खुली हवा से अंधेरी सुरंग में लौटता अफगानिस्तान

लगभग दो दशकों तक अपनी सेनाओं के जरिए अफगानिस्तान में तालिबान आतंकियों को काबू में रखने के बाद जब अमेरिका ने वहां से अपने सैनिकों की निकासी शुरू की थी तभी से यह आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं कि समूचे  अफगानिस्तान पर  दुबारा तालिबान का कब्जा होने में अब ज्यादा देर नहीं लगेगी।  वे सारी आशंकाएं अब सच साबित हो चुकी हैं। तालिबान तो अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान छोड़ने की बेसब्री से प्रतीक्षा ही कर रहे थे। उधर अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान छोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ और इधर तालिबान ने देश में अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। दरअसल उन्होंने इसके लिए पहले से पूरी तैयारी कर रखी थी। अमेरिका समर्थित  अफगानिस्तान सरकार के साथ तालिबान ने जो समझौता किया था उसको उन्होंने ताक पर रख दिया है ।

अगर तालिबान ने उस समझौते की शर्तों पर अमल किया होता तो अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी शायद अपने पलायन नहीं करते और अफगान सेनाएं  तालिबान से लड़े बिना ही आत्म समर्पण नहीं करती। वैसे भी जिस देश का राष्ट्रपति ही आतंकियों के डर से देश छोड़कर भाग जाए उस देश के सुरक्षा बलों से अपना मनोबल बनाए रखने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।  अब अफगानिस्तान के भगोड़े राष्ट्रपति अशरफ गनी खान यह सफाई दे रहे हैं कि वे अगर अफगानिस्तान नहीं छोड़ते तो तालिबान काबुल में खून की नदियां बहा देते और लाखों निर्दोष लोगों की जान चली जाती।

इसमें दो राय नहीं हो सकती कि अशरफ गनी गनी खान वास्तव में अपनी जान बचाने के लिए अपना देश छोड़कर भागे हैं , देश की जनता को तो उन्होंने तालिबान के रहमो-करम पर छोड़ दिया है जबकि उनसे अपेक्षा तो यह की जा रही थी कि संकट की इस घड़ी में वे देश में मौजूद रहकर  सरकारी सेनाओं और जनता का मनोबल  बढ़ाने की नैतिक जिम्मेदारी के निर्वहन को सर्वोपरि महत्व देंगे। यदि वे यह विकल्प चुनते तो शायद सरकारी सेना भी तालिबान से लडने  का साहस जुटा सकती थी और जनता भी उनके  समर्थन में उठ खड़ी होती परंतु उन्हें तोअपने प्राणों की चिंता सता रही थी।

अब्दुल गनी के भागने से सेना का मनोबल ऐसा टूटा कि  तीन लाख से अधिक सैनिकों ने अपने सारे हथियार और गोला-बारूद छोड़ कर सुरक्षित स्थानों में ठिकाना तलाश लिया लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि लड़ाई में काम आने वाले जो हथियार ,सैन्य उपकरण और गोला-बारूद उनके पास थे उन पर अब तालिबान का कब्जा हो चुका है। अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति ने जरूर कहा है कि वे तालिबान के डर से देश छोड़कर नहीं जाएंगे और तालिबान विरोधी गुटों के साथ मिलकर इस संकट का हल खोजने की भरपूर कोशिश करेंगे परंतु यह कहना मुश्किल है कि उन्हें अपने मिशन में कितनी सफलता मिलेगी क्योंकि तालिबान किसी भी हद तक जा सकते हैं।

अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से निकासी के  पूर्व तालिबान ने सरकार के साथ जो समझौता किया था उसकी शर्तों के अनुसार सत्ता में उनकी  भागीदारी और देश की जेलों में बंद हजारों तालिबान आतंकियों में से कुछ हजार  की रिहाई भी संभव हो सकती थी परंतु पूरे देश पर उनका कब्जा नहीं हो सकता था। अफगानिस्तान की जनता भी यही चाहती थी कि देश की  सत्ता तालिबान के साथ में न आने पावे लेकिन अमेरिकी ने वहां से अपनी सेनाओं को बाहर निकाल कर  तालिबान की मानों मुंह मांगी मुराद पूरी दी है । अब उन जेलों के दरवाज़े खोल दिए गए हैं जहां तालिबान आतंकियों को कैद कर रखा गया था।

अब सड़कों पर तालिबान गाडियां घूम रही हैं और लोगों में उनकी इतनी दहशत है कि वे अपने घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं। सबसे बुरी स्थिति तो महिलाओं की हो गई है जिन्हें अपनी जान से ज्यादा अपनी इज्जत आबरू की चिंता सता रही है। अफगानिस्तान में बुर्के की दुकानें फिर से खुलने लगी हैं क्योंकि महिलाओं को बिना बुर्के के घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं है। काबुल विमान तल पर तीन महिलाओं को इसलिए मौत के घाट उतार  दिया गया क्योंकि उन्होंने बुर्का नहीं पहना था । तालिबान के हाथ में सत्ता आते ही सबसे अधिक पाबंदियां महिलाओं पर ही थोपी गई हैं।  लड़कियों के स्कूल कालेज बंद हो चुके हैं। दफ्तरों में अब केवल पुरुष ही काम

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