जयंती विशेष: पल्टू शेख जिसकी वजह से मंगल पांडे को हुई थी फांसी

पल्टू शेख जिसकी वजह से मंगल पांडे को हुई थी फांसी

देश की आजादी के इतिहास को जब भी पढ़ा जाता है तब मंगल पांडेय नाम सुनहरे अक्षरों में नजर आता है। वह देश के ऐसे योद्धा थे जिन्होने लोगों को गुलामी से हट कर कुछ सोचना सिखाया और लोगों के मन में स्वतंत्रता की आग पैदा की हालांकि उन्हें इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी लेकिन वह देश के लोगों के दिलों में आज भी जिंदा हैं। मंगल पांडेय का जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ था उनके पिता का नाम दिवाकर पांडेय और माता का नाम आभारानी पांडेय था। मंगल पांडेय बचपन से ही होशियार थे जिसकी वजह से वह मात्र 18 साल की उम्र में ही अंग्रेजी सेना में भर्ती हो गये लेकिन वह जिस अंग्रेजी में भर्ती हुए थे उसके लिए ही वह काल बना जायेगें यह खुद ईस्ट इंडिया कंपनी को भी नहीं पता था।

ईस्ट इंडिया कंपनी में बतौर सैनिक होने के बाद भी उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ आवाज उठाई और उनका विरोध किया क्योंकि उन्होने देखा कि अंग्रेज भारतीयों के साथ बहुत ही बुरा बर्ताव कर रहे है जिसके बाद उनका मन बदला और उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया। 29 मार्च 1857 को उन्होंने बैरकपुर में दो अंग्रेज अधिकारियों पर हमला भी कर दिया। मंगल पांडेय कलकत्ता की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री की पैदल सेना में सिपाही थे। अंग्रेजी अफसरों पर गोली चलाने के आरोप में उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में फांसी दे दी गयी। मंगल पांडे ने गाय की चर्बी से बनी कारतूस के इस्तेमाल का भी विरोध किया था जिसके लिए उन्हें अंग्रेजी हुकूमत के गुस्से का शिकार होना पड़ा।

पल्टू शेख जिसकी वजह से मंगल पांडे को हुई थी फांसी

इस घटना को लेकर यह भी तथ्य है कि जब मंगल पांडेय ने अंग्रेजी अफसरों पर हमला किया तब किसी ने भी उनके खिलाफ गवाही नहीं दी थी सिर्फ अंग्रेजी सेना में शामिल पल्टू शेख ने मंगल पांडेय के खिलाफ गवाही दी जिसकी वजह से पांडे को फांसी की सजा हुई। मंगल पांडे जब अंग्रेजों पर हमला कर रहे थे तब भी पल्टू शेख ने उन्हे रोका था और अंग्रेजों की नजर में ईमानदार छवि बनाने का प्रयास किया था। हालांकि पल्टू शेख को इसकी सजा भुगतनी पड़ी और मंगल पांडे की फांसी के बाद लोगों ने उसे गद्दार करार दिया और एक भीड़ ने उसे पीट पीट कर मार डाला। मंगल पांडे को फांसी की सजा हुई लेकिन देश में बढ़ते विरोध के चलते अंग्रेजों ने उन्हें तय समय से करीब 10 दिन पहले ही फांसी दे दी। मंगल पांडे को 18 अप्रैल 1857 को फांसी देना निश्चित हुआ था लेकिन अंग्रेजी सरकार पर बढ़ते दबाव के चलते उन्होंने 8 अप्रैल को ही मंगल पांडे को फांसी दे दिया। मंगल पांडेय की वीरता और देशभक्ति को देखते हुए तमाम जल्लादों ने उन्हे फांसी देने से मना कर दिया था जिससे अंग्रेजी सरकार की चिंता बढ़ गयी थी लेकिन बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने कलकत्ता से जल्लादों को बुलाया और उन्होंने मंगल पांडे को फांसी दी। भारत सरकार ने उस जगह को बाद में मंगल उद्यान के नाम से प्रचलित किया जिसे देखने के लिए अब वहां लोगों की भीड़ इकट्ठा होती है।

देश को आजाद कराने के लिए मंगल पांडे का प्रयास सराहनीय रहा है और उन्होंने समय समय पर कई नारे भी दिये जिसमें “मारो फिरंगी को” सबसे अधिक प्रचलित हुआ था। मंगल पांडे को देश का सबसे पहला क्रांतिकारी भी माना जाता है उन्होंने देश के लोगों को गुलामी की जंजीर तोड़ने का सपना दिखाया और सभी को अंग्रेजों का विरोध करने के लिए कहा। भारत सरकार की तरफ से सन 1984 में मंगल पांडे की स्मृति में डाक टिकट जारी किया गया था।

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