महात्मा बसवेश्वर के क्रांतिकारी सुधार

12हवीं शताब्दी में कर्नाटक में महात्मा बसवेश्वर हुए, जो एक क्रांतिकारी विचारों वाले संत, कवि एवं समाज सुधारक के रूप में विख्यात हुए। अक्षय तृतीया का दिवस, उनका जयंती दिवस है। इस अवसर पर प्रस्तुत है संत बसवेश्वर द्वारा किए गए सुधार कार्यों का पुण्यस्मरण…

भारत देश संत-महात्माओं का देश है। दीर्घ काल से चली आ रही संत परंपरा, हमारे देश की आध्यात्मिक संपन्नता का प्रतीक है। संतों के कार्यों का मुख्य उद्देश्य भले ही धार्मिक रहा हो किंतु उन्होंने साहित्य, धर्म एवं समाज के सुधार में अपना अमूल्य योगदान दिया है। भारत के विभिन्न राज्यों में संत महात्माओं द्वारा उदात्त एवं व्यापक दृष्टिकोण से किया गया कार्य, किसी धर्म या जाति विशेष तक सीमित न रहकर संपूर्ण मानव जाति के लिए प्रेरक सिद्ध हुआ है।

संतों का जनजागरण

विभिन्न राज्यों के कई संतों ने समय-समय पर समाज को जागृत करने का काम किया है। साहित्य एवं उपदेशों के माध्यम से उन्होंने शाश्वत सत्य का प्रतिपादन करते हुए समाज को अच्छाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। समाज की इस जागृति के लिए उनका जितना आभार माना जाए उतना कम है। ऐसे ही एक संत, महात्मा बसवेश्वर के चरण कमलों से, कर्नाटक की भूमि पवित्र हुई है। समाज में समता स्थापित करने के लिए महात्मा बसवेश्वर द्वारा किए गए सुधार न केवल भारतवर्ष अपितु समस्त विश्व के समाज सुधारकों एवं प्रगतिशील विचारधारा के कार्यकर्ताओं के लिए के प्रकाश स्तंभ के समान पथ प्रदर्शक साबित हुए हैं।

कोई भी महापुरुष, संत या महात्मा भले ही किसी भी परिवार, किसी भी भाषाई समाज या जाति में जन्म ले; उसके कार्य अंततः समस्त समाज के हितों को साधने वाले साबित होते हैं। इसी तरह, महात्मा बसवेश्वर ने कर्नाटक राज्य के कन्नड़ भाषी ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया था। इसके बावजूद उनका विशाल, व्यापक एवं उदात्त मानवतावादी दृष्टिकोण तथा समता की स्थापना हेतु सर्व समावेशी कार्यों को देखते हुए ज्ञात होता है मानों, उनके द्वारा किए गए कार्यों पर न राज्य, न भाषा और न ही जाति-वर्ण के बंधन हैं। महात्मा बसवेश्वर के कार्य भाषा, सीमा एवं काल के परे हैं। इसी कारण आज 800 वर्ष बाद भी, वे संसार के समाज सुधारकों के लिए वंदनीय एवं अनुकरणीय हैं।

उनके द्वारा किए गए समस्त कार्यों का निचोड़, भले ही समाज में समता स्थापित करना हो लेकिन उसका मूलाधार दया था। अस्पृश्यता का संबंध जाति से न जोड़ते हुए, सभी वर्णों के लोगों के दुराचार से जोड़ कर उन्होंने समाज में अपनी प्रथम क्रांति का सूत्रपात किया। महात्मा बसवेश्वर के इन विचारों से महात्मा गांधी भावविभोर हो गए थे। उन्होंने संकल्प लिया था, महात्मा बसवेश्वर के अधूरे मानवतावादी कार्यों को अब मुझे पूर्ण करना है। केवल महात्मा गांधी ही नहीं बल्कि मार्क्सवादी विचारधारा के मानवेंद्र राय, महान स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण, महान विचारक आचार्य विनोबा भावे भी महाराज बसवेश्वर के विचारों एवं कार्यों से बहुत प्रभावित हुए थे। इतना ही नहीं, ऑर्थर माइल्स, सर जेम्स कैंबेल, जॉन रसेल आदि विश्वविख्यात विचारकों ने भी बसवेश्वर के क्रांतिकारी विचारों एवं कार्यों की स्तुति की है। महात्मा बसवेश्वर केवल दर्शन की कोरी बातें करने वाले धर्म प्रचारक नहीं बल्कि एक कर्मशील समाज एवं धर्म सुधारक थे। जाति, वर्ण, कर्मकांड, शुद्र देवता पूजन, अनेक देवताओं के पूजन के विरुद्ध उन्होंने सक्रिय संघर्ष किया। यही नहीं, उन्होंने स्त्री-पुरुष समानता एवं अछूतों को सवर्णों की बराबरी का स्थान देकर समता की स्थापना करने वाले समाज के निर्माण के लिए अथक प्रयास किए। महात्मा बसवेश्वर द्वारा किए जा रहे कई सुधार, आज किए जा रहे सुधारों की नींव साबित हुए हैं। भारतीय संविधान में समता का जो सूत्र है वह महाराज बसवेश्वर द्वारा शुरू किए गए कार्यों का ही परिणाम है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की गहन विद्वत्ता तथा भारतीय संविधान में समता के सूत्र की स्थापना में, महात्मा बसवेश्वर के वचन साहित्य का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।

जन्म, बाल्यकाल एवं शिक्षा

महात्मा बसवेश्वर की जीवनी के बारे में मतभिन्नता है। ’बसव पुराण’, ’बसवराज देवर रंगले’ आदि ग्रंथ, बसवेश्वर की जीवनी वर्णित करने वाले मुख्य स्रोत माने जाते हैं। बसवेश्वर का जन्म ईसवी सन 1105 (कुछ लोगों के मतानुसार 1131) में अक्षय तृतीया के दिन हुआ था। कर्नाटक राज्य में बीजापुर जिले में स्थित बागेवाड़ी नामक गांव में उनका जन्म हुआ था। बसवेश्वर के पिता ’मादिराज’ गांव के मुख्य अग्रहार (याने राज्य की ओर से, ब्राह्मण या मंदिर को निर्वाह के लिए मिलने वाला भूमिदान) प्राप्तकर्ता थे। बसवेश्वर की माता का नाम ’मादलांबा’ था। उनके धर्म परायण एवं संस्कारी ब्राह्मण परिवार को, गांव में विशेष स्थान एवं सम्मान प्राप्त था। भगवान शिव के उपासक उनके माता-पिता ने, शिव के वाहन वृषभ/ नंदी/ नंदीकेश्वर के नाम पर अपने पुत्र का नाम ’बसव’ (वृषभ) रखा था। एक आख्यायिका के अनुसार स्वयं भगवान शिव शंकर की आज्ञा से, उनके वाहन नंदी ने शिव भक्तों- मादिराज एवं मादलांबा के घर में अवतार लिया था। इसलिए बालक का नाम ’वृषभ’ (संस्कृत) या ’बसव’ (कन्नड़) रखा गया। इसका उल्लेख ’बसव पुराण’ नामक ग्रंथ में मिलता है।

महान कार्य

महानुभव पंथ के संस्थापक चक्रधर स्वामी, वारकरी संप्रदाय की नींव रखने वाले संत ज्ञानेश्वर, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक, वर्धमान महावीर, गौतम बुद्ध जैसे महापुरुषों की तरह ही महात्मा बसवेश्वर को भी भारतीय संत समूह में सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। जिस तरह सिख धर्म के लिए ’गुरु ग्रंथ साहिब’, वारकरियों के लिए ’ज्ञानेश्वरी, तुकाराम गाथा’, हिंदी भाषियों के लिए ’तुलसी रामचरित मानस’ एवं  ’कबीर के दोहे’ असाधारण महत्व रखते हैं; वही महत्व दक्षिण भारत में महात्मा बसवेश्वर के वचन साहित्य को प्राप्त है।

कुछ लोग, वीरशैव लिंगायत धर्म के संस्थापक के रूप में महात्मा बसवेश्वर की स्तुति करते हैं लेकिन इसमें कोई तथ्य नहीं है। वीरशैव लिंगायत धर्म बहुत प्राचीन है। 27 आगम 205 उपागम एवं सिद्धांत शिरोमणि जैसे ग्रंथ वीरशैव साहित्य बसवेश्वर से शतकों पूर्व के हैं। महात्मा बसवेश्वर ने पुराने हो चुके उन धर्म मतों को संजीवनी प्रदान की और उनकी पुनर्स्थापना की। 16हवें शतक में महाराष्ट्र में वीरशैव संत मन्मथ स्वामी हुए थे। वे बसवेश्वर के कार्यों की स्तुति करते हुए कहते हैं..

धर्म वीरशैव रसातली जाता।

झाला बसव शिवरूपी त्राता॥

(अर्थात, जब वीरशैव पंथ रसातल में जा रहा था, तब बसव ने उसकी पुनर्स्थापना की।)

कई संत कवियों ने विभिन्न तरह से उनकी ऐसी ही स्तुति की है।

गुरुदेव डॉक्टर रा.द. रानडे, म.गो. रानडे जैसे महान ज्ञाता एवं दार्शनिकों, विचारकों ने भी महात्मा बसवेश्वर के सुधारों एवं वचन साहित्य की स्तुति की है। माना जाता है कि महात्मा बसवेश्वर को साक्षात ईश्वर दर्शन हुए थे। वे क्रांतिकारी कवि एवं कर्मशील समाज सुधारक भी थे। बिज्जल राज दरबार में कर्णिक (मुंशी) से लेकर महामंत्री तक के उनके कार्यों का आलेख, पुरुषार्थ एवं उन्नति का आदर्श उदाहरण है। उत्कर्ष/आरंभ एवं मोक्ष- दोनों ही मार्गों के बारे में अपनी कर्मशीलता से उपदेश देने वाले बसवेश्वर एक विश्व मानव थे। उनके कार्य एवं उपदेश- प्रांत, भाषा एवं काल की सीमा से परे हैं। इसी कारण एक ओर महात्मा बसवेश्वर, विश्वात्मा के रूप में तो दूसरी ओर एक विश्व विजेता के रूप में एक महान विभूति हैं। वे एक प्रकाश स्तंभ की भांति, संपूर्ण मानव जाति की राह आलोकित कर रहे हैं।

 

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