आखिर नाम बदलने पर विधवा विलाप क्यों …!!!

आप कभी न कभी दिल्ली के India Gate पर ज़रूर गये होंगे। दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के सामने एक सड़क है, जिसे राजपथ कहा जाता है। ये वही सड़क है जिस पर 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड होती है। इसी सड़क राजपथ पर ब्रिटिश सरकार ने 1921 में एक War Memorial बनाने का निर्णय किया, उन सैनिकों की याद में जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में अपने प्राण गवांए थे।
1921 में ये स्मारक बनना शुरू हुआ और 1931 में तत्कालीन वाइसराय Lord Irwin ने इसका उद्घाटन किया। इसमें उन 13,300 ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों के नाम खुदे हैं जो प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद हुये थे।
1936 में इंग्लैंड के राजा जॉर्ज पंचम जब इंतकाल फरमा गये तो तत्कालीन गुलाम ब्रिटिश इंडिया ने अपने राजा की याद में उनकी एक 70 फ़ीट ऊंची मूर्ति इसी India Gate पर स्थापित कर दी। एक गुलाम देश ने अपने विदेशी राजा की मूर्ति को अपना लिया।
1947 में हम आज़ाद हुये, आज़ाद हुये तो Viceroy House का नाम बदल के राष्ट्रपति भवन कर दिया, 
House of Parliament का नाम बदल कर संसद भवन कर दिया गया। उस भवन में जो Chamber of Princes था उसका नाम बदल कर Library Hall कर दिया गया, State Council का नाम बदल के राज्यसभा हो गया और Central Legislative Assembly लोकसभा बन गयी। ये सब बदलाव आज़ादी के बाद हुये। ज़ाहिर सी बात है इसके पीछे जो मंशा रही होगी वो गुलामी के इतिहास से पिंड छुड़ाने की रही होगी।
इतना सब कुछ बदल गया पर वो King George पंचम की 70 फ़ीट ऊंची मूर्ति वहीं लगी रही। 1947 से 1965 के काल में तत्कालीन समाजवादी सोसलिस्ट पार्टी के नेताओं ने बार बार देश में ये आवाज़ उठायी कि ये गुलामी का प्रतीक आज भी इस देश में क्यों कायम है, इसको हटाओ। कांग्रेसी नेहरू की सरकार थी लेकिन उन्होंने एक न सुनी। फिर एक दिन समाजवादी नेता George Fernandis साहब के कुछ समाजवादी शिष्यों ने 13 अगस्त 1965 को King George की उस झक्क सफेद संगेमरमर मूर्ति के चेहरे पर डामर पोत दिया और उसके नाक कान तोड़ दिये। और उस मूर्ति के बगल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक फोटो रख दी। सरकार ने किसी तरह वो डामर पुता काला चेहरा साफ कराया। लाल बहादुर शास्त्री जी की सरकार थी। निर्णय हुआ कि गुलामी के चिन्ह इस मूर्ति को वाकई हटाया जाये। 
ऐसा सिर्फ दिल्ली में ही नही हुआ। पूरे देश में जहां जहां भी ब्रिटिश गुलामी के निशान थे उन्हें एक एक कर मिटाया गया। जगहों और इमारतों के नाम बदले गये। मूर्तियां हटाई गयीं। आप यदि पटियाला के मोती बाग Palace चले जाएं तो महल के पिछवाड़े एक पार्क में Queen Elizabeth और King George के कई मूर्तियां खड़ी हैं जो कभी राजमहल के मुख्य लॉन और मुख्य द्वार पर शोभायमान थीं, पर 1947 में स्वतंत्रता के बाद उखाड़ कर फेंक दी गयी थी।
India Gate पर वो Canopy — छतरी जिसके नीचे  King George पंचम की मूर्ति थी, आज भी खड़ी है।
80 के दशक में वहां महात्मा गांधी की मूर्ति लगाने का एक प्रस्ताव संसद में विचाराधीन था जिस पर कोई निर्णय नही हुआ। मूर्ति विहीन वो छतरी आज भी सीना ताने खड़ी है।
अभी योगी जी ने फैज़ाबाद का नाम बदल कर अयोध्या कर दिया। इससे पहले इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज किया था। जिस पर सेक्युलर्स और लिबेरल्स का विधवा विलाप शुरू हो गया है।
अंग्रेजी गुलामी के निशान मिटाने वाले, इस्लामिक गुलामी को गंगा जमुनी तहजीब के नाम पर आखिर कैसे स्वीकार कर लेते हैं ??
मद्रास, कलकत्ता और बॉम्बे जब चेन्नई, कोलकाता और मुम्बई हो जाते हैं तो किसी सेक्युलर और लिबेरल्स की बवासीर नही उभरती, लेकिन इलाहाबाद और फैज़ाबाद का नाम बदलने पर उभर आती है आखिर क्यों ??
ब्रिटिश गुलामी से चिढ़ने वाले सेक्यूलर्स और लिबेरल्स को विदेशी आक्रांताओं की इस्लामिक गुलामी से इतना प्रेम है आखिर क्यों ??

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