महात्मा ज्योतिबा फुले क्रांतिकारी समाज सुधारक

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19 वीं शताब्दी के प्रबोधनकाल के अधिकांश समाजसुधारक उच्चवर्णीय थे तथा उनके सुधार का विषय सफेदपोश शहरी थे। इस पार्श्वभूमि में महात्मा ज्योतिबा फुले बहुजन, दलित, किसान की उन्नति के लिए वातावरण निर्माण करने वाले बहुजन समाज के पहले समाज सुधारक, वैचारिक लेखक थे। भारत में स्त्री शिक्षा की नींव इन्होंने ही रखी, उनके शैक्षणिक विचारों तथा कार्यों का स्वयं ब्रिटिश लोगों ने खुला सम्मान किया था। महात्मा फुले के पूरे कार्य में उनकी पत्नी सावित्री बाई का बहुमूल्य योगदान रहा है।

कृष्णं वंदे जगद्गुरूम्

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जिन्हें भारतीय जीवन मूल्य एवं विचार दर्शन का पूर्ण रूप से आकलन करना है उनके लिए पूर्णावतार श्रीकृष्ण का चरित्र एवं विचार दीपस्तंभ की तरह हैं। विश्ववंद्य भगवद् गीता का उद्गाता, महाभारत के अधिनायक भगवान श्रीकृष्ण याने धर्माधिष्ठित समाज नीति एवं राजनीति का सुंदर संगम है।

राष्ट्रीय संत नामदेव

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नामदेव महाराष्ट्र के पहले ऐसे संत हैं जिन्होंने विट्ठल नाम भक्ति का परचम महाराष्ट्र से बाहर भी फहराया। गुजरात, राजस्थान होते हुए पंजाब तक पहुंच कर संत नामदेव ने जो भी कार्य किया उसे महान राष्ट्रीय कार्य ही कहा जा सकता है। सिक्खों के धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ स

राष्ट्र संत तुकडोजी की ग्रामोदय संकल्पना

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 २०वीं सदी में महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में जन्मे राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज ने ग्राम सुधार, ग्राम विकास, ग्रामोद्योग एंव ग्रामोध्दार का समग्र रूप से सविस्तर विचार किया है| पराधीन एवं स्वाधीन भारत में उनके ग्रामोद्धार कार्यों का कोई सानी नहीं है| उनकी ‘ग्रामगीता’ आज भी ग्रामोदय का ब्लू प्रिंट मानी जाती है| ‘ग्रामगीता’ ग्रामीण कार्यकर्ताओं की ‘भगवद् गीता’ ही है|

राष्ट्रीय कार्य को आध्यात्मिक अधिष्ठान देने वाला ग्रंथ- गीता रहस्य

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लोकमान्य तिलक मानते थे कि भारतीयों की अकर्मण्यता ही उनकी अवनति का कारण बनी। उस अकर्मण्यता को केवल पुरुषार्थी कर्मयोग ही दूर कर सकता है। ज्ञानी पुरुषों को विरक्त होकर कर्म संन्यासी होने के बजाय ज्ञानयुक्त पुरुषार्थमय जीवन जीना चाहिए। लोकमान्य ने ‘गीता रहस्य’ में यही सीख दी, जो अंग्रेजी दासता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए बहुत आवश्यक भी था।

नगालैण्ड के अनुभव

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नगालैण्ड जैसे दुर्गम परिसर, विविधता से भरे ईसाई बहुल राज्य में ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के कार्य की नींव डालने का सौभाग्य विद्याधर ताठे को मिला। श्री ताठे ‘एकता’ मासिक पत्रिका के सम्पादक, साप्ताहिक विवेक के पूर्व प्रतिनिधि हैं। वर्ष १९८० से १९८३ के दरमियान की उनकी कुछ यादें और कुछ अनुभव प्रस्तुत है उनकी ही जुबानी।

भक्ति पीठ पंढरपुर का अनोखा महाकुंभ

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महाराष्ट्र की परम पावन भूमि पर मध्ययुग के कालखंड में अनेक धर्म-सम्प्रदायों का उदय हुआ, तथा सभी एक भाव के साथ पल्लवित हुए। उसमें नाथ सम्प्रदाय, महानुभव सम्प्रदाय, तथा वारकरी सम्प्रदाय, १२हवीं- १३हवीं शताब्दी के पुरातन सम्प्रदाय हैं।

काशी विश्वनाथ का महत्व

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खाक भी जिस जमीं की पारस है,शहर मशहूर वह बनारस है । ‘श्री काशी’, ‘वाराणसी’,‘बनारस’,‘मोक्ष नगरी’,‘मुक्ति क्षेत्र’ इत्यादि नामों से जग विख्यात परम पावन पुण्य नगरी है काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग क्षेत्र।

महाराष्ट का सांस्कृतिक वैभव पंढरपुर की ‘वारी’

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‘वारी’ यानी पैदल यात्रा। पंढरपुर तीर्थक्षेत्र। पंढरपुर की ‘वारी’ महाराष्ट्र का सांस्कृतिक वैभव और पारमार्थिक ऐश्वर्य है। इस ‘वारी’ की प्राचीन परम्परा व इतिहास है। पंढरपुर की ‘वारी’ का जिक्र चौथी और पांचवीं सदी में मिले ताम्रपटों में मिलता है।

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