सात अमर व्यक्तियों से सम्बद्ध विदेश नीति

डिप्लोमेसी याने राजनीतिक कूटनीतिज्ञता और धार्मिक मिथक इनका आपस में संबंध नहीं हो सकता, ऐसा अनेकों का मत है परंतु वस्तुस्थिति वैसी ना होकर यदि हम और अधिक गहराई में जाएं तो धार्मिक मिथक और विदेश नीति का गहराई से संबंध है, यह अपने ध्यान में आएगा।

बचपन में संघ शाखा में जब जाते थे’ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) तब प्रातः स्मरण में सात अमर व्यक्तियों का उल्लेख आता था। उनके नाम इस प्रकार – अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम। अमर का अर्थ जिसे मृत्यु नहीं वह। ये सात ही व्यक्ति हमारी श्रद्धा के अनुसार आज भी जीवित हैं। वे शारीरिक रूप से जीवित हैं या उनकी अलौकिक गुण संपदा के कारण जीवित है इस पर चर्चा हो सकती है।

इन सात अमर व्यक्तियों के संबंध में जानकारी बचपन में संघ शाखा में प्राप्त हुई। प्रत्येक का जीवन चरित्र संक्षेप में क्यों ना हो सुनने को मिला परंतु ये सातों ही व्यक्ति विदेश नीति के सात विषय हैं, ऐसा बचपन में किसी ने बताया होता तब वह बात समझ में नहीं आती और युवावस्था में यदि किसी ने बताया होता तो वह हास्यास्पद लगता। अब प्रौढ़ावस्था में ये सातों ही अमर व्यक्ति विदेश नीति के विषय हैं, ऐसा यदि कोई कहता है तो उस पर विचार करना पड़ेगा।

ऐसा प्रतिपादित करने का काम टी.पी. श्रीनिवासन ने अपनी पुस्तक ‘अप्लाईड डिप्लोमेसी’ (Applied Diplomacy) में किया है। टीपी श्रीनिवासन केरल के हैं। पढ़ाई समाप्त होने के बाद भारत की विदेश सेवा में उन्होंने 37 साल नौकरी की। अनेक देशों में वे भारत के राजदूत रहे। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के स्थाई प्रतिनिधि के रूप में तथा अंतरराष्ट्रीय एटॉमिक एनर्जी एजेंसी में वे भारत के गवर्नर रहे। फिजी, कीनिया, टोक्यो, मास्को, अमेरिका (न्यूयॉर्क) आदि देशों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। विदेश नीति का उनका अनुभव गहरा है। अप्लाईड डिप्लोमेसी इस पुस्तक में वह प्रत्येक पन्ने पर झलकता है।

पुस्तक की प्रस्तावना में उन्होंने संस्कृत भाषा में शाखा में कहा जाने वाला वह श्लोक, जिसमें यह सातों नाम आते हैं, दिया है। डिप्लोमेसी याने राजनीतिक कूटनीतिज्ञता और धार्मिक मिथक इनका आपस में संबंध नहीं हो सकता, ऐसा अनेकों का मत है परंतु वस्तुस्थिति वैसी ना होकर यदि हम और अधिक गहराई में जाएं तो धार्मिक मिथक और विदेश नीति का गहराई से संबंध है, यह अपने ध्यान में आएगा। उन्होंने महाबली हनुमान से प्रारंभ करके उसका अंत व्यास पर किया है। यह सात अमर व्यक्ति विदेश नीति के कौन से विषय स्पष्ट करते हैं यह श्री टी.पी. श्रीनिवासन ने किस प्रकार से प्रतिपादित किया है, देखें।

महाबली हनुमान का उल्लेख हनुमान: द मैस्कॉट ऑफ इंडियन फॉरेन सर्विस (Hanuman: the mascot of Indian Foreign Service)) ऐसा किया है। अर्थात भारतीय विदेश नीति के शुभंकर हनुमान हैं। हनुमान विश्व के पहले राजदूत हैं। श्री राम के राजदूत के रूप में वे लंका गए थे। राजदूत के रूप में उनका चुनाव करते समय श्रीराम ने उनमें सभी गुण देखे थे। वे इस प्रकार- हनुमान जी का भाषा पर जबरदस्त प्रभुत्व था। उनकी संवाद कुशलता जबरदस्त थी। उच्चारण स्पष्ट थे। संभाषण करते समय उनका चेहरा शांत रहता था। माथे पर लकीरें या भौंहें तान कर अथवा शरीर की अनावश्यक हलचल वे नहीं करते थे। बोलते समय वे एक भी अनावश्यक शब्द का उच्चार नहीं करते थे। अपनी बात संक्षेप में कहते थे। उनकी वाणी संयत रहती थी। यह सब वर्णन प्रभु राम ने किया है। विदेश में जाने वाले किसी भी राजनीतिज्ञ में ये सब गुण होना आवश्यक है। अनजाने प्रदेश में जाना है; वहां की भाषा, रीति रिवाज की पहचान नहीं होती, ऐसे वातावरण में राजनीतिज्ञ को अर्थपूर्ण संवाद करना पड़ता है। अपने देश का मत दूसरे देश को संयत भाषा में समझाना पड़ता है। हनुमान इन सब में कुशल थे। श्रीनिवासन की पुस्तक के पहले भाग में 7 प्रकरण हैं और इन सातों प्रकरणों में उन्होंने वर्तमान समय की विदेश नीति के महत्वपूर्ण विषय स्पर्श किए हैं। श्रीनिवासन ने हनुमान जी के इन गुणों को अंगीकार करते हुए स्वतः किस प्रकार समस्याओं का सामना किया, उसका अनुभव कथन उन्होंने किया है।

हनुमान जी के बाद विभीषण का दूसरे क्रमांक पर उल्लेख किया है। उस पर दूसरा अध्याय है। उसका शीर्षक है,Vibhishana: India in a tough neighbourhood, मुश्किल पड़ोसियों के बीच भारत। विभीषण रावण का भाई था। असुरों में भी वह देव था। सत्य धर्म का पालन करने वाला था और उसके लिए उसने अपने भाई का भी त्याग कर दिया। श्री राम की रावण पर विजय के बाद श्री लंका में विभीषण का राज्याभिषेक किया गया। भारत की विदेश नीति का तत्व धर्म और सत्य पर आधारित है। हमने अहिंसा को स्वीकार किया है। विभीषण जिन तत्वों के साथ था वे ही ये तत्व हैं। हनुमान के साथ संवाद करते हुए विभीषण कहता है कि जीभ जैसे तीक्ष्ण दातों से घिरी रहती है, वैसी ही मेरी अवस्था है। मेरे आस-पास के लोग दुष्ट हेतु से प्रेरित हैं। टी.पी. श्रीनिवासन कहते हैं कि भारत का भूराजनीतिक दर्द भी ऐसा ही है, यद्यपि भारत शांति के मार्ग पर चलने वाला देश है तथापि उसके पड़ोसी वैसे नहीं हैं।

हनुमान ने विभीषण को उत्तर दिया कि पहले जीभ का उद्गम होता है फिर दांत आते हैं। जीभ अंत तक रहती है, काल की गति में दांत गिर जाते हैं। अर्थात सत्य धर्म पर चलने वाला अंत तक टिका रहता है और दुष्ट लोग काल के प्रवाह में समाप्त हो जाते हैं। जैसे विभीषण अकेला था वैसे ही भारत से शत्रुता रखने वाले देशों में भारत भी अकेला है। चीन और पाकिस्तान ये दो शत्रु देश सतत संकट निर्माण करते रहते हैं और ऐसे प्रकरणों में भारत इन उद्दंड पड़ोसियों से किस प्रकार व्यवहार कर रहा है यह विशद किया है। बहुध्रुवीय देश, एशिया पेसिफिक राजनीति, ऐसे अनेक विषयों को श्री श्रीनिवासन ने स्पर्श किया है। इस विभाग में भी 7 प्रकरण हैं। विभीषण का एक अनुभव यहां बताने लायक है। अशोक वाटिका का विध्वंस करने के बाद हनुमानजी को कैद किया जाता है और रावण के मन में हनुमान का वध करने का विचार आता है। तब विभीषण उसको कहता है कि ऐसा करना राज धर्म के विरुद्ध है। राजदूत को अभय दान होता है, उसे कैद नहीं किया जा सकता और उसका वध भी नहीं किया जा सकता। राजदूतों के विषय में इस नियम का पालन विश्व में आज भी पूरी तरह किया जाता है। रामायण का कालखंड हजारों वर्ष पूर्व का है। उस समय भी हमारी विदेश नीति कितनी परिपक्व थी इसका यह उदाहरण है।

अमर व्यक्तियों में तीसरे अमर व्यक्ति हैं, अश्वत्थामा। अश्वत्थामा याने आज का अमेरिका, ऐसा टी.पी. श्रीनिवासन का मत है। अश्वत्थामा द्रोणाचार्य का पुत्र है। उसे अमरता का वरदान प्राप्त है। उसे ब्रह्मास्त्र विद्या का ज्ञान था। सभी कौरव सेनापति और कौरवों की मृत्यु के बाद वह रात के समय पांडवों की छावनी में घुसा और उसने द्रोपदी के पांचों ही पुत्रों को मार डाला। अन्य सभी योद्धाओं को भी मार डाला। अंत में उसने ब्रह्मास्त्र छोड़ा। वह ब्रह्मास्त्र संपूर्ण विश्व का विनाश कर देगा यह जानकर सभी देवों ने हाथ जोड़कर ब्रह्मास्त्र को वापस लेने की प्रार्थना की। ब्रह्मास्त्र को वापस लेने की विद्या उसके पास नहीं थी इसलिए उसने पांडवों का एकमात्र वंशज जो उत्तरा के गर्भ में पल रहा था, की ओर ब्रह्मास्त्र को मोड़ दिया, ऐसी यह कहानी है।

श्री कृष्ण ने उसकी भर्त्सना की। उस के कपाल पर का मणि निकाल लिया। उसके कपाल पर गहरा घाव हो गया। उससे सतत खून बहने लगा। श्री कृष्ण ने उसको शाप दिया कि इसी अवस्था में तुम संसार में विचरण करते रहोगे। टी.पी. श्रीनिवासन अश्वत्थामा की तुलना आज के सुपर पावर अमेरिका से करते हैं। विश्व के अधिकतर युद्धों में अमेरिका का सहभाग होता है। शस्त्र सामर्थ्य का भी अमेरिका को बहुत ज्यादा घमंड है। हिरोशिमा और नागासाकी पर आज के समय का ब्रह्मास्त्र याने अणुबम का वर्षाव अमेरिका ने ही किया था। मानवी संहार का यह घाव विश्व के लिए अश्वत्थामा के घाव जैसा ही है। ऐसे अश्वत्थामा रूपी अमेरिका से भारत को कैसे संबंध रखने पड़ते हैं, इस विभाग के सात लेखों में श्री श्रीनिवासन ने स्पष्ट किया है।

अश्वत्थामा के बाद अमर पुरुष परशुराम आते हैं। अध्याय का शीर्षक है,Parshuram: weapons of War and Pea, परशुराम को श्री विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उस समय उन्होंने 6 बार, जुल्म करने वाले क्षत्रिय राजाओं का वध किया था। वे जन्म से ब्राह्मण थे परंतु वृत्ति से क्षत्रिय थे इसलिए उन्हें ब्रह्मक्षत्रीय कहा जाता है। श्रीनिवासन उनकी तुलना भारत से करते हैं। भारत यह शांतिप्रिय और अहिंसा पर विश्वास रखने वाला देश है। भारत ने अणु बम का निर्माण किया है परंतु प्रतिरोध इतना ही उसका अर्थ है। दूसरा अणु बम का प्रयोग ना करें इसका डर निर्माण करने के लिए भारत ने अणुबम की निर्मिति की है। सामने वाले द्वारा शस्त्र उठाने को बाध्य किए बिना शस्त्र नहीं उठाना, यह परशुराम की नीति थी, उसे ही भारत ने स्वीकार किया है। परशुराम का अवतार कार्य सभी प्रकार के शस्त्र धारण करने के बावजूद विश्व में शांति और अहिंसक वृत्ति निर्माण हो इसके लिए था।

टी.पी. श्रीनिवासन ने इस विभाग के 7 प्रकरणों में भारत की परमाणु नीति का लेखा जोखा प्रस्तुत किया है। उसमें शांति के लिए और प्रतिरोध के लिए अणुबम का प्रयोग और अणु बम का प्रथम उपयोग ना करने की नीति आदि विषयों को स्पर्श किया गया है। परमाणु संयंत्रों से तैयार होने वाली बिजली सस्ती होने के बावजूद परमाणु भट्टियां अत्यंत खतरनाक होती है। फुकोशिमा और चेर्नोबिल की दुर्घटनाओं का हवाला देते हुए अणुभट्टियां किस प्रकार खतरनाक होती हैं, यह बताने का उन्होंने प्रयत्न किया है।

कृपाचार्य उसके बाद के चिरंजीवी व्यक्ति हैं। वे कौरव और पांडव दोनों के कुल गुरु थे। वे सत्यवादी थे। अपना कर्तव्य करने पर वे दृढ़ थे। कौरव पांडवों के युद्ध में बहुत हिंसा होगी, किसी का भी लाभ नहीं होगा, कल्याण नहीं होगा। वे सब के कल्याण के लिए खटते रहे। कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर ने कृपाचार्य को सम्मान का स्थान दिया।

श्रीनिवासन आज के राष्ट्र संघ की तुलना कृपाचार्य से करते हैं। आज का राष्ट्र संघ विश्व में युद्ध की समाप्ति हेतु प्रयासरत रहता है। न्यायोचित बातों के पक्ष में रहता है। राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद यद्यपि युद्ध की समाप्ति नहीं हुई फिर भी राष्ट्र संघ की मौजूदगी के कारण तीसरा महायुद्ध नहीं हुआ। कृपाचार्य का सयानापन और बुद्धिमत्ता राष्ट्र संघ के रूप में प्रकट होती है। संवाद और विवेक यह राष्ट्र संघ की विशेषता है और कृपाचार्य की भी यह खासियत थी। राष्ट्र संघ के निर्माण में भारत की मुख्य सहभागिता है। इस अध्याय में राष्ट्र संघ का काम कैसे चलता है, यश- अपयश क्या है, भारत के संदर्भ में राष्ट्र संघ का विचार कैसे किया जाता है आदि विषय 7 अध्यायों में विशद किए गए हैं। Kripacharya:The United Nation इस अध्याय में इस विषय को रखा गया है।

बलीराजा यह छठवें अमर पुरुष हैं। टी. पी. श्रीनिवासन केरल के होने के कारण बलीराजा और केरल उनके लिए भावनात्मक विषय हैं ऐसा प्रतीत होता है। बलीराजा की प्रसिद्धि, गुणों का सागर, सत्यवादिता, और दानवीरता के विषय में है। इन गुणों में वे अतुलनीय हैं। उनका राज्य वामन द्वारा छल से समाप्त किया गया ऐसी पौराणिक कथा है। बलि का राज्य याने भगवान का राज्य! वहां अनाचार, भ्रष्टाचार, दुख, दीनता, दारिद्र्य, कुछ भी नहीं था। उनके स्मरणार्थ केरल में ओणम उत्सव मनाया जाता है।

उस समय का केरल आज नहीं रहा। केरल में जातीयता, अस्पृश्यता, एक समय बहुत बड़े प्रमाण में थी यद्यपि आज वह कम हो गई है फिर भी मद्यपान, सांप्रदायिकता, बढ़ती आत्महत्याएं इनसे केरल ग्रस्त है। इस विभाग में टी.पी. श्रीनिवासन ने 7 लेखों में केरल की स्थिति के संबंध में वर्णन किया है। शिक्षा के क्षेत्र में केरल द्वारा की गई प्रगति की जानकारी इसमें दी है।

Mahabali: The Kerala Landscape इस अध्याय में उन्होंने इस विषय का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है।

सात अमर व्यक्तियों में भगवान श्री व्यास का क्रमांक सातवां आता है। इस अध्याय का शीर्षक है, तूरीर: ढहश चरीींशी डीेीूींंशश्रश्रशी (कथाकथन में निष्णात व्यास) व्यास ऋषि थे और विख्यात कथाकार थे। हिंदू धर्म तत्व ज्ञान के ग्रंथ उन्होंने लिखें। उनमें ब्रह्मसूत्र, श्रीमद् भागवत, 18 पुराण और महाभारत का समावेश होता है। जो महाभारत में नहीं वह विश्व में नहीं ऐसा कहा जाता है। वे सनातन धर्म के संरक्षक और प्रचारक थे। भ्रातृ भावना की संकल्पना उनके द्वारा बताए गए सनातन धर्म का भाग है। सामान्य व्यक्ति को सुखी और ज्ञानी बनाने के लिए सभी ग्रंथों की रचना उन्होंने की। उम्र के बंधनों के परे जाकर सभी को उनके ग्रंथ अच्छे लगते हैं।

संभाषण कुशलता, अपना संदेश अलग-अलग माध्यमों से प्रभावी रूप से पहुंचाने की कला, यह व्यासजी के माध्यम से सभी लेखक, वक्ता, राजनीतिज्ञ और पत्रकारों को सीखनी चाहिए। ज्ञान और नैतिकता यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी की ओर हस्तांतरित करनी पड़ती है। वह कैसे करना यह व्यास जी ने दिखाया है। इस विभाग में श्रीनिवासन ने राजदूत के रूप में अपने अनुभवों में पाठकों को सहभागी कर बताया है। वैसे ही अलग-अलग मंचों से जो अलग-अलग विषय रखे हैं, वे भी इस विभाग में समाविष्ट हैं।

ऐसे इन 7 अमर महात्माओं विषयक पुस्तक हमें आधुनिक विश्व में, विदेश नीति में और देश के अंतर्गत कुछ प्रश्नों की ओर ले जाती है। स्वतंत्रता के 70 वर्षों बाद क्यों ना हो, देश चलाने वाले कर्तृत्ववान नेताओं को अपनी जड़े खोजने का ध्यान होने लगा है, यह खुशी की बात है। हम कौन हैं, किसके वंशज हैं, विदेश नीति सरीखे कठिन विषय में भी हमारे पूर्वजों का योगदान कितना है, यह श्री टी.पी. श्रीनिवासन ने अपनी पुस्तक में विशद किया है। अपने अस्मिता की खोज करने का यह प्रयास अभिनंदनीय और प्रशंसनीय है।

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