जानिए, एयर इंडिया पर 6100 करोड़ का कर्ज कैसे हुआ?

टाटा ग्रुप ने एयर इंडिया विमान का सौदा तो कर लिया लेकिन सवाल यह है कि 61000 करोड़ के कर्जे वाले विमान को टाटा कैसे उड़ाएंगे और फिर उसे मुनाफे का सौदा बनाएंगे। टाटा ग्रुप नमक से लेकर बस तक सब कुछ बनाता है और उनके अधिकतर व्यापार फायदे में चलते रहते है लेकिन एयर इंडिया की डील उन्हें शायद परेशानी में डाल दे हालांकि यह हमारी सोच है जबकि टाटा के पास इसके लिए भी कुछ बेहतर प्लान जरुर होगा। टाटा ने एयर इंडिया की यह डील किसी प्लान के तहत ली है या फिर भावुकता की वजह से इसकी घर वापसी करवा ली है? कोई भी व्यापारी कभी घाटे का सौदा नहीं करता फिर जिस एयर इंडिया पर पहले से ही 61000 करोड़ का कर्ज है उसे खरीदने का साहस करना भी बहुत बड़ी बात है। 
 
1953 को टाटा की इसी एयरलाइंस को नेहरू सरकार ने अपने पास ले लिया था जिसके करीब 68 साल बाद 2021 में यह फिर से टाटा के पास पहुंच गई है लेकिन इन 68 सालों में एयरलाइंस पर 61000 हजार करोड़ का कर्ज बन गया। एयर इंडिया की नीलामी के लिए सरकार की तरफ से 12906 करोड़ का रिजर्व प्राइस रखा गया था जिस पर टाटा एंड संस और स्पाइस जेट के अजय सिंह ने बोली लगायी। टाटा ने 18000 करोड़ के साथ यह नीलामी अपने नाम कर ली। टाटा इस साल दिसंबर तक एयर इंडिया का 15300 करोड़ का कर्ज चुकाएगा और 2700 करोड़ रुपये सरकार को कैश में देगा और इसी के साथ एयर इंडिया में टाटा की हिस्सेदारी 100 फीसदी हो जाएगी। इस डील के साथ ही टाटा को 127 विमान, 4400 डोमेस्टिक पार्किंग, 1800 अंतरराष्ट्रीय पार्किंग, कार्गो सर्विस और ग्राउंड सर्विस में भी पूरा अधिकार मिल जायेगा। 
एयर इंडिया की नीलामी के दौरान सरकार की तरफ से कुछ शर्तें भी रखी गयी है जिसका टाटा को पालन करना होगा। डील के अगले 5 साल तक यह विमान कंपनी टाटा किसी और को नहीं बेच सकते है अगर 5 साल बाद उन्हें बेचना भी होगा तो वह किसी विदेशी को यह नहीं बेच सकते हैं। अगले 5 साल तक विमान का लोगो (LOGO) भी नहीं बदला जा सकता है और एक साल तक किसी कर्मचारी को नहीं निकाल सकते हैं। वहीं इस डील के बाद रतन टाटा काफी भावुक हुए और उन्हें एक मैसेज सभी से साझा किया।

अब अगर एयर इंडिया के पुराने दिनों पर नजर डालें तो पता चलता है कि 1960 में एयर इंडिया बोइंग विमान उड़ाने वाली एशिया की पहली एयरलाइंस थी। 1966 तक एयर इंडिया की हर दिन करीब 100 फ्लाइट्स उड़ने लगी थी और हर साल करीब 10 लाख यात्री यात्रा करने लगे थे। 1970 में 8.5 करोड़ विदेशी करेंसी में कमाई होने लगी थी। 1980 में एयर इंडिया को पहली बार 15 करोड़ का घाटा हुआ। 1993 में एयर इंडिया फिर फायदे में लौटी और 333 करोड़ का व्यापार किया लेकिन यही उसकी आखिरी फायदे वाली उड़ान थी। इसके बाद फायदा कम होता गया और कर्ज बढ़ता गया। कांग्रेस की मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल (2008) में एयर इंडिया पर 5500 से अधिक का कर्ज हो गया। एयर इंडिया के बढ़ते घाटे तो देखते हुए मनमोहन सरकार ने एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस को मर्ज करने का ऐलान किया हालांकि इसका विरोध दोनों एयरलाइन कंपनियों द्वारा किया गया लेकिन फिर भी मर्जर हुआ लेकिन इसमें कुल 4 साल का समय लग गया और इस दौरान एयर इंडिया का घाटा बहुत ही तेजी से बढ़ा।
एयर इंडिया का घाटा हर दिन बढ़ रहा था इसी दौरान उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल की तरफ से 111 नये विमान खरीदने का ऐलान किया गया और उसके लिए फिर से 67 करोड़ का कर्ज लिया गया। नये विमान खरीदने का फैसला पूरी तरह गलत रहा क्योंकि उस समय विमान की कुल कमाई 7 करोड़ थी ऐसे में 67 करोड़ का निवेश कहीं से भी उचित नहीं था। नये विमान की खरीद को लेकर प्रफुल पटेल पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे थे कि इस डील में उन्होंने कमीशन लिया था। प्रफुल पटेल ने जब उड्डयन मंत्री का पद संभाला था तब एयर इंडिया का बाजार में शेयर 42 प्रतिशत था लेकिन जब उन्होंने अपना पद छोड़ा तब एयर इंडिया पूरी तरह से कर्ज में डूब चुकी थी।
अब सवाल यह है कि टाटा एयर इंडिया को कैसे उड़ाएगा और फायदे में कैसे लाएगा। तो हम आपको बता दें कि टाटा के पास अभी दो विमान कंपनियों एयर एशिया और विस्तारा का काम है इसलिए एयर इंडिया को चलाना आसान होगा क्योंकि उनके पास कुछ प्लान है जिसके सहारे वह एयर इंडिया को भी फायदे का पंख लगा देंगे। इसके साथ ही सबसे बड़ा फायदा यह है कि एयर इंडिया अब निजी हाथों में है तो उसके फैसले पूरी तरह से पक्षपात पूर्ण होंगे जबकि सरकार के मंत्री कोई भी फैसला वोट के आधार पर करते हैं।

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