से परिपूर्ण है| पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब समुद्र और उत्तर में बर्फ से भरी पहाडियां, दक्खन में हिंद महासागर| हमारे देश में सदियों से नदियां बहती रही हैं| उत्तर से आने वाली नदियां बारहो माह पानी से लबालब भरी होती हैं| दक्खन की कुछ नदियां गर्मी के दिनों में सूख जाती हैं, पर उत्तर की नदियों में हमेशा पानी रहता है| यहां पहाड़, पेड-पौंधों की कमी नहीं है|

उत्तरी इलाका पहाड़ों और जंगलों से भरा हैं| जैसे-जैसे निचले इलाकों की ओर बढ़ते हैं, यहां सपाट मैदान पाए जाते हैं| यहां पर खेती होती है जिनमें चावल गेहूं, ज्वार, बाजरा, गन्ना के अलावा धान की खेती की जाती है| इसके अलावा जो जमीन बचती है उस पर कई तरह के फूलों, फलों और सब्जी की खेती भी होती है| किसी चीज का कोई अभाव नहीं है| सबकुछ विपुल मात्रा में है| लोग अपनी जरुरतें पूरी करके संतुष्ट हैं| सब एक दूसरे के साथ अपने-अपने उत्पादनों का आदान-प्रदान करके अपनी दूसरी सारी जरूरतें पूरी कर लेते| जैसे-जैसे समय बदलता गया बहुत सारे परिवर्तन होने लगे| कुछ भौगोलिक परिवर्तन हुए और कुछ कृत्रिम परिवर्तन हुए|

माना कि प्रगति के लिए परिवर्तन जरूरी है, पर इतना भी नहीं होना चाहिए कि जिससे दुष्परिणामों का असर हमारे जीवन पर होने लगे| आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें परिवर्तन के दुष्परिणाम का नतीजा नजर आता है| आज हम देख रहे हैं कि कुछ सालों पहले जहां हरियाली नजर आती थी वहां अब बहुत बड़ी-बड़ी इमारतें बनी हैं| धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ने लगी और हरे भरे जंगल कटने लगे, पहाडियां टूटने लगीं| जहां देखो वहां लोग बस्तियां बना कर रहने लगे| पहले एक झोपड़ी बना लेते हैं और धीरे-धीरे उसे पक्के मकान में बदल लेते हैं| जमीन तो जमीन इन्होंने पहाड़ों तक को नहीं छोड़ा| इनकी वृध्दि होते होते इस हद तक बढ़ गई है कि न कोई मैदान नजर आता और कोई पहाड़ी|

जनसंख्या भी इतनी बढ़ गई है कि पूछो मत| ऐसे में गरीब और आम मध्यम वर्गीय लोगों को आवास की समस्या होनी ही है| लोगों के पास अब हर चीज की कमी होने लगी है| समस्याएं भी बढ़ने लगी है| जगह इसलिए नहीं मिल रही है क्योंकि बड़े-बड़े बिल्डर्स अपने मुनाफे के लिए किसी भी तरह से जमीन हथिया कर चाहे कानूनी तौर पर, गैरकानूनी तरीके से हड़प कर या बस्तीवालों को लालच देकर जमीनें खाली करवा कर वहां नई कई मंजिलों की इमारतें बना कर अपना बिजनेस जमाने लगे हैं| पैसेवाले बड़े-बड़े अमीर लोग इन ऊंची इमारतों में रहने लगे और प्राकृतिक जंगल कट कर कांक्रीट के जंगल बनने लगे हैं|

इन नई इमारतों के लिए लकड़ी की जरुरत तो होगी ही तो उसके लिए ये लोग विरासत में मिले जंगलों की बलि चढ़ा कर अपना काम निकाल रहे हैं| इसका आज पर्यावरण पर भी बहुत बुरा असर हो रहा है| जहां तालाब है उनको मिट्टी से भर कर उस पर भी इमारतें बनाने लगे हैं| इसका जीताजागता उदाहरण मुंबई के कुर्ला की वह खाड़ी जहां से बचपन में बस से गुजरते हुए इतनी बदबू आती थी कि नाक पर रुमाल रखे बिना वहां से निकलना मुश्किल था| वहां पर आज एक पूरा नगर बस गया है| अब कोई यकीन नहीं करेगा कि वहां कोई कुर्ला की खाड़ी थी| इसका असर पानी की निकासी पर होने लगा| बारिश के दिनों में जहां अतिरिक्त पानी तालाब, खाड़ियों में भरता था वही अब सड़कों पर बह कर यातायात के लिए समस्या बन गया है| उस पर मनपा की मेहरबानी से न तो सड़कें ढंग की हैं और न पानी की निकासी के लिए कोई व्यवस्था और न नालों, गटरों की सफाई हो पाती है| इसलिए बारिश के मौसम में हर साल चारों तरफ पानी ही पानी, इसके अलावा कुछ और नजर नहीं आता| एक-दो दिन की छुट्टी अतिवृष्टि के कारण हो जाती है, जिससे सब को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है| चारों तरफ पानी ही पानी नजर आता है, जिसमें से चलते समय आगे रास्ता है, गटर है या नाला है कुछ दिखाई नहीं देता| कुछ दूरी तक बहते हुए पानी में चलने के कारण चक्कर आने लगता है| इन्हीं दिनों में बांध भी खोल दिए जाते हैं जिससे और भी तकलीफ बढ़ जाती है|

मुंबई के लोगों की त्रासदी यह है कि लोगों को पीने के पानी के लिए तरसना पड़ता है| दक्षिण मुंबई में फिर भी पानी की समस्या जैसे थी वैसे ही है| मौसम बदल गए हैं| न समय पर गर्मी का मौसम शुरू हो पाता है न समय पर बारिश हो रही है और न ही समय पर ठंड पड़ती है| कभी सारी धरती तेज चिलचिलाती धूप से तपती है, लू चलने लगती है जिसकी वजह से गर्मी में मारे सब का बुरा हाल होता है| पसीने और घमौरियों से परेशान हो जाते हैं| नदियां, नाले, तालाब, झरने आदि सब सुख जाते हैं, सूखा पड़ जाता है और पानी की एक-एक बूंद के लिए इंसान के साथ पशु-पक्षी भी तरस जाते हैं शहर में मनपा भी पानी की कटौती करने लग जाती है| जब तक बारिश नहीं होती तब गर्मी के मारे बहुत बुरा हाल होता है| जहां एक समय ऐसा होता है कि सब पहली बारिश की पहली ठंडी फुहार का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हैं| जब पहली फुहार बरसती है तो सब बड़ी खुशी से भीग कर आनंद लेते हैं| कभी-कभी अतिवृष्टि होती है जिसमें बाढ़ आ जाती है और सब कुछ अपने साथ बहा ले जाती है| बारिश जब आ जाती है प्रलय का भयंकर रूप लेकर आ जाती है| यहां तक कि शहरों में लोगों का आना-जाना रुक जाता है| न ट्रेन चल पाती है, न बस| यातायात के कई साधन हैं पर सब के सब बेकार हो जाते हैं| या तो घर से बाहर निकल नहीं पाते या जो निकले हैं वे घर भी पहुंच नहीं पाते हैं|

ये सब तो होता है साथ में कई नई बीमारियां भी आ गई हैं| जाने कैसी – कैसी नई बीमारियां आ गई हैं| जिनके नाम पहले कभी सुने न होंगे ऐसी बीमारियां फैल रही हैं- जैसे डेंगू ,चिकनगुनिया, वायरल फीवर आदि| बीमारी से पूरा वातावरण दूषित हो जाता है| जो शारीरिक दृष्टि से हानिकारक है ही पर मानसिक दृष्टि से भी घातक है| कभी-कभी तो बेमौसम बारिश होती है| इससे फसलों का बहुत नुकसान होता है| जंगल हमारे लिए प्रकृति का दिया हुआ वरदान है| यह जंगली जानवरों का निवास स्थान हैं| एक जंगल में कई तरह के जंगली जानवर, पशु-पक्षी पाए जाते हैं| जंगल के पेड़-पौधों की जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जमी होती हैं| इसमें पानी के प्रवाह को कुछ हद तक रोकने की शक्ति भी होती है| यह पानी के बहाव को नियंत्रित करती है और पानी एकसाथ कई हिस्सों में बंट कर बहता है जिससे जंगलों को कुदरती तौर पर पानी मिलता है जो पेड़-पौधों के लिए बहुत जरुरी होने के साथ-साथ उनको हराभरा रखने में बहुत सहायक होता है|

जंगलों में कहीं-कहीं उपयोगी वनस्पति भी, कई औषधीय जड़ी-बूटियां भी पाई जाती हैं जिनका उपयोग विभिन्न रोगों के इलाज के लिए किया जाता है| आयुर्वेद में औषधीय जडीबूटियों का प्रमुख स्थान है, जो जंगल में ही मिलती हैं| इनके महत्व को वहीं जान पाते हैं जो इनकी जानकारी रखते हैं| आम लोग इसे सिर्फ घासफूस ही समझते हैं| पर इनसे बनी दवाइयां बहुत असरदार होती हैं और रोगनिवारक होती हैं| जंगल के कटने से सभी पक्षी और प्राणी बेघर हो गए हैं| यह सब जंगलोंके कटनेके दुष्परिणाम ही तो हैं|

शहरों में जहां कारखानें बहुत हैं, कई बड़ी-बड़ी चिमनियां है जिनमें से हमेशा धुआं निकलता रहता है| वह हवा में घुल कर पूरे वातावरण को दूषित करता है और बदबू भी फैलाता है| परंतु जंगल और पेड़-पौधों के कारण उसका कोई बुरा असर हम पर नहीं पड़ता है क्योंकि ये दिनभर प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन छोड़ता है और दूषित हवा यानी कार्बन डाइऑक्साइड को शोषित करके पर्यावरण को शुध्द रखता है| चूंकि रात में इनको प्राणवायु की जरुरत होती तब उसे लेकर ये कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं| ये पेड़-पौधें जंगलों की वजह से हैं| अगर जंगल नहीं होंगे तो पेड़-पौधें भी नहीं रहेंगे| हमें यह प्राणवायु देकर हमें जीवन देने वाले ये जंगल और पेड़-पौधें हम पर कितना उपकार करते हैं | पर हम मानव कितने एहसानफरामोश हैं जो इनकी न कद्र करते हैं और न इस अनमोल संपत्ति के मोल को समझते हैं और बड़ी बेरहमी से इन्हें काटते जा रहे हैं| काश! जिस तरह ये भी सांस लेते हैं उसी तरह बोल पाते या वे खुद अपनी रक्षा कर पाते तो कितना अच्छा होता| पर अफसोस कि ऐसा नहीं हो सकता है| इसलिए अब यह हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि जो ‘जंगलधन’ चला गया है उसका अफसोस मनाने के बजाय जो कुछ बचा है उसे संभला जाए| एक जंगल बनने में कई साल लग जाते हैं| अतः अपनी ओर से पौंधे जरूर लगा सकते हैं| सड़कों के किनारे अगर छांवदार वृक्षों के पौधें लगाए जाए तो कुछ सालों बाद हमें ठंडी छांव जरूर दे सकते हैं| आम के पौधें लगाए तो जैसे कि कहावत है ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ यथार्थ में बदल सकती है| खाने को आम भी मिलेंगे और कड़ी धूप में छांव भी मिल सकेगी| इसलिए नए वर्ष की शुरूआत एक नया पौधा लगा कर की जाए तो बेहतर होगा| इसलिए हमें ‘पौधा लगाओ, हरियाली बचाओ’ नारे पर अमल करना होगा|

 

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